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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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प्रस्तावना। २६

बल सों करि हैं ग्रास कह —
( नेपथ्य में )

है ! मेरे जीते चन्द्र को कौन बल से ग्रस सकता है ?
सूत्र०।— जेहि बुध रक्खत आप ॥७॥

से लोक में राहूकृत ग्रहण कहा जाता है और उस काल में स्नान, दान, जप, होम इत्यादि करन से वह राहूकृत पीडा दूर होती है और बहुत पुण्य होता है ।

२ पूर्णिमा में चन्द्रग्रहण होने का कारण ऊपर लिखा ही है और पूर्णिमा में चन्द्रविम्ब भी पूर्ण उज्ज्वल होता है तभी चन्द्रग्रहण होता है ।

३ जब कि पूर्णिमा के दिन चन्द्रग्रहण होता है, इस से पूर्णिमा में चन्द्रमा का और बुध का योग कभी नहीं होता ( क्योंकि बुध सर्वदा सूर्य के पास रहता है और पूर्णिमा के दिन सूर्य चन्द्रमा से दूर राशि के अन्तर पर रहता है, इस लिये बुध भी उस दिन चन्द्र से दूर ही रहता है) यों बुध के योग में चन्द्रग्रहण कभी नहीं हो सकता । इति शिवम् । संवत् १९३७ ज्येष्ठ शुक्ल १५ मंगल दिन, मंगल मंगले भूयात् ।

शास्त्री जी से एक दिन मुझे इस विषय में फिर वार्ता हुई । शास्त्री जी को मैं ने मुद्राराक्षस की पुस्तक भी दिखलाई । इस पर शास्त्री जी ने कहा कि मुझ को ऐसा मालूम होता है कि यदि उस दिन उपराग का सम्भव होगा तो सूर्यग्रहण का क्योंकि बुधयोग अमावस्या के पास होता भी है । पुराणों में स्पष्ट लिखा है कि राहु चन्द्रमा का ग्रास करता है और केतु सूर्य का, और इस श्लोक में केतु का नाम भी है। इस से भी सम्भव होता है कि सूर्योपराग रहा हो । तो चाणक्य का कहना भी ठीक हुआ कि केतू हठपूर्वक क्यों चन्द्र को ग्रसा चाहता है अर्थात् एक तो चन्द्रग्रहण का दिन नहीं दूसरे केतु का चन्द्रमा ग्रास का विषय नहीं क्योंकि नन्द वीर्य्यजात होने से चन्द्रगुप्त राक्षस का वध्य नहीं है । इस अवस्था में ‘चन्द्रम् असम्पूर्ण मण्डल’ चन्द्रमा का अधूरा मण्डल यह अर्थ करना पडेगा । तब छन्द में ‘चन्द्र विम्ब पूरन भए’ के स्थान पर ‘बिना चन्द्र पूरन भए’ पढना चाहिए ।

बुध का बिम्ब प्राचीन भास्कराचार्य के मतानुसार छ कला पन्द्रह विकला के लगभग है परन्तु नवीनों के मत से केवल दश विकला परम है ।

परन्तु इस में कुछ सन्देह नहीं कि यह ग्रह बहुत छोटा है क्योंकि प्राचीनों को इस का ज्ञान बहुत कठिनता से हुआ है इसी लिए इस का नाम ही बुध, ज्ञ, इत्यादि हो गया । यह पृथ्वी से १८६३७७ इतने योजन की दूरी पर मध्यम मान से रहता है और सदा सूर्य के अनुचर के समान सूर्य के पास ही रहता है, एक पाद अर्थात् तीन राशि