Skip to content
SarvaKosh
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished178 pages

Page 142 of 178

Read in context
Page 142

भक्तिके प्रधान सहायक
भक्तिशास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधककर्माण्यपि
करणीयानि ॥ ७६ ॥
७६-( उस प्रेमाभक्तिकी प्राप्तिके लिये ) भक्तिशास्त्रका
मनन करते रहना चाहिये और ऐसे कर्म भी करने चाहिये
जिनसे भक्तिकी वृद्धि हो।
भक्ति चाहनेवालोंको न कोई ग्रन्थ देखना चाहिये और न
कोई कर्म करना चाहिये ऐसी बात नहीं है। उनको तर्क-
वितर्कका त्याग करके बार-बार ऐसे ग्रन्थोंको अवश्य देखना
चाहिये जिनमें भगवान्‌की भक्तिका निरूपण हो, भक्तिका
माहात्म्य हो, भक्तिके साधन बतलाये गये हों, भगवान्‌के प्यारे
भक्तोंके पुण्यचरित्रोंकी कथाएँ हों और भक्तिके वशमें होकर
रहनेवाले भगवान्‌के प्रभाव, रहस्य और गुणोंका वर्णन हो। ऐसे
भक्तिशास्त्रोंके अध्ययनसे, महात्मा भक्त सन्तोंकी वाणियोंके
श्रवण और पठनसे भगवान्‌के प्रति प्रेमाभक्तिका उदय होता है।
हाँ, भक्ति चाहनेवाले पुरुषोंको ऐसी पुस्तकें कभी नहीं पढ़नी-
सुननी चाहिये जिनमें श्रीभगवान्‌का और भक्तिका खण्डन हो,
उनका महत्त्व कम बतलाया गया हो और भक्तोंकी निन्दा हो,
अथवा जिनमें लौकिक विषयोंकी महत्ताका ही वर्णन हो। ऐसी
पुस्तकें भी उन्हें लाभदायक नहीं होतीं जिनमें भगवान्, भक्ति
और भक्तोंका महत्त्व न हो। इसके सिवा राग-द्वेष, काम-क्रोध
और वैर-विरोध उत्पन्न करनेवाला साहित्य तो छूना भी नहीं
चाहिये। इसीलिये ऐसा कहा गया है कि —