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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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हैं। ये चारुदत्त, अविमारक, प्रतिज्ञा, स्वप्नवासवदत्त आदि मे मिलते हैं। इधर
वात्स्यायन के वर्णन पर अविमारक कथा के अध्ययन की छाया स्पष्ट है।
वात्स्यायन का समय चोल चित्रासेना, कुन्तल शातकर्णि, शातवाहन, मलयवती
एवं नरदेव चित्रलेखा के आख्यानो के प्राप्त होने के कारण ईस्वी सन् 140-
200 के लगभग है। भास इनसे पूर्ववर्ती हैं ।
(5) भास की रचनाओं की भाषा मे पाणिनी से यत्र-तत्र भिन्नता
उपलब्ध है। यथा सन्धि के नियमो का अतिक्रमण, आत्मनेपद के स्थान पर
परस्मैपद का प्रयोग, अकर्मक धातुओं का सकर्मक के समान प्रयोग, अनियमित
समास तथा प्रत्यय आदि। अतएव भास का समय पाणिनि से पूर्व या उनके
समकालीन होना चाहिए।
(6) शूद्रक के मृच्छकटिक पर भास के चारुदत्त का स्पष्ट प्रभाव है,
कुछ तो मृच्छकटिक को चारुदत्त का ही विकसित रूप मानते हैं। स्मिथ महोदय
ने शूद्रक का शासन काल ई. पू 220-197 माना है। अतः भास का काल
इससे पूर्व ही होना चाहिए ।
(7) भास ने नागवन, वेणुवन, राजगृह एव पाटलिपुत्र का उल्लेख
किया है। ये सभी स्थान बुद्ध के समय मे प्रसिद्ध हो चुके थे। अतः भास का
समय बुद्ध के पश्चात् मानना युक्तिसंगत है।
(8) भास ने मानवीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर, योगशास्त्र, बार्हस्पत्य अर्थ-
शास्त्र, प्राचेतस श्राद्धकल्प, मेधातिथि न्यायशास्त्र आदि का उल्लेख किया है।
इनमें से कोई भी ई. पू. चतुर्थ पंचम शताब्दी के बाद का नहीं है।
(9) डॉ० पुशालकर ने भास का समय महापद्म नन्द का राज्यकाल
बतलाया है। यह पहला शासक है, जिसने समस्त उत्तर भारत को अपने
अधीन किया था। भास के भरत वाक्य में जिस राज्य सीमा का निर्देश आया
है, वह राज्यसीमा महापद्म नन्द की है।
(10) अय्यर महोदय का अनुमान है कि भास कौटिल्य के समकालीन
है। कौटिल्य ने नन्दो के विनाश मे योगदान दिया था और चन्द्रगुप्त मौर्य को
भारत के चक्रवर्ती पद पर प्रतिष्ठित किया था। चाणक्य या कौटिल्य ने अपने
अर्थशास्त्र मे प्रतिज्ञा यौगन्धरायण का "नवं शरावं" (4·2) वाला पद्य उद्धृत