सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

( 7 )
किया है। इससे स्पष्ट है कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय तक भास की
रचनाएं विख्यात हो चुकी थी।
(11) भास के कई नाटकों के भरत वाक्य में "राजसिंह" शब्द आया
है। मौर्य राजा स्वयं राजसिंह कहलाते थे। अय्यर महोदय का अनुमान है कि
चन्द्रगुप्त को ही राजसिंह कहा गया है। वही हिमालय से लेकर विंध्यपर्वत-
पर्यन्त समुद्र पृथ्वी का एकच्छत्र भोग करने वाला चन्द्रगुप्त मौर्य ही था। यही
प्रथम सम्राट् माना जाता है, जिसने प्रथम बार समस्त उत्तर भारत को संगठित
कर अपने शासन के अधीन किया था।
(12) भास के रूपकों में जैन और बौद्ध धर्म के प्रति किसी भी प्रकार
की सद्भावना नही दिखलाई पड़ती। अपितु जो भी धार्मिक आदर्श प्रस्तुत
किए गए है, वे वैदिक धर्म के है। भास ने अपनी कृतियों में सर्वत्र प्राचीन
वैदिक आदर्शों का ही चित्रण किया है। यह यथार्थ है कि क्रान्तिकारी जैन
और बौद्ध धर्म से भास परिचित थे तथा उन्होंने जैन और बौद्ध श्रमणों का
उपहास भी किया है। अतएव इनका समय ई. पू. चतुर्थ शती होना चाहिए।
(13) कालिदास ने मालविकाग्निमित्र नाटक की प्रस्तावना मे भास
को याद किया है। इस उल्लेख से स्पष्ट है कि भास कालिदास के पूर्ववर्ती हैं।
जो विद्वान् कालिदास का समय ई० पू० प्रथम सदी मानते है, उनके
मत से भास का समय ई. पू. चौथी शती मानने में कोई विरोध नहीं है।
अतः भास का समय ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी मानना अधिक
उचित है।
भास की रचनाएं
बहुत समय तक भास की रचनाएं अज्ञात रही और कालिदास, बाण,
राजशेखर आदि कवियों द्वारा की गई भास की प्रशंसा ही उपलब्ध थी। सन्
1912 ई. मे गणपति ने त्रिवेन्द्रम से भास के 13 नाटको का एक संग्रह
प्रकाशित किया। इनके नाम इस प्रकार हैं--
(1) प्रतिमा नाटक
(2) अभिषेक
(3) पंचरात्र
(4) मध्यम व्यायोग