प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
About this granth
Prem Darshan (प्रेम-दर्शन) is Hanuman Prasad Poddar's detailed Hindi commentary on the Narada Bhakti Sutra. The sutra, a short text of eighty-four aphorisms attributed to the sage Narada, defines bhakti as supreme love for God ("sa tvasmin paramapremarupa"). Poddar (1892–1971), known as Bhaiji, was the founding editor of the magazine Kalyan and a central figure of the Gita Press.
The commentary groups the sutras into four sections: the nature and marks of supreme devotion; the means to devotion, giving up ego and the value of holy company; the indescribable nature of loving devotion and the difference between secondary and primary bhakti; and the eleven forms of attachment to God and the pre-eminence of bhakti. Opening essays introduce Narada, the nature of devotion as love, and single-minded love, and Poddar draws often on the gopis and the saints to illustrate the sutras.
This is the Gita Press, Gorakhpur edition; the copy records its fortieth reprint in Samvat 2077. At about 178 pages, it is an accessible guide for readers on the path of devotion.
प्रेमी भक्तोंकी महिमा १३५
यतस्तदीयाः ॥ ७३ ॥
७३-क्योंकि (भक्त सब ) उनके ( भगवान्के ) ही हैं।
भक्त अपनी भक्तिके प्रभावसे भगवद्रूप ही हो जाते हैं,
इसीलिये उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती और उनमें कोई
अपनेको किसी भी हेतुसे ऊँचा नहीं समझता।
□ □
पीठ देकर बैठना, २४-भगवान्की मूर्तिके सामने जूते पहनकर जाना, २५-भगवान्की
मूर्तिके सामने माला धारण करना, २६-भगवान्की मूर्तिके सामने छड़ी लेकर जाना,
२७-भगवान्की मूर्तिके सामने नीले कपड़े पहनकर जाना, २८-दाँतुन-कुल्ला किये बिना
जाना, २९-मलत्याग या मैथुनादिके बाद कपड़े बदले बिना मन्दिरमें प्रवेश करना,
३०-भगवान्की मूर्तिके सामने हाथ-पैर फैलाना, ३१-भगवान्की मूर्तिके सामने पान
खाना, ३२-भगवान्की मूर्तिके सामने जोरसे हँसना, ३३-कुचेष्टा करना, ३४-स्त्रियोंके
चारों ओर घूमना, ३५-क्रोध करना, ३६-भगवान्की मूर्तिके सामने किसी दूसरेका
अभिवादन करना, ३७-दुर्गन्धवाली कोई चीज खाकर दुर्गन्ध दूर हुए पहले मन्दिरमें जाना,
३८-मादक द्रव्य सेवन करना, ३९-किसीको अपमानित करना या मारना, ४०-काम-
क्रोधादिकी चेष्टा करना, ४१-अतिथि या साधुकी आवभगत न करना, ४२-अपनेको
भक्त, धर्मात्मा, पण्डित या पुण्यवान् समझना, ४३-नास्तिक, व्यभिचारी, हिंसक, लोभी
और झूठ बोलनेवाले मनुष्योंका संग करना, ४४-विपत्तिमें ईश्वरपर दोष लगाना, ४५-
पापके लिये धर्म करना, ४६-किसीको किंचित् भी कष्ट देकर अपनेको धार्मिक
समझना, ४७-स्त्री, पुत्र, परिवार, आश्रित, दीन और साधुका पालन-पोषण न करना,
४८-किसी वस्तुको अपनी भोग्य समझकर भगवान्के निवेदन करना या बिना निवेदन
किये भोगना, ४९-अपने इष्टदेवके नामकी शपथ करना, ५०-धर्म और भगवान्के
नामको बेचकर धन कमाना, ५१-अपने इष्टदेवको छोड़कर दूसरेसे आशा करना,
५२-शास्त्रोंकी मर्यादाको तोड़ना, ५३-ब्रह्मज्ञान न होनेपर भी ब्रह्मज्ञानीके समान आचरण
करना, ५४-सम्प्रदायभेदसे वैष्णवोंमें किसीको ऊँचा-नीचा समझना, ५५-देवताके
समान आचरण करना, ५६-अवतारोंकी लीलाओंमें तारतम्य देकर उनकी निन्दा
करना, ५७-दिल्लगीमें भी किसीको 'आप ही भगवान् हैं' ऐसा कहना, ५८-भगवान्
किसीके मुखापेक्षी हैं, भूलकर भी ऐसा समझना, ५९-लोभवश किसीको भगवत्प्रसाद
या चरणोदक देना, ६०-भगवान्के चित्र, प्रतिमा या नामका अपमान करना, ६१-
किसी भी जीवको किसी प्रकारसे कष्ट पहुँचाना, भय दिखलाना या किसीका अहित
करना, ६२-तर्क-वितर्कमें हार जाने या सिद्धान्त स्थापित न कर सकनेपर आस्तिकताको
त्याग देना, ६३-भगवान्के अवतारोंके जन्म-कर्मोंको साधारण समझना, ६४-
भगवान्के युगलरूपमें द्वैतबुद्धि करना।
वाद-विवादरूपी विघ्न
वादो नावलम्ब्यः ॥ ७४ ॥
७४-( भक्तको ) वाद-विवाद नहीं करना चाहिये।
भक्तिके साधकोंके लिये यह सूत्र बड़े ही महत्त्वका है।
भक्तको तर्क-वितर्कमें पड़नेकी कोई भी आवश्यकता नहीं। यह
समझना चाहिये कि मेरा तो हरेक क्षण अपने प्रियतम भगवान्के
भजनके लिये समर्पण हो चुका, उसे दूसरे काममें लगानेका
अधिकार ही नहीं है। फिर वह तर्क-वितर्क करे भी किस
बातकी। सृष्टि कब हुई, कैसे हुई, क्यों हुई, इसका मूल तत्त्व
क्या है, इन सब बातोंको जाननेकी उसे जरूरत नहीं। उसने तो
श्रीभगवान्को ही सब कुछ मान-जानकर अपना एकमात्र लक्ष्य
बना लिया है। भगवान् अपना तत्त्व जब चाहेंगे, आप ही समझा
देंगे। कब समझावेंगे, समझावेंगे या नहीं समझावेंगे, इस बातकी
भी उसे कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिये। अपने प्रियतम भगवान्के
चिन्तनको छोड़कर दूसरी किसी वस्तुके चिन्तनकी उसके मनमें
गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिये। और यह भी निश्चित है कि
तर्कसे तत्त्वकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसीलिये ब्रह्मसूत्रमें कहा
है—‘तर्काप्रतिष्ठानात्’ (२।१।११)—‘तर्ककी प्रतिष्ठा नहीं
है।’ कठोपनिषद्में कहा गया है— ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’
(१।२।९)—‘बुद्धिके तर्कसे उस तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती।’
वह सत्य तत्त्व तो शुद्धचित्त सात्त्विक पुरुषके सामने स्वयमेव
आविर्भूत होता है। किसी अंशमें यह भी सत्य है कि ‘वादे वादे
जायते तत्त्वबोधः’, परन्तु वह वाद दूसरा होता है। श्रद्धालु
शिष्य जिज्ञासाभावसे गुरुके सामने तर्क उपस्थित करता है और
वाद-विवादरूपी विघ्न १३७
गुरु उसकी शंका निवारण कर और भी प्रबल तर्कसे उसे
सिद्धान्त समझाते हैं। ऐसा वाद दूषित नहीं है। परन्तु जो वाद
आग्रहपूर्वक होता है वह तो बुरा ही फल उत्पन्न करता है और
वादमें अपने मतका आग्रह हो ही जाता है। फिर सिद्धान्तका
लक्ष्य छूट जाता है और व्यक्तिगत दोषनिरीक्षण, दोषारोपण और
परस्पर गालीगलौज होने लगता है। विवेक नष्ट हो जाता है,
क्रोध छा जाता है, वाणी बेकाबू हो जाती है और सदाके लिये
वैर बँध जाता है। इसीलिये ‘वादे वादे वर्द्धते वैरवह्निः’—
‘वाद-विवादसे वैरकी आग भड़क उठती है’, कहा जाता है।
भक्तिके पथिकको तो इतनी फुरसत ही नहीं मिलनी चाहिये
जिसमें वह वाद-विवाद कर सके। जहाँतक हो सके उसे तर्कके
स्थानसे अलग ही रहना चाहिये। यदि प्रारब्धवश कभी तर्कवादियोंसे
समागम हो जाय तो उसे विनीतभाव धारणकर उनकी बात सुन
लेनी चाहिये और बदलेमें कोई उत्तर देकर बात बढ़ानी नहीं
चाहिये। ‘अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति’—‘जब
आगमें ईंधन नहीं पड़ेगा तो वह आप ही बुझ जायगी’—
कहनेवाले स्वयं ही थक जायँगे। अतएव भक्तके लिये सबसे
भली चुप है। ‘मौनं सर्वार्थसाधनम्’—यह वाक्य याद रखना
चाहिये। दूसरेकी ऐसी बात सुने ही नहीं जिससे अपने इष्टमें,
पथमें, विश्वासमें और साधनमें संशय हो जाय; और स्वयं
किसीका जी दुःखे, ऐसी कोई बात किसीसे कहे नहीं। दूसरेकी
बात मौके-बेमौके सुननी पड़े तो उसे सुन ले; परन्तु स्वयं तो
तर्ककी इच्छासे, दूसरेको दबानेके लिये, अपना मत स्थापन
करनेके लिये विवादमें उतरे ही नहीं। इसका यह तात्पर्य नहीं कि
श्रद्धाके साथ पूछनेवालेको कुछ न कहे या मौका पड़नेपर बिना
१३८ प्रेम-दर्शन
पूछे भी हितकी बात न कहे। मतलब तो यह है कि विवादमें
न उतरे। अनावश्यक बोले ही नहीं, जब बिना बोले काम न चले
तब आवश्यक समझकर इतना ही बोले जितनेसे काम चल जाय।
बात बढ़ाकर न कहे, विवादके भावसे न कहे, किसीका विरोध
न करे, किसीकी दिल्लगी न करे, किसीका दोष न बतावे,
किसीके हृदयपर चोट न करे, अपनी या अपने मतकी बड़ाई
न करे, किसीकी निन्दा न करे, कड़ुआ न बोले, बोलनेमें आशा
या कामनाका भाव न रखे, जबानसे किसीको धोखा न दे,
किसीके विश्वासमें शंका न पैदा करे। जो कुछ बोले सत्य,
मधुर, प्रिय, अनुद्वेगकर और हितकर शब्द ही बोले; शेष समय
भगवन्नाम-स्मरणमें लगा रहे। अनावश्यक एक शब्द बोलनेमें भी
बड़ी हानि समझे, क्योंकि उतना समय व्यर्थ गया। उतने समयके
लिये जीभसे नामजप छूट गया और अनावश्यक शब्दका
वातावरणमें जो असर हुआ, वह अलग। यह निश्चय रखे कि
तर्क और वाद-विवादसे कभी भगवत्प्रेम, ज्ञान या भगवान्की
प्राप्ति नहीं होती। तर्कसे तो अहंकार, द्वेष, क्रोध, हिंसा और
वैरकी ही जमात इकट्ठी होती है। अतएव वाद-विवादसे सदा
अलग रहे।
अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तरक सब त्यागी ॥
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥
बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च ॥ ७५ ॥
७५-क्योंकि (वाद-विवादमें) बाहुल्यका अवकाश है
और वह अनियत है।
सूत्रकार कारण दिखाते हुए कहते हैं कि वाद-विवादमें
वाद-विवादरूपी विघ्न १३१
उत्तर-प्रत्युत्तर होता है और वह बढ़ता ही जाता है। दोनों ओरसे
अपने-अपने मतका समर्थन करनेमें शब्दोंकी झड़ी लग जाती है।
जो बात भगवत्कृपासे ही जानी जा सकती है, वह तर्कसे मिल
तो सकती ही नहीं। अतएव तर्क-वितर्कका कोई सुफल भी नहीं
होता। यदि विवादमें बोलते-बोलते थक जाने या समयपर तर्क
याद न आनेसे किसी पक्षकी जीत हो जाती है तो वह भी
सिद्धान्त नहीं माना जाता; क्योंकि वह सिद्धान्त है ही नहीं।
अतएव विवादमें समय नष्ट न कर भक्तको सर्व प्रकारसे अपने
भगवान्पर निर्भर रहते हुए निरन्तर निष्कपट और निष्काम
भावसे परम श्रद्धापूर्वक भगवान्का भजन करना चाहिये।
भगवत्प्रेमकी प्राप्ति तर्कसे नहीं होती, भक्तिसे ही होती है।
☐ ☐
भक्तिके प्रधान सहायक
भक्तिशास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधककर्माण्यपि
करणीयानि ॥ ७६ ॥
७६-( उस प्रेमाभक्तिकी प्राप्तिके लिये ) भक्तिशास्त्रका
मनन करते रहना चाहिये और ऐसे कर्म भी करने चाहिये
जिनसे भक्तिकी वृद्धि हो।
भक्ति चाहनेवालोंको न कोई ग्रन्थ देखना चाहिये और न
कोई कर्म करना चाहिये ऐसी बात नहीं है। उनको तर्क-
वितर्कका त्याग करके बार-बार ऐसे ग्रन्थोंको अवश्य देखना
चाहिये जिनमें भगवान्की भक्तिका निरूपण हो, भक्तिका
माहात्म्य हो, भक्तिके साधन बतलाये गये हों, भगवान्के प्यारे
भक्तोंके पुण्यचरित्रोंकी कथाएँ हों और भक्तिके वशमें होकर
रहनेवाले भगवान्के प्रभाव, रहस्य और गुणोंका वर्णन हो। ऐसे
भक्तिशास्त्रोंके अध्ययनसे, महात्मा भक्त सन्तोंकी वाणियोंके
श्रवण और पठनसे भगवान्के प्रति प्रेमाभक्तिका उदय होता है।
हाँ, भक्ति चाहनेवाले पुरुषोंको ऐसी पुस्तकें कभी नहीं पढ़नी-
सुननी चाहिये जिनमें श्रीभगवान्का और भक्तिका खण्डन हो,
उनका महत्त्व कम बतलाया गया हो और भक्तोंकी निन्दा हो,
अथवा जिनमें लौकिक विषयोंकी महत्ताका ही वर्णन हो। ऐसी
पुस्तकें भी उन्हें लाभदायक नहीं होतीं जिनमें भगवान्, भक्ति
और भक्तोंका महत्त्व न हो। इसके सिवा राग-द्वेष, काम-क्रोध
और वैर-विरोध उत्पन्न करनेवाला साहित्य तो छूना भी नहीं
चाहिये। इसीलिये ऐसा कहा गया है कि —
भक्तिके प्रधान सहायक १४१
यस्मिन् शास्त्रे पुराणे वा हरिभक्तिर्न दृश्यते।
श्रोतव्यं नैव तच्छास्त्रं यदि ब्रह्मा स्वयं वदेत्॥
‘जिस शास्त्र या पुराणमें भगवान्की भक्ति न दिखलायी दे,
ब्रह्माके द्वारा कहा हुआ होनेपर भी उसको नहीं सुनना चाहिये।’
साथ ही कर्म भी ऐसे करने चाहिये, जिनसे भक्तिकी जागृति
और वृद्धि हो। भक्तिकामी पुरुषको निषिद्ध (पाप) कर्मोंका तो
बिलकुल ही त्याग कर देना चाहिये। जो विषयोंकी आसक्तिवश
पापकर्मोंको नहीं छोड़ना चाहता और भक्त भी कहलाना चाहता है
वह या तो स्वयं भ्रममें है या जान-बूझकर भ्रम फैलाना चाहता है।
भक्तिकी प्राप्तिमें सहायक कर्मोंमें प्रधान निम्नलिखित हैं—
१—अपने वर्ण और आश्रमके धर्मोंका यथासम्भव पूरा
पालन। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासीके लिये त्यागपूर्ण
आचरण और गृहस्थके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ माता-पिता, स्त्री-
पुत्र-परिवार आदि आश्रित जनोंका प्रेम और सत्कारपूर्वक
पालन, न्याय और सत्यपूर्वक जीविकानिर्वाह एवं शास्त्रोक्त यज्ञ,
दान, तप आदि।
२—सदाचारका पालन।
३—सत्संग और भगवद्गुणानुवादका श्रवण, चिन्तन और
कीर्तन।
४—भगवन्नामका जप, स्मरण और कीर्तन।
५—भगवत्-पूजन, स्तुति-प्रार्थना और नमस्कार।
६—सन्त-भक्तोंकी सेवा और श्रद्धापूर्वक उनकी आज्ञाका
पालन।
७—तीर्थसेवन।
१४२ प्रेम-दर्शन
८—दीन प्राणियोंपर दया और यथासाध्य तन-मन-धनसे
उनकी सेवा।
९—सब कर्मोंको भगवान्के प्रति अर्पण।
१०—सब प्राणियोंमें भगवान्को देखनेका अभ्यास।
श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं—
श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम्।
परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम॥
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः॥
मदर्थेष्वंगचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥
मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च।
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद्व्रतं तपः॥
एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्।
मयि संजायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥
(श्रीमद्भागवत ११।१९।२०—२४)
‘मेरी अमृतके समान कल्याणमयी कथामें श्रद्धा, निरन्तर मेरे
नाम और गुणोंका कीर्तन, मेरी पूजामें पूर्ण निष्ठा, स्तोत्रोंके द्वारा
मेरी स्तुति, मेरी सेवामें निरन्तर आदर, सब अंगोंसे मुझको
नमस्कार, मेरे भक्तोंका विशेषरूपसे पूजन, सब प्राणियोंमें मुझे
देखना, मेरे लिये ही सारे लौकिक कर्म करना, बातचीतमें केवल
मेरे ही गुणोंकी चर्चा करना, मनको मुझमें ही अर्पण कर देना,
समस्त कामनाओंको छोड़ देना, मेरे लिये धन, भोग और
सुखोंको त्याग देना और मेरे ही लिये यज्ञ, दान, होम, जप, तप
और व्रतादि शास्त्रोक्त कर्मोंको करना। हे उद्धव! आत्मनिवेदनपूर्वक
इन धर्मोंके द्वारा मेरी उपासना करनेसे मनुष्योंको मेरी प्रेमरूपा
भक्ति प्राप्त होती है। फिर उनको कुछ भी प्राप्त करना बाकी
नहीं रह जाता।'
प्रबुद्ध नामक योगीश्वरने महाराजा निमिसे प्रेमरूपा भक्तिकी
प्राप्तिके साधन इस प्रकार बतलाये हैं—
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।
शब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥
तत्र भागवतान्धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।
अमाययानुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः॥
सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु।
दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥
शौचं तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः॥
सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम्।
विविक्तचीरवसनं सन्तोषं येन केनचित्॥
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि।
मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि॥
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम्॥
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।
दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम्॥
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।
परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु॥
४. चतुर्थ प्रकरण: एकादश-आसक्ति, भक्ति-विजय एवं उपसंहार (सूत्र ७४-८४)
१४४ प्रेम-दर्शन
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।
मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥
(श्रीमद्भागवत ११।३।२१-३१)
'जिसको अपना परम कल्याण जाननेकी इच्छा हो, उसे
वेदके ज्ञाता और परब्रह्ममें स्थित शान्तस्वरूप गुरुकी शरण जाना
चाहिये। और गुरुको ही आत्मा एवं इष्टदेव समझकर निष्कपटभावसे
उनकी सेवा करके उन भागवत-धर्मोंको सीखना चाहिये, जिनसे
अपने-आपको दे डालनेवाले परमात्मा हरि प्रसन्न हो जाते हैं।
मनसे सब विषय-भोगोंमें वैराग्य, साधु-महात्माओंका संग, सब
प्राणियोंके प्रति यथायोग्य (दीनोंके प्रति) दया, (समान अवस्था-
वालोंसे) मित्रता और (बड़ोंके प्रति विनयका व्यवहार), तन-
मन-धनसे पवित्र रहना, कष्ट सहकर भी अपने वर्णाश्रमधर्मका
पालनरूपी तप करना, शीत, उष्ण आदिको सहना, व्यर्थ बातचीतका
त्याग या भगवान्का मनन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा,
सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें समभाव, सर्वत्र सब जीवोंमें अपने-
आपको तथा ईश्वरको देखना, एकान्तमें रहना, घर आदिको
भगवान्का मानना, शुद्ध साधारण वस्त्र पहनना, जो कुछ भी
मिले उसीमें सन्तोष मानना, भगवान्का गुण गानेवाले शास्त्रोंमें
श्रद्धा रखना, दूसरे शास्त्रोंकी निन्दा न करना, मन, वाणी और
कर्मोंका संयम, सत्यभाषण, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखना,
अद्भुत लीला करनेवाले श्रीहरिके जन्म, कर्म और गुणोंका
श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना, भगवान्के लिये ही सब विहित
कर्म करना, यज्ञ, दान, तप, जप आदि सदाचार, अपने प्रिय
लगनेवाले सब पदार्थ और स्त्री, पुत्र, घर तथा प्राणोंको भी
परमात्माके अर्पण कर देना, और इस प्रकार भगवान् ही जिनके
आत्मा और स्वामी हैं ऐसे भक्तोंसे मित्रता करना, जड-चेतन
जीवोंकी, मनुष्योंकी और उनमें भी साधुस्वभाववाले महापुरुषोंकी
विशेषरूपसे सेवा करना, परस्परमें भगवान्के पवित्र यशका
कथन करना और इस भगवद्गुणगानके द्वारा ही परस्पर प्रीति,
तुष्टि और दुःखोंकी निवृत्ति करना—ये सब साधन सद्गुरुके
समीप रहकर सीखने चाहिये। इस प्रकार बर्ताव करनेवाले और
पापसमूहके नाशक श्रीहरिका स्वयं स्मरण करने और दूसरोंसे
करानेवाले भक्तोंके हृदयमें इस साधनरूपा भक्तिके द्वारा प्रेमलक्षणा
भक्ति उत्पन्न हो जाती है और उनका शरीर पुलकित हो जाता
है, वह फिर प्रेममग्न हो जाते हैं।'
इस प्रकार श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामायण
आदि भक्तिप्रधान ग्रन्थोंके श्रवण-पठनसे तथा उपर्युक्त प्रकारसे
सत्संग, नाम-जप, नाम-कीर्तनादि भक्तिवर्धक सत्कार्योंके भगवत्प्रीत्यर्थ
करनेसे भक्तिकी वृद्धि होती है। भक्तको सदा साधुस्वभाव और
सत्कार्योंमें ही रत होना चाहिये तभी उनकी भक्ति बढ़ती है।
श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने अपने प्यारे भक्तोंके
लक्षण बतलाते हुए कहा है—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
१४६ प्रेम-दर्शन
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥
(१२।१३-२०)
'जो किसी भी जीवसे द्वेष नहीं रखता, जो सबका मित्र
और दयालु है, जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख-
दुःखोंकी प्राप्तिमें समभाववाला और क्षमाशील है, जिसका
चित्त निरन्तर मुझमें लगा है, जो सदा सन्तुष्ट है, मन और
इन्द्रियोंको जीते हुए है, मुझमें दृढ़निश्चयी है और जिसने
अपने मन-बुद्धिको मुझे सौंप रखा है वह मेरा भक्त मुझे
प्रिय है।
जिससे किसी जीवको उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं
किसीसे उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगोंसे
छूटा हुआ है वह भक्त मुझको प्रिय है।
जिसको किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है, जो शुद्ध,
भक्तिके प्रधान सहायक १४७
चतुर और उदासीन है, जो दुःखोंसे मुक्त है और 'मैं
करनेवाला हूँ' इस अभिमानसे किसी कार्यका आरम्भ नहीं
करता (सब कुछ भगवान्का ही किया मानता है) वह मेरा
भक्त मुझको प्रिय है।
जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और
न कुछ चाहता ही है, जो शुभ और अशुभ किसी भी कर्मको
आसक्ति और फलकी इच्छासे नहीं करता वह भक्तिमान् पुरुष
मुझको प्रिय है।
जो शत्रु-मित्रमें, मान-अपमानमें और सर्दी-गर्मी तथा सुख-
दुःखादि द्वन्द्वोंमें समानभाव रखता है, जिसकी (मुझको छोड़कर)
किसी भी पदार्थमें आसक्ति नहीं है, जो निन्दास्तुतिको समान
समझता है, जो चित्त तथा वाणीसे केवल मेरा ही मनन और
कथन करता है और जो किसी भी प्रकार जीवननिर्वाह
होनेमें सन्तोष रखता है, जिसका अपना कोई घर नहीं है
अर्थात् जो घरमें ममत्वरहित है या जो घर-द्वार सबको
भगवान्के मान चुका है वह स्थिरबुद्धि भक्त पुरुष मुझको
प्रिय है।
जो श्रद्धावान् पुरुष मेरे ही परायण होकर उपर्युक्त धर्ममय
अमृतका भलीभाँति सेवन करते हैं वे भक्त तो मुझको अत्यन्त
ही प्रिय हैं।'
श्रीभगवान्के बतलाये हुए ये लक्षण सिद्ध भक्तोंमें तो
स्वाभाविक होते हैं और भक्तिके साधकोंको इन्हें अपना
आदर्श मानकर इनके अनुसार आचरण करनेकी चेष्टा करनी
चाहिये।
१४८ प्रेम-दर्शन
इस प्रकार भक्तिशास्त्रके अध्ययन-मननसे तथा भक्तिको
बढ़ानेवाले साधनोंमें लगे रहनेसे भक्तको योगिजनदुर्लभ प्रेमरूपा
भक्तिकी प्राप्ति होती है।
सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्द्धमपि
व्यर्थं न नेयम् ॥ ७७ ॥
७७-सुख, दुःख, इच्छा, लाभ आदिका (पूर्ण) त्याग हो
जाय ऐसे कालकी बाट देखते हुए आधा क्षण भी (भजन
बिना) व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि भक्तिकी सिद्धि होनेपर सुख-
दुःख, लाभ-हानि आदि सारे द्वन्द्व स्वयमेव मिट जाते हैं
और फिर किसी पदार्थकी इच्छा नहीं रहती। परन्तु ऐसे शुभ
समयकी केवल बाट ही देखी जाय और साधन कुछ भी
न किया जाय तो वर्तमान हीन दशाका विनाश होकर अचानक
वैसी शुभ दशा अपने-आप प्राप्त होगी ही कैसे? फिर
मनुष्यके जीवनका एक क्षणका भी पता नहीं है, न मालूम
किस पलमें प्रलय हो जाय, कब मृत्यु आ जाय; इसलिये
'अमुक स्थिति हो जानेपर भगवान्का भजन करूँगा' ऐसी
धारणाको छोड़ देना चाहिये और अभी जो जिस अवस्थामें
है, उसे उसी अवस्थामें भगवान्की कृपाका आश्रय करके
साधना आरम्भ कर देनी चाहिये। आधे क्षणके लिये भी
विलम्ब नहीं करना चाहिये। कबीरजी कहते हैं—
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पलमें परलै होयगी, फेरि करैगा कब॥
पलक मारते-मारते मृत्युके ग्रास बन जाओगे, फिर कब
भक्तिके प्रधान सहायक १४९
करोगे। यह मत समझो कि 'अभी छोटी उम्र है, खेलने-
खाने और विषय भोगनेका समय है; बड़े-बूढ़े होनेपर भजन
करेंगे।' कौन कह सकता है कि तुम बड़े-बूढ़े होनेसे पहले
ही नहीं मर जाओगे। मौतकी नंगी तलवार तो सदा ही
सिरपर झूल रही है। इसपर एक दृष्टान्त है। एक भ्रमर था,
वह कमलके अन्दर बैठा कमलका रस पी रहा था और
उसकी सुगन्धसे मस्त हो रहा था; इतनेमें सन्ध्या हो आयी।
सूर्यके छिपते ही कमल संकुचित हो जाता है; अतएव कमल
बन्द हो गया और मोटे-मोटे शाल और शीशमके पेड़ोंको
छेद डालनेकी ताकत रखनेवाला भ्रमर विषयासक्तिके कारण
उसके अन्दर ही रह गया और विचार करने लगा—
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥
'रात बीत जायगी, प्रातःकाल होगा, सूर्य उदय होंगे और
जब उनकी किरणोंके पड़ते ही कमल फिर खिल जायगा,
तब मैं इसमेंसे निकल जाऊँगा। इतने आनन्दसे मकरन्दरसका
आस्वादन करता रहूँ।' वह यों विचार कर ही रहा था कि
इतनेमें एक मतवाले हाथीने आकर कमलको उखाड़कर मुँहमें
डाल लिया और कमलके साथ ही भौंरा भी हाथीके दाँतोंमें
पिस गया। उसके मनका मनोरथ मनहीमें रह गया। अतएव
इन विचारोंको तो छोड़ ही देना चाहिये कि अमुक काम
होनेपर भजन करेंगे। प्रथम तो मनमानी कामनाओंकी पूर्ति
१५० प्रेम-दर्शन
होती ही नहीं और यदि होती है तो एक कामनाकी पूर्ति
अनेकों नये-नये अभावोंको साथ लेकर आती है, फिर उनकी
पूर्तिके प्रयत्नमें लग जाना पड़ता है। अपूर्ण और अभावमय
क्षणभंगुर सांसारिक पदार्थोंसे कभी पूर्ण तृप्ति हो ही नहीं
सकती। कितनी ही प्राप्ति हो जाय, रहेगा अभाव ही और
अभावके दुःखसे जलते हुए ही विषयकामी मनुष्यको मर
जाना पड़ेगा। इसलिये विषयोंकी पूर्ण प्राप्ति और विषयोंके
भोगसे पूर्ण तृप्ति हो जाय ऐसे समयकी आशा छोड़कर
पहलेसे ही भजनमें लग जाना चाहिये।
इसके सिवा एक बात और विचारणीय है कि आज
अच्छे संगसे हमारे मनमें भगवान्को या भगवान्की भक्तिको
प्राप्त करनेकी इच्छा हुई है और हमने क्षणभरके लिये अपने
जीवनका ध्येय भगवत्-प्राप्ति माना है; परन्तु हम विचार
करते हैं कि अमुक स्थिति हो जानेपर इस ध्येयकी प्राप्तिके
लिये साधन किया जायगा। क्या हमारा यह विचार धोखेका
नहीं है? प्रथम तो यही निश्चय नहीं कि अमुक स्थिति
प्राप्त हो और फिर यह कौन कह सकता है कि तबतक
हमारा ध्येय नहीं बदल जायगा। परन्तु यदि आज हम अपने
ध्येय भगवत्प्राप्तिके साधनमें लग जाते हैं तो साधनमार्गमें
ज्यों-ज्यों आगे बढ़ेंगे त्यों-त्यों हमारा उसमें विशेष अनुराग
होगा, लाभ भी प्रतीत होगा और अभ्यास भी दृढ़ होता
जायगा। इसके विपरीत यदि हम केवल ध्येयमात्र मानकर ही
चुप रह जाते हैं तो दूसरे ही क्षण, दूसरा संग मिलनेपर
हमारा यह ध्येय बदल जायगा। इसलिये कालकी प्रतीक्षा न
भक्तिके प्रधान सहायक १५१
कर अभीसे भजन-साधन आरम्भ कर देना चाहिये। सत्संगसे
प्राप्त सदिच्छाके सुअवसरको खो नहीं देना चाहिये। स्वास्थ्य
भी सदा अच्छा रहेगा, यह भी निश्चय नहीं है। जबतक
स्वास्थ्य ठीक है तभीतक साधन-भजन होता है। स्वास्थ्य
बिगड़ जानेपर, इन्द्रियोंके असक्त हो जानेपर और बुढ़ापा आ
जानेपर, यदि पहले पूरा अभ्यास नहीं किया गया है तो
भजनमें मन ही नहीं लगेगा। महाराजा भर्तृहरिने इसीलिये
कहा है—
यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्
प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥
(वैराग्यशतक)
'जबतक शरीर स्वस्थ है, बुढ़ापा नहीं आया है, इन्द्रियोंकी
शक्ति पूरी बनी हुई है, आयुके दिन शेष हैं, तभीतक
बुद्धिमान् पुरुषको अपने कल्याणके लिये अच्छी तरह यत्न
कर लेना चाहिये। घरमें आग लग जानेपर कुआँ खोदनेसे
क्या होगा?'
इसीलिये भक्तगण भगवान्के शरण होकर पुकारा करते हैं—
आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं
प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः।
लक्ष्मीस्तोयतरंगभंगचपला विद्युच्चलं जीवितं
तस्मान्मां शरणागतं शरणद! त्वं रक्ष रक्षाधुना॥
'आयु प्रतिदिन देखते-देखते नष्ट हो रही है, जवानी बीती जा
१५२ प्रेम-दर्शन
रही है, गये हुए दिन लौटकर नहीं आते, काल जगत्को खा रहा है,
लक्ष्मी जलके तरंगकी भाँति चंचल है और जीवन तो बिजलीकी
चमकके समान अस्थिर है; अतएव हे शरण देनेवाले प्रभु! मुझ
शरणागतकी तुम अभी रक्षा करो।'
कृष्ण त्वदीयपदपंकजपञ्जरान्ते
अद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः।
प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः
कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते॥
'हे कृष्ण! तुम्हारे पदकमलरूपी पिंजरेमें मेरा यह मनरूपी
राजहंस आज ही प्रवेश कर जाय। प्राण निकलनेके समय जब
कफ, वायु और पित्तके बढ़नेपर कण्ठ रुक जायगा, उस समय
तुम्हारा स्मरण कहाँसे होगा?'
अतएव जरा-सा भी काल भगवान्के भजनके बिना नहीं
बिताना चाहिये। जो समय भगवद्भजनमें जाता है वही सार्थक
है, शेष सब व्यर्थ है। समयका मूल्य समझकर एक-एक
साँसको खूब सावधानीके साथ कंजूसके परिमित पैसोंकी
भाँति केवल भगवच्चिन्तनमें ही लगाना उचित है। भजनहीन
काल ही वास्तवमें हमारे लिये भयंकर काल है। वही सबसे
बड़ी विपत्ति है।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः स च विभ्रमः।
यन्मुहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवं न कीर्तयेत्॥
'जो घड़ी या एक क्षण भी श्रीभगवान्के कीर्तन बिना बीत
गया उसीको सबसे बड़ा नुकसान, अज्ञान और मोह जानना
चाहिये।'
भक्तिके प्रधान सहायक १५३
भगवान्के भजनके लिये किसी भी सुभीतेके समयकी
प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिये। नहीं तो हमारा अमूल्य मनुष्यजीवन
ही वृथा नष्ट हो जायगा। भगवान्का भजन ही मनुष्यजीवनका
सर्वोत्तम और आदरणीय कर्म है। भजन करते-करते भगवान्की
कृपासे एक दिन हमारे सारे सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंका अपने-आप
ही नाश हो जायगा और भगवत्प्रेमकी निर्मल ज्योतिसे हमारा
हृदय जगमगा उठेगा; सब दिशाएँ और सारा ब्रह्माण्ड उस निर्मल
शीतल स्निग्ध ज्योतिसे भर जायगा और तब हमारे आनन्दकी
कोई सीमा नहीं रहेगी।
वस्तुतः भक्तका काम तो यह सोचना भी नहीं है कि
भजनका क्या परिणाम होगा; उसका काम तो केवल प्रेमपूर्वक
भजन ही करना है। प्रेमके लिये ही प्रेम करना है, भजनके लिये
ही भजन करना है। भजन करना उसका स्वभाव ही बन जाता
है, भजन बिना उससे रहा ही नहीं जाता। वह सब कुछ सह
सकता है, किन्तु भजनका वियोग उसके लिये असह्य है।
श्रीमद्भागवतमें कहा है—
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ-
स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात् ।
न चलति भगवत्पदारविन्दा-
ल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः ॥
(११।२।५३)
‘यदि भगवान्के भक्तसे कहा जाय कि तुम आधे क्षण या
आधे निमेषके लिये भी भगवच्चरणोंका चिन्तन छोड़ दो और
त्रिलोकीके सम्पूर्ण वैभवको ले लो, तो वह इस बातको स्वीकार
नहीं करता। उसका चित्तरूपी भ्रमर तो अचंचलरूपसे भगवान्के
उन चारु चरणकमलोंमें ही लगा रहता है, जिनको निरन्तर
ध्यानपूर्वक खोजनेपर भी देवता नहीं पा सकते। ऐसा वह भक्त
कुछ भी नहीं चाहता।' वह बार-बार कातर कण्ठसे यही कहता
है कि मुझे न मोक्ष चाहिये, न ज्ञान चाहिये, न वैभव चाहिये,
न ऋद्धि-सिद्धि चाहिये और न महान् कीर्ति ही चाहिये। किसी
भी योनिमें जाना पड़े, कुछ भी हो, इसकी भी तनिक-सी चिन्ता
नहीं। बस, हे मेरे प्रियतम ! तुम्हारे चरणोंमें मेरा प्रेम, बिना किसी
हेतुका प्रेम, पगला प्रेम, अन्धा प्रेम, प्रेममय प्रेम, प्रियतममय प्रेम
दिनोंदिन बढ़ता ही रहे।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥
श्रीशंकराचार्य जगज्जननीरूप भगवान्से प्रार्थना करते हैं—
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥
अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्र्याणि परिपाल-
नीयानि॥ ७८॥
७८-(भक्तिके साधकको) अहिंसा, सत्य, शौच, दया,
आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारोंका भलीभाँति पालन
करना चाहिये।
छिहत्तरवें सूत्रमें भक्तिको बढ़ानेवाले कर्मोंका आचरण करनेकी
बात कही गयी है। इस सूत्रमें उन क्रियाओं और सद्गुणोंमेंसे पाँच
प्रधान आचारोंका नाम निर्देश करके सूत्रकार इनके पालनकी
अत्यन्त आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं।