प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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पूछे भी हितकी बात न कहे। मतलब तो यह है कि विवादमें
न उतरे। अनावश्यक बोले ही नहीं, जब बिना बोले काम न चले
तब आवश्यक समझकर इतना ही बोले जितनेसे काम चल जाय।
बात बढ़ाकर न कहे, विवादके भावसे न कहे, किसीका विरोध
न करे, किसीकी दिल्लगी न करे, किसीका दोष न बतावे,
किसीके हृदयपर चोट न करे, अपनी या अपने मतकी बड़ाई
न करे, किसीकी निन्दा न करे, कड़ुआ न बोले, बोलनेमें आशा
या कामनाका भाव न रखे, जबानसे किसीको धोखा न दे,
किसीके विश्वासमें शंका न पैदा करे। जो कुछ बोले सत्य,
मधुर, प्रिय, अनुद्वेगकर और हितकर शब्द ही बोले; शेष समय
भगवन्नाम-स्मरणमें लगा रहे। अनावश्यक एक शब्द बोलनेमें भी
बड़ी हानि समझे, क्योंकि उतना समय व्यर्थ गया। उतने समयके
लिये जीभसे नामजप छूट गया और अनावश्यक शब्दका
वातावरणमें जो असर हुआ, वह अलग। यह निश्चय रखे कि
तर्क और वाद-विवादसे कभी भगवत्प्रेम, ज्ञान या भगवान्की
प्राप्ति नहीं होती। तर्कसे तो अहंकार, द्वेष, क्रोध, हिंसा और
वैरकी ही जमात इकट्ठी होती है। अतएव वाद-विवादसे सदा
अलग रहे।
अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तरक सब त्यागी ॥
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥
बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च ॥ ७५ ॥
७५-क्योंकि (वाद-विवादमें) बाहुल्यका अवकाश है
और वह अनियत है।
सूत्रकार कारण दिखाते हुए कहते हैं कि वाद-विवादमें