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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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२०४ राजयोग

हमें करना ही पड़ेगा, पर स्मरण रहे, हम अपना चरम लक्ष्य कभी न भूलें।

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१९॥

सूत्रार्थ—विशेष (भूतेन्द्रिय), अविशेष (तन्मात्र अस्मिता), केवल चिह्नमात्र (महत्) और चिह्नशून्य (प्रकृति)—ये चार (सत्त्वादि) गुणों की अवस्थाएँ हैं।

व्याख्या—यह पहले कहा जा चुका है कि योगशास्त्र सांख्यदर्शन पर स्थापित है; यहाँ पर फिर से सांख्यदर्शन का जगत्-सृष्टिप्रकरण स्मरण कर लेना आवश्यक है। सांख्यमत से, प्रकृति ही जगत् का निमित्त और उपादान कारण है। यह प्रकृति तीन प्रकार के धातुओं से निर्मित है—सत्त्व, रज और तम। तम पदार्थ केवल अन्धकारस्वरूप है, जो कुछ अज्ञानात्मक और भारी है, सभी तमोमय है। रज क्रियाशक्ति है। और सत्त्व स्थिर एव प्रकाशस्वभाव है। सृष्टि के पूर्व प्रकृति जिस अवस्था में रहती है, उसे सांख्यमतावलम्बी दार्शनिकगण अव्यक्त, अविशेष या अविभक्त कहते हैं, इसका तात्पर्य यह कि इस अवस्था में नाम-रूप का कोई भेद नहीं रहता, इस अवस्था में ये तीनों पदार्थ पूर्ण साम्यभाव से रहते हैं। उसके बाद जब यह साम्यावस्था नष्ट होकर वैषम्यावस्था आती है, तब ये तीनों पदार्थ अलग-अलग रूप से परस्पर मिश्रित होते रहते हैं और उनका फल है यह जगत्। प्रत्येक मनुष्य में भी ये तीन पदार्थ विद्यमान हैं। जब सत्त्व प्रबल होता है, तब ज्ञान का उदय होता है, रज प्रबल होने पर क्रिया की वृद्धि होती है, और तम प्रबल होने पर अन्धकार, आलस्य और अज्ञान आते हैं। सांख्यमत के अनुसार, त्रिगुणमयी प्रकृति का सर्वोच्च प्रकाश है महत् या बुद्धि-

पातंजल-योगसूत्र-२ २०५

तत्त्व—उसे सर्वव्यापी या सार्वजनीन बुद्धितत्त्व कहते हैं। प्रत्येक मानव-बुद्धि इस सर्वव्यापी बुद्धितत्त्व का एक अंश-मात्र है। सांख्य-मनोविज्ञान के मत से, मन और बुद्धि में विशेष भेद है। मन का काम है केवल विषय के आघात से उत्पन्न संवेदनाओं को भीतर ले जाकर एकत्रित करना और उन्हें बुद्धि अर्थात् व्यष्टि या व्यक्तिगत महत् के सामने रख देना। बुद्धि उन सब विषयों का निश्चय करती है। महत् से अहंतत्त्व और महत्तत्त्व से सूक्ष्म भूतों की उत्पत्ति होती है। ये सूक्ष्म भूत फिर परस्पर मिलकर इन बाहरी स्थूल भूतों में परिणत होते हैं; उसी से इस स्थूल जगत् की उत्पत्ति होती है। सांख्यदर्शन का मत है कि बुद्धि से लेकर पत्थर के एक टुकड़े तक सभी एक ही पदार्थ से उत्पन्न हुए हैं, उनमें जो भेद है, वह केवल उनकी सूक्ष्मता और स्थूलता में ही है। सूक्ष्म कारण है और स्थूल कार्य। सांख्यदर्शन के मतानुसार, पुरुष समग्र प्रकृति के बाहर है, वह जड़ नहीं है। पुरुष बुद्धि, मन, तन्मात्रा या स्थूल भूत इनमें से किसी के भी समान नहीं है। वह सर्वथा अलग है, उसका स्वभाव सम्पूर्णत भिन्न है। इससे वे यह सिद्धान्त स्थिर करते हैं कि पुरुष अवश्य मृत्युरहित, अजर और अमर होना चाहिए, क्योंकि वह किसी प्रकार के मिश्रण से उत्पन्न नहीं हुआ है। और जो किसी मिश्रण से उत्पन्न नहीं हुआ है, उसका कभी नाश भी नहीं हो सकता। इन पुरुषों या आत्माओं की संख्या अनगिनती है।

अब हम इस सूत्र का तात्पर्य समझ सकेंगे। 'विशेष' शब्द स्थूल भूतों को लक्ष्य करता है—जिनकी हम इन्द्रियों से उपलब्धि कर सकते हैं। 'अविशेष' का अर्थ है सूक्ष्म भूत—

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तन्मात्रा, इन तन्मात्राओ की उपलब्धि साधारण मनुष्य नही कर सकते। किन्तु पतञ्जलि कहते है, ‘यदि तुम योग का अभ्यास करो, तो कुछ दिनो वाद तुम्हारी अनुभव-शक्ति इतनी सूक्ष्म हो जायगी कि तुम सचमुच तन्मात्राओ को भी देख सकोगे।’ तुम लोगो ने सुना होगा कि हर एक मनुष्य की अपनी एक प्रकार की ज्योति होती है, प्रत्येक प्राणी के भीतर से हमेशा एक प्रकार का प्रकाश बाहर निकलता रहता है। पतञ्जलि कहते है, योगी ही उसे देखने मे समर्थ होते है। हममे से सभी उसे नही देख पाते, फिर भी जिस प्रकार फूल में से सदैव फूल की सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमाणुस्वरूप तन्मात्राएँ बाहर निकलती रहती हैं, जिसके द्वारा हम उसकी गन्ध ले सकते है, उसी प्रकार हमारे शरीर से भी ये तन्मात्राएँ सतत निकल रही है। प्रति दिन हमारे शरीर से शुभ या अशुभ किसी-न-किसी प्रकार की शक्तिराशि बाहर निकलती रहती है। अतएव हम जहाँ भी जायेंगे, वही आकाश इन तन्मात्राओ से पूर्ण होकर रहेगा। इसका असल रहस्य न जानते हुए भी, इसी से मनुष्य के मन में अनजाने मन्दिर, गिर्जा आदि बनाने का भाव आया है। भगवान को भजने के लिए मन्दिर बनाने की क्या आवश्यकता थी ? क्यो, कही भी तो ईश्वर की उपासना की जा सकती थी। फिर यह सब मन्दिर आदि क्यो, इसका कारण यह है कि स्वय इस रहस्य को न जानने पर भी, मनुष्य के मन में स्वाभाविक रूप से ऐसा उठा था कि जहाँ पर लोग ईश्वर की उपासना करते है, वह स्थान पवित्र तन्मात्राओ से परिपूर्ण हो जाता है। लोग प्रति दिन वहाँ जाया करते है, और मनुष्य जितना ही वहाँ आते-जाते हैं, उतना ही वे पवित्र होते जाते हैं और साथ ही वह स्थान