राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
१६ राजयोग
१६ राजयोग
उसने उतनी ही अधिक युक्तियुक्त बात कही है। आधुनिक लेखको मे ऐसे अनेक हैं, जो नाना प्रकार की रहस्यात्मक और अद्भुत-अद्भुत बाते कहा करते हैं। इस प्रकार, जिनके हाथ यह शास्त्र पडा, उन्होने समस्त शक्तियाॅँ अपने अधिकार मे कर रखने की इच्छा से इसको महा गोपनीय और आश्चर्यजनक बना डाला और युक्तिरूप प्रभाकर का पूर्ण आलोक इस पर न पडने दिया।
मै पहले ही कह देना चाहता हूँ कि मै जो कुछ प्रचार कर रहा हूँ, उसमे गुह्य नाम की कोई चीज नहीं है। मै जो कुछ थोडासा जानता हूँ, वही तुमसे कहूँगा। जहाँ तक यह युक्ति से समझाया जा सकता है, वहाँ तक समझाने की कोशिश करूँगा। परन्तु मै जो नही समझ सकता, उसके बारे मे कह दूँगा, "शास्त्र का यह कथन है।" अन्धविश्वास करना अन्याय है। अपनी विचार-शक्ति और युक्ति काम मे लानी होगी। यह प्रत्यक्ष करके देखना होगा कि शास्त्र मे जो कुछ लिखा है, वह सत्य है या नही। जडविज्ञान तुम जिस ढग से सीखते हो, ठीक उसी प्रणाली से यह धर्मविज्ञान भी सीखना होगा। इसमे गुप्त रखने की कोई बात नही, किसी विपत्ति की भी आशका नही। इसमे जहाँ तक सत्य है, उसका सबके समक्ष राजपथ पर प्रकट रूप से प्रचार करना आवश्यक है। यह सब किसी प्रकार छिपा रखने की चेष्टा करने से अनेक प्रकार की विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं।
कुछ और अधिक कहने के पहले मै सांख्य-दर्शन के सम्बन्ध में कुछ कहूँगा। इस सांख्य-दर्शन पर राजयोग-विद्या स्थापित है। सांख्य-दर्शन के मत से किसी विषय के ज्ञान की प्रणाली इस प्रकार है—प्रथमत विषय के साथ चक्षु आदि वाह्य करणो का सयोग
अवतरणिका १७
होता है। ये चक्षु आदि बाहरी करण फिर उसे मस्तिष्क-स्थित अपने-अपने केन्द्र अर्थात् इन्द्रियों के पास भेजते हैं, इन्द्रियाँ मन के निकट, और मन उसे निश्चयात्मिका बुद्धि के पास ले जाता है, तब पुरुष या आत्मा उसका ग्रहण करती है। फिर जिस सोपान-क्रम में से होता हुआ वह विषय अन्दर आया था, उसी में से होते हुए लौट जाने की पुरुष मानो उसे आज्ञा देता है। इस प्रकार विषय गृहीत होता है। पुरुष को छोड़कर शेष सब जड़ है। पर आँख आदि बाहरी करणों की अपेक्षा मन सूक्ष्मतर भूत से निर्मित है। मन जिस उपादान से निर्मित है, उसके क्रमशः स्थूलतर होने पर तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। उनके और भी स्थूल हो जाने पर परिदृश्यमान भूतों की उत्पत्ति होती है। यही सांख्य का मनोविज्ञान है। अतएव बुद्धि और स्थूल भूत में अन्तर केवल मात्रा के तारतम्य में है। एकमात्र पुरुष ही चेतन है। मन तो मानो आत्मा के हाथो एक यन्त्र है। उसके द्वारा आत्मा बाहरी विषयों को ग्रहण करती है। मन सतत परिवर्तनशील है, इधर से उधर दौड़ता रहता है, कभी सभी इन्द्रियों से लगा रहता है, तो कभी एक से, और कभी किसी भी इन्द्रिय से संलग्न नहीं रहता। मान लो, मैं मन लगाकर एक घड़ी की टिक-टिक सुन रहा हूँ। ऐसी दशा में आँखें खुली रहने पर भी मैं कुछ देख न पाऊँगा। इससे स्पष्ट समझ में आ जाता है कि मन जब श्रवणेन्द्रिय से लगा था, तो दर्शनेन्द्रिय से उसका संयोग न था। पर पूर्णता-प्राप्त मन सभी इन्द्रियों से एक साथ लगाया जा सकता है। उसकी अन्तर्दृष्टि की शक्ति है, जिसके बल से मनुष्य अपने अन्तर के सबसे गहरे प्रदेश तक में नजर डाल सकता है। इस अन्तर्दृष्टि का विकास-साधन ही योगी का उद्देश्य है। मन की समस्त शक्तियों
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