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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 151 of 178

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Page 151

भक्तिके प्रधान सहायक १४९
करोगे। यह मत समझो कि 'अभी छोटी उम्र है, खेलने-
खाने और विषय भोगनेका समय है; बड़े-बूढ़े होनेपर भजन
करेंगे।' कौन कह सकता है कि तुम बड़े-बूढ़े होनेसे पहले
ही नहीं मर जाओगे। मौतकी नंगी तलवार तो सदा ही
सिरपर झूल रही है। इसपर एक दृष्टान्त है। एक भ्रमर था,
वह कमलके अन्दर बैठा कमलका रस पी रहा था और
उसकी सुगन्धसे मस्त हो रहा था; इतनेमें सन्ध्या हो आयी।
सूर्यके छिपते ही कमल संकुचित हो जाता है; अतएव कमल
बन्द हो गया और मोटे-मोटे शाल और शीशमके पेड़ोंको
छेद डालनेकी ताकत रखनेवाला भ्रमर विषयासक्तिके कारण
उसके अन्दर ही रह गया और विचार करने लगा—
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥
'रात बीत जायगी, प्रातःकाल होगा, सूर्य उदय होंगे और
जब उनकी किरणोंके पड़ते ही कमल फिर खिल जायगा,
तब मैं इसमेंसे निकल जाऊँगा। इतने आनन्दसे मकरन्दरसका
आस्वादन करता रहूँ।' वह यों विचार कर ही रहा था कि
इतनेमें एक मतवाले हाथीने आकर कमलको उखाड़कर मुँहमें
डाल लिया और कमलके साथ ही भौंरा भी हाथीके दाँतोंमें
पिस गया। उसके मनका मनोरथ मनहीमें रह गया। अतएव
इन विचारोंको तो छोड़ ही देना चाहिये कि अमुक काम
होनेपर भजन करेंगे। प्रथम तो मनमानी कामनाओंकी पूर्ति