राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
२८२ राजयोग
२८२ राजयोग
गुरुणोक्तप्रकारेण रहस्येवं समभ्यसेत् ।
प्रातर्मध्यंदिने सायं स्नात्वा षट्कृत्व आचरेत् ॥
सन्ध्यादिकर्म कृत्वैव मध्यरात्रेऽपि नित्यशः ।
नाडीशुद्धिमवाप्नोति तच्चिह्नं दृश्यते पृथक् ॥
शरीरलघुता दीप्तिर्जठराग्निविवर्धनम् ॥
नादाभिव्यक्तिरित्येतल्लिङ्गं तच्छुद्धिसूचनम् ॥
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प्राणायामं ततः कुर्याद्रेचपूरककुम्भकैः ॥
प्राणापानसमायोगः प्राणायामः प्रकीर्तितः ॥
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पूरयेत् षोडशैर्मात्रैरापादतलमस्तकम् ।
मात्रैर्द्वात्रिंशकैः पश्चाद्रेचयेत् सुसमाहितः ॥
सम्पूर्णकुम्भवद्वायोर्निश्चल मूर्ध्नदेशतः ।
कुम्भक धारणं गार्गि चतु.षष्ट्या तु मात्रया ॥
ऋपयस्तु वदन्त्यन्ये प्राणायामपरायणाः ।
पवित्रभूताः पूतान्त्रा. प्रभञ्जनजये रता ॥
तत्रादौ कुम्भकं कृत्वा चतु.षष्ट्या तु मात्रया ।
रेचयेत् षोडशर्मात्रैर्नासिनेकेन सुन्दरि ॥
तयोश्च पूरयेद्वायुं शनै. पोडशमात्रया ।
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प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्च किल्विषान् ।
प्रत्याहाराच्च संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥
व्याख्या—यथाविधि वांछित आसनों का अभ्यास करके, तदनन्तर, हे गार्गि, आसन पर जय प्राप्त कर प्राणायाम का।
परिशिष्ट २८३-
अभ्यास करना चाहिए। कोमल आसन पर सम्यक् प्रकार से कुश बिछा, उस पर मृगचर्म बिछाकर, फल और मोदक आदि के द्वारा गणेश की पूजा करके, उस आसन पर सुखासीन होकर, बाएँ हाथ पर दाहिना हाथ रखकर, समग्रीवशिर हो, मुँह बन्द करके, निश्चल होकर, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठकर, नासाग्र मे दृष्टि को स्थापित करके, यत्नपूर्वक अतिभोजन या एकदम अनाहार का त्याग कर पूर्वोक्त प्रकार से यत्नपूर्वक नाडी का शोधन करे, यह नाड़ी शोधन न करने पर उसके साधन के सारे क्लेश निष्फल होते हैं। पिंगला और इड़ा के संयोगस्थल मे (दाहिनी और बाईं नाक के सयोग-स्थल मे) 'हु' बीज का चिन्तन करके इडा के द्वारा द्वादश-मात्रा-क्रम से बाह्य वायु को भीतर खींचे, उसके बाद उस स्थान मे अग्नि का चिन्तन तथा 'र' बीज का ध्यान करे, इस तरह ध्यान करने के समय धीरे-धीरे पिंगला (दाहिनी नाक) के द्वारा वायु का रेचन करे। पुनः पिंगला के द्वारा पूरक करके पूर्वोक्त प्रकार से धीरे-धीरे इडा के द्वारा रेचन करे। श्रीगुरु के उपदेशानुसार इसका तीन-चार वर्ष या तीन-चार मास अभ्यास करे। प्रात काल, मध्याह्न, सायकाल तथा मध्यरात्रि में, जब तक नाड़ीशुद्धि नही हो जाती, तब तक एकान्त में अभ्यास करना होगा। तब उनमें ये सब लक्षण प्रकाशित होते हैं, जैसे, शरीर का हल्कापन, सुन्दर वर्ण, क्षुधा तथा नादश्रवण। तत्पश्चात् रेचक, कुम्भक और पूरकात्मक प्राणायाम करना होगा। अपान के साथ प्राण का योग करने का नाम है प्राणायाम। १६ मात्राओ में मस्तक से लेकर पद तक पूरक, ३२ मात्राओ मे रेचक और ६४ मात्राओ में कुम्भक करे।