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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 143 of 178

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Page 143

भक्तिके प्रधान सहायक १४१
यस्मिन् शास्त्रे पुराणे वा हरिभक्तिर्न दृश्यते।
श्रोतव्यं नैव तच्छास्त्रं यदि ब्रह्मा स्वयं वदेत्॥
‘जिस शास्त्र या पुराणमें भगवान्‌की भक्ति न दिखलायी दे,
ब्रह्माके द्वारा कहा हुआ होनेपर भी उसको नहीं सुनना चाहिये।’
साथ ही कर्म भी ऐसे करने चाहिये, जिनसे भक्तिकी जागृति
और वृद्धि हो। भक्तिकामी पुरुषको निषिद्ध (पाप) कर्मोंका तो
बिलकुल ही त्याग कर देना चाहिये। जो विषयोंकी आसक्तिवश
पापकर्मोंको नहीं छोड़ना चाहता और भक्त भी कहलाना चाहता है
वह या तो स्वयं भ्रममें है या जान-बूझकर भ्रम फैलाना चाहता है।
भक्तिकी प्राप्तिमें सहायक कर्मोंमें प्रधान निम्नलिखित हैं—
१—अपने वर्ण और आश्रमके धर्मोंका यथासम्भव पूरा
पालन। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासीके लिये त्यागपूर्ण
आचरण और गृहस्थके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ माता-पिता, स्त्री-
पुत्र-परिवार आदि आश्रित जनोंका प्रेम और सत्कारपूर्वक
पालन, न्याय और सत्यपूर्वक जीविकानिर्वाह एवं शास्त्रोक्त यज्ञ,
दान, तप आदि।
२—सदाचारका पालन।
३—सत्संग और भगवद्गुणानुवादका श्रवण, चिन्तन और
कीर्तन।
४—भगवन्नामका जप, स्मरण और कीर्तन।
५—भगवत्-पूजन, स्तुति-प्रार्थना और नमस्कार।
६—सन्त-भक्तोंकी सेवा और श्रद्धापूर्वक उनकी आज्ञाका
पालन।
७—तीर्थसेवन।