Skip to content
SarvaKosh
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished178 pages

Page 152 of 178

Read in context
Page 152

१५० प्रेम-दर्शन

होती ही नहीं और यदि होती है तो एक कामनाकी पूर्ति
अनेकों नये-नये अभावोंको साथ लेकर आती है, फिर उनकी
पूर्तिके प्रयत्नमें लग जाना पड़ता है। अपूर्ण और अभावमय
क्षणभंगुर सांसारिक पदार्थोंसे कभी पूर्ण तृप्ति हो ही नहीं
सकती। कितनी ही प्राप्ति हो जाय, रहेगा अभाव ही और
अभावके दुःखसे जलते हुए ही विषयकामी मनुष्यको मर
जाना पड़ेगा। इसलिये विषयोंकी पूर्ण प्राप्ति और विषयोंके
भोगसे पूर्ण तृप्ति हो जाय ऐसे समयकी आशा छोड़कर
पहलेसे ही भजनमें लग जाना चाहिये।
इसके सिवा एक बात और विचारणीय है कि आज
अच्छे संगसे हमारे मनमें भगवान्‌को या भगवान्‌की भक्तिको
प्राप्त करनेकी इच्छा हुई है और हमने क्षणभरके लिये अपने
जीवनका ध्येय भगवत्-प्राप्ति माना है; परन्तु हम विचार
करते हैं कि अमुक स्थिति हो जानेपर इस ध्येयकी प्राप्तिके
लिये साधन किया जायगा। क्या हमारा यह विचार धोखेका
नहीं है? प्रथम तो यही निश्चय नहीं कि अमुक स्थिति
प्राप्त हो और फिर यह कौन कह सकता है कि तबतक
हमारा ध्येय नहीं बदल जायगा। परन्तु यदि आज हम अपने
ध्येय भगवत्प्राप्तिके साधनमें लग जाते हैं तो साधनमार्गमें
ज्यों-ज्यों आगे बढ़ेंगे त्यों-त्यों हमारा उसमें विशेष अनुराग
होगा, लाभ भी प्रतीत होगा और अभ्यास भी दृढ़ होता
जायगा। इसके विपरीत यदि हम केवल ध्येयमात्र मानकर ही
चुप रह जाते हैं तो दूसरे ही क्षण, दूसरा संग मिलनेपर
हमारा यह ध्येय बदल जायगा। इसलिये कालकी प्रतीक्षा न