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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

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मुद्राराक्षस—

।—जो आज्ञा (जाता है)।
क पर्दा हटता है और राक्षस आसन पर बैठा हुआ
ा की मुद्रा मे एक पुरुष के साथ दिखलाई पड़ता
)
—(आप ही आप) चन्द्रगुप्त की ओर के बहुत लोग
री सेना मे भरती हो रहे हैं इस से हमारा मन शुद्ध
है। क्योंकि—

साध्य ते अन्वित अरु बिलसत निज पच्छहि।
साधन साधक जो नहि छुअत बिपच्छहि॥
पुनि आपु असिद्ध सपच्छ बिपच्छहु मे सम।
कछु नहि निज पच्छ माहि जाको है सगम॥
ति ऐसे साधनन कों अनुचित अंगीकार करि।
भांति पराजित होत है बादी लो बहुबिधि बिगरि+॥


पाँचवें अंक में चार बेर दृश्य बदलना है। पहिले प्रवेशक, फिर भागुरायण
र तीसरा यह राक्षस का प्रवेश, चौथा राक्षस का फिर मलयकेतु के पास
नाटको के अनुसार चार दृश्या वा गर्भांको में इस को बाट सकते हैं यथा
राजमार्ग, दूसरा युद्ध के डेरा के बीच में मार्ग, और तीसरा राक्षस का
मलयकेतु का डेरा।

यशास्त्र में अनुमान के प्रकरण में किसी पदार्थ को दूसरे पदार्थ के साथ
देख कर व्याप्तिज्ञान होता है कि जहां पहला पदार्थ रहता है वहां दूसरा
। होगा। जैसे रसोई के घर में अग्नि के साथ धूए को बराबर देख कर
होता है कि जहां धुँआ होगा वहां अग्नि भी अवश्य होगी। इसी भांति और
२ दूसरे पदार्थ को देखते। पहले पदार्थ का ज्ञान होता है कि वहां भी अग्नि
। इसी को अनुमिति कहते हैं। जिस की बाद में सिद्धि करनी हो उस
हते हैं, जैसे अग्नि। जिस के द्वारा सिद्ध हो उसे हेतु और साधन कहते हैं
जहां साध्य का रहना निश्चित हो वह सपक्ष कहलाता है, जैसे पाकशाला।
मिति से साध्य की सिद्धि करनी हो वह पक्ष कहलाता है जैसे पर्वत।
का निश्चय अभाव हो वह विपक्ष कहलाता है, जैसे जलाशय। यहां पर
नी न्यायशास्त्र की जानकारी का परिचय देने को यह छंद बनाया है।