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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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भास का जीवनवृत्त
भास ने अपनी कृतियो मे अपने सम्बन्ध मे कुछ भी निर्देश नही किया
है । अतः इनके जीवनवृत्त के बारे मे निश्चित जानकारी प्राप्त करना कठिन
है । किन्तु इनके विषय मे कई किम्वदन्तिया प्रचलित है तथा उनकी रचनाओ
में भी कुछ ऐसे संकेत विद्यमान है, जिनसे उनके जीवन वृत्त पर प्रकाश
पडता है ।
दन्तकथाये — प्रचलित दन्तकथा के अनुसार भास जाति के धोबी या
धावक थे । आचार्य मम्मट ने काव्य प्रकाश मे इनका उल्लेख किया है । इसके
अनुसार श्री हर्ष की रत्नावली आदि नाटिकाओ के प्रणयन मे धावक कवि
सहायक था और उसको धन दिया गया था । कतिपय विद्वान् भास की उपाधि
धावक मानते है । किन्तु भास को श्री हर्ष कालीन स्वीकारना (सप्तम शताब्दी
ईस्वी) कथमपि युक्तियुक्त नही है ।
दूसरी किम्वदन्ती के अनुसार भास जाति के धोबी थे और उन्ही का
नाम घटकर्पर था । समीक्षा करने पर यह दन्तकथा भी तथ्यशून्य है, क्योकि
घटकर्पर कालिदास के समकालीन हैं । सम्राट् विक्रम की राजसभा के नवरत्नों
में कालिदास और घटकर्पर का नाम आता है । अतः भास और घटकर्पर की
अभिन्नता स्वीकार नही की जा सकती है ।
तीसरी दन्तकथा मे बताया गया है कि एक बार व्यास और भास मे
प्रतिष्ठा के लिए झगड़ा हुआ । व्यास अपने को श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली कवि
मानते थे और भास अपने को । निर्णय के लिए दोनों के ग्रन्थ अग्नि को
अर्पित किये गए । कहा जाता है कि व्यास के ग्रन्थो को अग्नि ने भस्म कर
दिया, पर भास के नाटको मे स्वप्नवासवदत्तम् अग्नि मे भस्म न हो सका ।
राजशेखर ने इसकी पुष्टि की है । इसका आशय यह है कि भास भी व्यास
के समान प्राचीन एव यशस्वी कवि है । इन दोनो के कल्पित कलह से यह भी
ध्वनित होता है कि नाटककार भास महाकवि व्यास के समान अनेक कृतियो
के लेखक हैं ।