प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextवाद-विवादरूपी विघ्न १३७
गुरु उसकी शंका निवारण कर और भी प्रबल तर्कसे उसे
सिद्धान्त समझाते हैं। ऐसा वाद दूषित नहीं है। परन्तु जो वाद
आग्रहपूर्वक होता है वह तो बुरा ही फल उत्पन्न करता है और
वादमें अपने मतका आग्रह हो ही जाता है। फिर सिद्धान्तका
लक्ष्य छूट जाता है और व्यक्तिगत दोषनिरीक्षण, दोषारोपण और
परस्पर गालीगलौज होने लगता है। विवेक नष्ट हो जाता है,
क्रोध छा जाता है, वाणी बेकाबू हो जाती है और सदाके लिये
वैर बँध जाता है। इसीलिये ‘वादे वादे वर्द्धते वैरवह्निः’—
‘वाद-विवादसे वैरकी आग भड़क उठती है’, कहा जाता है।
भक्तिके पथिकको तो इतनी फुरसत ही नहीं मिलनी चाहिये
जिसमें वह वाद-विवाद कर सके। जहाँतक हो सके उसे तर्कके
स्थानसे अलग ही रहना चाहिये। यदि प्रारब्धवश कभी तर्कवादियोंसे
समागम हो जाय तो उसे विनीतभाव धारणकर उनकी बात सुन
लेनी चाहिये और बदलेमें कोई उत्तर देकर बात बढ़ानी नहीं
चाहिये। ‘अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति’—‘जब
आगमें ईंधन नहीं पड़ेगा तो वह आप ही बुझ जायगी’—
कहनेवाले स्वयं ही थक जायँगे। अतएव भक्तके लिये सबसे
भली चुप है। ‘मौनं सर्वार्थसाधनम्’—यह वाक्य याद रखना
चाहिये। दूसरेकी ऐसी बात सुने ही नहीं जिससे अपने इष्टमें,
पथमें, विश्वासमें और साधनमें संशय हो जाय; और स्वयं
किसीका जी दुःखे, ऐसी कोई बात किसीसे कहे नहीं। दूसरेकी
बात मौके-बेमौके सुननी पड़े तो उसे सुन ले; परन्तु स्वयं तो
तर्ककी इच्छासे, दूसरेको दबानेके लिये, अपना मत स्थापन
करनेके लिये विवादमें उतरे ही नहीं। इसका यह तात्पर्य नहीं कि
श्रद्धाके साथ पूछनेवालेको कुछ न कहे या मौका पड़नेपर बिना