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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 148 of 178

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Page 148

१४६ प्रेम-दर्शन
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥
(१२।१३-२०)
'जो किसी भी जीवसे द्वेष नहीं रखता, जो सबका मित्र
और दयालु है, जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख-
दुःखोंकी प्राप्तिमें समभाववाला और क्षमाशील है, जिसका
चित्त निरन्तर मुझमें लगा है, जो सदा सन्तुष्ट है, मन और
इन्द्रियोंको जीते हुए है, मुझमें दृढ़निश्चयी है और जिसने
अपने मन-बुद्धिको मुझे सौंप रखा है वह मेरा भक्त मुझे
प्रिय है।
जिससे किसी जीवको उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं
किसीसे उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगोंसे
छूटा हुआ है वह भक्त मुझको प्रिय है।
जिसको किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है, जो शुद्ध,