मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
पूर्व्वकथा॥ २१
तपोवन में कई दिन रह कर राक्षस ने यह सोचा कि जब तक पर्वतक को हम न फोड़ेंगे काम न चलेगा। यह सोच कर वह पर्वतक के राज्य में गया और वहा उस के बूढ़े मन्त्री से कहा कि चाणक्य बड़ा दगाबाज है, वह आधा राज कभी न देगा। आप राजा को लिखिए, वह मुझ से मिले तो मै सब राज्य उन को दूं। मन्त्री ने पत्रद्वारा पर्वतक को यह सब वृत्त और राक्षस की नीतिकुशलता लिख भेजा और यह भी लिखा कि मै अत्यन्त वृद्ध हूं, आगे से मन्त्री का काम राक्षस को दीजिये। पाटलिपुत्र विजय होने पर भी चाणक्य आधा राज्य देने में विलम्ब करता है, यह देख कर सहज लोभी पर्वतक ने मन्त्री की बात मानली और पत्रद्वारा राक्षस को गुप्त रीति से अपना मुख्य अमात्य बना कर इधर ऊपर के चित्त से चाणक्य से मिला रहा।
जीवसिद्धि के द्वारा चाणक्य ने राक्षस का सब हाल जान कर अत्यन्त सावधानतापूर्वक चलना आरम्भ किया। अनेक भाषा जाननेवाले बहुत से धूर्त पुरुषों को वेष बदल बदल कर भेद लेने को चारो ओर नियुक्त किया। चन्द्रगुप्त को राक्षस का कोई गुप्तचर धोखे से किसी प्रकार की हानि न पहुचावे इस का भी पक्का प्रबन्ध किया और पर्वतक की विश्वासघातकता का बदला लेने का दृढ़ संकल्प से, परन्तु अत्यन्त गुप्त रूप से, उपाय सोचने लगा।
राक्षस ने केवल पर्वतक की सहायता से राज के मिलने की आशा छोड़ कर * कुलूत, मलय, काश्मीर, सिन्धु और पारस इन पांच देशों के राजा से सहायता ली। जब इन पांचों देश के
* कुलूत देश विलात वा कुल्लू देश।
२२ मुद्राराक्षस ।
राजाओं ने बड़े आदर से राक्षस को सहायता देना स्वीकार
किया तो वह तपोवन के निकट फिर से लौट आया और
वहा से चन्द्रगुप्त के मारने को एक विषकन्या+ भेजी और
अपना विश्वासपात्र समझ कर जीवसिद्धि को उस के साथ
५ कर दिया। चाणक्य ने जीवसिद्धि द्वारा यह सब बात जान
कर और पर्वतक की धूर्तता और विश्वासघातकता से कुढ़
कर प्रकट मे इस उपहार को बडी प्रसन्नता से ग्रहण किया
और लानेवाले को बहुत सा पुरस्कार देकर बिदा किया।
साझ होने के पीछे धूर्ताधिराज चाणक्य ने इस कन्या को
१० पर्वतक के पास भेज दिया और इन्द्रियलोलुप पर्वतक उसी
रात को उस कन्या के संग से मर गया। इधर चाणक्य ने
यह सोचा कि मलयकेतु यहा रहेगा तो उस को राज्य का
हिस्सा देना पड़ेगा, इस से किसी तरह इस को यहा से
भगावे तो काम चले। इस कार्य्य के हेतु भागुरायण नामक
१५ एक प्रतिष्ठित विश्वासपात्र पुरुष को मलयकेतु के पास सिखा
पढ़ा कर भेज दिया। उस ने पिछली रात को मलयकेतु
से जा कर उस का बड़ा हित बन कर उस से कहा कि आज
चाणक्य ने विश्वासघातकता कर के आप के पिता को
विषकन्या के प्रयोग से मार डाला और औसर पाकर आप
२० को भी मार डालेगा। मलयकेतु बेचारा इस बात के
सुनते ही सन्न हो गया और पिता के शयनागार मे
- विषकन्या शास्त्रो में दो प्रकार की लिखी है। एक तो थोडे से ऐसे बुरे योग
हैं कि उस लग्न में उस प्रकार के ग्रहो के समय जो कन्या उत्पन्न हो उस के साथ
जिस का विवाह हो वा जो उस का साथ करे वह साथ ही वा शीघ्र ही मर जाता है।
दूसरे प्रकार की विषकन्या वैद्यक रीति से बनाई जाती थी। छोटेपन से बरन गर्भ
से कन्या को दूध में वा भोजन में थोडा २ विष देते देते बडी होने पर उस का शरीर
ऐसा विषमय हो जाता था कि जो उस का अङ्ग संग करता वह मर जाता।
पूर्व्वकथा । २३
जाकर देखा तो पर्वतक को बिछौने पर मरा हुआ पाया । इस भयानक दृश्य के देखते ही मुग्ध मलयकेतु के प्राण सूख गये और भागुरायण का सलाह से उस रात को छिप कर वहा से भाग कर अपने राज्य की ओर चला गया । इधर चाणक्य के सिखाये भद्रभट इत्यादि चन्द्रगुप्त के कई बड़े २ अधिकारी प्रगट में राजद्रोही बन कर मलयकेतु और भागुरायण के साथ ही भाग गये । ५
राक्षस ने मलयकेतु से पर्वतक के मारे जाने का समाचार सुन कर अत्यन्त सोच किया और बड़े आग्रह और सावधानी से चन्द्रगुप्त और चाणक्य के अनिष्टसाधन मे प्रवृत्त हुआ । १०
चाणक्य ने कुसुमपुर मे दूसरे दिन यह प्रसिद्ध कर दिया कि पर्वतक और चन्द्रगुप्त दोनों समान बन्धु थे, इस से राक्षस ने विषकन्या भेज कर पर्वतक को मार डाला और नगर के लोगों के चित्त पर, जिन को कि यह सब गुप्त अनुसन्धि न मालूम थी, इस बात का निश्चय भी करा दिया । १५
इस के पीछे चाणक्य और राक्षस के परस्पर नीति की जो चोटें चली हैं, उसी का इस नाटक में वर्णन है ।
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महाकवि विशाखदत्त का बनाया
मुद्राराक्षस नाटक ।
स्थान रङ्गभूमि ।
रंगशाला में नान्दी मङ्गलपाठ करता है।
भरित नेह नव नीर नित, बरसन सुरस अथोर ।
जयति अपूरब घन कोऊ, लखि नाचत मन मोर ॥१॥
'कौन है सीस पै' 'चन्द्रकला' 'कहा याको है नाम यही त्रिपुरारी' ।
'हा यही नाम है भूल गई किमि जानत हू तुम प्रान पियारी' ॥
'नारिहि पूंछत चन्द्रहि नाहिं' 'कहै विजया यदि चन्द्र लबारी' । ५
यों गिरिजै छलि गंग छिपावत ईस हरौ सब पीर तुम्हारी ॥२॥
पाद प्रहार सों जाइ पताल न भूमि सबै तनु बोझ के मारे ।
हाथ नचाइबे सों नभ मैं इत के उत टूटि परैं नहिं तारे ॥
देखन सो जरि जाहि न लोक न खोलत नैन कृपा उर धारे ।
यों थल के बिनु कष्ट सों नाचत शर्व हरौ दुख सर्व तुम्हारे ॥३॥ * १०
* संस्कृत का मंगलाचरण —
धन्या केयं स्थिता ते शिरसि शशिकला, किन्नु नामैतदस्या
नामैवास्यास्तदेतत्, परिचितमपि ते विस्मृतं कस्य हेतोः ।॥
नारी पृच्छामि नेन्दुं, कथयतु विजया न प्रमाणं यदिन्दु-
र्देव्या निह्नोतुमिच्छोरिति सुरसरितं शाठ्यमव्याद्विभोर्वः ॥१॥
२६ | मुद्राराक्षस ।
नान्दी-पाठ के अनन्तर* ।
**सूत्रधार ।—**बस ! बहुत मत बढ़ाओ, सुनो, आज मुझे सभासदों की आज्ञा है कि सामन्त वटेश्वरदत्त के पौत्र और महाराज पृथु के पुत्र विशाखदत्त कवि का बनाया मुद्राराक्षस ५ नाटक खेलो । सच है, जो सभा काव्य के गुण और दोष को सब भांति समझती है, उस के सामने खेलने में मेरा भी चित्त सन्तुष्ट होता है ।
और भी
पादस्याविभ्रव तीम्भन तमवने—रक्षन् स्वैरपातै
स्सङ्कोचेनैव नेष्या मुहरभियत सर्व्वलोकातिगानाम ।
दृष्टि लङ्क्ष्वेषु नोमा ज्वलन शमुच बध्नतो दाहभीते
रित्याधारानुरोधात त्रिपुरविजयिन पातु वो दु खनृत्यम ॥२॥
अर्थ ।
'यह आप के सिर पर कौन बडभागिनी है ? 'शशिकला है । 'क्या इस का यही नाम है ? हां, यही तो तुम तो जानती हो फिर क्यो भूल गई, 'अजी हम स्त्री को पूछती हैं चन्द्रमा को नहीं पूछती 'अच्छा चन्द्र की बात का विश्वास न हो तो अपनी सखी विजया से पूछ लो । योही बात बना कर गङ्गा जी को छिपा कर देवी पार्वती को ठगने की इच्छा करने वाले महादेव जी का छल तुमलोगो की रक्षा करै ।
दूसरा ।
पृथ्वा झुकने के डर से इच्छानुसार पैर का बोझ नहीं दे सकत ऊपर के लोकों के इधर उधर हो जाने के भय से हाथ भी यथेच्छ नहीं फेंक सकते, और उस के अग्निकण से जल जायगे इसी ध्यान से किसी की ओर भर दृष्टि देख भी नहीं सकते, इस से आधार के संकोच से महादेव जी का कष्ट से नृत्य करना तुम्हारी रक्षा करै ।
* नाटको में पहले मंगलाचरण कर के तब खेल आरम्भ करते हैं । इस मंगलाचरण को नाटकशास्त्र में नान्दी कहते हैं । किसी का मत है कि नान्दी पहिले ब्राह्मण पढ़ता है, कोई कहता है सूत्रधार ही और किसी का मत है कि परदे के भीतर से नान्दी पढ़ी या गाई जाय ।
प्रस्तावना । २७
उपजै अच्छे खेत मे, मूरखहू के धान।
सधन होन मै धान के, चहिय न गुनी किसान ॥ ४ ॥
तो अब मै घर से सुघर घरनी को बुलाकर कुछ गाने बजाने का ढग जमाऊ (घूम कर) यही मेरा घर है, चलू । (आगे बढ़ कर) अहा ! आज तो मेरे घर मे कोई उत्सव जान ५ पड़ता है, क्योकि घर-वाले सब अपने अपने काम मे चूर हो रहे है।
पीसत कोऊ सुगन्ध कोऊ जल भरि कै लावत ।
कोऊ बैठि कै रंग रंग की माल बनावत ॥
कहु तिय गन हु कार सहित अति श्रवन सोहावत । १०
होत मुशल को शब्द सुखद जियको सुनि भावत ॥५॥
जो हो घर से स्त्री को बुला कर पूछ लेता हूं (नेपथ्य की ओर)
री गुनवारी सब उपाय की जाननवारी ।
घर की राखनवारी सब कुछ साधनवारी ॥
मो गृह नीति सरूप काज सब करन संवारी । १५
बेगि आउरी नटी बिलम्ब न करु सुनि प्यारी ॥६॥
(नटी आती है)
नटी।—आर्य्यपुत्र ! * मै आई, अनुग्रहपूर्वक कुछ आज्ञा दीजिये ।
सूत्र०।—प्यारी, आज्ञा पीछे दी जायगी, पहिले यह बता कि २० आज ब्राह्मणों का न्योता कर के तुम ने इस कुटुम्ब के लोगो पर क्यो अनुग्रह किया है ? या आप ही से आज अतिथि लोगो ने कृपा किया है कि ऐसे धूम से रसोई चढ़ रही है ?
नटी।—आर्य्य ! मै ने ब्राह्मणों को न्यौता दिया है । २५
सूत्र०।—क्यो ? किस निमित्त से ?
* संस्कृत मुहाविरे म पति को स्त्रिया आर्य्यपुत्र कह कर पुकारती हैं।
२८ मुद्राराक्षस ।
नटी।—चन्द्रग्रहण लगने वाला है।
सूत्र०।—कौन कहता है ?
नटी।—नगर के लोगों के मुंह सुना है।
सूत्र०।—प्यारी ! मैंने ज्योति शास्त्र के चौसठों * अंगों मे बडा
५ परिश्रम किया है। जो हो, रसोई तो होने दो + पर आज
तो गहन है यह तो किसी ने तुझे धोखाही दिया है क्योकि—
चन्द्र×विम्ब पूरन भए क्रूरकेतु - हठ दाप ।
* होरा मुहूर्त जातक ताजिक रमल इत्यादि।
+ अर्थात् ग्रहण का योग तो कदापि नही है। खैर रसोई हो।
×केतु अर्थात राक्षस मंत्री। राक्षस मंत्री ब्राह्मण था और केवल नाम उस का राक्षस था कि तु गुण उस में देवताओ के थे।
केतु ग्रह का और हाल पुस्तक के अन्त में लिखा है।
— इस श्लोक का यथार्थ तात्पर्य जानने को काशी संस्कृत विद्यालय के प्रधान जगद्विख्यात पण्डितवर बापूदेव शास्त्री को मैने पत्र लिखा। क्योंकि टीकाकारो ने “चन्द्रमा पूर्ण होने पर” यही अर्थ किया हे और इस अर्थ से मेरा जी नहीं भरा। कारण यह कि पूर्ण चन्द्र में तो ग्रहण लगता ही है, इस में विशेष क्या हुआ ? शास्त्री जी ने जो उत्तर दिया है वह यहां प्रकाशित होता है।
श्रीयुत बाबू साहिब को बापूदेव का कोटिश आशीर्वाद, आपने प्रश्न लिख भेजे उन का संक्षेप से उत्तर लिखता हूं।
१ सूर्य्य के अस्त हो जाने पर जो रात्रि में अन्धकार होता हे यही पृथ्वी की छाया है और पृथ्वी गोलाकार है और सूर्य्य से छोटी है इस लिये उसकी छाया गव्य्वाकार शंकु के आकार की होती है और यह आकाश में चन्द्र के भ्रमणमार्ग को पार कर बहुत दूरतक सातवें से आठवें राशि के अन्तर पर रहती २ और पूर्णिमा के अन्त में चन्द्रमा भी सूर्य्य से छ राशि के अन्तर पर रहता है। इस लिए जिस पूर्णिमा में चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में आ जाता है अर्थात् पृथिवी की छाया चन्द्रमा के बिम्ब पर पड़ती है तभी वह चंद्र का ग्रहण कहलाता है और छाया जो चन्द्रबिम्ब पर देख पड़ती है वही ग्रास कहलाता है। और राहु नामक एक दैत्य प्रसिद्ध है वह चन्द्रग्रहणकाल में पृथ्वी की छाया में प्रवेश कर के चन्द्र की ओर प्रभा का पीछा करता है, इस कारण
प्रस्तावना। २६
बल सों करि हैं ग्रास कह —
( नेपथ्य में )
है ! मेरे जीते चन्द्र को कौन बल से ग्रस सकता है ?
सूत्र०।— जेहि बुध रक्खत आप ॥७॥
से लोक में राहूकृत ग्रहण कहा जाता है और उस काल में स्नान, दान, जप, होम इत्यादि करन से वह राहूकृत पीडा दूर होती है और बहुत पुण्य होता है ।
२ पूर्णिमा में चन्द्रग्रहण होने का कारण ऊपर लिखा ही है और पूर्णिमा में चन्द्रविम्ब भी पूर्ण उज्ज्वल होता है तभी चन्द्रग्रहण होता है ।
३ जब कि पूर्णिमा के दिन चन्द्रग्रहण होता है, इस से पूर्णिमा में चन्द्रमा का और बुध का योग कभी नहीं होता ( क्योंकि बुध सर्वदा सूर्य के पास रहता है और पूर्णिमा के दिन सूर्य चन्द्रमा से दूर राशि के अन्तर पर रहता है, इस लिये बुध भी उस दिन चन्द्र से दूर ही रहता है) यों बुध के योग में चन्द्रग्रहण कभी नहीं हो सकता । इति शिवम् । संवत् १९३७ ज्येष्ठ शुक्ल १५ मंगल दिन, मंगल मंगले भूयात् ।
शास्त्री जी से एक दिन मुझे इस विषय में फिर वार्ता हुई । शास्त्री जी को मैं ने मुद्राराक्षस की पुस्तक भी दिखलाई । इस पर शास्त्री जी ने कहा कि मुझ को ऐसा मालूम होता है कि यदि उस दिन उपराग का सम्भव होगा तो सूर्यग्रहण का क्योंकि बुधयोग अमावस्या के पास होता भी है । पुराणों में स्पष्ट लिखा है कि राहु चन्द्रमा का ग्रास करता है और केतु सूर्य का, और इस श्लोक में केतु का नाम भी है। इस से भी सम्भव होता है कि सूर्योपराग रहा हो । तो चाणक्य का कहना भी ठीक हुआ कि केतू हठपूर्वक क्यों चन्द्र को ग्रसा चाहता है अर्थात् एक तो चन्द्रग्रहण का दिन नहीं दूसरे केतु का चन्द्रमा ग्रास का विषय नहीं क्योंकि नन्द वीर्य्यजात होने से चन्द्रगुप्त राक्षस का वध्य नहीं है । इस अवस्था में ‘चन्द्रम् असम्पूर्ण मण्डल’ चन्द्रमा का अधूरा मण्डल यह अर्थ करना पडेगा । तब छन्द में ‘चन्द्र विम्ब पूरन भए’ के स्थान पर ‘बिना चन्द्र पूरन भए’ पढना चाहिए ।
बुध का बिम्ब प्राचीन भास्कराचार्य के मतानुसार छ कला पन्द्रह विकला के लगभग है परन्तु नवीनों के मत से केवल दश विकला परम है ।
परन्तु इस में कुछ सन्देह नहीं कि यह ग्रह बहुत छोटा है क्योंकि प्राचीनों को इस का ज्ञान बहुत कठिनता से हुआ है इसी लिए इस का नाम ही बुध, ज्ञ, इत्यादि हो गया । यह पृथ्वी से १८६३७७ इतने योजन की दूरी पर मध्यम मान से रहता है और सदा सूर्य के अनुचर के समान सूर्य के पास ही रहता है, एक पाद अर्थात् तीन राशि
३० मुद्राराक्षस ।
नटी ।—आर्य्य ! यह पृथ्वी ही पर से चन्द्रमा को कौन बचाना चाहता है ?
सूत्र०।—प्यारी, मै ने भी नही लखा, देखो, अब फिर से वही पढता हू और अब जब वह फिर बोलैगा तो मै उस की बोली से पहिचान लूगा कि कौन है।
भा सूर्य्य सै आगे नही जाता। विल्सन ने केतु शब्द से मलयकेतु का ग्रहण किया हे। इस मे भी एक प्रकार का अलकार अच्छा रहता है।
चमत्कृत बुद्धिसम्पन्न पण्डित सुधाकर जी न इस विषय में जो लिखा हे वह विचित्र ही है। वह भी प्रकाश किया जाता हं—
करत अधिक अंधियार वह, मिलि मिलि करि हरिच द ।
द्विजराजहु विकसित करत, धान धनि यह हरिच द ॥
श्री बाबू साहब को हमारे अनेक आशीर्वाद,
महाशय !
चन्द्रग्रहण का सम्भव भूच्छाया के कारण प्रति पूर्णिमा के अन्त में होता है और उस समय में केतु और सूर्य्य साथ रहते हैं। परन्तु कतु और सूर्य्य का योग यदि नियत सख्या के अर्थात् पाच राशि सोतरह अश से लेकर छ राशि चौदह अश क वा ग्यारह राशि सोरह अश मे लेकर बारह राशि चौदह अश के भीतर होता है तब ग्रहण होता है और यदि योग नियत सख्या क बाहर पड जाता है तब ग्रहण नही होता इस लिये सूर्य्य केतु के योगही के कारण से प्रत्येक पूर्णिमा मे ग्रहण नही होता। तब
क्रूरग्रह स केतुश्च द्रमस पूर्णामण्टलमिदानीम ।
अभिभवितुमिच्छति बलाद्गद्गत्येन तु बुधयोग ॥
इस श्लोक का यथार्थ अर्थ यह है कि क्रूरग्रह सूर्य्य केतु के साथ च द्रमा क पूर्णम ण्डल को यून करने की इच्छा करता है पर तु हे बुध ! योग जो हं वही बल सै उस च द्रमा की रक्षा करता है। यहा बुध शब्द पण्डित के अर्थ मे सम्बोधन हे, ग्रहवाची कदापि नही हे। बुध शब्द को ग्रहार्थ में ले जान से जो जो अर्थ होते हं वे सब बनावट हैं। इति
स० १८३७ वशाख शुक्ल ५
ऊंचे ह्नौ गुरु बुध कवी मिलि लरि होत विरूप ।
करत समागम सबहि सो, यह द्विजराज अनूप ॥
आप का
पं० सुधाकर।
प्रस्तावना। ३१
(अहि चन्द्र पूरन भए फिर से घटता है)
(नेपथ्य मे)
हैं ! मेरे जीते चन्द्र को कौन बल से ग्रस सकता है ?
सूत्र० — (सुन कर) जाना।
अरे अहै कौटिल्य ५
नटी ।— (डर नाट्य करती है)
सूत्र० ।— दुष्ट टेढ़ी मतिवारो।
नन्दवंश जिन सहजहि निज क्रोधानल जारो ॥
चन्द्रग्रहण को नाम सुनत निज नृप को मानी ।
इतही आवत चन्द्रगुप्त पै कछु भय जानी ॥ ८ ॥ १०
तो अब चलो हम लोग चलैं।
(दोनों जाते हैं)
इति प्रस्तावना।
—.*.—
प्रथम अंक ।
स्थान—चाणक्य का घर।
(अपनी खुली शिखा को हाथ से फटकारता हुआ चाणक्य आता है)
। क्य। —बता ! कौन है जो मेरे जीते चन्द्रगुप्त को बल से ग्रसना चाहता है ?
सदा दन्ति के कुम्भ को जो बिदारै ।
ललाटै नए चन्द सी जौन धारै ॥
जभाई समै काल सो जौन बाढैँ ।
भलो सिंह को दात सो कौन काढैँ ॥ ९ ॥
और भी
काल सर्पिणी नन्द कुल, क्रोध धूम सी जौन ।
अब हूं बाधन देत नहि, अहो शिखा मम कौन ॥ १० ॥
दहन नन्दकुल बन सहज, अति प्रज्वलित प्रताप ।
को मम क्रोधा नल पतंग, नयो चहत अब पाप ॥ ११ ॥
शारगरव ! शारगरव !!
( शिष्य आता है )
**शिष्य ।—**गुरु जा ! क्या आज्ञा है ?
**चाणक्य ।—**बेटा ! मै बैठना चाहता हू ।
**शिष्य ।—**महाराज ! इस दालान मे बेत की चटाई पहिले ही से बिछी है, आप बिराजिये ।
**चाणक्य ।—**बेटा ! केवल कार्य्य म तत्परता मुझे व्याकुल करती है न कि और उपाध्यायों के तुल्य शिष्य जन से
प्रथम अङ्क । ३३
प्रथम अङ्क । ३३
दुःशीलता * ( बैठ कर आप ही आप ) क्या सब लोग यह
बात जान गए कि मेरे × नन्दवंश के नाश से क्रुद्ध हो कर
राक्षस, पितावध से दुखी मलयकेतु + से मिल कर यवनराज
की सहायता ले कर चन्द्रगुप्त पर चढाई किया चाहता है।
( कुछ सोच कर ) क्या हुआ, जब मै नन्दवश की बड़ी प्रतिज्ञा ५
रूपी नदी से पार उतर चुका, तब यह बात प्रकाश होने ही से
क्या मै इस को न पूरी कर सकूँगा ? क्यों कि—
दिसि सरिस रिपु रमनी बदन शशि शोक कारिख लाय कै।
लै नीति पवनहि सचिव बिटपन छार डारि जराय कै ॥
बिनु पुर निवासी पच्छिगन नृप बंसमूल नसाय कै । १०
भो शांति मम क्रोधाग्नि यह कछु दहन हित नहि पाय कै - ॥१२॥
और भी
जिन जनन नै अति सोच सों नृप भय प्रगट धिक नहि कह्यौ।
पै मम अनादर को अतिहि वह सोच जिय जिन के रह्यौ =॥
ते लखहि आसन सों गिरायो नन्द सहित समाज कौं । १५
जिमि शिखर तें वनराज क्रोधि गिरावई गजराज कौं ॥ १३ ॥
सो यद्यपि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर चुका हूं, तौ भी
चन्द्रगुप्त के हेतु शस्त्र अब भी धारण करता हूं। देखो मैने—
नवनन्दन कौ मूल सहित खोद्यो छन भर में।
चन्द्रगुप्त मै श्री राखी नलिनी जिमि सर में ॥ २०
क्रोध प्रीति सो एक नासि कै एक बसायो।
शत्रु मित्र को प्रगट सबन फल ले दिखलायो ॥
* अर्थात् कुछ तुम लोगो पर दृष्टता मे नहीं अपने काम की घबराहट से बिछी हुई चटाई नहीं देखी ।
× नन्दवश अर्थात् नवा न द, एक नन्द और उस क आठ पा ।
+ पर्वतेश्वर राजा का पत्र ।
— अग्नि बिना आधार नही जलती ।
= न द ने कुरूप होने क कारण चाणक्य को अपने श्राद्ध से निकाल दिया था ।
३४ मुद्राराक्षस ।
अथवा जब तक राक्षस नही पकडा जाता तब तक नन्दों के मारने से क्या और चन्द्रगुप्त को राज्य मिलने से ही क्या ? (कुछ सोचकर) अहा ! राक्षस की नन्दवंश मे कैसी दृढ़ भक्ति है ! जब तक नन्दवंश का कोई भी जीता रहेगा तब तक
५ वह कभी शूद्र का मन्त्री बनना स्वीकार न करेगा, इस से उस के पकडने मे हम लोगों को निरुद्यम रहना अच्छा नही । यही समझ कर तो नन्दवंश का सर्वार्थसिद्धि बिचारा तपोवन मे चला गया तौ भी हमने मार डाला । देखो, राक्षस मलय केतु को मिला कर हमारे बिगाड़ने मे यत्न करता ही जाता है
१० (आकाश मे देख कर) वाह राक्षस मन्त्री वाह ! क्यों न हो ! वाह मन्त्रियों मे वृहस्पति के समान वाह ! तू धन्य है, क्योंकि—
जब लौं रहै सुख राज को तब लौं सबै सेवा करै ।
पुनि राज बिगडे कौन स्वामी तनिक नहि चित पे धरै ॥
१५ जे विपतिहू मे पालि पूरब प्रीति काज सवारहीं ।
ते धन्य नर तुम सारिखे दुर्लभ अहै संसय नहीं ॥
इसी से तो हम लोग इतना यत्न करके तुम्हें मिलाया चाहते है कि तुम अनुग्रह करके चन्द्रगुप्त के मन्त्री बनो, क्योंकि—
२० मूरख कातर स्वामिभक्ति कछु काम न आवै ।
पण्डित हूं बिन भक्ति काज कछु नाहि बनावै ॥
निज स्वारथ की प्रीति करैं ते सब जिमि नारी ।
बुद्धि भक्ति दोउ होय तबै सेवक सुखकारी ॥
सो मै भी इस विषय मे कुछ सोता नही हूं, यथाशक्ति
२५ उसी के मिलाने का यत्न करता रहता हूं । देखो, पर्व्वतक को चाणक्य ने मारा यह अपवाद न होगा, क्योंकि सब जानते है कि चन्द्रगुप्त और पर्व्वतक मेरे मित्र है तो मै पर्व्वतक को मार
प्रथम अङ्क । ३५
प्रथम अङ्क । ३५
कर चन्द्रगुप्त का पक्ष निर्बल कर दूंगा ऐसी शंका कोई न करेगा
सब यही कहेंगे कि राक्षस ने विषकन्या-प्रयोग करके चाणक्य
के मित्र पर्वतक को मार डाला। पर एकान्त मे राक्षस ने मलय
केतु के जी मे यह निश्चय करा दिया है कि तेरे पिता को मै ने
नहीं मारा चाणक्य ही ने मारा, इस से मलयकेतु मुझ से ५
बिगड़ रहा है। जो हो, यदि यह राक्षस लड़ाई करने को
उद्यत होगा तो भी पकड़ जायगा । पर जो हम मलयकेतु को
पकड़ेंगे तो लोग निश्चय करलेंगे कि अवश्य चाणक्य ही
ने अपने मित्र इस के पिता को मारा और अब मित्रपुत्र
अर्थात् मलयकेतु को मारना चाहता है । और भी, अनेक १०
देश की भाषा पहिरावा चाल व्यवहार जाननेवाले अनेक
वेषधारी बहुत से दूत मै ने इसी हेतु चारो ओर भेज रक्खे
हैं कि वे भेद लेते रहें कि कौन हम लोगों से शत्रुता
रखता है, कौन मित्र है । और कुसुमपुर निवासी नन्द के
मन्त्री और सम्बन्धियों के ठीक ठीक वृत्तान्त का अन्वेषण १५
हो रहा है, वैसे ही भद्रभटादिकों को बड़े बड़े पद देकर
चन्द्रगुप्त के पास रख दिया है और भक्ति की परीक्षा लेकर
बहुत से अप्रमादी पुरुष भी शत्रु से रक्षा करने को नियत कर
दिए हैं । वैसे ही मेरा सहपाठी मित्र विष्णुशर्म्मा नामक
ब्राह्मण जो शुक्रनीति और चौसठों कला से ज्योतिषशास्त्र में २०
बड़ा प्रवीण है, उसे मै ने पहिले ही योगी बना कर नन्दवध की
प्रतिज्ञा के अनन्तर ही कुसुमपुर में भेज दिया है, वह वहां
नन्द के मन्त्रियों से मिलता करके, विशेष कर के राक्षस का
अपने पर बड़ा विश्वास बढ़ा कर सब काम सिद्ध करेगा,
इस से मेरा सब काम बन गया है परन्तु चन्द्रगुप्त सब राज्य २५
का भार मेरे ही ऊपर रख कर सुख करता है । सच है,
जो अपने बल बिना और अनेक दुःखों के भोगे बिना राज्य
मिलता है वही सुख देता है । क्योंकि—
३६ मुद्राराक्षस ।
अपने बल सों लावही, यद्यपि मारि सिकार ।
तदपि सुखी नहि होत है, राजा सिंह-कुमार ॥१६॥
( * यम का चित्र हाथ मे लिये योगी का वेष धारण किये दूत आता है । )
५ दूत ।—अरे, और देव को काम नहि, जम को करो प्रनाम ।
जो दूजन के भक्त को, प्रान हरत परिनाम ॥ १७ ॥
और
उलटे ते हू बनत है, काज किये अति हेत ।
जो जम जो सब को हरत, सोई जीविका देत ॥ १८॥
१० तो इस घर मे चल कर जमपट दिखाकर गावै ।
( घूमता है )
शिष्य ।—रावल जी ! ड्योढी के भीतर न जाना ।
दूत ।— अरे ब्राह्मण ! यह किस का घर हे ?
शिष्य ।—हम लोगों के परम प्रसिद्ध गुरु चाणक्य जी का ।
१५ दूत ।— ( हँस कर ) अरे ब्राह्मण, तब तो यह मेरे गुरुभाई ही का घर है, मुझे भीतर जाने दे, मै उस को धर्मोपदेश करू गा ।
शिष्य ।—( क्रोध से ) छि मूर्ख ! क्या तू गुरुजी से भी धर्म विशेष जानता है ?
२० दूत ।—अरे ब्राह्मण ! क्रोध मत कर, सभी सब कुछ नही जानते, कुछ तेरा गुरु जानता है, कुछ मेरे से लोग जानते ह ।
शिष्य ।—(क्रोध से ) मूर्ख ! क्या तेरे कहने से गुरु जी की सर्वज्ञता उड जायगी ?
दूत ।—भला ब्राह्मण ! जो तेरा गुरु सब जानता ह तो बतलावे
२५ कि चन्द्र किस को नही अच्छा लगता ?
* उस काल में एक चाल के फकीर जम का चित्र दिखला कर संसार की अनित्यता के गीत गाकर भीख मागते थे ।
प्रथम अङ्क । ३७
प्रथम अङ्क । ३७
शिष्य ।—मूर्ख ! इस को जानने से गुरु को क्या काम ?
दूत ।—यही तो कहता हूं कि यह तेरा गुरु ही समझेगा कि इसके जानने से क्या होता है ? तू तो सीधा मनुष्य है तू केवल इतना ही जानता है कि कमल को चन्द्र प्यारा नहीं है । देख—
जदपि होत सुन्दर कमल, उलटो तदपि सुभाव ।
जो नित पूरन चन्द सों, करत बिरोध बनाव ॥
चाणक्य ।—( सुन कर आपही आप ) अहा ! “मै चन्द्रगुप्त के बैरियों को जानता हूं ” यह कोई गूढ वचन से कहता है ।
शिष्य ।—चल मूर्ख ! क्या बेठिकाने की बकवाद कर रहा है ।
दूत ।—अरे ब्राह्मण ! यह सब ठिकाने की बाते होंगी ।
शिष्य ।—कैसे होंगी ?
दूत ।—जो कोई सुननेवाला और समझनेवाला होय ।
चाणक्य ।—रावल जी ! बेखटके चले आइये, यहां आपको सुनने और समझनेवाले मिलेंगे ।
दूत ।—आया ( आगे बढ़ कर ) जय हो महाराज की ।
चाणक्य ।— ( देख कर आप ही आप ) कामों की भीड़ से यह नहीं निश्चय होता कि निपुणक को किस बात के जानने के लिये भेजा था । अरे जाना, इसे लोगों के जी का भेद लेने को भेजा था ( प्रकाश ) आओ, आओ, कहो, अच्छे हो ? बैठो ।
दूत ।—जो आज्ञा ( भूमि मे बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहो, जिस काम को गए थे उसका क्या किया ? चन्द्रगुप्त को लोग चाहते हैं कि नही ?
दूत ।—महाराज ! आप ने पहिले ही से ऐसा प्रबन्ध किया है कि कोई चन्द्रगुप्त से बिराग न करै, इस हेतु सारी प्रजा महाराज चन्द्रगुप्त मे अनुरक्त है, पर राक्षस मन्त्री के दृढ़ मित्र तीन ऐसे है जो चन्द्रगुप्त की वृद्धि नही सह सकते ।
३८ मुद्राराक्षस—
चाणक्य ।—( क्रोध से ) अरे ! कह, कौन अपना जीवन नही सह सकते, उन के नाम तू जानता है ?
दूत ।—जो नाम न जानता तो आप के सामने क्योंकर निवेदन करता ?
चाणक्य । - मै सुना चाहता हूं कि उन के क्या नाम है ?
दूत ।—महाराज सुनिये । पहिले तो शत्रु का पक्षपात करने वाला क्षपणक है ।
चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) हमारे शत्रुओं का पक्ष पाती क्षपणक है ? ( प्रकाश ) उस का नाम क्या है ?
दूत ।—जीवसिद्धि नाम है ।
चाणक्य ।—तू ने कैसे जाना कि क्षपणक मेरे शत्रुओं का पक्ष पाती है ?
दूत ।—क्योंकि उस ने राक्षस मन्त्री के कहने से देव पर्वतेश्वर पर विषकन्या का प्रयोग किया ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) जीवसिद्धि तो हमारा गुप्त दू है ( प्रकाश ) हा, और कौन है ।
दूत ।—महाराज ! दूसरा राक्षस मन्त्री का प्यारा सखा शकट दास कायथ है ।
चाणक्य ।—( हँस कर आप ही आप ) कायथ कोई बडी बात नहीं है तो भी क्षुद्र शत्रु का भी उपेक्षा नही करनी चाहिए, इसी हेतु तो मैने सिद्धार्थक को उस का मित्र बना कर उस के पास रक्खा है, ( प्रकाश ) हा, तीसरा कौन है ?
दूत ।—( हँस कर ) तीसरा तो राक्षस मन्त्री का मानो हृदय ही पुष्पपुरवासी चन्दनदास नामक वह बड़ा जोहरी है जिस के घर मे मन्त्री राक्षस अपना कुटुम्ब छोड़ गया है ।
चाणक्य ।—(आप ही आप) अरे ! यह उस का बड़ा अन्तरग मित्र होगा, क्योंकि पूरे विश्वास बिना राक्षस अपना
प्रथम अङ्क। ३६
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कुटुम्ब यों न छोड़ जाता (प्रकाश) भला, तूने यह कैसे
जाना कि राक्षस मन्त्री वहां अपना कुटुम्ब छोड़ गया ?
दूत।—महाराज ! इस “मोहर” की अंगूठी से आप को
विश्वास होगा (अंगूठी देता है)।
चाणक्य।—(अंगूठी लेकर और उस में राक्षस का नाम बांच ५
कर प्रसन्न हो कर आप ही आप) अहा ! मै समझता हूं
कि राक्षस ही मेरे हाथ लगा (प्रकाश) भला, तुम ने
यह अंगूठी कैसे पाई ? मुझ से सब वृत्तान्त तो कहो।
दूत:—सुनिये, जब मुझे आप ने नगर के लोगों का भेद लेने
भेजा तब मै ने यह सोचा कि बिना भेस बदले मै दूसरे के १०
घर मे न घुसने पाऊंगा इससे मै जोगी का भेस कर
के जमराज का चित्र हाथ मे लिये फिरता फिरता चन्दन-
दास जौहरी के घर मे चला गया और वहा चित्र फेला
कर गीत गाने लगा।
चाणक्य। हां तब ? १५
दूत।—तब महाराज ! कौतुक देखने को एक पांच बरस
का बड़ा सुन्दर बालक एक परदे के आड से बाहर
निकला, उस समय परदे के भीतर स्त्रियों में बड़ा
कलकल हुआ कि “लड़का कहा गया”। इतने मे एक स्त्री
ने द्वार के बाहर मुख निकाल कर देखा और लड़के को २०
झट पकड़ ले गई, पर पुरुष की उंगली से स्त्री की उंगली
पतली होती है, उस से द्वार ही पर यह अंगूठी गिर पड़ी,
और मै उस पर राक्षस मन्त्री का नाम देख कर आप के
पास उठा लाया।
चाणक्य।—वाह वाह ! क्यो न हो, अच्छा जाओ, मैं ने २५
सब सुन लिया ! तुम्हे इस का फल शीघ्र ही मिलेगा।
दूत।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य।—शारङ्गरव ! शारङ्गरव ! !
४० मुद्राराक्षस !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा, गुरुजी ?
चाणक्य ।- बेटा ! कलम, दावात, कागज तो लाओ ।
शिष्य ।—जो आज्ञा, ( बाहर जाकर ले आता है ) गुरुजी !
ले आया ।
५ चाणक्य ।—(लेकर आप ही आप ) क्या लिखू ? इसी पत्र से
राक्षस को जीतना है।
( प्रतिहारी आता है )
प्रतिहारी ।—जय हो महाराज की, जय हो !
चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) वाह वाह ! कैसा सगुन
१० हुआ कि कार्यारम्भ ही में जय शब्द सुनाई पडा ।
( प्रकाश ) कहो, शोणोत्तरा, क्यों आयी हो ?
प्र० ।—महाराज ! राजा चन्द्रगुप्त ने प्रणाम कहा है और पूछा
है कि मै पर्व्वतेश्वर की क्रिया किया चाहता हूं इस से
आप की आज्ञा हो तो उन के पहिरे आभरणों को
१५ पण्डित ब्राह्मणों को दूं ।
चाणक्य ।—( हर्ष से आप ही आप ) वाह चन्द्रगुप्त वाह,
क्यों न हो, मेरे जी की बात सोच कर संदेशा कहला भेजा
है ( प्रकाश ) शोणोत्तरा ! चन्द्रगुप्त से कहो कि “वाह !
बेटा वाह ! क्यों न हो, बहुत अच्छा विचार किया ! तुम
२० व्यवहार में बड़े ही चतुर हो, इस से जो सोचा है सो
करो पर पर्व्वतेश्वर के पहिरे हुए आभरण गुणवान्
ब्राह्मणों को देने चाहिए, इस से ब्राह्मण मै चुन के
भेजूंगा ।”
प्र० ।-- जो आज्ञा महाराज ! ( जाता है ) ।
२५ चाणक्य ।—शार्ङ्गरव ! विश्वावसु आदि तीनों भाइयों से
कहो कि जाकर चन्द्रगुप्त से आभरण ले कर मुझ से
मिलें ।