राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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प्रकार की शक्तियो का विकास हुआ है, उनकी समष्टि चिरकाल समान रहती है, वे शक्तियाँ कल्प के अन्त मे शान्तभाव धारण करती है—अव्यक्त अवस्था मे गमन करती है, और दूसरे कल्प के आदि मे वे ही फिर से व्यक्त होकर आकाश पर कार्य करती रहती है। इसी आकाश से परिदृश्यमान साकार वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, और आकाश के परिणाम-प्राप्त होने पर यह प्राण भी नाना प्रकार की शक्तियो मे परिणत होता रहता है। इस प्राण के यथार्थ तत्त्व को जानना और उसको सयत करने की चेष्टा करना ही प्राणायाम का प्रकृत अर्थ है।
इस प्राणायाम मे सिद्ध होने पर हमारे लिए मानो अनन्त शक्ति का द्वार खुल जाता है। मान लो, किसी व्यक्ति की समझ मे यह प्राण का विषय पूरी तरह आ गया और वह उस पर विजय प्राप्त करने मे भी कृतकार्य हो गया, तो फिर ससार में ऐसी कौनसी शक्ति है, जो उसके अधिकार मे न आए ? उसकी आज्ञा से चन्द्र-सूर्य अपनी जगह से हिलने लगते है, क्षुद्रतम परमाणु से बृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते है, क्योकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्य है। जब योगी सिद्ध हो जाते है, तब प्रकृति मे ऐसी कोई वस्तु नही, जो उनके वश मे न आ जाय। यदि वे देवताओ का आह्वान करेगे, तो वे उनकी आज्ञामात्र से आ उपस्थित होगे, यदि मृत व्यक्तियो को आने की आज्ञा देगे, तो वे तुरन्त हाजिर हो जायेंगे। प्रकृति की समुदाय शक्ति उनकी आज्ञा से दासी की तरह काम करने लगेगी। अज्ञ जन योगी के इन कार्यकलापो को अलौकिक समझते है। हिंदुओ का यह एक विशेषत्व है कि वे
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जिस किसी तत्त्व की आलोचना करते हैं, पहले उसके भीतर, यथासम्भव, एक साधारण भाव का अनुसन्धान करते हैं, और उसके भीतर जो कुछ विशेष है, उसको बाद में मीमांसा के लिए रख देते हैं। वेद में यह प्रश्न बार-बार पूछा गया है, “कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिद विज्ञात भवति ?”†—ऐसी कौनसी वस्तु है, जिसका ज्ञान होने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है? इस प्रकार, हमारे जितने शास्त्र हैं, जितने दर्शन हैं, सब-के-सब उसी के निर्णय में लगे हुए हैं, जिसके जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति जगत् का तत्त्व थोडा-थोडा करके जानना चाहे, तो उसे अनन्त समय लग जायगा, क्योकि फिर तो उसे बालू के एक-एक कण तक को भी अलग-अलग रूप से जानना होगा। अत यह स्पष्ट है कि इस प्रकार सब कुछ जानना एक प्रकार से असम्भव है। तब फिर इस प्रकार के ज्ञानलाभ की सम्भावना कहाँ है? एक-एक विषय को अलग-अलग रूप से जानकर मनुष्य के लिए सर्वज्ञ होने की सम्भावना कहाँ है? योगी कहते हैं, इन सब विशिष्ट अभिव्यक्तियों के पीछे एक साधारण सत्ता है। उसको पकड सकने या जान लेने पर सब कुछ जाना जा सकता है। इसी प्रकार, वेदो में सम्पूर्ण जगत् को उस एक अखण्ड निरपेक्ष सत्स्वरूप में पर्यवसित किया है। जिन्होने इस ‘अस्ति’-स्वरूप को पकड़ा है वे ही सम्पूर्ण विश्व को समझ सके हैं। उक्त प्रणाली से ही समस्त शक्तियो को भी इस प्राणरूप साधारण शक्ति में पर्यवसित किया है। अतएव जिन्होने प्राण को पकड़ा है, उन्होने ससार में जितनी आधिभौतिक या आध्यात्मिक शक्तियाँ हैं, सबको पकड़ लिया है। जिन्होने प्राण
† मुण्डक उपनिषद्—१।३
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को जीता है, उन्होने अपने मन को ही नही, वरन् सबके मन को भी जीत लिया है। उन्होने अपनी देह और दूसरी जितनी देह हैं, सबको अपने अधीन कर लिया है, क्योकि प्राण ही सारी शक्तियो का मूल है।
किस प्रकार इस प्राण पर विजय पाई जाय, यही प्राणायाम का एकमात्र उद्देश्य है। इस प्राणायाम के सम्बन्ध में जितनी साधनाएँ और उपदेश हैं, सबका यही एक उद्देश्य है। हर एक साधनार्थी को, उसके सबसे समीप जो कुछ है, उसी से साधना शुरू करनी चाहिए—उसके निकट जो कुछ है, उस सब पर विजय पाने की चेष्टा करनी चाहिए। ससार की सारी वस्तुओ मे देह हमारे सबसे निकट है, मन उससे भी निकटतर है। जो प्राण ससार मे सर्वत्र क्रीडा कर रहा है, उसका जो अश इस शरीर और मन को चलाता है, वही अश हमारे सबसे निकट है। यह जो क्षुद्र प्राण-तरग है—जो हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियो के रूप से परिचित है, वह अनन्त प्राण-समुद्र में हमारे सबसे पास की तरग है। यदि हम उस क्षुद्र तरग पर विजय पा ले, तभी हम समस्त प्राण-समुद्र को जीतने की आशा कर सकते हैं। जो योगी इस विषय मे कृतकार्य होते हैं, वे सिद्धि पा लेते हैं, तब कोई भी शक्ति उन पर प्रभुत्व नही जमा सकती। वे एक प्रकार से सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हो जाते हैं। हम सभी देशो मे ऐसे सम्प्रदाय देखते है, जो किसी-न-किसी उपाय से इस प्राण पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे है। इसी देश मे (अमेरिका में) हम मन शक्ति से आरोग्य करनेवाले (Mind-healers), विश्वास से आरोग्य करनेवाले (Faith-healers), प्रेततत्त्ववित् (Spiritualists), ईसाई
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'क्रिश्चियनवित् (Christian Scientists)*, वशीकरणविद्यावित् (Hypnotists), आदि अनेक सम्प्रदाय देखते है। यदि हम इन मतो का विशेष रूप से विश्लेषण करे, तो देखेंगे कि इन सब मतो के मूल मे—वे फिर जाने या न जाने—प्राणायाम ही है। उन सब मतो के मूल मे एक ही बात है। वे सब एक ही शक्ति को लेकर कार्य कर रहे हैं, पर हाँ, वे उसके सम्बन्ध मे कुछ जानते नही। उन लोगो ने एकाएक मानो एक शक्ति का आविष्कार कर डाला है, परन्तु उस शक्ति के स्वरूप के सम्बन्ध में बिलकुल अनभिज्ञ है। योगी जिस शक्ति का परिचालन करते है, ये भी बिना जाने-बूझे उसी का परिचालन कर रहे है। वह प्राण की ही शक्ति है।
यह प्राण ही समस्त प्राणियो के भीतर जीवनी-शक्ति के रूप मे विद्यमान है। मनोवृत्ति इसकी सूक्ष्मतम और उच्चतम अभिव्यक्ति है। जिसे हम साधारणत मनोवृत्ति की आख्या देते है, मनोवृत्ति कहने से केवल उसका बोध नही होता। मनो-वृत्ति के अनेक प्रकार हैं। जिसे हम सहज ज्ञान (instinct) अथवा ज्ञानरहित चित्त-वृत्ति अथवा मन की अचेतन भूमि कहते हैं, वह हमारा निम्नतम कार्यक्षेत्र है। मान लो, मुझे एक मच्छड़ ने काटा, तो मेरा हाथ अपने ही आप उसे मारने को उठ जाता है। उसे मारने के लिए हाथ को उठाते-गिराते मुझे कोई विशेष सोच-विचार नही करना पड़ता। यह एक प्रकार की मनोवृत्ति है। शरीर की समस्त ज्ञानरहित प्रतिक्रियाएँ
* टिप्पणी के लिए पृष्ठ २५ देखिए।