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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 146 of 178

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Page 146

१४४ प्रेम-दर्शन
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।
मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥
स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥
(श्रीमद्भागवत ११।३।२१-३१)
'जिसको अपना परम कल्याण जाननेकी इच्छा हो, उसे
वेदके ज्ञाता और परब्रह्ममें स्थित शान्तस्वरूप गुरुकी शरण जाना
चाहिये। और गुरुको ही आत्मा एवं इष्टदेव समझकर निष्कपटभावसे
उनकी सेवा करके उन भागवत-धर्मोंको सीखना चाहिये, जिनसे
अपने-आपको दे डालनेवाले परमात्मा हरि प्रसन्न हो जाते हैं।
मनसे सब विषय-भोगोंमें वैराग्य, साधु-महात्माओंका संग, सब
प्राणियोंके प्रति यथायोग्य (दीनोंके प्रति) दया, (समान अवस्था-
वालोंसे) मित्रता और (बड़ोंके प्रति विनयका व्यवहार), तन-
मन-धनसे पवित्र रहना, कष्ट सहकर भी अपने वर्णाश्रमधर्मका
पालनरूपी तप करना, शीत, उष्ण आदिको सहना, व्यर्थ बातचीतका
त्याग या भगवान्‌का मनन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा,
सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें समभाव, सर्वत्र सब जीवोंमें अपने-
आपको तथा ईश्वरको देखना, एकान्तमें रहना, घर आदिको
भगवान्‌का मानना, शुद्ध साधारण वस्त्र पहनना, जो कुछ भी
मिले उसीमें सन्तोष मानना, भगवान्‌का गुण गानेवाले शास्त्रोंमें
श्रद्धा रखना, दूसरे शास्त्रोंकी निन्दा न करना, मन, वाणी और
कर्मोंका संयम, सत्यभाषण, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखना,
अद्भुत लीला करनेवाले श्रीहरिके जन्म, कर्म और गुणोंका
श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना, भगवान्‌के लिये ही सब विहित