मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
Registered under Act X X of 1847
मुद्राराक्षस
राजनीति विषयक अपूर्व नाटक
विशाखदत्त के संस्कृत ग्रन्थ का भाषानुवाद,
भारतभूषण भारतेन्दु श्रीहरिश्चन्द्र रचित
त्रियपत्रिका सम्पादक ˘ म०कु० बाबू रामदीन सिंह संकलित
राय रामरणविजय सिंह बहादुर द्वारा प्रकाशित.
ह० स० ४१—१६२५
बाकीपुर—खड्गविलास प्रेस में रामप्रसाद सिंह द्वारा मुद्रित ।
आठवी बार
परमश्रद्धास्पद
श्रीयुक्त राजा शिवप्रसाद बहादुर सी० एस० आइ०
के
चरण कमलों में
केवल उन्ही के उत्साहदान से
उन के
वात्सल्यभाजन छात्र द्वारा बना हुआ
यह ग्रन्थ
सादर समर्पित हुआ।
नाटक के पात्र ।
चन्द्रगुप्त—पटने का राजा ( नाटक का नायक )
राक्षस—नन्द का मन्त्री— ( नाटक का मुख्य पात्र )
चाणक्य—चन्द्रगुप्त का मन्त्री ( तथा )
मलयकेतु—पर्वतेश्वर राजा का पुत्र (नाटक का प्रतिनायक)
सिद्धार्थक—चाणक्य का भेदिया ।
चन्दनदास—पटने का जौहरी महाजन, राक्षस का मित्र ।
शकटदास—राक्षस का मित्र ।
विराधगुप्त—सपेरा बना हुआ राक्षस का भेदिया ।
प्रियम्बदक—राक्षस का सेवक ।
भागुरायण—चाणक्य का भेदिया ( प्रकट में मलयकेतु का मित्र ) ।
करभक—राक्षस का भेदिया ।
क्षपणक—जैनी फकीर बना हुआ चाणक्य का भेदिया ।
भासुरक—भागुरायण का सेवक ।
समिद्धार्थक—सिद्धार्थक का मित्र ।
और भी—सूत्रधार, नटी, द्वारपाल, द्वारपालिका, प्रतिहारी शिष्य, कंचुकी, चन्दनदास की स्त्री, चन्दनदास का पुत्र, पुरुष, चाण्डाल, बन्दीजन और सेवक ।
पूर्व्वकथा
पूर्व्व काल में भारतवर्ष मे मगधराज्य एक बड़ा भारी जनस्थान था। जरासन्ध आदि अनेक प्रसिद्ध पुरुवंशी राजा यहा बड़े प्रसिद्ध हुए हैं। इस देश की राजधानी पाटलिपुत्र अथवा पुष्पपुर थी। इन लोगों ने अपना प्रताप और शौर्य्य इतना बढ़ाया था कि आज तक इनका नाम भूमण्डल पर प्रसिद्ध है। किन्तु कालचक्र बड़ा प्रबल है कि किसी को भी एक अवस्था मे रहने नही देता। अन्त में नन्दवंश * ने पौरवों को निकाल कर वहा अपनी जयपताका उड़ाई। वरच सारे भारतवर्ष मे अपना प्रबल प्रताप विस्तारित कर दिया।
इतिहासग्रन्थों मे लिखित है कि एक सौ अड़तीस बरस नन्दवंश ने मगध देश का राज्य किया। इसी वंश में महानन्द का जन्म हुआ। यह बड़ा प्रसिद्ध और अत्यन्त प्रतापशाली राजा हुआ। जब जगद्विजयी सिकन्दर (अलक्षेन्द्र) ने भारतवर्ष पर चढ़ाई किया था तब असंख्य हाथी, बीस हजार सवार और दो लाख पैदल लेकर महानन्द ने उस के विरुद्ध प्रयाण किया था ×। सिद्धान्त यह कि भारतवर्ष में उस समय महानन्द सा प्रतापी और कोई राजा न था।
महानन्द के दो मन्त्री थे। मुख्य का नाम शकटार और दूसरे
* यह वंश सम्मिलित क्षत्रियों का वंश था। ये लोग शुद्ध क्षत्री नहीं थे।
× सिकन्दर के कान्यकुब्ज से आगे न बढने से महानन्द से उस से मुक़ाबिल नहीं हुआ।
| १० | मुद्राराक्षस। |
|---|
का राक्षस था। शकटार शूद्र और राक्षस * ब्राह्मण था। ये दोनों अत्यन्त बुद्धिमान् और महाप्रतिभासम्पन्न थे। केवल भेद इतना था कि राक्षस धीर और गम्भीर था, उस के विरुद्ध शकटार अत्यन्त उद्धतस्वभाव था। यहां तक कि अपने प्राचीनपने के अभिमान से कभी कभी यह राजा पर भी अपना प्रभुत्व जमाना चाहता। महानन्द भी अत्यन्त उग्रस्वभाव, असहनशील और क्रोधी था, जिस का परिणाम यह हुआ कि महानन्द ने अन्त को शकटार को क्रोधान्ध हो कर बड़े निबिड़ बन्दीखाने में कैद किया और सपरिवार उस के भोजन का केवल दो सेर सत्तू देता था + ।
* बृहत्कथा में राक्षस मन्त्री का नाम कहीं नहीं है, केवल वररुचि से एक मन्त्री राक्षस से मैत्री की कथा यों लिखी है—एक बड़े प्रचण्ड राक्षस पाटलिपुत्र में फिरा करता था। वह एक रात्रि वररुचि से मिला और पूछा कि "इस नगर में कौन स्त्री सुन्दर है ? वररुचि ने उत्तर दिया— जो जिस को रुचे वही सुन्दर है। इस पर प्रसन्न हो कर राक्षस मन्त्री से मित्रता की और कहा कि हम सब बात में तुम्हारी सहायता करेंगे और फिर सदा राजकाज में ध्यान में प्रत्यक्ष होकर राक्षस वररुचि की सहायता करता।
+ बृहत्कथा में यह कहानी और ही चाल पर लिखी है। वररुचि व्याडि और इन्द्रदत्त तीनों को गुरुदक्षिणा देने के हेतु करोड़ों रुपये के सोने की आवश्यकता हुई। तब इन लोगों ने सलाह किया कि नन्द (सत्यनन्द) राजा के पास चल कर उस से माँगना ले। उन दिनों राजा का डेरा अयोध्या में था ये तीनों ब्राह्मण वहां गये, किन्तु दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों राजा मर गया। तब आपस में सलाह करके इन्द्रदत्त योगबल से अपना शरीर छोड़ कर राजा के शरीर में चला गया, जिस से राजा फिर जी उठा। तभी से उसका नाम योगानन्द हुआ। योगानन्द ने वररुचि को करोड़ रुपये देने की आज्ञा किया। शकटार बड़ा बुद्धिमान था उस ने सोचा कि राजा का मरकर जीना और यकबारगी एक अपरिचित को करोड़ रुपया देना इस में हो न हो कोई भेद है। ऐसा न हो कि अपना काम कर के फिर राजा का शरीर छोड़ कर यह चला जाय, यह सोच कर शकटार ने राज्य भर में जितने मुरदे मिले उन को जलवा दिया, उसी में इन्द्रदत्त का भी शरीर जल गया। तब व्याडि ने यह वृत्तान्त योगानन्द से कहा कि
पूर्व्वकथा । ११
शकटार ने बहुत दिन तक महा-मात्य का अधिकार भोगा
था, इस से यह अनादर उस के पक्ष मे अत्यन्त दुखदाई हुआ।
नित्य सत्तू का बरतन हाथ मे लेकर अपने परिवार से कहता
कि जो एक भी नन्दवंश के जड़ से नाश करने मे समर्थ हो वह
यह सत्तू खाय । मन्त्री के इस वाक्य से दुःखित हो कर उस के ५
परिवार का कोई भी सत्तू न खाया । अन्त मे कारागार की
पीड़ा से एक एक कर के उस के परिवार के सब लोग
मर गए ।
एक तो अपमान का दुख, दूसरे कुटुम्ब का नाश, इन दोनो
कारणो से शकटार अत्यन्त तनछीन मनमलीन दीन हीन हो १०
गया। किन्तु अपने मनसूबे का ऐसा पक्का था कि शत्रु से
बदला लेने की इच्छा से अपने प्राण नही त्याग किए और थोड़े
बहुत भोजन इत्यादि से शरीर को जीवित रक्खा । रात दिन
इसी सोच मे रहता कि किस उपाय से वह अपना बदला ले
सकेगा। १५
कहते है कि राजा महानन्द एक दिन हाथ मुह धोकर
हंसते हसते जनाने मे आ रहे थे। विचक्षणा नाम की एक
दासी जो राजा के मुह लगने के कारण कुछ धृष्ट हो गई थी,
राजा को हसता देख कर हस पड़ी । राजा उस की ढिठाई से
बहुत चिढ़ा और उस से पूछा—तू क्यों हसी ? उस ने उत्तर २०
दिया—"जिस बात पर महाराज हँसे उसी पर मै भी हसी"।
महानन्द इस बात पर और भी चिढ़ा। और कहा कि अभी
बतला मैं क्यों हंसा, नही तो तुझ को प्राणदण्ड होगा । दासी
से और कुछ उपाय न बन पड़ा और उसने घबड़ा कर इस के
यह सुन कर पहिले तो दुःखी हुआ फिर वररुचि को अपना मत्री बनाया। परन्तु
अन्त में शकटार की उग्रता से सन्तप्त हो कर उस को अन्धे कुए में कैद किया । बृह-
कथा में शकटार के स्थान पर शकटाल नाम लिखा है।
१२ मुद्राराक्षस ।
उत्तर देने को एक महीने की मुहलत चाही। राजा ने कहा—
आज से ठीक एक महीने के भीतर जो उत्तर न देगी तो कभी
तेरे प्राण न बचेंगे।
विचक्षणा के प्राण उस समय तो बचगए, परन्तु महीने के
५ जितने दिन बीतते थे, मारे चिन्ता के वह मरी जाती थी।
कुछ सोच विचार कर वह एक दिन कुछ खाने पीने की
सामग्री लेकर शकटार के पास गई और रो रो कर अपनी
सब विपत्ति कहने लगी। मत्री ने कुछ देर तक सोच कर
उस अवसर की सब घटना पूछी और हस कर कहा— 'मै
१० जान गया राजा क्यों हसे थे। कुल्ला करने के समय पानी
के छोटे छीटों पर राजा को वटबीज की याद आई, और
यह भी ध्यान हुआ कि ऐसे बड़े बड़ के वृक्ष इन्ही छोटे
बीजों के अन्तर्गत है। किन्तु भूमि पर पडते ही वह जल
के छींटे नाश हो गए। राजा अपनी इसी भावना को याद कर
१५ के हसते थे।' विचक्षणा ने हाथ जोड कर कहा— "यदि
आप के अनुमान से मेरे प्राण की रक्षा होगी तो मै जिस
तरह से होगा, आप को कैदखाने से छुड़ाऊगी और जन्म
भर आप की दासी हो कर रहूंगी।"
राजा ने विचक्षणा से एक दिन फिर हसने का कारण
२० पूछा, तो विचक्षणा ने शकटार से जैसा सुना था कह
सुनाया। राजा ने चमत्कृत हो कर पूछा— "सच बता,
तुझ से यह भेद किस ने कहा?" दासी ने शकटार का
सब वृत्त कहा और राजा को शकटार की बुद्धि की प्रशंसा
करते देख अवसर पाकर उस के मुक्त होने की प्रार्थना भी
२५ की। राजा ने शकटार को बन्दी से छुडा कर राक्षस के नीचे
मन्त्री बना कर रक्खा।
ऐसे अवसर पर राजा लोग बहुत चूक जाते हैं।
पूर्व्वकथा । १३
पहिले तो किसी की अत्यन्त प्रतिष्ठा बढ़ानी ही नीतिविरुद्ध
है। यदि संयोग से बढ़ जाय तो उस की बहुत सी बातों
को तरह देकर टालना चाहिए, और जो कदाचित् बड़े प्रतिष्ठित
मनुष्य का राजा अनादर करै तो उस की जड़ काट कर
छोड़ै, फिर उस का कभी विश्वाश न करै । ५
प्राय अमीर लोग पहले तो मुसाहिब या कारिन्दों को
बेतरह सिर चढ़ाते हैं, और फिर छोटी छोटी बातो पर उन की
प्रतिष्ठा हीन कर देते हैं। इसी से ऐसे लोग राजाओं के प्राण के
गाहक हो जाते हैं और अन्त मे नन्द की भांति उन का सर्वनाश
होता है। १०
शकटार यद्यपि बन्दीखाने से छूटा और छोटा मन्त्री भी
हुआ, किन्तु अपनी अप्रतिष्ठा और परिवार के नाश का शोक उस
के चित्त मे सदा पहिले ही सा जागता रहा। रात दिन
वह यही सोचता कि किस उपाय से ऐसे अव्यवस्थित-चित्त
उद्धत राजा का नाश करके अपना बदला लें। एक दिन घोड़े १५
पर वह हवा खाने जाता था। नगर के बाहर एक स्थान पर
देखता है कि एक काला सा ब्राह्मण अपनी कुटी के सामने मार्ग
की कुशा उखाड़ उखाड़कर उस की जड़ मे मठा डालता
जाता है। पसीने से लथपथ है, परन्तु कुछ भी शरीर की ओर
ध्यान नहीं देता। चारो ओर कुशा के बड़े २ ढेर लगे हुए हैं। २०
शकटार ने आश्चर्य्य से ब्राह्मण से इस श्रम का कारण पूछा।
उसने कहा—"मेरा नाम विष्णुगुप्त चाणक्य है। मैं ब्रह्मचर्य्य
मे नीति, वैद्यक, ज्योतिष, रसायन आदि संसार की उपयोगी
सब विद्या पढ कर विवाह की इच्छा से नगर की ओर आया
था, किन्तु कुश गड़ जाने से मेरे मनोरथ मे विघ्न हुआ, इस २५
से जब तक इन बाधक कुशाओं का सर्वनाश न कर लूंगा
और काम न करूंगा। मठा इस वास्ते इन की जड़ मे देता
हूं जिस से पृथ्वी के भीतर इन का मूल भी भस्म हो जाय।"
१८ मुद्राराक्षस ।
शकटार के जी में यह ध्यान आया कि ऐसा पक्का ब्राह्मण जो किसी प्रकार राजा से क्रुद्ध हो जाय तो उस का जड़ से नाश कर के छोड़े । यह सोच कर उस ने चाणक्य से कहा कि जो आप नगर में चल कर पाठशाला स्थापित करें तो ५ अपने को मैं बड़ा अनुगृहीत समझूं । मैं इस के बदले बेलदार लगा कर यहां की सब कुशाओं को खुदवा डालूंगा । चाणक्य इस पर सम्मत हुआ और नगर में आकर एक पाठशाला स्थापित की । बहुत से विद्यार्थी लोग पढ़ने आने लगे और पाठशाला बड़े धूमधाम से चल निकली ।
१० अब शकटार इस सोच में हुआ कि चाणक्य से राजा में किस चाल से बिगाड़ हो । एक दिन राजा के घर में श्राद्ध था उस अवसर को शकटार ने अपने मनोरथ सिद्ध होने का अच्छा समय सोच कर चाणक्य को श्राद्ध का न्यौता दे कर अपने साथ ले आया और श्राद्ध के आसन पर बिठला कर १५ चला गया । क्योंकि वह जानता था कि चाणक्य का रंग काला, आंखें लाल और दांत काले होने के कारण नन्द उस को आसन पर से उठा देगा, जिस से चाणक्य अत्यन्त क्रुद्ध हो कर उस का सर्वनाश करेगा ।
और ठीक ऐसा ही हुआ—जब राक्षस के साथ नन्द २० श्राद्धशाला में आया और एक अनिमन्त्रित ब्राह्मण को आसन पर बैठा हुआ और श्राद्ध के अयोग्य देखा तो चिढ़ कर आज्ञा दिया कि इस के बाल पकड़ कर यहां से निकाल दो । इस अपमान से ठोकर खाए हुए सर्प की भांति अत्यन्त क्रोधित हो कर शिखा खोल कर चाणक्य ने सब के सामने प्रतिज्ञा २५ की कि जब तक इस दुष्ट राजा का सत्यानाश न कर लूंगा तब तक शिखा न बांधूंगा । यह प्रतिज्ञा कर के बड़े क्रोध से राज-भवन से चला गया ।
पूर्व्वकथा । १५
शकटार अवसर पाकर चाणक्य को मार्ग में से अपने घर ले आया और राजा की अनेक निन्दा कर के उस का क्रोध और भी बढ़ाया और अपनी सब दुर्दशा कह कर नन्द के नाश में सहायता करने की प्रतिज्ञा किया। चाणक्य ने कहा कि जब तक हम राजा के घर का भीतरी हाल न जानें कोई उपाय नहीं सोच सकते। शकटार ने इस विषय में विचक्षणा की सहायता देने का वृत्तान्त कहा और रात को एकान्त में बुला कर चाणक्य के सामने उस से सब बात का करार ले लिया।
महानन्द के नौ पुत्र थे। आठ विवाहिता रानी से और एक चन्द्रगुप्त मुरा नाम की नाइन स्त्री से। इसी से चन्द्रगुप्त को मौर्य और वृषल भी कहते हैं। चन्द्रगुप्त बड़ा बुद्धिमान् था इसी से और आठो भाई इस से भीतरी द्वेष रखते थे। चन्द्रगुप्त की बुद्धिमानी की बहुत सी कहानियां हैं। कहते हैं कि, एक बेर रूम के बादशाह ने महानन्द के पास एक कृत्रिम सिंह लोहे की जाली के पिजड़े में बन्द करके भेजा और कहला दिया कि पिजड़ा टूटने न पावे और सिंह इस में से निकल जाय। महानन्द और उस के आठ औरस पुत्रों ने इस को बहुत कुछ सोचा, परन्तु बुद्धि ने कुछ काम न किया। चन्द्रगुप्त ने विचारा कि यह सिंह अवश्य किसी ऐसे पदार्थ का बना होगा जो या तो पानी से या आग से गल जाय यह सोच कर पहले उसने उस पिजड़े को पानी के कुण्ड में रक्खा और जब वह पानी से न गला तो उस पिजड़े के चारो तरफ आग बलवाई, जिस की गर्मी से वह सिंह, जो लाह और राल का बना था, गल गया। एक बेर ऐसे ही किसी बादशाह ने एक अगीठी में दहकती हुई आग * एक बोरा सरसों और
* दहकती आग की कथा—"रासन्धमहाकाव्य" में लिखा है कि जरासन्ध ने उग्रसेन के पास अगीठी भेजी थी, शायद उसी से यह कथा निकाली गई हो।
१६ मुद्राराक्षस ।
एक मीठा फल महानन्द के पास अपने दूत के द्वारा भेज दिया। राजा की सभा का कोई भी मनुष्य इस का आशय न समझ सका, किन्तु चन्द्रगुप्त ने सोच कर कहा कि अंगीठी यह दिखलाने को भेजी है कि मेरा क्रोध अग्नि है और सर सों यह सूचन कराती है कि मेरी सेना असंख्य है और फल भेजने का आशय यह है कि मेरी मित्रता का फल मधुर है। इन के उत्तर मे चन्द्रगुप्त ने एक घड़ा जल और एक पिजडे मे थोडे से तीतर और एक अमूल्य रत्न भेजा, जिस का आशय यह था कि तुम्हारी सेना कितनी भी असंख्य क्यो न हो हमारे
१० वीर उस को भक्षण करने मे समर्थ है और तुम्हारा क्रोध हमारी नीति से सहज ही बुझाया जा सकता है और हमारी
सवैया —रूप की रूपनिधान अनूप अगौठी नई गढि मोल मगाई।
ता मवि पावकपुंज धरयो गिरिधारन जामें प्रभा अधिकाई॥
तेज सो ताके ललाई भई रज मै मिली यासु सबै रजताई।
मानो प्रवाल की थाल बनाय क लाल की रास बिसाल लगाई॥ १॥
ताकि कै पावक दूत के हाथ दै बात कही इहि भाति बुझाय कै।
भोज भुआल सभा मह स मुख राखि कै यो कहियो सिर नाय कै॥
याहि पठायो जरासुत नै अवलोकहु नीके अधीरज लाय कै।
पुत्र खपाय कै नातिन पाय कै जी हौ नै पाय कै कौन उपाय कै॥ २॥
दोहा—सुनत चार तिहि हाथ लै, गयो भैम दरबार।
वासब ऐसे कैक सब, जहां बैठे सरदार॥ ३॥
अडिल्ल —जाय जरासुतदूत भैमपतिपइपरयौ। खिन्नराऊ जगहियेसभ्रमभरयौ।
जगतजरावनद्रव्यपातआगेधर्यो। सोचनराहनै अभय हाल बरननकर यो॥४॥
सुनिनिहसैजदुवीरजीतकीचायसों। ह सि बोले गोवि द कहहु यह रायसो।
उचितससुरपन कीन अवकुन यायसो। चही दमाद सहाय सुताकां हानमो॥५
सोरठा—इमि कहि दूत गहि चाय, आप आप सिखि मे दिया।
तुरतहि गयो बुझाय, ज्ञान पाय मन भ्रान्ति॥ ६॥
विदा किये नृप दूत, उर मै सर का य क करि।
निरखि बृहद्रथ पूत, भवन सहित कोप्यो अतिहि॥ ७॥
पूर्व्वकथा । १७
मित्रता सदा अमूल्य और एक रस है। ऐसे ही तीन पुतली-
वाली कहानी भी इसी के साथ प्रसिद्ध है। इसी बुद्धिमानी
के कारण चन्द्रगुप्त से उस के भाई लोग बुरा मानते थे; और
महानन्द भी अपने औरस पुत्रों का पक्ष कर के इस से कुढ़ता ५
था। यह यद्यपि शूद्रा के गर्भ से था, परन्तु ज्येष्ठ होने के
कारण अपने को राज का भागी समझता था, और इसी से
इस का राजपरिवार से पूर्ण वैमनस्य था। चाणक्य और
शकटार ने इसीसे निश्चय किया कि हम लोग चन्द्रगुप्त को
राज का लोभ देकर अपनी ओर मिला लें और नन्दों का
नाश कर के इसी को राजा बनावें। १०
यह सब सलाह पक्की हो जाने के पीछे चाणक्य तो
अपनी पुरानी कुटी में चला गया और शकटार ने चन्द्रगुप्त
और विचक्षणा को तब तक सिखा पढ़ा कर पका कर के
अपनी ओर फोड़ लिया। चाणक्य ने कुटी में जाकर
हलाहल विष मिले हुए कुछ ऐसे पकवान तैयार किये जो १५
परीक्षा करने में न पकड़े जाय, किन्तु खाते ही प्राण नाश
होजाय। विचक्षणा ने किसी प्रकार से महानन्द को पुत्रों समेत
यह पकवान खिला दिया, जिस से बेचारे सब के सब एक
साथ परमधाम को सिधारे ⁕ ।
⁕ भारतवर्ष की कथाओ में लिखा है कि चाणक्य ने अभिचार से मारण का प्रयोग कर के इन सबों को मार डाला। विचक्षणा ने उस अभिचार का निर्माल्य किसी प्रकार इन लोगो के अंग में छुवा दिया था। किन्तु वर्तमान काल के विद्वान् लोग सोचते हैं कि उस निर्माल्य में मन्त्र का बल नहीं था, चाणक्य ने कुछ औषधि ऐसे विषमिश्रित बनाये थे कि जिन के भोजन वा स्पर्श से मनुष्य का सद्य नाश हो जाय। भट्ट सोमदेव के कथा सरित्सागर के पीठलम्ब के चौथे तरंग मे लिखा है—योगानन्द को ऊंची अवस्था में नये प्रकार की कामवासना उत्पन्न हुई।
१८ मुद्राराक्षस ।
चन्द्रगुप्त इस समय चाणक्य के साथ था । शकटार अपने दुख और पापों से सन्तप्त हो कर निविड़ बन मे चला गया और अनसन कर के प्राण त्याग किये । कोई कोई इतिहासलेखक कहते हैं कि चाणक्य ने अपने हाथ से शस्त्रद्वारा नन्द का वध किया और फिर क्रम से उसके पुत्रों को भी मारा, किन्तु इस
वररुचि ने यह सोच कर कि राजा को तो भोगाविलास से छुट्टी ही नहीं है, इस से राजकाज का काम शकटार निकाला जाय तो अच्छी तरह से चले । यह विचार कर और राजा से पूछ कर शकटार को अन्धे कूप से निकाल कर वररुचि ने मन्त्रीपद पर नियत किया । एकदिन शिकार खेलने में गङ्गा में राजा ने अपनी पांचो उंगली की परछाईं वररुचि को दिखलाना । वररुचि ने अपनी दो उंगलियो की परछाई ऊपर से दिखाई, जिस से राजा के हाथ की परछाईं छिप गई । राजा ने इन संज्ञाओ का कारण पूछा । वर रुचि ने कहा —आप का यह आशय था कि पांच मनुष्य मिल कर सब काय्य साध सकते हैं । मै ने यह कहा कि जो दो चित्त एक हो जाय तो पांच का बल व्यर्थ है । इस बात पर राजा ने वररुचि की बड़ी स्तुति किया । एक दिन राजा ने अपनी रानी को एक ब्राह्मण से खिड़की में से बात करते देख कर उस ब्राह्मण को मारने की आज्ञा किया, किन्तु अनेक कारण से वह बच गया । । वररुचि ने कहा कि आप के जन-महल की यही दशा है और अनेक स्त्रीवेषधारी पुरुष महल में रहते हैं और उन सबों को पकड़ कर दिखला दिया और इसी से उस ब्राह्मण के प्राण बचे । एक दिन योगानन्द की रानी के एक चित्र मे जो महल मे लगा हुआ था, वररुचि ने जांघ में तिल बना दिया । योगानन्द को गुप्त स्थान में वररुचि के तिल बनाने से उस पर भी सन्देह हुआ और शकटार को आज्ञा दिया कि तुम वररुचि को आज ही रात को मार डालो । शकटार ने उस को अपने घर में छिपा रक्खा और किसी और को उस के बदले मार कर उसका मारना प्रकट किया । एक बेर राजा का पुत्र हिरण्यगुप्त जंगल मे शिकार खेलने गया था, वहां रात को सिंह के भय से एक पेड़ पर चढ़ गया । उस वृक्ष पर एक भालू था, किन्तु इस ने उस को अभय दिया । इन दोनों में यह बात ठहरी कि आधी रात तक कुंवर सोये आधी पहरा
पूर्ववकथा । १६
विषय का कोई दृढ़ प्रमाण नहीं है। चाहे जिस प्रकार से हो चाणक्य ने नन्दों का नाश किया, किन्तु केवल पुत्र सहित राजा के मारने ही से वह चन्द्रगुप्त को राजसिंहासन पर न बैठा सका, इस से अपने अन्तरङ्ग मित्र जीवसिद्धि को क्षपणक के वेष में राक्षस के पास छोड़कर आप राजा लोगों से सहायता लेने की इच्छा से विदेश निकला। अन्त में अफगानिस्तान वा उस के उत्तर ओर के निवासी पर्वतक नामक लोभपरतन्त्र एक राजा से मिलकर और उस को जीतने के पीछे मगध राज्य का आधा भाग देने के नियम पर उस को पटने पर चढ़ा लाया। पर्वतक के भाई का नाम वैरोधक * और पुत्र का
-, फिर भालू सोवै कुंवर पहरा दे । भालू ने अपना मित्रधर्म्म निबाहा और सिंह के बहकाने पर भी कुंवर की रक्षा किय। किन्तु अपनी बारी में कुंवर ने सिंह के बहकाने से भालू को ढकलना चाहा, जिस पर उस ने जाग कर मित्रता के कारण कुंवर को मारा तो नहीं किन्तु कान में मूत दिया, जिस से कुंवर गूंगा और बहिर हो गया। राजा को बेटे की इस दुर्दशा पर बड़ा सोच हुआ और कहा कि वररुचि जीता होता तो इस समय उपाय सोचता। शकटार ने यह अवसर समझ कर राजा से कहा कि वररुचि जीता है और लाकर राजा के सामने खड़ा कर दिया। वररुचि ने कहा—कुंवर ने मित्रद्रोह किया है उस का फल है। यह वृत्त कह कर उस को उपाय से अच्छा किया। राजा ने पूछा—तुम ने यह सब वृत्तान्त किस तरह जाना? वररुचि ने कहा-योगबल से, जैसे रानी का तिल। (ठीक यही कहानी राजा भोज, उस की रानी भानुमती और उस के पुत्र और कालिदास की भी प्रसिद्ध है) यह सब कह कर और उदास हो कर वररुचि जंगल में चला गया। वररुचि से शकटार ने राजा को मारने को कहा था, किन्तु वह धर्मिष्ठ था इस से सम्मत न हुआ। वररुचि के चले जाने पर शकटार ने अवसर पा कर चाणक्य द्वारा कृत्या से नन्द को मारा।
* लिखी पुस्तकों में यह नाम विरोधक, वैरोधक, वैरोचक वैबोधक, विरोध, वैराध इत्यादि कई चाल से लिखा है।
२० मुद्राराक्षस ।
मलयकेतु था। और भी पांच म्लेच्छ राजाओ को पर्वतक
अपने सहायता को लाया था।
इधर राक्षस मन्त्री राजा के मरने से दुखी होकर
उस के भाई सर्वार्थसिद्धि को सिहासन पर बैठा कर राजकाज
५ चलाने लगा। चाणक्य ने पर्वतक की सैना लेकर
कुसुमपुर को चारों ओर से घेर लिया। पन्द्रह दिन तक घोरतर
युद्ध हुआ। राक्षस की सेना और नागरिक लोग लड़ते २
शिथिल हो गए, इसी समय मे गुप्त रीति से जीवसिद्धि
के बहकाने से राजा सर्वार्थसिद्धि बैरागी हो कर बन मे
१० चला गया, इस कुसमय मे राजा के चले जाने से राक्षस
और भी उदास हुआ। चन्दनदास नामक एक बड़े धनी
जौहरी के घर मे अपने कुटुम्ब को छोड़ कर और शकट
दास कायस्थ तथा अनेक राजनीति जाननेवाले विश्वास-
पात्र मित्रों को और कई आवश्यक काम सौंप कर
१५ राजा सर्वार्थसिद्धि के फेर लाने को आप तपोवन की
ओर गया।
चाणक्य ने जीवसिद्धिद्वारा यह सब सुन कर राक्षस
के पहुचने के पहले ही अपने मनुष्यों से राजा सर्वार्थसिद्धि
को मरवा डाला। राक्षस जब तपोवन मे पहुचा और
२० सर्वार्थसिद्धि को मरा देखा तो अत्यन्त उदास हो कर
वही रहने लगा। यद्यपि सर्वार्थसिद्धि के मार डालने
से चाणक्य की नन्दकुल के नाश की प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी
थी, किन्तु उस ने सोचा कि जब तक राक्षस चन्द्रगुप्त का
मन्त्री न होगा तब तक राज्य स्थिर न होगा। वरंच बड़े
२५ विनय से तपोवन मे राक्षस के पास मन्त्रित्व स्वीकार करने
का सन्देसा भेजा, परन्तु प्रभुभक्त राक्षस ने उस को
स्वीकार नही किया।
पूर्व्वकथा॥ २१
तपोवन में कई दिन रह कर राक्षस ने यह सोचा कि जब तक पर्वतक को हम न फोड़ेंगे काम न चलेगा। यह सोच कर वह पर्वतक के राज्य में गया और वहा उस के बूढ़े मन्त्री से कहा कि चाणक्य बड़ा दगाबाज है, वह आधा राज कभी न देगा। आप राजा को लिखिए, वह मुझ से मिले तो मै सब राज्य उन को दूं। मन्त्री ने पत्रद्वारा पर्वतक को यह सब वृत्त और राक्षस की नीतिकुशलता लिख भेजा और यह भी लिखा कि मै अत्यन्त वृद्ध हूं, आगे से मन्त्री का काम राक्षस को दीजिये। पाटलिपुत्र विजय होने पर भी चाणक्य आधा राज्य देने में विलम्ब करता है, यह देख कर सहज लोभी पर्वतक ने मन्त्री की बात मानली और पत्रद्वारा राक्षस को गुप्त रीति से अपना मुख्य अमात्य बना कर इधर ऊपर के चित्त से चाणक्य से मिला रहा।
जीवसिद्धि के द्वारा चाणक्य ने राक्षस का सब हाल जान कर अत्यन्त सावधानतापूर्वक चलना आरम्भ किया। अनेक भाषा जाननेवाले बहुत से धूर्त पुरुषों को वेष बदल बदल कर भेद लेने को चारो ओर नियुक्त किया। चन्द्रगुप्त को राक्षस का कोई गुप्तचर धोखे से किसी प्रकार की हानि न पहुचावे इस का भी पक्का प्रबन्ध किया और पर्वतक की विश्वासघातकता का बदला लेने का दृढ़ संकल्प से, परन्तु अत्यन्त गुप्त रूप से, उपाय सोचने लगा।
राक्षस ने केवल पर्वतक की सहायता से राज के मिलने की आशा छोड़ कर * कुलूत, मलय, काश्मीर, सिन्धु और पारस इन पांच देशों के राजा से सहायता ली। जब इन पांचों देश के
* कुलूत देश विलात वा कुल्लू देश।
२२ मुद्राराक्षस ।
राजाओं ने बड़े आदर से राक्षस को सहायता देना स्वीकार
किया तो वह तपोवन के निकट फिर से लौट आया और
वहा से चन्द्रगुप्त के मारने को एक विषकन्या+ भेजी और
अपना विश्वासपात्र समझ कर जीवसिद्धि को उस के साथ
५ कर दिया। चाणक्य ने जीवसिद्धि द्वारा यह सब बात जान
कर और पर्वतक की धूर्तता और विश्वासघातकता से कुढ़
कर प्रकट मे इस उपहार को बडी प्रसन्नता से ग्रहण किया
और लानेवाले को बहुत सा पुरस्कार देकर बिदा किया।
साझ होने के पीछे धूर्ताधिराज चाणक्य ने इस कन्या को
१० पर्वतक के पास भेज दिया और इन्द्रियलोलुप पर्वतक उसी
रात को उस कन्या के संग से मर गया। इधर चाणक्य ने
यह सोचा कि मलयकेतु यहा रहेगा तो उस को राज्य का
हिस्सा देना पड़ेगा, इस से किसी तरह इस को यहा से
भगावे तो काम चले। इस कार्य्य के हेतु भागुरायण नामक
१५ एक प्रतिष्ठित विश्वासपात्र पुरुष को मलयकेतु के पास सिखा
पढ़ा कर भेज दिया। उस ने पिछली रात को मलयकेतु
से जा कर उस का बड़ा हित बन कर उस से कहा कि आज
चाणक्य ने विश्वासघातकता कर के आप के पिता को
विषकन्या के प्रयोग से मार डाला और औसर पाकर आप
२० को भी मार डालेगा। मलयकेतु बेचारा इस बात के
सुनते ही सन्न हो गया और पिता के शयनागार मे
- विषकन्या शास्त्रो में दो प्रकार की लिखी है। एक तो थोडे से ऐसे बुरे योग
हैं कि उस लग्न में उस प्रकार के ग्रहो के समय जो कन्या उत्पन्न हो उस के साथ
जिस का विवाह हो वा जो उस का साथ करे वह साथ ही वा शीघ्र ही मर जाता है।
दूसरे प्रकार की विषकन्या वैद्यक रीति से बनाई जाती थी। छोटेपन से बरन गर्भ
से कन्या को दूध में वा भोजन में थोडा २ विष देते देते बडी होने पर उस का शरीर
ऐसा विषमय हो जाता था कि जो उस का अङ्ग संग करता वह मर जाता।
पूर्व्वकथा । २३
जाकर देखा तो पर्वतक को बिछौने पर मरा हुआ पाया । इस भयानक दृश्य के देखते ही मुग्ध मलयकेतु के प्राण सूख गये और भागुरायण का सलाह से उस रात को छिप कर वहा से भाग कर अपने राज्य की ओर चला गया । इधर चाणक्य के सिखाये भद्रभट इत्यादि चन्द्रगुप्त के कई बड़े २ अधिकारी प्रगट में राजद्रोही बन कर मलयकेतु और भागुरायण के साथ ही भाग गये । ५
राक्षस ने मलयकेतु से पर्वतक के मारे जाने का समाचार सुन कर अत्यन्त सोच किया और बड़े आग्रह और सावधानी से चन्द्रगुप्त और चाणक्य के अनिष्टसाधन मे प्रवृत्त हुआ । १०
चाणक्य ने कुसुमपुर मे दूसरे दिन यह प्रसिद्ध कर दिया कि पर्वतक और चन्द्रगुप्त दोनों समान बन्धु थे, इस से राक्षस ने विषकन्या भेज कर पर्वतक को मार डाला और नगर के लोगों के चित्त पर, जिन को कि यह सब गुप्त अनुसन्धि न मालूम थी, इस बात का निश्चय भी करा दिया । १५
इस के पीछे चाणक्य और राक्षस के परस्पर नीति की जो चोटें चली हैं, उसी का इस नाटक में वर्णन है ।
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महाकवि विशाखदत्त का बनाया
मुद्राराक्षस नाटक ।
स्थान रङ्गभूमि ।
रंगशाला में नान्दी मङ्गलपाठ करता है।
भरित नेह नव नीर नित, बरसन सुरस अथोर ।
जयति अपूरब घन कोऊ, लखि नाचत मन मोर ॥१॥
'कौन है सीस पै' 'चन्द्रकला' 'कहा याको है नाम यही त्रिपुरारी' ।
'हा यही नाम है भूल गई किमि जानत हू तुम प्रान पियारी' ॥
'नारिहि पूंछत चन्द्रहि नाहिं' 'कहै विजया यदि चन्द्र लबारी' । ५
यों गिरिजै छलि गंग छिपावत ईस हरौ सब पीर तुम्हारी ॥२॥
पाद प्रहार सों जाइ पताल न भूमि सबै तनु बोझ के मारे ।
हाथ नचाइबे सों नभ मैं इत के उत टूटि परैं नहिं तारे ॥
देखन सो जरि जाहि न लोक न खोलत नैन कृपा उर धारे ।
यों थल के बिनु कष्ट सों नाचत शर्व हरौ दुख सर्व तुम्हारे ॥३॥ * १०
* संस्कृत का मंगलाचरण —
धन्या केयं स्थिता ते शिरसि शशिकला, किन्नु नामैतदस्या
नामैवास्यास्तदेतत्, परिचितमपि ते विस्मृतं कस्य हेतोः ।॥
नारी पृच्छामि नेन्दुं, कथयतु विजया न प्रमाणं यदिन्दु-
र्देव्या निह्नोतुमिच्छोरिति सुरसरितं शाठ्यमव्याद्विभोर्वः ॥१॥