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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

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कर्म करना, यज्ञ, दान, तप, जप आदि सदाचार, अपने प्रिय
लगनेवाले सब पदार्थ और स्त्री, पुत्र, घर तथा प्राणोंको भी
परमात्माके अर्पण कर देना, और इस प्रकार भगवान् ही जिनके
आत्मा और स्वामी हैं ऐसे भक्तोंसे मित्रता करना, जड-चेतन
जीवोंकी, मनुष्योंकी और उनमें भी साधुस्वभाववाले महापुरुषोंकी
विशेषरूपसे सेवा करना, परस्परमें भगवान्के पवित्र यशका
कथन करना और इस भगवद्गुणगानके द्वारा ही परस्पर प्रीति,
तुष्टि और दुःखोंकी निवृत्ति करना—ये सब साधन सद्गुरुके
समीप रहकर सीखने चाहिये। इस प्रकार बर्ताव करनेवाले और
पापसमूहके नाशक श्रीहरिका स्वयं स्मरण करने और दूसरोंसे
करानेवाले भक्तोंके हृदयमें इस साधनरूपा भक्तिके द्वारा प्रेमलक्षणा
भक्ति उत्पन्न हो जाती है और उनका शरीर पुलकित हो जाता
है, वह फिर प्रेममग्न हो जाते हैं।'
इस प्रकार श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामायण
आदि भक्तिप्रधान ग्रन्थोंके श्रवण-पठनसे तथा उपर्युक्त प्रकारसे
सत्संग, नाम-जप, नाम-कीर्तनादि भक्तिवर्धक सत्कार्योंके भगवत्प्रीत्यर्थ
करनेसे भक्तिकी वृद्धि होती है। भक्तको सदा साधुस्वभाव और
सत्कार्योंमें ही रत होना चाहिये तभी उनकी भक्ति बढ़ती है।
श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने अपने प्यारे भक्तोंके
लक्षण बतलाते हुए कहा है—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्‌भक्तः स मे प्रियः॥