मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context११८ मुद्रा राक्षस—
प्रतिहारी।— (आगे बढ़ कर) अमात्य ! कुमार यह बिराजते हैं, आप जाइये।
राक्षस।—अरे, कुमार यह बैठे हैं।
लखत चरन की ओर हू, तऊ न देखत ताहि।
अचल दृष्टि इक ओर ही, रही बुद्धि अवगाहि॥
कर पै धारि कपोल निज, लसत झुकौ अवनीस।
दुसह काज के भार सो, मनहु नमित भो सीस॥
(* आगे बढ़ कर) कुमार की जय हो !
मलयकेतु।—आर्य ! प्रणाम करताहू। आसन पर बिराजिए।
१० राक्षस।—(बैठता है।)
मलयकेतु। आर्य ! बहुत दिनों से हम लोगों ने आप को नही देखा।
राक्षस।—कुमार ! सेना को आगे बढ़ाने के प्रबन्ध में फसने के कारण हम को यह उपालम्भ सुनना पड़ा।
१५ मलयकेतु।—अमात्य ! सेना के प्रयाण का आप ने क्या प्रबन्ध किया है? मैं भी सुनना चाहता हूं।
राक्षस। कुमार! आपके अनुयायी, राजा लोगों को यह आज्ञा दी है (आगे खस अरु मगध इत्यादि छन्द पढ़ता है)।
उस समय क्या कहत थे यह निर्णय करना बहुत कठिन है। संस्कृत के शब्द भी यूनानी में इतने बदल जाते हैं जिस का कुछ हिसाब नहीं। च द्रगुप्त का ऐ द्राका त्तस वा सैं डाकोटस, पाटलिपुत्र का पालीबोत्रा वा पालीभोत्तरा। तक्षक का टैक्साइल्स। यही बात यदि हम यूनानी शब्दों का संस्कृत के सादृश्यानुसार अनुवाद करें तो उपस्थित होंगी। अलेक्जैन्डर एलेकजे दर इत्यादि का फारसी सिकन्दर हुआ। हम यदि इन शब्दो को संस्कृत Sanskritised करें तो अलक्षेन्द्र वा लक्षेन्द्र वा श्रीकेन्द्र वा ओक दर वा शिखेन्द्र इत्यादि शब्द होगे। अब कहिए, कहा के शब्द कह जा पडे इसी से ठीक ठीक नामग्राम का निर्णय होना बहुत कठिन है। केवल शब्द विद्या के पण्डितो के कुतूहल के हेतु इतना भी लिखा गया।
* यहीं पर चौथा दृश्य आरम्भ होता है।