प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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चतुर और उदासीन है, जो दुःखोंसे मुक्त है और 'मैं
करनेवाला हूँ' इस अभिमानसे किसी कार्यका आरम्भ नहीं
करता (सब कुछ भगवान्का ही किया मानता है) वह मेरा
भक्त मुझको प्रिय है।
जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और
न कुछ चाहता ही है, जो शुभ और अशुभ किसी भी कर्मको
आसक्ति और फलकी इच्छासे नहीं करता वह भक्तिमान् पुरुष
मुझको प्रिय है।
जो शत्रु-मित्रमें, मान-अपमानमें और सर्दी-गर्मी तथा सुख-
दुःखादि द्वन्द्वोंमें समानभाव रखता है, जिसकी (मुझको छोड़कर)
किसी भी पदार्थमें आसक्ति नहीं है, जो निन्दास्तुतिको समान
समझता है, जो चित्त तथा वाणीसे केवल मेरा ही मनन और
कथन करता है और जो किसी भी प्रकार जीवननिर्वाह
होनेमें सन्तोष रखता है, जिसका अपना कोई घर नहीं है
अर्थात् जो घरमें ममत्वरहित है या जो घर-द्वार सबको
भगवान्के मान चुका है वह स्थिरबुद्धि भक्त पुरुष मुझको
प्रिय है।
जो श्रद्धावान् पुरुष मेरे ही परायण होकर उपर्युक्त धर्ममय
अमृतका भलीभाँति सेवन करते हैं वे भक्त तो मुझको अत्यन्त
ही प्रिय हैं।'
श्रीभगवान्के बतलाये हुए ये लक्षण सिद्ध भक्तोंमें तो
स्वाभाविक होते हैं और भक्तिके साधकोंको इन्हें अपना
आदर्श मानकर इनके अनुसार आचरण करनेकी चेष्टा करनी
चाहिये।