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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

प्रथमांक एवं द्वितीयांक: राम-वनगमन एवं महाराज दशरथ का देहावसान

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महाकवि भास विरचितम्
प्रतिमा नाटकम्
अनुवादक
डॉ० श्रीकृष्ण ओझा
अध्यक्ष, संस्कृत विभाग
राजकीय महाविद्यालय, टोंक
आदर्श प्रकाशन
चड़ा रास्ता, जयपुर-3
[मूल्य : रु० 8.00]

प्रतिमा नाटक की विषय-सूची
प्रस्तावना
भास का जीवन-वृत्त 1
भास का जन्म-स्थान 3
भास का काल-निर्णय 4
भास की रचनाएं 7
भास की कृतियों की प्रामाणिकता 8
भास की नाट्यकला का सस्कृत नाटकों पर प्रभाव 10
भास की भाषाशैली 11
नाटक का नामकरण 16
समालोचन 16
कथावस्तु 17
भास का कथावस्तु मे परिवर्तन 19
चरित्र-चित्रण 21
पद्यों की सूची 27
पात्र-परिचय 34
मूल नाटक, शब्दार्थ, अन्वय, अर्थ
प्रथम अंक 36
द्वितीय अंक 67
तृतीय अंक 85
चतुर्थ अंक 114
पंचम अंक 140
षष्ठ अंक 161
सप्तम अंक 182
प्रिंटिंग सेन्टर, चौड़ा रास्ता, जयपुर—3

भास का जीवनवृत्त
भास ने अपनी कृतियो मे अपने सम्बन्ध मे कुछ भी निर्देश नही किया
है । अतः इनके जीवनवृत्त के बारे मे निश्चित जानकारी प्राप्त करना कठिन
है । किन्तु इनके विषय मे कई किम्वदन्तिया प्रचलित है तथा उनकी रचनाओ
में भी कुछ ऐसे संकेत विद्यमान है, जिनसे उनके जीवन वृत्त पर प्रकाश
पडता है ।
दन्तकथाये — प्रचलित दन्तकथा के अनुसार भास जाति के धोबी या
धावक थे । आचार्य मम्मट ने काव्य प्रकाश मे इनका उल्लेख किया है । इसके
अनुसार श्री हर्ष की रत्नावली आदि नाटिकाओ के प्रणयन मे धावक कवि
सहायक था और उसको धन दिया गया था । कतिपय विद्वान् भास की उपाधि
धावक मानते है । किन्तु भास को श्री हर्ष कालीन स्वीकारना (सप्तम शताब्दी
ईस्वी) कथमपि युक्तियुक्त नही है ।
दूसरी किम्वदन्ती के अनुसार भास जाति के धोबी थे और उन्ही का
नाम घटकर्पर था । समीक्षा करने पर यह दन्तकथा भी तथ्यशून्य है, क्योकि
घटकर्पर कालिदास के समकालीन हैं । सम्राट् विक्रम की राजसभा के नवरत्नों
में कालिदास और घटकर्पर का नाम आता है । अतः भास और घटकर्पर की
अभिन्नता स्वीकार नही की जा सकती है ।
तीसरी दन्तकथा मे बताया गया है कि एक बार व्यास और भास मे
प्रतिष्ठा के लिए झगड़ा हुआ । व्यास अपने को श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली कवि
मानते थे और भास अपने को । निर्णय के लिए दोनों के ग्रन्थ अग्नि को
अर्पित किये गए । कहा जाता है कि व्यास के ग्रन्थो को अग्नि ने भस्म कर
दिया, पर भास के नाटको मे स्वप्नवासवदत्तम् अग्नि मे भस्म न हो सका ।
राजशेखर ने इसकी पुष्टि की है । इसका आशय यह है कि भास भी व्यास
के समान प्राचीन एव यशस्वी कवि है । इन दोनो के कल्पित कलह से यह भी
ध्वनित होता है कि नाटककार भास महाकवि व्यास के समान अनेक कृतियो
के लेखक हैं ।

( 2 )

एक ग्रंथ मत के, अनुसार प्राचीन समय मे गोत्र के नाम पर व्यक्ति के
नामकरण की प्रथा प्रचलित थी। पतंजलि, यौगन्धरायण, काश्यप आदि नाम
गोत्र के आधार पर ही प्रयुक्त हैं। अगस्त्य गोत्र की हेमीदक शाखा में "भाष"
गोत्र है। इसी गोत्र मे नाटककार भास का जन्म हुआ था। क्योकि भाष गोत्र
का अपभ्रंश रूप भास है। अतएव भास नाम गोत्र के नाम के आधार पर
प्रचलित हुआ है। भास जाति के ब्राह्मण थे और वर्णाश्रम धर्म के पोषक
थे। यज्ञ के प्रति इनकी अपूर्व आस्था अभिव्यक्त होती है।
कृतियों के आधार पर—पुसालकर महोदय का विचार है कि स्वप्न-
वासवदत्तम् और अविमारक रूपको के मंगलाचरण मे प्रयुक्त "त्वाम्" और
"ते" पद से यह ध्वनित होता है कि भास शासक नृपति थे। वे उन रूपको
के प्रथम अभिनय में स्वय सम्मिलित रहे होंगे, और उन्होंने उपस्थित
सामाजिकों के लिए आशीर्वाद के रूप मे "त्वाम्" और 'ते" पदों का उपयोग
किया होगा। प्रस्तुत सन्दर्भों मे त्वम् और ते पद का प्रयोग कवि की उपस्थिति
के साथ उसके प्रशासक होने का भी सूचक है।
प्रतिज्ञा, पंचरात्र और प्रतिमा रूपकों के मंगलाचरण मे कवि राजा
की उपस्थिति को निश्चित रूप से प्रतिपादित नहीं करता। वह सामाजिकों
के कल्याण का आशीर्वाद "वः पातु" पद द्वारा प्रदान करता है। अतः इन
रूपकों के मंगल श्लोकों से भास किसी राजसभा में निवास करने वाला राज-
कवि सिद्ध होता है।
भास की वैदिक क्रियाकांड के प्रति अपार आस्था है। वह धर्मभीरू,
सकल शास्त्रों का ज्ञाता, विनोत, प्रत्युत्पन्नमति, हास्यप्रिय, शिष्ट, गुरुजनों का
आज्ञाकारी एव कुशल भाषणकर्ता सिद्ध होता है। चाटुकारिता से रहित
स्पष्टवादी और राष्ट्रकवि के रूप में भास को माना जा सकता है।
भास की रचनाओं से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि कवि मे देशभक्ति
कूट-कूट कर भरी है। इसी कारण विदेशी राजा के विनाश तथा एकच्छत्र
राज्य की वह कामना करता है। नाटकों के अन्तरंग परीक्षण से भास का
राष्ट्रप्रेम भी झलकता है। प्रतिज्ञा यौगन्धरायण नाटक में कर्मठ तथा सफल
मंत्री का अपने स्वामी के मंगल हेतु प्रतिज्ञा करना और उस कठोर
व्रत का तत्परता एव बुद्धिमता से पालन करना मंत्रियो के लिए आदर्श का

वस्तु है। मंत्रित्व के इतने सफल अंकन से 'भास' के किसी 'राजा के यहाँ मन्त्री'
होने की सूचना मिलती है। ऐसा ज्ञात होता है कि वे परम राजभक्त मंत्री थे
और किन्हीं कारणों से उनका देश निर्वासन किया गया था अथवा उन्हें स्वयं शत्रु
या किसी विदेशी राजा के यहाँ जाकर, रहना पड़ा हो और दक्षिण में उन्होंने
शरण ली हो। दक्षिण में इनकी कृतियों की प्राप्ति का भी यही कारण है।
भास मनुष्य स्वभाव और प्रकृति के पारखी हैं। इनकी रचनाओं से
यह संकेतित होता है कि इनका कौटुम्बिक जीवन सुखी था। ये कर्त्तव्यपरायण
पुत्र, निष्ठावान् पति एवं सन्तानप्रिय पिता थे। अविभक्त परिवार के प्रति
इनकी अपार आस्था थी। ये आशावादी व्यक्ति थे। न्याय व स्वतन्त्रता के
प्रेमी थे। राजकुलों से सम्बन्ध रहने के कारण राजप्रासाद तथा अन्तःपुरों के
सजीव चित्रण में विशेष रुचि प्रदर्शित की गई है। अमात्य, सेना, दूत, युद्ध
आदि के चित्रणों से भी यह सिद्ध होता है कि भास का सम्बन्ध किसी राज-
कुल से अवश्य था।
भास का जन्म स्थान
प्रायः संस्कृत के समस्त मूर्धन्य कवियों एवं नाटककारों के जन्मस्थान
और जन्मकाल के सम्बन्ध में ऐतिहासिक सामग्री का अभाव है। भास ने
अपने जन्म से भारत के किस भूभाग को अलंकृत किया था, यह निश्चित रूप
से नहीं कहा जा सकता है।
दक्षिणी भारत—भास के रूपकों की उपलब्धि केरल में होने से कुछ
इन्हें दाक्षिणात्य स्वीकार करते हैं। किन्तु भास ने उत्तर भारत के देश, नगर,
नदी, वन, पर्वत आदि का जैसा चित्रण किया है, वैसा दक्षिण का नहीं।
इनका दक्षिण भारत का ज्ञान रामायण और महाभारत के ज्ञान तक ही
सीमित है। रामायण की कथावस्तु को ग्रहण करने पर भी इन्होंने रामेश्वरम्
जैसे प्रसिद्ध तीर्थ का उल्लेख नहीं किया। अतः भौगोलिक निर्देशों के आधार
पर भास को दक्षिण का निवासी नहीं माना जा सकता। संभव है अपने
'उत्तरार्द्ध' जीवन में ये दक्षिण के प्रवासी रहे हों। सामाजिक दृष्टि से भी भास
द्वारा निरूपित रीति-रिवाज एवं प्रथायें उत्तर भारत की ही हैं।
उज्जयिनी—अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यह नगरी ई० पू० 400
वर्ष के लगभग प्रसिद्ध हो चुकी थी। उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों व पुराणों में
भी उज्जयिनी की प्रसिद्धि मानी गई है। भारतीय साहित्य में जिन सोलह

( 4 )
जनपदों का उल्लेख आया है, उनमें अवन्ती भी एक है। यह अवन्ती जनपद
दो भागों में विभक्त था—उत्तरी और दक्षिणी। उत्तरी भारत की राजधानी
उज्जयिनी थी और दक्षिण की माहिष्मती। बुद्ध के समय उज्जयिनी में
महासेन प्रद्योत राज्य करता था। इसकी पुत्री वासवदत्ता व उदयन की कथा
प्रतिज्ञा व स्वप्न नाटक में भास ने अंकित की है। अतः भास का यही
जन्मस्थान होना चाहिए, क्योंकि उज्जयिनी के प्रति इनकी ममता सर्वाधिक
है। भास ने इसके विभिन्न स्थानों का इतना सूक्ष्म तथा सांगोपांग वर्णन किया
है, जो आँखों से देखे बिना कभी सम्भव नहीं। अतः इसे भास का जन्मस्थान
मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है।
मगध— भास के रूपकों में मगध के प्रति भी श्रद्धा और आस्था है।
कवि ने राजगृह के समीपवर्ती वन प्रदेश और आश्रम का सजीव चित्रण किया
है। मगध जनपद के आश्रमों का सूक्ष्म चित्रण रहने से भास का जन्मस्थान
राजगृह या उसके आसपास का प्रदेश होना चाहिए, यह संभव है। भास ने
अपने नाटकों में नक्षत्र मुहूर्त का उल्लेख किया है। यह परम्परा प्राचीन होने
के साथ मगध से सम्बद्ध है। उज्जयिनी में तिथि मुहूर्त का प्रचार था और
मगध में नक्षत्रमुहूर्त का।
निष्कर्ष—भास के रूपकों के अध्ययन से इतना तो स्पष्ट है कि ये
उत्तर भारत के निवासी थे। उज्जयिनी और मगध इन दोनों से इनका घनिष्ठ
सम्बन्ध है। मगध यदि जन्मभूमि है तो उज्जयिनी प्रवास भूमि और उज्जयिनी
जन्मभूमि है तो मगध प्रवास भूमि। राजगृह और उज्जयिनी ये दोनों ही स्थान
भास के लिए विशेष सुपरिचित हैं। अतः इन दोनों में भौगोलिक महत्त्व की
दृष्टि से उज्जयिनी और सांस्कृतिक वर्णनों की प्रमुखता की दृष्टि से राजगृह
भास की जन्मभूमि सम्भाव्य है। समीचीन यह है कि उज्जयिनी जन्मभूमि है,
तो राजगृह कर्मभूमि। भास चन्द्रगुप्त मौर्य की राजसभा के अमात्य
कवि थे।
भास का काल-निर्णय
भास के काल-निर्धारण में विद्वानों में काफी मतभेद है। बाण द्वारा
भास के नाटकचक्र का निर्देश किए जाने के कारण भास का समय सातवीं
सदी ईस्वी के बाद का नहीं माना जा सकता है। डॉक्टर पुषालकरने भास की
रचनाओं के अन्तःपरीक्षण के आधार पर इनका समय ई. पू. चौथी-पाँचवी
9-10 शताब्दि राजसिंह शब्द का उल्लेख है जो
10 वीं शताब्दि का माना जाता है

(5)
शताब्दी माना है । भास के काल-निर्णय के सम्बन्ध में निम्नांकित बिन्दु अत्यन्त
महत्वपूर्ण हैं—
(1) प्रतिज्ञायौगन्धरायण, अविमारक एवं स्वप्नवासवदत्त में जिन
प्राचीन राज्यों का उल्लेख किया है, उनका अस्तित्व मौर्य युग के पूर्व महापद्म
नन्द के समय अर्थात् ई. पू 384 में वर्तमान था । चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में
छोटे-छोटे गणतन्त्र विलीन होकर बृहत्तर भारत में मिल गए थे । फलतः भास
द्वारा उल्लिखित राज्यों के आधार पर उनका समय ई. पू. चौथी सदी माना
जा सकता है ।
(2) भास ने दर्शक के समय में मगध की राजधानी राजगृह को बताया
है । अजातशत्रु के समय में मगध की राजधानी राजगृह से हटकर पाटलिपुत्र
में स्थापित हो गई थी । अतः भास का काल मौर्यकाल से पूर्व है ।
(3) भास की रचनाओं में भरत के नाट्यशास्त्र के नियमों का विरोध
पाया जाता है, जैसे—
(अ) भरत ने प्रस्तावना में नान्दी पाठ के अनन्तर काव्य के नाम-
निर्देश का निरूपण किया है किन्तु भास की रचनाओं में यह नहीं मिलता ।
(ब) नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रतिज्ञायौगन्धरायण चार अंकों का होने
से तथा दिव्यस्त्री कारणोपगत युद्ध होने से ईहामृग होना चाहिए, पर नाटक-
कार ने स्वयं ही इस नाटक के प्रारम्भ में इसे प्रकरण कहा है ।
(स) भरत ने मंच पर युद्ध, वध, आक्रमण एवं रुदन का निषेध किया
है । जबकि बालचरित में दामोदर द्वारा अरिष्टर्षभ्, मुष्टिका वध, ऊरुभंग में
दुर्योधन भीम युद्ध तथा अभिषेक में राम-रावण युद्ध वर्णित है । प्रतिमा में
दशरथ की मृत्यु, अभिषेक में वाली की मृत्यु तथा विभिन्न स्थानों पर शयन
आदि का वर्णन आया है । इससे स्पष्ट है कि भास ने नाट्यशास्त्र के नियमों
का अनुसरण नहीं किया है । अतएव भास को भरत से पूर्ववर्ती स्वीकार करना
तर्कसंगत है ।
(4) भास वात्स्यायन एवं उसके कामसूत्र से अपरिचित है । इसके
नाटकों में आए प्रेमसन्दर्भों में बाभ्रव्य का ही अनुकरण किया गया है । बाभ्रव्य
ने मन्दिर गमन, भ्रमण, उद्यान विहार, जलक्रीड़ा, विवाह, उत्सव, पर्व दुर्घटना,
अग्निकांड, चोरी, दृश्यदर्शन हेतु गमन आदि द्वारा प्रेमोद्भव का कथन किया

( 6 )
हैं। ये चारुदत्त, अविमारक, प्रतिज्ञा, स्वप्नवासवदत्त आदि मे मिलते हैं। इधर
वात्स्यायन के वर्णन पर अविमारक कथा के अध्ययन की छाया स्पष्ट है।
वात्स्यायन का समय चोल चित्रासेना, कुन्तल शातकर्णि, शातवाहन, मलयवती
एवं नरदेव चित्रलेखा के आख्यानो के प्राप्त होने के कारण ईस्वी सन् 140-
200 के लगभग है। भास इनसे पूर्ववर्ती हैं ।
(5) भास की रचनाओं की भाषा मे पाणिनी से यत्र-तत्र भिन्नता
उपलब्ध है। यथा सन्धि के नियमो का अतिक्रमण, आत्मनेपद के स्थान पर
परस्मैपद का प्रयोग, अकर्मक धातुओं का सकर्मक के समान प्रयोग, अनियमित
समास तथा प्रत्यय आदि। अतएव भास का समय पाणिनि से पूर्व या उनके
समकालीन होना चाहिए।
(6) शूद्रक के मृच्छकटिक पर भास के चारुदत्त का स्पष्ट प्रभाव है,
कुछ तो मृच्छकटिक को चारुदत्त का ही विकसित रूप मानते हैं। स्मिथ महोदय
ने शूद्रक का शासन काल ई. पू 220-197 माना है। अतः भास का काल
इससे पूर्व ही होना चाहिए ।
(7) भास ने नागवन, वेणुवन, राजगृह एव पाटलिपुत्र का उल्लेख
किया है। ये सभी स्थान बुद्ध के समय मे प्रसिद्ध हो चुके थे। अतः भास का
समय बुद्ध के पश्चात् मानना युक्तिसंगत है।
(8) भास ने मानवीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर, योगशास्त्र, बार्हस्पत्य अर्थ-
शास्त्र, प्राचेतस श्राद्धकल्प, मेधातिथि न्यायशास्त्र आदि का उल्लेख किया है।
इनमें से कोई भी ई. पू. चतुर्थ पंचम शताब्दी के बाद का नहीं है।
(9) डॉ० पुशालकर ने भास का समय महापद्म नन्द का राज्यकाल
बतलाया है। यह पहला शासक है, जिसने समस्त उत्तर भारत को अपने
अधीन किया था। भास के भरत वाक्य में जिस राज्य सीमा का निर्देश आया
है, वह राज्यसीमा महापद्म नन्द की है।
(10) अय्यर महोदय का अनुमान है कि भास कौटिल्य के समकालीन
है। कौटिल्य ने नन्दो के विनाश मे योगदान दिया था और चन्द्रगुप्त मौर्य को
भारत के चक्रवर्ती पद पर प्रतिष्ठित किया था। चाणक्य या कौटिल्य ने अपने
अर्थशास्त्र मे प्रतिज्ञा यौगन्धरायण का "नवं शरावं" (4·2) वाला पद्य उद्धृत

( 7 )
किया है। इससे स्पष्ट है कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय तक भास की
रचनाएं विख्यात हो चुकी थी।
(11) भास के कई नाटकों के भरत वाक्य में "राजसिंह" शब्द आया
है। मौर्य राजा स्वयं राजसिंह कहलाते थे। अय्यर महोदय का अनुमान है कि
चन्द्रगुप्त को ही राजसिंह कहा गया है। वही हिमालय से लेकर विंध्यपर्वत-
पर्यन्त समुद्र पृथ्वी का एकच्छत्र भोग करने वाला चन्द्रगुप्त मौर्य ही था। यही
प्रथम सम्राट् माना जाता है, जिसने प्रथम बार समस्त उत्तर भारत को संगठित
कर अपने शासन के अधीन किया था।
(12) भास के रूपकों में जैन और बौद्ध धर्म के प्रति किसी भी प्रकार
की सद्भावना नही दिखलाई पड़ती। अपितु जो भी धार्मिक आदर्श प्रस्तुत
किए गए है, वे वैदिक धर्म के है। भास ने अपनी कृतियों में सर्वत्र प्राचीन
वैदिक आदर्शों का ही चित्रण किया है। यह यथार्थ है कि क्रान्तिकारी जैन
और बौद्ध धर्म से भास परिचित थे तथा उन्होंने जैन और बौद्ध श्रमणों का
उपहास भी किया है। अतएव इनका समय ई. पू. चतुर्थ शती होना चाहिए।
(13) कालिदास ने मालविकाग्निमित्र नाटक की प्रस्तावना मे भास
को याद किया है। इस उल्लेख से स्पष्ट है कि भास कालिदास के पूर्ववर्ती हैं।
जो विद्वान् कालिदास का समय ई० पू० प्रथम सदी मानते है, उनके
मत से भास का समय ई. पू. चौथी शती मानने में कोई विरोध नहीं है।
अतः भास का समय ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी मानना अधिक
उचित है।
भास की रचनाएं
बहुत समय तक भास की रचनाएं अज्ञात रही और कालिदास, बाण,
राजशेखर आदि कवियों द्वारा की गई भास की प्रशंसा ही उपलब्ध थी। सन्
1912 ई. मे गणपति ने त्रिवेन्द्रम से भास के 13 नाटको का एक संग्रह
प्रकाशित किया। इनके नाम इस प्रकार हैं--
(1) प्रतिमा नाटक
(2) अभिषेक
(3) पंचरात्र
(4) मध्यम व्यायोग

( 8 )
(5) कर्णभार
(6) दूतवाक्य
(7) दूतघटोत्कच
(8) ऊरुभंग
(9) बालचरित
(10) प्रतिज्ञायौगन्धरायण
(11) स्वप्नवासवदत्त
(12) चारुदत्त
(13) अविमारक
कथावस्तु की दृष्टि से इन नाटकों के 5 वर्ग बनाए गए हैं—
(1) रामकथा वाले (प्रथम दो नाटक)
(2) महाभारत की कथा वाले (तीसरे से आठवें तक)
(3) कृष्ण कथा वाला (नवी संख्या का नाटक) .
(4) उदयन कथा के (दसवा व ग्यारहवा नाटक)
(5) लोककथा वाले (अन्तिम दो नाटक) !
भास की कृतियों की प्रामाणिकता
इस संबंध में तीन मत हैं—
प्रथम मत—कतिपय आलोचकों ने नाटकचक्र के रूपकों को केरलीय
रंगमंच के अभिनेता चाक्यारों की रचना माना है। उनका मत है कि यदि यह
नाटकचक्र भास द्वारा प्रणीत होता तो प्रस्तावना या स्थापना में भास का नाम
अवश्य आता। इनकी पाण्डुलिपियां केरल के अतिरिक्त अन्य प्रान्तों में भी
अवश्य प्राप्त होतीं। रीति ग्रन्थों में जो स्वप्नवागवदत्तम् के उदाहरण आये
हैं, उनका भी वर्तमान नाटक में अभाव है। प्रतिज्ञा व स्वप्न नाटकों में
विवाह के लिए "सम्बन्ध" शब्द का प्रयोग हुआ है, जो आज भी चाक्यारों
में इसी अर्थ में प्रयुक्त है।
द्वितीय मत—कुछ विद्वानों ने इन तेरह नाटकों को दो भागों में
विभक्त किया है और विभिन्न काल की रचनाएं स्वीकार किया है। ये स्वप्न
और प्रतिज्ञा आदि नाटकों को तो भास की कृति मानते हैं तथा अन्य रूपकों
को नहीं। इनके अनुसार भास के नाटकों में परिवर्द्धन तथा संशोधन कर किसी
केरल कवि ने इन्हें रंगमंच के योग्य बनाया है। नाटकचक्र पर हुए समीक्षण

( ९ )
और परीक्षणों से यह स्पष्ट है कि इन नाटकों का समस्त अंश भास की
रचना नही है।
तृतीय मत—इस वर्ग के विचारक इन तेरह रूपकों को भास कृत
मानते हैं, क्योकि—
(1) इन सभी रूपको मे आकृति की समता पाई जाती है। अतः
इनका रचयिता एक ही व्यक्ति है।
(2) प्राचीन उदाहरणो मे स्वप्नवासवदत्तम् भास की कृति सिद्ध है
तथा ये सभी रूपक उसके ही समान है।
(3) सस्कृत रूपकों की परम्परा के अनुसार नान्दी पाठ के बाद
सूत्रधार रगमच पर प्रवेश करता है, किन्तु इन 13 रूपकों मे नान्दी पाठ की
योजना प्रस्तावना मे सम्मिलित नही है।
(4) लगभग सभी रूपको के अन्त में भरत वाक्य का अन्तिम चरण
"राजसिंहः प्रशास्तु न." लिखा है।
(5) इनमे प्ररोचना का अभाव है तथा अनेक रूपको मे पताका
स्थान एव गण्ड का प्रयोग है।
(6) इन सभी नाटकों मे अपाणिनीय प्रयोग भी समान रूप से
मिलते है।
(7) भरत नाट्यशास्त्र के नियमो का उल्लघन समान रूप से ही इन
नाटको मे पाया जाता है।
(8) युद्ध की सूचना और युद्ध का वर्णन भटो द्वारा किया गया है।
(9) मुद्रा अलकार का प्रयोग चारुदत्त और अविमारक को छोड़ कर
शेष सभी नाटको में पाया जाता है। इसमे नाटक के प्रमुख पात्रो के नाम
तथा अभीष्ट देवता की स्तुति की गई है।
(10) कंचुकी और प्रतिहारी के नामों की कई नाटको में पुनरावृत्ति
हुई है। ये नाम क्रमशः बादरायण और विजया है।
(11) प्रायः सभी नाटकों में प्रस्तावना के स्थान पर "स्थापना" का
प्रयोग हुआ है। इन रूपको में अन्य किसी भी ग्रन्थकार का नाम नही
मिलता। छन्दो के प्रयोग भी प्रायः समान है।
(12) इन सभी नाटको मे साम्य भी उपलब्ध है, जैसे—

( 10 )
(अ) बलशाली की उपमा सिंह से तथा दुर्बल की मृग से दी है ।
(ब) वीर व्यक्ति का सबसे अच्छा अस्त्र उसका हाथ बताया गया है ।
(स) नारद को "कलह प्रिय" कहा है ।
(द) शाप तथा शपथ का वर्णन इन सभी नाटको मे समान रूप से
पाया जाता है ।
(क) भास ने अपने रूपको मे जीवन की विविधता और वैषम्य का
चित्रण किया है, जिससे अश्रुसिक्त अवस्था का वर्णन भी अनेक स्थलो पर
आया है ।
(ख) समान भावों का प्रयोग—जैसे दयनीय दृश्यो का वर्णन समान
रूप से उपलब्ध है । ब्रह्मचारी पात्र के प्रवेश से नाटकीय कौतूहल को सजग
बनाने का प्रयास प्रायः कई नाटको में पाया जाता है । परिव्राजक या तापस
इसी का परिवर्तित रूप है ।
(ग) पिता को कन्या के विवाह की चिन्ता, अमात्य का दायित्व,
अपराध निरीक्षण एव कला संबधी प्रेम ऐसे भाव है, जिनकी आवृत्ति विभिन्न
प्रसंगों मे प्रायः कई नाटकों में पाई जाती है ।
(घ)

( 11 )

भास की उपमाओं, भावों व शब्दो आदि से प्रभावित हैं। वल्कल धारण से
सौन्दर्य की वृद्धि, तपोवन का वर्णन, शाप की कल्पना, वृक्ष व लताओं के प्रति
स्नेह, भाग्यदशा का चित्रण आदि के भाव कालिदास ने भास से ग्रहण किए हैं।
भास के चारुदत्त का परिवृंहण कर शूद्रक ने मृच्छकटिक की रचना
की है। इन दोनो रूपको की कथावस्तु समान है तथा भावों का अंकन भी
उसी प्रकार पाया जाता है। इसे हम भास का प्रभाव ही नहीं कह सकते,
अपितु पूर्णतया अनुकरण मान सकते है। विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में भी
भास के भावों, विचारों और शब्दो के प्रयोग में पर्याप्त समता है। मनोवैज्ञानिक
दृष्टिकोण तथा परिस्थिति विशेष में विभिन्न मानसिक स्थितियों का चित्रण
विशाखदत्त मे भास के समान पाया जाता है। नाटककार हर्ष भी भास से
पर्याप्त प्रभावित है। रत्नावली नाटिका की कथावस्तु का आधार वृहत्कथा
चाहे न भी हो पर स्वप्नवासदत्तम् अवश्य है। स्वप्न नाटक में वर्णित उदयन
और वासवदत्ता की कथा रत्नावली में यत्किंचित् परिवर्तन के साथ गृहीत है।
भवभूति की तीनों रचनाओ पर भास का पर्याप्त प्रभाव है। इनके उत्तर राम-
चरित की चित्रवीथि कल्पना पर भास का प्रभाव पाया जाता है तथा और
भी कई भाव साम्य हैं।
भट्टनारायण ने वीर रस प्रधान वेणीसंहार नामक नाटक की रचना
की है, जो महाभारत के आख्यान पर आधृत है। इस नाटक की कथावस्तु के
गठन मे भट्टनारायण ने वीर रस प्रधान एकांकी उरुभंग तथा दूतवाक्य का
अध्ययन अवश्य किया है। मुरारि कवि ने अपने अनर्घराघव नाटक में भास
अभिषेक और प्रतिमा नाटक से उपमाएँ एव कल्पनाएँ ग्रहण की हैं। राज-
शेखर के नाटकों पर भी भास की कृतियों का ऋण है। जयदेव कवि के प्रसन्न-
राघव पर भी भास का प्रभाव परिलक्षित होता है। इस प्रकार सस्कृत के
सभी नाटककारो ने भास से कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य ग्रहण किया है।
भास की भाषा शैली
भास के नाटको में कल्पना, भावना और कवित्व का प्राचुर्य है, जिसके
कारण उनकी भाषा में काव्यात्मकता की प्रधानता है। इनकी भाषा शैली
पात्रो के भावो और विचारों के अनुरूप है। शैली की विशेषता के ॰ ॰

इनके संवादों में प्रभावात्मकता आ गई है : सूक्ति वाक्यों के प्रयोगों ने इनकी
भाषा शैली को सशक्त बनाया है ।
प्रभावपूर्ण भाषा—भास की भाषा प्रभावोत्पादक तथा मुहावरेदार है ।
इसमें सर्वत्र स्वभावोक्ति का पुट मिलता है । लम्बे-लम्बे समासान्त पदों का
प्रयोग भास को पसन्द नहीं है । नाट्यकला के लिए भाषा की सरलता, सरसता,
स्फुटता, प्रसन्नता, गम्भीरता, मधुरता, मनोरंजकता अपेक्षित है । कथोप-
कथन एवं कवित्व की दृष्टि से भी इनके रूपक संस्कृत साहित्य के किसी
भी सम्मानित कवि या नाटककार से कम नहीं है । निःसन्देह भास की कृतियों
में ओज, प्रसाद और माधुर्य इन तीनों गुणों का यथोचित रूप में समावेश
हुआ है ।
सरल भाषा—अपनी कृतियों में भास ने अलंकार विहीन सरल भाषा
का प्रयोग किया है । उनकी प्रवाहयुक्त सरल भाषा भावों की अभिव्यक्ति में
पूर्ण समर्थ है । इनके संवादों में शैली की स्वच्छता स्पष्टतः दिखाई पड़ती
है । पात्र कथोपकथनों में अत्यन्त विदग्ध है । उक्ति प्रत्युक्ति की मनोरमता
अवगत करने के लिए प्रतिज्ञा नाटक में यौगन्धरायण तथा भरत रोहक के
संवादों का अवलोकन किया जा सकता है । उदयन पर भरत रोहक द्वारा
लगाए गए आक्षेपों का उत्तर यौगन्धरायण जिस चतुराई से देता है, उसमें
भास की नाट्यशैली की विशेषता झलकती है । नाटक में तर्क-वितर्क का
महत्त्वपूर्ण स्थान है । क्योंकि इन्हीं के द्वारा घटना चक्र और कथानक आगे
बढ़ता है । भास के नाटकों में उक्ति प्रत्युक्तियों का संतुलित प्रयोग आया है ।
ये सीधी, स्वाभाविक और प्रभावोत्पादक हैं ।
छन्दों का सफल प्रयोग—नाटककार भास की उक्ति-प्रत्युक्तियों में
छन्दों का प्रयोग भी सफलतापूर्वक हुआ है । यही कारण है कि कई स्थानों पर
एक ही छन्द दो भागों में विभक्त हो गया है । पूर्वार्द्ध का प्रयोग एक पात्र
करता है तथा उत्तरार्द्ध का अन्य पात्र । इस प्रक्रिया द्वारा पात्रों में प्रत्युत्पन्न-
मतित्व समाविष्ट हो गया है ।
पात्रों के अनुकूल भाषा—भास के रूपकों की सफलता का श्रेय जहां
एक ओर उनके चरित्र चित्रणों में निपुण होने को है, वही उन पात्रों के
नुकूल भाषा का प्रयोग भी हैं । पात्रों और दर्शकों को एक सूत्र में बांधने

वाला उनका प्रसाद गुण अत्यधिक सहायक हुआ है। रूपको का प्राण प्रसाद-
गुण है, यह स्वीकार करने मे कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योकि रूपक गति-
शील होता है। जिस गति से वह चलता है, उसी गति से यदि भाषा सामा-
जिको की समझ मे नही आती तो रूपक का समस्त आनन्द ही समाप्त हो
जाता है। अतः रूपक को गतिशील बनाए रखने के लिए उसमे प्रसाद गुण की
सर्वाधिक आवश्यकता है।
बोलचाल की भाषा—भास ने बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया
है। यही कारण है कि इनकी भाषा मे अनेक अपाणिनीय प्रयोग भी सम्मि-
लित है। ये आत्मनेपद के स्थान पर परस्मैपद का अथवा इसका विपरीत
प्रयोग करते है। इसी प्रकार इन्होने अकर्मक क्रियाओ का सकर्मक प्रयोग भी
किया है। यही नही, भास ने समास की प्रक्रिया मे भी कुछ नवीन प्रयोग
किए है, जो पाणिनि से मेल नही खाते। इन्होने कई नए तथा क्लिष्ट शब्दो
का प्रयोग भी किया है।
शैली मे तीनों गुणो का समावेश—शास्त्रीय दृष्टि से भासकी शैली में
ओज, प्रसाद व माधुर्य इन तीनो गुणो का समावेश पाया जाता है। ये मधुर
तथा मनोरम शैली का प्रयोग वही करते है, जहा किसी व्यक्ति की कोमल
भावनाओ की अभिव्यक्ति करनी होती है अथवा रम्य प्रकृति का वर्णन करना
अभीष्ट होता है। यह सत्य है कि जब कल्पना की दुरूहता और अलकारो के
बोझ से भाषा की सहज माधुरी दब जाती है, तब रसोद्रेक मे क्षीणता उत्पन्न
होती है। भास ने बलपूर्वक अलकारो का उपयोग नही किया है।
सशक्त शैली का प्रयोग—भास की वर्णन कला प्रौढ एव अपने ढंग
की अनोखी है। शैली को सशक्त बनाने के लिए इन्होने आम, वाढम् यदि,
चेत् तथा कुशल प्रश्न के लिए 'सुखमार्यस्य'' का प्रयोग किया है। इससे
ज्ञात होता है कि नाटककार दृश्यो के चित्रण मे अत्यन्त पटु है। इस प्रकार
के वर्णनो के आधार पर चित्राकन किया जा सकता है। शैली की सक्षिप्तता के
कारण छोटे-छोटे वाक्यो मे गभीर तथा रसपेशल भावो की व्यजना प्रस्तुत
की गई है।
वाग्विस्तार का परिहार—भास के पात्रो ने शैली की विशेषता के
कारण कम से कम शब्दो मे अधिक से अधिक भावो की अभिव्यजना की है।

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इनमें व्यर्थ का विसंवाद कहीं भी प्राप्त नहीं होता है। संक्षिप्त शब्दों में
मनोगत भावों को प्रकट करना भास की विशेषता है। कौन पात्र किस परि-
स्थिति में किस प्रकार की भावदशा के अधीन रहेगा, इसका चित्रण भास ने
कुशलतापूर्वक किया है। वाग्विस्तार का परिहार इनकी प्रमुख विशेषता है।
वार्तालापों के आश्रय से ही सारे दृश्य उपस्थित हो गए हैं। पृथक्-पृथक् अवस्था
में विभिन्न भावों और विषयों के सूक्ष्म वर्णन में भास सिद्धहस्त हैं।
वर्णन का सूक्ष्म व स्पष्ट होना—वर्णन की सूक्ष्मता भी भास का शैलीगत
वैशिष्ट्य है। विषय या दृश्य का वर्णन करते समय उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंश
को भी वे उपस्थित कर देते हैं। दरिद्र चारुदत्त में दरिद्रता का वर्णन स्वाभा-
विक होने के साथ सूक्ष्म भी है। भास की शैली में संक्षिप्तता के साथ स्पष्टता
गुण भी निहित है। वे दृश्य वर्णन प्रसंग में इतने स्पष्ट रहते हैं, जिससे पाठक
या दर्शक बिम्ब ग्रहण करने में समर्थ होता है। यही कारण है कि भास को
संध्यावर्णन, मध्यरात्रि वर्णन, वनवर्णन, मध्याह्न वर्णन, तारुण्य वर्णन आदि

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शब्द और श्रथ का सामंजस्य सुन्दर रूप मे घटित हुआ है । नाटकीयता का
सन्निवेश सुरुचिपूर्ण ढंग से किया गया है । भास का काव्यत्व नाटकत्व का
पूरक है । इनके पात्रो के सवाद संक्षिप्त, उचित, श्रवसरानुकूल तथा कथावस्तु
के परिवृहरण में सहायक है । नाटकीय कुतूहल सर्वत्र पाया जाता है । भाषा
मे श्रपूर्व प्रवाह श्रौर सरलता विद्यमान है । गागर मे सागर भरने वाली उक्ति
इनकी रचनाश्रो मे चरितार्थ है । इनका कथन क्षण भर में गुह्यतम गुत्थियों
का समाधान, मानसिक भावनाश्रो की सुख मे परिणति तथा विचारो को
सक्षिप्त रूप मे रखते हुए भाव की स्पष्टता को करने वाला है ।
श्रनुकरणीय शैली—भास की शैली मे भावाभिव्यक्ति की पूर्ण क्षमता
है । श्रत आद्य नाटककार होने पर भी भास की शैली पूर्ण गंभीर और प्रौढ़
है । इसका अनुकरण कालिदास, हर्ष, भवभूति आदि नाटककारो ने भी किया
है ।
निष्कर्ष—हम सक्षेप मे भास की शैली की विशेषताश्रो को इस प्रकार
बद्ध कर सकते है—
(1) स्वच्छता श्रौर सक्षिप्तता
(2) प्रभावोत्पादकता व व्यजकता का मणिकांचन योग
(3) श्रल्पसमास या समासहीन वाक्य संघटना
(4) सरलता श्रौर सहज बाधगम्यता
(5) श्रौचित्य एवं पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग
(6) लोकोक्तियो एवं सूक्तियो का प्रचुर प्रयोग
(7) घटनाश्रो का श्राकस्मिक वितरण
(8) स्वल्प शब्दो द्वारा श्रधिक भाव व्यजना
(9) श्रकृत्रिमता श्रौर स्वाभाविकता का समावेश

प्रतिमा-नाटकम्
नाटक का नामकरण
प्रतिमा नाटक भास का एक महत्वपूर्ण नाटक है । रामायण की
कथावस्तु वाले इस रूपक मे प्रतिमा गृह अथवा मूर्ति गृह की घटना का
महत्व ही इस नाटक की इतिवृत्त रचना की प्रमुख विशेषता है । इस प्रकार
इसका नाम तीसरे अंक के 'प्रतिमा गृह' की घटना के आधार पर रखा
गया है । प्राचीन काल मे राजाओ के देवकुल होते थे, जिनमे मृत्यु के बाद
राजाओ की पत्थर की मूर्तिया स्थापित की जाती थी । इक्ष्वाकु वंश का
भी ऐसा ही देवकुल था, जिसमे मृत नरेशो की मूर्तिया स्थापित की गई थी ।
ननिहाल से लौटने समय देवकुल मे स्थापित दशरथ की प्रतिमा को देख कर
ही भरत ने उनकी मृत्यु का अनुमान अपने आप कर लिया था । इसी कारण
से इसका नाम "प्रतिमा नाटक" पड़ा । प्रो० ध्रुव के अनुसार इस नाटक
का पूरा नाम 'प्रतिमा दशरथ' रहा होगा, जिसे संक्षिप्त रूप मे 'प्रतिमा'
कर दिया गया । भास के एक अन्य नाटक 'प्रतिज्ञा यौगन्धरायण' को संक्षेप
मे 'प्रतिज्ञा नाटक' तथा 'स्वप्नवासवदत्तम्' को 'स्वप्न नाटक' भी कहा जाता
[

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नाओं को इस तरह सजाया गया है कि नाटक के अन्त तक पहुंचते-पहुंचते
क्षको की प्रायः सम्पूर्ण जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है। नाटक के कथानक के
भिन्न अंगों का विकास सहज रूप में हुआ है। इसकी सारी घटनाएं एक-
सरे का सहज विकास है। इसके कथानक में श्रोता या दर्शक के मन में
तूहल उत्पन्न करने की पूर्ण क्षमता है। इसकी घटनाएं अचानक मोड़
लेकर लोगो को सहसा चौंका देती हैं। इसमें कार्य-कारण की पूर्वापरता इस
तरह व्यवस्थित की गई है कि स्थान-स्थान पर दर्शक विमुग्ध होता जाता
है।
कथावस्तु
प्रतिमा नाटक में कुल सात अंक है।
पहला अंक—अयोध्या में राम के अभिषेक की तैयारियां हो रही
हैं। राजा दशरथ के आदेश से सब कुछ व्यवस्थित होता है। अचानक मंगल
वाद्य बजते हुए रुक जाते हैं। इधर सीता भी परिहास में एक वल्कल वस्त्र
पहनती हैं। राम उसके पास आते हैं और कहते हैं कि अचानक मेरा राजा
बनना रुक गया। वहीं लक्ष्मण का भी आगमन होता है, जो आवेश में कहते
हैं कि मैं संसार से सभी युवतियों को समाप्त कर दूंगा, क्योंकि एक युवती
कैकेयी के ही कारण यह सब हुआ है। यहीं ये बताते हैं कि राम को 14
वर्ष के लिए वन में भी रहना पड़ेगा। सीता तथा लक्ष्मण दोनों भी राम से
वन चलने की अनुमति प्राप्त कर लेते हैं।
दूसरा अंक—राम के वन चले जाने के कारण राजा दशरथ अत्यन्त
विकल हो जाते हैं। सभी प्राणियों को लगता है कि उनके बिना अयोध्या
सूनी हो गई। कौसल्या और सुमित्रा महाराज को धैर्य बंधाती हैं। सुमन्त्र इन
तीनों को रथ में बैठा कर वन में छोड़ने जाते हैं। अब भी राजा
दशरथ को आशा है कि राम वापस अयोध्या लौट आयेंगे। किन्तु जब सुमन्त्र
खाली रथ को लेकर आते हैं, तो दशरथ का हृदय टूट जाता है। उनके
और सुमन्त्र के मध्य होने वाले वार्तालाप से अत्यन्त करुणा झलकती है। वे
राम, लक्ष्मण और सीता के समाचार पूछते हुए बार-बार संज्ञाहीन हो जाते
हैं। अन्त में उन्हें लगता है, मानो उन्हें ले जाने हेतु उनके पितर आ गए हैं
और उनकी मृत्यु हो जाती है।