राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
३५६ राजयोग
३५६ राजयोग
सकता है? हाँ, 'ओम्' (अउम्) ही वह शब्द है, वही सारे शब्दो की भित्तिस्वरूप है। उसका प्रथम अक्षर 'अ' सभी शब्दो का मूल है—वह सारे शब्दो की कुजी के समान है, वह जिह्वा या तालु के किसी अंश को स्पर्श किए बिना ही उच्चारित होता है। 'म' समस्त शब्दो का अन्तिम शब्द है, उसका उच्चारण करने में दोनो ओठो को बन्द करना पडता है। और 'उ' शब्द जिह्वा के मूल से लेकर मुख के मध्यवर्ती शब्दाधार की अन्तिम सीमा तक मानो ढुलकता आता है। इस प्रकार 'ॐ' शब्द के द्वारा शब्दोच्चारण की सम्पूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती है। अतएव वही स्वाभाविक वाचक-शब्द है, वही सब विभिन्न शब्दो की जननीस्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते है—हमारी ताकत मे जितने प्रकार के शब्द-उच्चारण की सम्भावना है, 'ओम्' उन सभी का सूचक है। यह सब तात्त्विक चर्चा छोड देने पर भी, हम देखते है कि भारतवर्ष में जितने सारे विभिन्न धर्मभाव है, यह ओंकार उन सबका केन्द्रस्वरूप है, वेद के सब विभिन्न धर्मभाव इस ओंकार का ही अवलम्बन किए हुए हैं। अब प्रश्न यह है कि इसके साथ अमेरिका, इगलैण्ड और अन्यान्य देशो का क्या सम्बन्ध है ? उत्तर यह है कि सब देशों मे इस ओंकार का व्यवहार हो सकता है। कारण, भारतवर्ष में धर्म के विकास की प्रत्येक अवस्था मे—उसके प्रत्येक सोपान में ओंकार को अपनाया गया है, उसका आश्रय लिया गया है और वह ईश्वर सम्बन्धी सारे विभिन्न भावो को व्यक्त करने के लिए व्यवहृत हुआ है। अद्वैतवादी, द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी, भेद-वादी, यहाँ तक कि नास्तिको ने भी अपने उच्चतम आदर्श को प्रकट करने के लिए इस ओंकार का अवलम्बन किया था।
पातंजल-योगसूत्र १५७
मानव-जाति के अधिकांश के लिए यह ओंकार उनकी अपनी धार्मिक स्पृहा का एक प्रतीक बन गया है। अतएव अन्य सब देशो की विभिन्न जातियां भी इसका अवलम्बन कर सकती है। अँगरेजी गॉड (God) शब्द को लो। वह जिस भाव को प्रकट करता है, वह कोई अधिक दूर तक नही जा सकता। यदि तुम उसके अतिरिक्त अन्य कोई भाव उस शब्द से व्यक्त करने की इच्छा करो, तो तुम्हे उसमे विशेषण लगाना पडेगा—जैसे Personal (सगुण), Impersonal (निर्गुण), Absolute (निर्विशेष) आदि-आदि। अन्य दूसरी भाषाओ मे ईश्वर-वाचक जो सब शब्द हैं, उनके बारे मे भी यही बात घटती है, उनमे बहुत कम भाव प्रकट करने की शक्ति है, किन्तु 'ॐ' शब्द मे ये सभी प्रकार के भाव विद्यमान है। अतएव सर्वसाधारण को उसका ग्रहण करना चाहिए।
तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥
**सूत्रार्थ—**इस (ओंकार) का जप और उसके अर्थ का ध्यान (समाधि-लाभ का उपाय है)।
**व्याख्या—**जप अर्थात् बारम्बार उच्चारण की आवश्यकता क्या है? हम सस्कार-विषयक मतवाद को न भूले होगे, हमे स्मरण होगा कि समस्त सस्कारो की समष्टि हमारे मन में विद्यमान है। ये सस्कार क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होकर अव्यक्त भाव धारण करते है। पर वे बिलकुल लुप्त नही हो जाते, वे मन के अन्दर ही रहते है, और ज्योही उन्हे यथोचित स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे मानस-सरोवर की सतह पर उठ आते हैं। परमाणु-कम्पन कभी बन्द नही होता। जब यह सारा ससार नाश को प्राप्त होता है, तब सब बड़े-बड़े कम्पन या प्रवाह लुप्त
१५८ राजयोग
हो जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, सभी लय को प्राप्त हो जाते है, पर परमाणुओं मे का कम्पन बच रहता है। इन बड़े बड़े ब्रह्माण्डो मे जो कार्य होता है, प्रत्येक परमाणु वही कार्य करता है। ठीक ऐसा ही चित्त के बारे मे भी है। चित्त में होनेवाले सब कम्पन अदृश्य अवश्य हो जाते हैं, फिर भी परमाणु के कम्पन के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है, और ज्योही उन्हे कोई स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे पुन बाहर आ जाते है। अब हम समझ सकेगे कि जप अर्थात् वारम्वार उच्चारण का तात्पर्य क्या है। हम लोगो के अन्दर जो धर्म के सस्कार हैं, उन्हे विशेष रूप से बल देने मे यह प्रधान सहायक है।
"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका। भवति भवार्णवतरणे नौका।"*
—साधुओं की एक क्षण की भी संगति भवसागर पार होने के लिए नौका-स्वरूप है। सत्संग की ऐसी जबरदस्त शक्ति है! बाह्य सत्संग की जैसी शक्ति बतलाई गई है, वैसी ही आन्तरिक सत्संग की भी है। इस ओंकार का बारम्बार जप करना और उसके अर्थ का मनन करना ही आन्तरिक सत्संग है। जप करो और उसके साथ उस शब्द के अर्थ का ध्यान करो। ऐसा करने से, देखोगे, हृदय मे ज्ञानालोक आयगा और आत्मा प्रकाशित हो जायगी।
'ॐ' शब्द पर मनन तो करोगे ही, पर साथ ही उसके अर्थ पर भी मनन करो। कुसंगति छोड़ दो, क्योकि पुराने घाव के चिह्न अभी भी बने हुए है, उन पर कुसंगति की गर्मी लगने भर की देर है कि बस वे फिर से ताजे हो उठेंगे। ठीक इसी प्रकार हम लोगो मे जो उत्तम सस्कार है, वे भले ही अभी अव्यक्त हो, पर
* शंकराचार्यकृत मोहमुद्गर, ५।