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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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इनके संवादों में प्रभावात्मकता आ गई है : सूक्ति वाक्यों के प्रयोगों ने इनकी
भाषा शैली को सशक्त बनाया है ।
प्रभावपूर्ण भाषा—भास की भाषा प्रभावोत्पादक तथा मुहावरेदार है ।
इसमें सर्वत्र स्वभावोक्ति का पुट मिलता है । लम्बे-लम्बे समासान्त पदों का
प्रयोग भास को पसन्द नहीं है । नाट्यकला के लिए भाषा की सरलता, सरसता,
स्फुटता, प्रसन्नता, गम्भीरता, मधुरता, मनोरंजकता अपेक्षित है । कथोप-
कथन एवं कवित्व की दृष्टि से भी इनके रूपक संस्कृत साहित्य के किसी
भी सम्मानित कवि या नाटककार से कम नहीं है । निःसन्देह भास की कृतियों
में ओज, प्रसाद और माधुर्य इन तीनों गुणों का यथोचित रूप में समावेश
हुआ है ।
सरल भाषा—अपनी कृतियों में भास ने अलंकार विहीन सरल भाषा
का प्रयोग किया है । उनकी प्रवाहयुक्त सरल भाषा भावों की अभिव्यक्ति में
पूर्ण समर्थ है । इनके संवादों में शैली की स्वच्छता स्पष्टतः दिखाई पड़ती
है । पात्र कथोपकथनों में अत्यन्त विदग्ध है । उक्ति प्रत्युक्ति की मनोरमता
अवगत करने के लिए प्रतिज्ञा नाटक में यौगन्धरायण तथा भरत रोहक के
संवादों का अवलोकन किया जा सकता है । उदयन पर भरत रोहक द्वारा
लगाए गए आक्षेपों का उत्तर यौगन्धरायण जिस चतुराई से देता है, उसमें
भास की नाट्यशैली की विशेषता झलकती है । नाटक में तर्क-वितर्क का
महत्त्वपूर्ण स्थान है । क्योंकि इन्हीं के द्वारा घटना चक्र और कथानक आगे
बढ़ता है । भास के नाटकों में उक्ति प्रत्युक्तियों का संतुलित प्रयोग आया है ।
ये सीधी, स्वाभाविक और प्रभावोत्पादक हैं ।
छन्दों का सफल प्रयोग—नाटककार भास की उक्ति-प्रत्युक्तियों में
छन्दों का प्रयोग भी सफलतापूर्वक हुआ है । यही कारण है कि कई स्थानों पर
एक ही छन्द दो भागों में विभक्त हो गया है । पूर्वार्द्ध का प्रयोग एक पात्र
करता है तथा उत्तरार्द्ध का अन्य पात्र । इस प्रक्रिया द्वारा पात्रों में प्रत्युत्पन्न-
मतित्व समाविष्ट हो गया है ।
पात्रों के अनुकूल भाषा—भास के रूपकों की सफलता का श्रेय जहां
एक ओर उनके चरित्र चित्रणों में निपुण होने को है, वही उन पात्रों के
नुकूल भाषा का प्रयोग भी हैं । पात्रों और दर्शकों को एक सूत्र में बांधने