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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 138 of 178

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Page 138

वाद-विवादरूपी विघ्न

वादो नावलम्ब्यः ॥ ७४ ॥
७४-( भक्तको ) वाद-विवाद नहीं करना चाहिये।
भक्तिके साधकोंके लिये यह सूत्र बड़े ही महत्त्वका है।
भक्तको तर्क-वितर्कमें पड़नेकी कोई भी आवश्यकता नहीं। यह
समझना चाहिये कि मेरा तो हरेक क्षण अपने प्रियतम भगवान्‌के
भजनके लिये समर्पण हो चुका, उसे दूसरे काममें लगानेका
अधिकार ही नहीं है। फिर वह तर्क-वितर्क करे भी किस
बातकी। सृष्टि कब हुई, कैसे हुई, क्यों हुई, इसका मूल तत्त्व
क्या है, इन सब बातोंको जाननेकी उसे जरूरत नहीं। उसने तो
श्रीभगवान्‌को ही सब कुछ मान-जानकर अपना एकमात्र लक्ष्य
बना लिया है। भगवान् अपना तत्त्व जब चाहेंगे, आप ही समझा
देंगे। कब समझावेंगे, समझावेंगे या नहीं समझावेंगे, इस बातकी
भी उसे कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिये। अपने प्रियतम भगवान्‌के
चिन्तनको छोड़कर दूसरी किसी वस्तुके चिन्तनकी उसके मनमें
गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिये। और यह भी निश्चित है कि
तर्कसे तत्त्वकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसीलिये ब्रह्मसूत्रमें कहा
है—‘तर्काप्रतिष्ठानात्’ (२।१।११)—‘तर्ककी प्रतिष्ठा नहीं
है।’ कठोपनिषद्‌में कहा गया है— ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’
(१।२।९)—‘बुद्धिके तर्कसे उस तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती।’
वह सत्य तत्त्व तो शुद्धचित्त सात्त्विक पुरुषके सामने स्वयमेव
आविर्भूत होता है। किसी अंशमें यह भी सत्य है कि ‘वादे वादे
जायते तत्त्वबोधः’, परन्तु वह वाद दूसरा होता है। श्रद्धालु
शिष्य जिज्ञासाभावसे गुरुके सामने तर्क उपस्थित करता है और