मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
१०६ मुद्राराक्षस-
मलयकेतु ।—विजये ! तुम दबे पाव से उधर से आओ, मै
पीछे से जाकर मित्र भागुरायण की आखें बन्द
करता हूं ।
प्रतिहारी ।—जो आज्ञा ।
५ [दोनों दबे पाव से चलते है और भासुरक आता है]
भासुरक ।—[ भागुरायण से ] बाहर क्षपणक आया है, उस
को परवाना चाहिए ।
भागुरायण ।—अच्छा, यहा भेज दो ।
भासुरक ।—जो आज्ञा [ जाता है ] ।
१० [ क्षपणक आता है ]
क्षपणक ।—श्रावक को धर्म लाभ हो !
भागुरायण ।—[छल से उसकी ओर देख कर] यह तो राक्षस
का मित्र जीवसिद्धि है [ प्रगट ] भदन्त ! तुम नगर में
राक्षस के किसी काम से जाते होगे ।
१५ क्षपणक ।—[कान पर हाथ रख कर छी छी ! हम से राक्षस
वा पिशाच से क्या काम ?
भागुरायण ।—आज तुम से और मित्र से कुछ प्रेम कलह हुआ
है, पर यह तो बताओ कि राक्षस ने तुम्हारा कौन
अपराध किया है ?
२० क्षपणक ।—राक्षस ने कुछ अपराध नही किया है, अपराधी
तो हम है ।
भागुरायण ।—ह ह ह ह ! भदन्त ! तुम्हारे इस कहने से
तो मुझ को सुनने की और भी उत्कण्ठा होती है ।
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) मुझ को भी ।
२५ भागुरायण ।—तो भदन्त ! कहते क्यो नही ?
क्षपणक । तुम सुन के क्या करोगे ?
भागुरायण ।—तो जाने दो, हमैं कुछ आग्रह नही है, गुप्त हो
तो मत कहो ।
पंचम अङ्क । १०७
पणक ।—नहो उपासक ! गुप्त ऐसा नही है, पर वह बहुत बुरी बात है।
भागुरायण ।—तो जाओ, हम तुम को परवाना न देंगे।
ज्ञपणक ।—( आप ही आप की भांति ) जो यह इतना आग्रह ५ करता है तो कह दे (प्रत्यक्ष ) श्रावक ! निरुपाय हो कर कहना पड़ा। सुनो—मै पहिले कुसुमपुर मे रहता था, तब संयोग से मुझ से राक्षस से मित्रता हो गई, फिर उस दुष्ट राक्षस ने चुपचाप मेरे द्वारा विषकन्या का प्रयोग करा के बिचारे पर्व्वतेश्वर को मार डाला।
मलयकेतु ।—'आखों में पानी भर के) हाय हाय ! राक्षस ने १० हमारे पिता को मारा, चाणक्य ने नही मारा। हा !
भागुरायण ।—हां, तो फिर क्या हुआ ?
क्षपणक ।—फिर मुझे राक्षस का मित्र जान कर उस दुष्ट चाणक्य ने मुझ को नगर से निकाल दिया, तब मैं राक्षस के यहा आया, पर राक्षस ऐसा जालिया है कि अब मुझ १५ को ऐसा काम करने कहता है जिस से मेरा प्राण जाय।
भागुरायण ।—भदन्त ! हम तो यह समझते है कि पहिले जो आधा राज देने कहा था, वह न देने को चाणक्य ही ने यह दुष्ट कर्म्म किया, राक्षस ने नही किया।
क्षपणक ।—(कान पर हाथ रख कर ) कभी नही, चाणक्य तो २० विषकन्या का नाम भी नही जानता, यह घोर कर्म्म उस दुर्बुद्धि राक्षस ही ने किया है।
भागुरायण ।—हाय हाय ! बड़े कष्ट की बात है। लो, मुहर तो तुम को देते हैं, पर कुमार को भी यह बात सुना दो।
मलयकेतु ।—(आगे बढ़ कर ) २५
सुन्यो मित्र, श्रुति भेद कर, शत्रु कियौ जो हाल।
पिता मरन को मोहि दुख, दुगुन भयो एहि काल ॥
१०८ मुद्राराक्षस—
क्षपणक।—(आप ही आप) मलयकेतु दुष्ट ने यह बात सुन लिया तो मेरा काम हो गया (जाता है)।
मलयकेतु।—(दात पीस कर ऊपर देख कर) अरे राक्षस !
५ जिन तोपै विश्वास करि, सौप्यौ सब धन धाम।
ताहि मारि दुख दै सबन, साचो किय निज नाम ॥
भागुरायण।—(आप ही आप) आर्य चाणक्य की आज्ञा है कि “अमात्य राक्षस के प्राण की सर्वथा रक्षा करना” इस से अब बात फेरैं। (प्रकाश) कुमार ! इतना आवेग मत कीजिये। आप आसन पर बैठिए तौ मैं कुछ निवेदन करू।
१० मलयकेतु।—मित्र क्या कहते हो? कहो (बैठजाता है)।
भागुरायण।—कुमार ! बात यह है कि अर्थशास्त्रवालों की मित्रता और शत्रुता अर्थ ही के अनुसार होती है, साधारण लोगों की भांति इच्छानुसार नही होती। उस समय सर्वार्थसिद्धि को राक्षस राजा बनाया चाहता था तब देव पर्व्वतेश्वर ही इस कार्य में कटक थे तो उस कार्य की सिद्धि के हेतु यदि राक्षस ने ऐसा किया तो कुछ दोष नही। आप देखिए—
मित्र शत्रु ह्वै जात हैं, शत्रु करहि अति नेह।
अर्थ नीति बस लोग सब, बदलहि मानहु देह॥
२० इस से राक्षस को ऐसी अवस्था मे दोष नही देना चाहिये। और जब तक नन्दराज्य न मिलै तब तक उस पर प्रकट स्नेह ही रखना नीति सिद्ध है, राज मिलने पर कुमार जो चाहैंगे करेंगे।
मलयकेतु।—मित्र ! ऐसा ही होगा। तुम ने बहुत ठीक सोचा
२५ है। इस समय इस के वध करने से प्रजागण उदास हो जायगे और ऐसा होने से जय में भी सन्देह होगा।
(एक मनुष्य आता है)
पंचम अङ्क । १०६
मनुष्य ।—कुमार की जय हो ! कुमार के कटकद्वार के रक्षा-
धिकारी दीर्घचक्षु ने निवेदन किया है कि ‘मुद्रा लिये
बिना एक पुरुष कुछ पत्र सहित पकड़ा गया है सो उस को
एक बेर आप देख ले ।’
भागुरायण । अच्छा, उस को ले आओ । ५
पुरुष ।—जो आज्ञा ।
(जाता है और हाथ बंधे हुए सिद्धार्थक को लेकर आता है)
सिद्धार्थक । ( आप ही आप )
गुन पै रिझवत, दोस सों, दूर बचावत जौन ।
स्वामि भक्ति जननी लखिस, प्रनमत नित हम तौन ॥ १०
पुरुष ।—( हाथ जोड़ कर ) कुमार ! यहाँ मनुष्य है।
भागुरायण ।-( अच्छी तरह देख कर ) यह क्या बाहर का
मनुष्य है या यही किसी का नौकर है ?
सिद्धार्थक ।—मैं अमात्य राक्षस का पासवर्ती सेवक हूं ।
भागुरायण ।—तो तुम क्यों मुद्रा लिये बिना कटक के बाहर १५
जाते थे ?
सिद्धार्थक ।—आर्य्य ! काम की जल्दी से ।
भागुरायण ।—ऐसा कौन काम है जिस के आगे राजाज्ञा को
भी कुछ मोल नहीं गिना ?
सिद्धार्थक ।—( भागुरायण के हाथ मे लेख देता है ) । २०
भागुरायण । -( लेख लेकर देख कर ) कुमार ! इस लेख
पर अमात्य राक्षस की मुहर है ।
मलयकेतु ।—ऐसी तरह से खोल कर दो कि मुहर न टूटे ।
भागुरायण ।—( पत्र खोल कर मलयकेतु को देता है) ।
मलयकेतु ।—( पढ़ता है ) स्वस्ति । यथा स्थान में कहीं से २५
कोई किसी पुरुष विशेष को कहता है । हमारे विपत्त
को निराकरण कर के सच्चे मनुष्य ने सचाई दिखलाई ।
११०
मुद्राराक्षस-
अब हमारे पहिले के रक्खे हुए हमारे हितकारी वरो
को भी जो जो देने को कहा था वह देकर प्रसन्न
करना। यह लोग प्रसन्न होगे तो अपना आश्रय छूट
जाने पर सब भांति अपने उपकारी की सेवा करेंगे।
सच्चे लोग कही नही भूलते तो भी हम स्मरण कराते
है। इन मे से कोई तो शत्रु का कोष और हाथी चाहते हैं
और कोई राज चाहते है। हम को सत्यवादी ने जो तीन
अलङ्कार भेजे सो मिले। हम ने भी लेख अशून्य करने को
कुछ भेजा है सो लेना। और जबानी हमारे अत्यन्त
१० प्रामाणिक सिद्धार्थक से सुन लेना * ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! इस लेख का आशय क्या है ?
भागुरायण ।—भद्र सिद्धार्थक ! यह लेख किस का है ?
सिद्धार्थक ।—आर्य्य ! मै नही जानता ।
भागुरायण ।—धूर्त ! लेख लेकर जाता है और यह नही
१५ जानता कि किसने लिखा है, और संदेसा किस
से कहैगा ?
सिद्धार्थक ।—( डरते हुए की भांति ) आप से।
भागुरायण ।—क्यों रे ! हम से ?
सिद्धार्थक ।—आप ने पकड़ लिया। हम कुछ नही जानते
२० कि क्या बात है।
भागुरायण ।—( क्रोध से ) अब जानैगा । भद्र भासुरक !
इस को बाहर ले जाकर जब तक यह सब कुछ न बतलावे
तब तक खूब मारो।
पुरुष ।—जो आज्ञा ( सिद्धार्थक को बाहर ले कर जाता है
२५ और हाथ मे एक पेटी लिए फिर आता है ) आर्य्य !
* यह वही लेख है जिस को चाणक्य ने शकटदास से धोखा देकर लिखवाया था और अपने हाथ से राक्षस की मुहर उस पर करके सिद्धार्थक को दिया थ ।
पंचम अङ्क । १११
उस को मारने के समय उस के बगल में से यह मुहर की हुई पेटी गिर पड़ी ।
भागुरायण ।—( देख कर ) कुमार ! इस पर भी राक्षस की मुहर है ।
मलयकेतु ।—यही लेख अशून्य करने को होगी । इस की भी मुहर बचा कर हम को दिखलाओ ।
भागुरायण ।—( यही खोल कर दिखलाता है ) ।
मलयकेतु ।—अरे ! यह तो वही सब आभरण हैं जो हम ने राक्षस को भेजे थे * । निश्चय यह चन्द्रगुप्त को लिखा है ।
भागुरायण ।—कुमार ! अभी सब संशय मिट जाता है । भासुरक ! उस को और मारो ।
रुष ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर फिर आता है × ) आर्य्य ! हमने उसको बहुत मारा है । अब कहता है कि अब हम कुमार से सब कह देंगे ।
मलयकेतु ।—अच्छा, ले आओ ।
पुरुष ।—जो कुमार की आज्ञा ( बाहर जा कर सिद्धार्थक को ले कर आता है ) ।
* दूसरा अङ्क पढ़ने से यहा की सब कथा खुल जायगी । चाणक्य ने चालाकी कर के चन्द्रगुप्त से पर्व्वतेश्वर के आभरण का दान कराया था और अपने ही ब्राह्मणों को दिलवाया था । उन्हीं लोगो ने राक्षस के हाथ वह आभरण बेचे जिस के विषय में कि इस पत्र में लिखा है " हम को सत्यवादी ने तीन अलकार भेजे सो मिले । " जिस में मलयकेतु को विश्वास हो कि पर्व्वतेश्वर के आभरण राक्षस ने मोल नही लिए कि तु चन्द्रगुप्त ने उस को भेजे और मलयकेतु ने कञ्चुकी के द्वारा जो आभरण राक्षस को भेजे थे वही इस पेटी में बन्द थे, जिस में मलयकेतु को यह सन्देह हो कि राक्षस इन आभरणो को चन्द्रगुप्त को भेजता है ।
×ऐसे अवसर पर नाटक खेलनेवालों को उचित है कि बाहर जाकर बहुत जल्द न चले आवै, और वह जिस कार्य्य के हेतु गए हैं नेपथ्य में उसका अनुकरण करै । जैसा भासुरक को सिद्धार्थक के मारने के हेतु भेजा गया है तो उस को नेपथ्य में मारने का सा कुछ शब्द कर कै तब फिर आना चाहिए ।
११६॥ मुद्रा राक्षस-
प्रतीहारी —(मलयकेतु के पैरों पर गिर कर) कुमार! हम [अभय] दान दीजिए।
—भद्र! उठो, शरणागत जन यहा सदा अभय हैं। [वृत्तान्त] का वृत्तान्त कहो।
५ राक्षत्रा —(उठ कर) सुनिए। मुझ को अमात्य राक्षस ने [पत्र] दे कर चन्द्रगुप्त के पास भेजा था।
—जबानी क्या कहने कहा था वह कहो।
—कुमार! मुझ को अमात्य राक्षस ने यह कहने [कहा था] कि मेरे मित्र कुलूत देश के राजा चित्रवर्मा, [मलय]पति सिंहनाद, कश्मीरेश्वर पुष्कराक्ष, * सिन्धु [देशाधिपति] सिन्धुषेन और पारसीक पालक मेघनाक्ष इन पाच
* [पुष्करा]क्ष राजा के विषय में मुद्राराक्षस के कवि को भ्रम हुआ है यह सम्भव [राज]तरगिणी में कोई राजा पुष्कराक्ष नाम का नहीं है। जिस समय में [चन्द्र]गुप्त राज्य करता था उस समय कश्मीर में विजय जयेन्द्र संधिमान [गोपाल]सेन इन्हीं राजा के होने का सम्भव है। कनिगहम लैसन, विल्सन [आदि के] मत में सौ बरस के लगभग का अन्तर है, इसी से मैंने यहा कई [संक्षेप] ना लिखा। इन राजाओ के जीवनइतिहास में पटने तक किसी का [उल्लेख नहीं] है और न चन्द्रगुप्त के काल की किसी घटना से उन से सम्बन्ध है। [जो कुछ] लिखा हो यह सम्भव हो सकता है। क्योंकि मेघवाहन पहले [पारसीक देश में] था फिर कश्मीर का राजा हुआ। भ्रम से इस को पारसीकराज [समझ लिया हो] या सिल्यूकस का शैलाक्ष अनुवाद न कर के मेघनाक्ष किया हो [और सिल्यूक]षैन से सिंधुसेन निकाला हो। भारतवर्ष की पश्चिमोत्तर सीमा पर [सिकन्दर] के मरने से बडा ही गडबड था इस से कुछ शुद्ध वृत्तान्त नहीं [मिलता] कि कवि ने जो कुछ उस समय सुना लिख दिया। वा यह भी [हो सकता है कि यह दे]श और नाम केवल काव्यकल्पना हो। इतिहासों से यह भी [पाया जाता है कि मे]गास्थनिस (Megasthenes) नामक एक राजदूत सिल्यूकस का [चन्द्रगुप्त के पास] आया था। सम्भव है कि इसी का नाम मेघनाक्ष लिखा हो। यदि [राजतरंगिणी का] हिसाब लीजिए तो एक दूसरी ही लट मिलती है। इस के मत से [कलि संवत् के बि]तिते महाभारत का युद्ध हुआ। फिर १०१ बरस में तीन गोनर्द
पञ्चम अङ्क ।
११३
राजाओं से आप से पूर्व मे सन्धि हो चुकी है । इस मे पहिले तीन तो मलयकेतु का राज चाहते है और बाकी दो खजाना और हाथी चाहते हैं । जिस तरह महाराज ने चाणक्य को उखाड़ कर मुझ को प्रसन्न किया उसी तरह इन लोगों को भी प्रसन्न करना चाहिए । यही राज-सन्देश है ।
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) क्या चित्रवर्म्मादिक भी हमारे द्रोही हैं ? तभी राक्षस मे उन लोगों की ऐसी प्रीति है ।
( प्रकाश ) विजये ! हम अमात्य राक्षस को देखा चाहते हैं । १
हुए, अब ७५४ ग० क० समबत हुआ । इस के पीछे १२६६ बरस के राजाओ का वृत्ता नहीं मालूम । ( २०२० ग० क० ) इस समय के ८६७ वर्ष पीछे उत्पलाक्ष, हिरण्याक्ष और हिरण्यकुल इस नाम के राजा हुए । २७६० ग० क० के पास इन का राज आरम्भ हुआ और २८८७ ग० क० तक रहा । इस वर्ष गत कलि ४६८२ इस से चन्द्रगुप्त का समय २८०० ग० क० हुआ तो उत्पलाक्ष हिरण्य वा हिरण्याक्ष राजा राजतरंगिणी के मत से चन्द्रगुप्त के समय में थे । ( राजतरंगिणी प्र० त० २८७ श्लोक से ) ।
“ उत्पलाक्ष इति ख्यातिं पेशलाक्षस्तथा गतः ।
तत्सूनुस्त्रि शत सार्द्धान् वर्षाणामवशन्महीम् ॥
तस्यसूनुर्हिरण्याक्ष स्वनामाकपुर व्यधात् ।
क्ष्मा सप्तत्रिंशतवर्षान्सप्तमासाश्च भुक्तवान् ॥
हिरण्यकुलइत्यस्थ हिरण्याक्षस्य चात्मज
षष्टि षष्टिच मुकुलस्तत्सूनुरभवत् समाः ॥
अथम्लेच्छगणाकीर्णे मण्डले चण्डचेष्टितः ।” इत्यादि ।
यह सम्बन्ध दो तीन बातो से पष्ट होता है । एक तो यह स्पष्ट सम्भव है कि उत्पलाक्ष का पुष्कराक्ष हो गया हो । दूसर उन्हीं लोगो के समय उस प्रान्त में म्लेच्छो का आना लिखा है । तीसरे इसी समय से गान्धार, बर्बर आदि देशो के लोगो का व्यवहार यहा प्रचलित हुआ । इन बातो से निश्चित होता है कि यही उत्पलाक्षवा हिरण्याक्ष पुष्कराक्ष नाम से लिखा है, विरोध केवल इतना ही है कि राजतरंगिणी में चन्द्रगुप्त का वृत्तान्त नहीं है ।
मुद्राराक्षस—
।—जो आज्ञा (जाता है)।
क पर्दा हटता है और राक्षस आसन पर बैठा हुआ
ा की मुद्रा मे एक पुरुष के साथ दिखलाई पड़ता
)
—(आप ही आप) चन्द्रगुप्त की ओर के बहुत लोग
री सेना मे भरती हो रहे हैं इस से हमारा मन शुद्ध
है। क्योंकि—
साध्य ते अन्वित अरु बिलसत निज पच्छहि।
साधन साधक जो नहि छुअत बिपच्छहि॥
पुनि आपु असिद्ध सपच्छ बिपच्छहु मे सम।
कछु नहि निज पच्छ माहि जाको है सगम॥
ति ऐसे साधनन कों अनुचित अंगीकार करि।
भांति पराजित होत है बादी लो बहुबिधि बिगरि+॥
पाँचवें अंक में चार बेर दृश्य बदलना है। पहिले प्रवेशक, फिर भागुरायण
र तीसरा यह राक्षस का प्रवेश, चौथा राक्षस का फिर मलयकेतु के पास
नाटको के अनुसार चार दृश्या वा गर्भांको में इस को बाट सकते हैं यथा
राजमार्ग, दूसरा युद्ध के डेरा के बीच में मार्ग, और तीसरा राक्षस का
मलयकेतु का डेरा।
यशास्त्र में अनुमान के प्रकरण में किसी पदार्थ को दूसरे पदार्थ के साथ
देख कर व्याप्तिज्ञान होता है कि जहां पहला पदार्थ रहता है वहां दूसरा
। होगा। जैसे रसोई के घर में अग्नि के साथ धूए को बराबर देख कर
होता है कि जहां धुँआ होगा वहां अग्नि भी अवश्य होगी। इसी भांति और
२ दूसरे पदार्थ को देखते। पहले पदार्थ का ज्ञान होता है कि वहां भी अग्नि
। इसी को अनुमिति कहते हैं। जिस की बाद में सिद्धि करनी हो उस
हते हैं, जैसे अग्नि। जिस के द्वारा सिद्ध हो उसे हेतु और साधन कहते हैं
जहां साध्य का रहना निश्चित हो वह सपक्ष कहलाता है, जैसे पाकशाला।
मिति से साध्य की सिद्धि करनी हो वह पक्ष कहलाता है जैसे पर्वत।
का निश्चय अभाव हो वह विपक्ष कहलाता है, जैसे जलाशय। यहां पर
नी न्यायशास्त्र की जानकारी का परिचय देने को यह छंद बनाया है।
पंचम अङ्क । ११५
वा जो लोग चन्द्रगुप्त से उदास हो गए हैं वही लोग इधर मिले हैं, मैं व्यर्थ सोच करता हूं । (प्रगट) प्रियम्वदक ! कुमार के अनुयायी राजा लोगों से हमारी ओर से कह दो कि अब कुसुमपुर दिन दिन पास आता जाता है, इस से सब लोग अपना सेना अलग अलग कर के जो जहां नियुक्त हों ५
वहां सावधानी से रहें ।
आगे खस अरु मगध चलैं जय ध्वजहि उड़ाए ।
यवन और गंधार रहैं मधि सैन जमाए ॥
चेदि हून सक राज लोग पीछे सो धावहि ।
कौलूतादिक नृपति कुमारहि घेरे आवहि * ॥ १०
जैसे न्यायशास्त्र में वाद करनेवाला पूर्वोक्त साधनादिको को न जान कर स्वपक्ष स्थापन में असमर्थ हो कर हार जाता है, वैसे ही जो राजा ( भावक ) सैना आदि साधन से अन्वित है और अपने पक्ष को जानता है, विपक्ष से बचता है वह जय पाता है । जो आप साध्यो ( सेना नीति आदिको ) से हीन ( असिद्ध ) है और जिसको शत्रु मित्र का ज्ञान नहीं है और जो अपने पक्ष को नहीं समझता और अनुचित साधनों का [ अर्थात् शत्रु से मिले हुए लोगों का ] अंगीकार करता है, वह हारता है । यह राक्षस ने इसी विचार पर कहा कि चन्द्रगुप्त के लोग इधर बहुत मिले हैं इस से हारने का सन्देह है [ दर्शनों का थोड़ा सा बखान पाठकगण को जानकारी के हेतु पीछे किया जायगा ] ।
* खस हिमालय के उत्तर की एक जाति । कोई विद्वान तिब्बत, कोई लद्दाख़ को खस देश मानते हैं । यवन शब्द से मुख्य तात्पर्य्य यूनानप्रान्त के देशों से है (Bactria, Ionia, Greek) परन्तु पश्चिम की विदेशी और अन्यधर्मी जाति मात्र को मुहाविरे में यवन कहते हैं । गांधार जिस का अपभ्रंश कन्दहार है । चेदि देश बुन्देलखराड, कोई कोई चन्देरी के छोटे शहर को चेदि देश की राजधानी कहते हैं । हून देश योरोप के तत्काल के किसी असभ्य देश का नाम ( Huns Hungary ) कोई विद्वान् मध्यएशिया में हून देश मानते हैं । शक को कोई विद्वान् तातार देश कहते हैं और कोई ( Scythians ) को शक कहते हैं । कोई बलूचिस्तान के पास के देशों को शक देश मानते हैं । कौलूत देश के राजा चित्रवर्मादिक राक्षस के बड़े विश्वस्त थे इसी से कुमार की सुरक्षा इनको दी थी । इन को राजाओं के
११६ मुद्राराक्षस—
प्रियम्बदक ।—अमात्य की जो आज्ञा (जाता है) ।
(प्रतिहारी आता है)
प्रतिहारी ।—अमात्य की जय हो। कुमार अमात्य को देखना चाहते हैं।
५ राक्षस ।—भद्र ! क्षण भर ठहरो। बाहर कौन है ?
(एक मनुष्य आता है)।
मनुष्य ।—अमात्य ! क्या आज्ञा है ?
राक्षस ।—भद्र ! शकटदास से कहो कि जब से कुमार ने हम को आभरण पहराया है तब से उन के सामने नगे अंग १० जाना हम को उचित नही है। इस से जो तीन आभरण मोल लिये हैं उन में से एक भेज दें।
नाम और देश का कुछ और पता मिलने को हम सिकंदर क विजय की बडी बडी पुस्तको को देखें। क्योकि बहुत सी बाते जिन का पता इस देश की पुस्तको से नहीं लगता विदेशी पुस्तकें उन को सहज में बतला देती हैं। इस हेतु यहा तीन अगरेजी पुस्तको से हम थोडा सा अनुवाद करते हैं—( 1 ) Alexander the Great and his successors, ( 2 ) History of Greece ( 3 ) Plutarch s lives of illustrious men V II “सिकंदर के सिपाही लोग केवल ऋतु और थकावट ही से नहीं डरे कि तु उन्हो ने यह भी सुना कि गगा छ सौ फुट गहरी और चार मील चौटी है। Ganderites और Praisians के राजगण अस्सी हजार सवार, दो लाख सिपाही छ हजार हाथी और आठ हजार रथ सजे हुए सिकंदर से लडने को तैयार हैं। इतनी सैना मगध देश में एकत्र होना कुछ आश्चर्य की बात नहीं क्योकि ऐन्डाकुत्तस (चद्रगुप्त) ने सिल्यूकस को एक ही बेर पाच सौ हाथी दिए थे और एक बेर छ लाख सैना लेकर मारा हिंदुस्तान जीता था। यह गान्दरिटस गान्धार और प्रेसियन फारस प्रात के किसी देश का नाम होगा। हम को इन पाच राजाओ में कुलूत और मलय इन दो देशो की विशेष चिंता है इस हेतु इन देशो का विशेष अन्वेषण कर के आग लिखते हैं ‘ एक बेर सिकंदर [Malli] माल्लि वा मल्लि नामक भारत के विख्यात लटनवाली जाति से जब वह उन को जीतने को गया था मरते मरते बचा। जब सिकन्दर ने उन लोगो का दुर्ग घेर लिया और दीवार पर के लोगों को अपने शस्त्र से मार डाला तो साहस कर क अकेला दीवार पर चढ कर भीतर कूद पडा और वहा
पञ्चम अङ्क । ११७
पञ्चम अङ्क । ११७
मनुष्य ।—जो अमात्य की आज्ञा । ( बाहर जाता है आभरण लेकर आता है । ) अमात्य ! अलङ्कार लीजिए ।
राक्षस ।— ( अलङ्कार धारण कर के ) भद्र ! राजकुल में जाने का मार्ग बतलाओ ।
प्रतिहारी ।—इधर से आइए । ५
राक्षस ।—अधिकार ऐसी बुरी वस्तु है कि निर्दोष मनुष्य का भी जी डरा करता है ।
सेवक प्रभु सों डरत सदाही । पराधीन सपने सुख नाही ॥
जे ऊंचे पद के अधिकारी । तिन को मनही मन भय भारी ॥
सबही द्वेष बड़न सो करहीं । अनुचित कान स्वामि को भरहीं ॥ १०
जिमि जे जनमे ते मरैं मिले अवसि बिलगाहि ।
तिमि जे अति ऊंचे चढ़, गिरि हैं संसय नाहि ॥
शत्रुओं से ऐसा घिर गया कि यदि उस के सिपाही साथ ही न पहुंचते तो वह टुकड़े २ हो जाता । ” यह मली देश ही मुद्राराक्षस का मलय देश है यह संभव होता है । यद्यपि अंग्रेजी वाले यह देश कहां था इस का कुछ वर्णन नहीं करते किन्तु हिन्दुस्तान से लौटते समय यह देश उस को मिला था, इस से अनुमान होता है कि कहीं बलूचिस्तान के पास होगा । आगे चल कर फिर लिखते हैं “नदियों के मुहाने पर पहुंचने के पीछे उस को एक टापू मिला, जिस को उसने शिकोस्तितिस Scillcustis लिखा है पर आरियन [आर्य] लोग उस टापू को किलूता Cillutta कहते हैं ।” क्या आश्चर्य है कि यहां कुलूत हो । वह लोग यह भी लिखते हैं कि चन्द्रगुप्त ने छोटेपन में सिकन्दर को देखा था और उस के विषय में उस ने यह अनुमति दी थी कि सिकन्दर यदि स्वभाव अपने वश में रखता तो सारी पृथ्वी जीतता । अब इन पुस्तकों से राजाओं के नाम भी कुछ मिलाइए । पर्व्वतेश्वर और बर्बर यह दोनों शब्द Barbarian बर्बरियन के कैसे पास हैं । काश्मीरादि देश का राजा जिस के पंजाब अति निकट है, पुष्कराक्ष ग्रीक लोगो के पोरस शब्द के पास है । पुष्कराज वा पुसकस और उस से पोरस हुआ हो तो क्या आश्चर्य है । प्युकैस्तम वा पुसैतस ( जो सिकन्दर के पीछे पारस का गवर्नर हुआ था ) भी पुष्कराक्ष के पास है किंतु यहां पारस का राजा मेघाक्ष लिखा है । इन राजाओं का ठीक, ठीक ग्रीक नाम या जो देश उन का विशाखदत्त ने लिखा उस को यूनानवाले
११८ मुद्रा राक्षस—
प्रतिहारी।— (आगे बढ़ कर) अमात्य ! कुमार यह बिराजते हैं, आप जाइये।
राक्षस।—अरे, कुमार यह बैठे हैं।
लखत चरन की ओर हू, तऊ न देखत ताहि।
अचल दृष्टि इक ओर ही, रही बुद्धि अवगाहि॥
कर पै धारि कपोल निज, लसत झुकौ अवनीस।
दुसह काज के भार सो, मनहु नमित भो सीस॥
(* आगे बढ़ कर) कुमार की जय हो !
मलयकेतु।—आर्य ! प्रणाम करताहू। आसन पर बिराजिए।
१० राक्षस।—(बैठता है।)
मलयकेतु। आर्य ! बहुत दिनों से हम लोगों ने आप को नही देखा।
राक्षस।—कुमार ! सेना को आगे बढ़ाने के प्रबन्ध में फसने के कारण हम को यह उपालम्भ सुनना पड़ा।
१५ मलयकेतु।—अमात्य ! सेना के प्रयाण का आप ने क्या प्रबन्ध किया है? मैं भी सुनना चाहता हूं।
राक्षस। कुमार! आपके अनुयायी, राजा लोगों को यह आज्ञा दी है (आगे खस अरु मगध इत्यादि छन्द पढ़ता है)।
उस समय क्या कहत थे यह निर्णय करना बहुत कठिन है। संस्कृत के शब्द भी यूनानी में इतने बदल जाते हैं जिस का कुछ हिसाब नहीं। च द्रगुप्त का ऐ द्राका त्तस वा सैं डाकोटस, पाटलिपुत्र का पालीबोत्रा वा पालीभोत्तरा। तक्षक का टैक्साइल्स। यही बात यदि हम यूनानी शब्दों का संस्कृत के सादृश्यानुसार अनुवाद करें तो उपस्थित होंगी। अलेक्जैन्डर एलेकजे दर इत्यादि का फारसी सिकन्दर हुआ। हम यदि इन शब्दो को संस्कृत Sanskritised करें तो अलक्षेन्द्र वा लक्षेन्द्र वा श्रीकेन्द्र वा ओक दर वा शिखेन्द्र इत्यादि शब्द होगे। अब कहिए, कहा के शब्द कह जा पडे इसी से ठीक ठीक नामग्राम का निर्णय होना बहुत कठिन है। केवल शब्द विद्या के पण्डितो के कुतूहल के हेतु इतना भी लिखा गया।
* यहीं पर चौथा दृश्य आरम्भ होता है।
पंचम अङ्क । ११६
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) हां, जाना, जो हमारे नाश
करने के हेतु चन्द्रगुप्त से मिले हैं वही हमको घेरे रहेंगे
(प्रकाश) आर्य्य, अब कुसुमपुर से कोई आता है या वहां
जाता है कि नहीं ?
राक्षस ।—अब यहां किसी के आने जाने से क्या प्रयोजन । ५
पांच छः दिन मे हम लोग ही वहां पहुंचेगे ।
मलयकेतु ।—[ आप ही आप ] अभी सब खुल जाता है
[ प्रगट ] जो यही बात है तो इस मनुष्य को चिट्ठी ले
कर आप ने कुसुमपुर क्यों भेजा था ?
राक्षस ।—[ देख कर ] अरे ! सिद्धार्थक है ? भद्र ! यह १०
क्या ?
सिद्धार्थक ।—[ भय और लज्जा नाट्य कर के ] अमात्य ! हम
को क्षमा कीजिये । अमात्य ! हमारा कुछ भी दोष नहीं है
मार खाते खाते हम आप का रहस्य छिपा न सके ।
राक्षस ।—भद्र ! वह कौन सा रहस्य है यह हम को नहीं १५
समझ पड़ता ।
सिद्धार्थक ।—निवेदन करते हैं, मार खाने से, [ इतना ही
कह लज्जा से नीचा मुंह कर लेता है ] ।
मलयकेतु ।—भागुरायण ! स्वामी के सामने लज्जा और भय
से यह कुछ न कह सकेगा, इस से तुम सब बात आर्य्य २०
से कहो ।
भागुरायण ।—कुमार की जो आज्ञा । अमात्य ! यह कहता है
कि अमात्य राक्षस ने हम को चिट्ठी दे कर और संदेश
कह कर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है ।
राक्षस ।—भद्र सिद्धार्थक ! क्या यह सत्य है ?
सिद्धार्थक ।—[ लज्जा नाट्य कर के ] मार खाने के डर से २५
मैंने कह दिया ।
१२० मुद्राराक्षस—
राक्षस। — कुमार ! मार की डर से लोग क्या नहीं कह देते ?
मलयकेतु। — भागुरायण ! चिट्ठी दिखला दो और संदेशा वह अपने मुह से कहैगा ।
भागुरायण। — (चिट्ठी खोल कर 'स्वस्ति कही से कोई
५ किसी को' इत्यादि पढता है ।)
राक्षस। — कुमार ! कुमार ! यह सब शत्रु का प्रयोग है ।
मलयकेतु। — लेख अशून्य करने को आर्य ने जो आभरण भेजे हैं वह शत्रु कैसे भेजेगा ? (आभरण दिखलाता है)
राक्षस। — कुमार ! यह मैं ने किसी को नहीं भेजा । कुमार ने
१० यह मुझ को दिया, और मै ने प्रसन्न होकर सिद्धार्थक को दिया ।
भागुरायण। — अमात्य ! ऐसे उत्तम आभरणों का विशेष कर अपने अङ्ग से उतार कर कुमार की दी हुई वस्तु का—यह पात्र है ?
१५ मलयकेतु। — और संदेश भी बड़े प्रामाणिक सिद्धार्थक से सुनना—यह आर्य ने लिखा है ।
राक्षस। — कैसा संदेश और कैसी चिट्ठी ? यह हमारा कुछ नहीं है !
मलयकेतु। — तो मुहर किस की है ?
२० राक्षस। — धूर्त्त लोग कपटमुद्रा भी बना लेते हैं ।
भागुरायण। — कुमार ! अमात्य सच कहते हैं । सिद्धार्थक, यह चिट्ठी किस की लिखी है ?
सिद्धार्थक। — (राक्षस का मुंह देख कर चुप रह जाता है ।)
भागुरायण। — चुप मत रहो । जी कड़ा कर के कहो ।
२५ सिद्धार्थक। — आर्य ! शकटदास ने ।
राक्षस—शकटदास ने लिखा तो मानो मैने ही लिखा ।
मलयकेतु। — विजये ! शकटदास को हम देखा चाहते हैं ।
पञ्चम अङ्क । १२१
पञ्चम अङ्क । १२१
भागुरायण । - ( आप ही आप ) आर्य चाणक्य के लोग बिना निश्चय समझे हुए कोई बात नही करते । जो शकटदास आकर यह चिट्ठी किस प्रकार लिखी गई है यह सब वृत्तान्त कह देगा तो मलयकेतु फिर बहक जायगा ।
प्रकाश ) कुमार ! शकटदास, अमात्य राक्षस के सामने लिखा होगा तो भी न स्वीकार करेंगे, इस से उन का कोई और लेख मगाकर अक्षर मिला लिये जाय ।
मलयकेतु ।—विजये ! ऐसा ही करो ।
भागुरायण ।—और मुहर भी आवै ।
मलयकेतु । - हा, यह भी । १०
कञ्चुकी । - जो आज्ञा ( बाहर जाता है और पत्र और मुहर लेकर आता है ।) कुमार ! यह शकटदास का लेख और मुहर है ।
मलयकेतु - ( देख कर और अक्षर और मुहर को मिलान कर के ) आर्य ! अक्षर तो मिलते है । १५
राक्षस ।--( आप ही आप ) अक्षर नि सन्देह मिलते हैं, किन्तु शकटदास हमारा मित्र है, इस हिसाब से नही मिलते, तो क्या शकटदास ही ने लिखा अथवा
पुत्र दार की याद करि, स्वामि भक्ति तजि देत ।
छोड़ि अचल जस कों करत, चल धन सों जन हेत ॥ २०
या इसमे सन्देह ही क्या है ?
मुद्रा ताके हाथ की, सिद्धार्थक हू मित्र ।
ताही के कर को लिख्यौ, पत्रहु साधन चित्र ॥
मिलि कै शत्रुन सों करन, भेद भूलि निज धर्म ।
स्वामि विमुख शकटहि कियो, निश्चय यह खल कर्म ॥ २५
मलयकेतु ।—आर्य ! श्रीमान ने तीन आभरण भेजे, सो मिले, यह जो आप ने लिखा है सो उसी में का एक आभरण
१२२ मुद्राराक्षस-
यह भी है ? (राक्षस के पहने हुए आभरण को देख कर
आप ही आप) क्या यह पिता के पहने हुए आभरण है ?
(प्रकाश) आर्य, यह आभरण आपने कहा से पाया ?
राक्षस। — जौहरी से मोल लिया था ।
५ मलयकेतु। — विजये ! तुम इन आभरणों को पहचानती हौ ?
प्रतिहारी। — देख कर आसू भर के) कुमार ! हम सुगृहीत
नामधेय महाराज पर्व्वतेश्वर के पहिरने के आभरणों को
न पहिचानैगे ?
मलयकेतु। — (आखों मे आसू भर के)
१० भूषण प्रिय ! भूषण सबै, कुल भूषण ! तुव अङ्ग ।
तुव मुख ढिग इमि सोहतो, जिमि ससि तारन सङ्ग ॥
राक्षस। (आपही आप) य पर्व्वतेश्वर के पहिने हुए आभरण
हैं ? (प्रकाश) जाना, यह भी निश्चय चाणक्य के भेजे हुए
जौहरियों ने ही बेचा हे ।
१५ मलयकेतु। — आर्य ! पिता के पहने हुए आभरण और फिर
चन्द्रगुप्त के हाथ पडे हुए जौहरी बेचै, यह कभी हो नही
सकता । अथवा हो सकता है ।
अधिक लाभ के लोभ सों, क्रूर ! त्यागि सब नेह ।
बदले इन आभरन के तुम बेच्यौ मम देह ॥
२० राक्षस। — (आपही आप) अरे ! यह दाव तो पूरा बैठ गया ।
मम लेख नहि यह किमि कहैं मुद्रा छुपी जब हाथ की ।
विश्वास होत न शकट तजि हे प्रीति कबहु साथ की ॥
पुनि बेचि हैं नृप चन्द्र भूषण कौन यह पतियाइहैं ।
तासों भलो अब मौन रहनो कथन तैं पति जाइ है ॥
२५ मलयकेतु। — आर्य ! हम यह पूछते हैं । -
राक्षस। — जो आर्य हो उस से पूछो, हम अब पापकारी अनार्य
हो गये है ।
पंचम अङ्क । १२३
मलयकेतु ।—स्वामि पुत्र तुव मौर्य्य हम, मित्र पुत्र सह हेत ।
पैहो उत वाको दियो इत तुम हम कोँ देत ॥
सचिवहु भे उत दास ही, इत तुम स्वामी आप ।
कौन अधिक फिर लोभ जो, तुम कीन्हो यह पाप ॥
राक्षस ।—( आखों मे आसू भरके ) कुमार ! इस का निर्णय ५
तो आप ही ने कर दिया—
स्वामि पुत्र मम मौर्य्य तुम, मित्र पुत्र सह हेत ।
पैहैं उत वाको दियो, इत हम तुम को देत ॥
सचिवहु भे उत दास ही, इत हम स्वामी आप ।
कौन अधिक फिर लोभ जो, हम कीन्हो यह पाप ॥ १०
मलयकेतु ।—( चिट्ठी, पेटी इत्यादि दिखला कर ) यह सब
क्या है ?
राक्षस ।—( आखों मे आसू भर के ) यह सब चाणक्य ने
नही किया, दैव ने किया ।
निज प्रभु सोँ करि नेह जे भृत्य समर्पत देह । १५
तिन सौं अपने सुत सरिस सदा निबाहत नेह ॥
ते गुण गाहक नृप सबे जिन मारे नुन माहि ।
ताही विधि को दोस यह औरन को कछु नाहि ॥
मलयकेतु ।—(क्रोधपूर्वक) अनार्य्य ! अब तक छल किए जाते
हौ कि यह सब दैव ने किया । २०
विष कन्या दै पितु हत्यौ, प्रथम प्रीति उपजाय ।
अब रिपु सोँ मिलि हम सबन, बधन चहत ललचाय ॥
राक्षस ।—( दुःख से आप ही आप ) हां ! यह और जले पर
नमक है । (प्रगट कानों पर हाथ रख कर ) नारायण ! देव
पर्व्वतेश्वर का कोई अपराध हम ने नही किया । २५
मलयकेतु ।—फिर पिता को किसने मारा ?
राक्षस ।—यह दैव से पूछो ।
१२४ मुद्रााराक्षस -
मलयकेतु ।— दैव से पूछूँ, जीवसिद्धि क्षपणक से न पूछूँ ?
राक्षस । ( आप ही आप ) क्या जीवसिद्धि भी चाणक्य का गुप्तचर है ! हाय ! शत्रु ने हमारे हृदय पर भी अधिकार कर लिया ?
५ मलयकेतु ।—( क्रोध से ) शिखरसेन सेनापति से कहो कि राक्षस से मिल कर चन्द्रगुप्त को प्रसन्न करने को पाच राजे जो हमारा बुरा चाहते हैं उन मे कौलूत चित्रवर्मा, मलयाधिपति सिंहनाद और काश्मीराधीश पुष्कराक्ष ये तीन हमारी भूमि की कामना रखते हैं, सो इन को भूमि ही में
१० गाड दे, और सिन्धुराज सुषेण और पारसीकपति मेघनाद हमारी हाथी की सेना चाहते हैं सो इन को हाथी ही के पैर के नीचे पिसवा दो । *
पुरुष ।—जो कुमार की आज्ञा । ( जाता है )
मलयकेतु ।—राक्षस ! हम मलयकेतु हैं, कुछ तुम से विश्वा
१५ सघाती राक्षस नहीं हैं + इस से तुम जाकर अच्छी तरह चन्द्रगुप्त का आश्रय करो ।
चन्द्रगुप्त चाणक्य सों, मिलिए सुख सों आप ।
हम तीनहु को नासि हैं, जिमि त्रिवर्ग कह पाप x ॥
भागुरायण ।—कुमार ! व्यर्थ अब कालक्षेप मत कीजिए ।
२० कुसुमपुर घेरने को हमारी सेना चढ़ चुकी है ।
उड़िक तियगन गडजुगल कह मलिन बनावति ।
अलिकुल से कल अलकन निज कत ववल छुवावति ॥
* यही ब त ऐथानियन ले गो न तारा से कही थी । Wilson कहत ह कि चाणक्य की आज्ञा से ये राजे सब कैद कर लिय गए ने मारे नही गए थे ।
+ अर्थात् हम तुम्हारा प्राण नहीं मारत ।
x जैसे धर्म, अर्थ काम का पाप नाश कर दा ->
पंचम अङ्क । १२५
चपल तुरगखुर घात उठी घन घुमड़ि नवीनी ।
सबु सीस पैं धूरि परै गजमद सौं भीनी ॥
अपने भृत्यों के साथ मलयकेतु जाता है ।
राक्षस ।— ( घबड़ा कर ) हाय ! हाय ! चित्रवर्मादिक साधु सब व्यर्थ मारे गए । हाय ! राक्षस की सब चेष्टा शत्रु को ५
नही, मित्रों ही के नाश करने को होती है । अब हम मन्द-भाग्य क्या करें ?
जाहि तपोबन, पै न मन, शांत होत सह क्रोध ।
प्रान देहि ? रिपु कें जियत, यह नारिन को बोध ॥
खींचि खड्ग कर पतग सम, जाहि अनल अरि पास । १०
है या साहस होइ है, चन्दनदास बिनास ॥
( सोचता हुआ जाता है । )
पटाक्षेप । इति पंचम अङ्क ।