केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
पद-भाष्य
न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न
नाम्। न हि तेषां विज्ञातम् | (अकुशल) है उनके लिये ऐसी
अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति । | बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो
| 'हमने ब्रह्मको जान लिया है' ऐसी
इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्म- | बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो
दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- | लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि
| उपाधियोंमें आत्मभाव करनेवाले हैं
पलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च | उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधिके
| पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि
वाक्य-भाष्य
कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः | और भी जो कोई कुविचार हैं वे
प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये हैं और सब-के-
स्मृताः” (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं” इस
इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और
र्नष्टत्वादिति । | मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञात- | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम-
मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु- | विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमें कहे
वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- | हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योंकि
मात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वो- | उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ
क्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- | होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात
ज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये
| 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे
अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन | हुए ज्ञान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही
अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् | यह कहा गया है ।
तस्मात्तदेव ज्ञानम्। यत्तेषां विज्ञातं | क्योंकि विज्ञानियोंको ब्रह्म आत्म-
विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं | स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोंका विषय
| न होनेसे अविज्ञात—अविदित है,
| इसलिये वही ज्ञान है । और जो
| अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युप- | आदि उपाधिके ज्ञातरूप होनेसे
पद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्य- | 'ब्रह्म विदित है' ऐसी भ्रान्ति होनी
ग्दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते— | उचित ही है । अतः यहाँ 'विज्ञात-
विज्ञातमविजानतामिति । अथवा | मविजानताम्' इस वाक्यद्वारा
हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञात- | असम्यग्दर्शनका पूर्वपक्षरूपसे उल्लेख
मित्यादिः ॥३॥ | किया गया है । अथवा 'अविज्ञातं
| विजानताम्' इत्यादि जो मन्त्रका
| उत्तरार्द्ध है वह* हेतु-अर्थमें है ॥३॥
वाक्य-भाष्य
˙ ब्रह्माविजानतां विदिताविदित- | ज्ञात और अज्ञात पदार्थोंसे रहित,
व्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञान- | अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप,
स्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमज- | आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर,
रमभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् | अभय और अनन्यरूप होनेके कारण
अविजानतां बुद्ध्यादिविषया- | ब्रह्म किसी इन्द्रियका विषय नहीं है—
त्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । | उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त
तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्त- | अर्थात् बुद्धि आदिके विषयरूपसे ही
धर्माध्यारोपेण कार्यकारणभावेन | प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि-
सविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । | के विषयरूपसे ही ब्रह्मका ज्ञान है। अतः
शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपण- | विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त
ज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥ ३ ॥ | आदि धर्मोंके आरोपसे [ उनका जाना
| हुआ ब्रह्म ] कार्य-कारणभाव रहनेसे
| सविकल्प ही है क्योंकि वह अयथार्थ-
| विषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति
| आदिमें आरोपित रजत आदि ज्ञानोंके
| समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥
* हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियोंको इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियोंको वह अज्ञात है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
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पद-भाष्य
'अविज्ञातं विजानताम्' | 'ब्रह्म जाननेवालोंको अविज्ञात
इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | है' ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार
एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है
विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- | तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओंमें
ज्ञातं विजानताम्' इति च | कोई भेद नहीं रह जाता; इसके
परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म | सिवा 'जाननेवालोंको अविज्ञात है'
सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- | यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है ।
| फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे
| जाना जाता है—यही बात
| बतलानेके लिये कहते हैं—
विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) में प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया
है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व-
की प्राप्ति होती है । अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो
अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
प्रतिबोधविदितं बोधं बोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो
प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धाः | बोध-बोधके प्रति विदित होता
प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया | है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे
| होनेवाली प्रतीतियों (ज्ञानों) का
| कथन हुआ है । अतः समस्त
वाक्य-भाष्य
प्रतिबोधविदितं मतम् इति | 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है,
वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- | क्योंकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी
द्वारत्वात् । बोधं प्रति | द्वार हैं । 'बोधं प्रति बोधं प्रति' (बोध-
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विषयीभवन्ति यस्य स आत्मा सर्व- प्रतीतियाँ जिसकी विषय होती हैं
बोधान्प्रति बुध्यते । सर्वप्रत्यय- वह आत्मा समस्त बोधोंके समय
जाना जाता है । सम्पूर्ण प्रतीतियों-
दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः का साक्षी और चिच्छक्तिस्वरूपमात्र
प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया होनेके कारण वह प्रतीतियोंद्वारा
सामान्यरूपसे प्रतीतियोंमें ही लक्षित
लक्ष्यते; नान्यद्द्वारमन्तरात्मनो होता है । उस अन्तरात्माका ज्ञान
विज्ञानाय । प्राप्त करनेके लिये कोई और मार्ग
नहीं है ।
अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया अतः जिस समय ब्रह्मको
प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, प्रतीतियोंके अन्तःसाक्षीस्वरूपसे
ब्रह्मणोऽभेद- तदा तन्मतं तत्- जाना जाता है उसी समय
'प्रतिपादनम् वह ज्ञात होता है; अर्थात् यही
सम्यग्दर्शनमित्यर्थः उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण
सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजनना- प्रतीतियोंका साक्षी होनेपर ही
वाक्य-भाष्य
बोधं प्रतीति वीप्सा सर्वप्रत्यय- बोधके प्रति ) यह द्विरुक्ति सम्पूर्ण
व्याप्त्यर्था । बौद्धा हि सर्वे प्रत्ययाः प्रतीतियोंमें [ ब्रह्मकी ] व्याप्ति सूचित
करनेके लिये है । बुद्धिजनित सम्पूर्ण
तप्तलोहवन्नित्यविज्ञानस्वरूपात्म- प्रतीतियाँ तपे हुए लोहेके समान नित्य
विज्ञानस्वरूप आत्मासे व्याप्त रहनेके
व्याप्तत्वाद् विज्ञानस्वरूपावभासाः, कारण उस विज्ञानस्वरूपसे ही
अवभासित हैं तथा उनसे पृथक् उनका
तदन्यावभासश्चात्मा तद्वि- अवभासक आत्मा [ लोहपिण्डमें व्याप्त
हुए ] अग्निके समान उनसे सर्वथा
लक्षणोऽग्निवदुपलभ्यत इति तेन विलक्षण उपलब्ध होता है । अतः वे
ते द्वारीभवन्त्यात्मोपलब्धौ । बौद्ध प्रत्यय आत्माकी उपलब्धिमें
द्वारस्वरूप हैं । इसलिये प्रत्येक बौद्ध
तस्मात्प्रतिबोधावभासप्रत्यगात्म- प्रत्ययके अवभासमें जो प्रत्यगात्म-
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
पद-भाष्य
पायवर्जितदृक्स्वरूपता नित्यत्वं | उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व,
विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्वि- | नित्यत्व, विशुद्धस्वरूपत्व, आत्मत्व,
शेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं | निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतोंमें [ अनुस्यूत ] एकत्व सिद्ध हो सकता
भवेत् ; लक्षणभेदाभावाद्द्योम्न | है, जिस प्रकार कि लक्षणोंमें भेद न होनेके कारण घट, पर्वत और गुहादि-
इव घटगिरिगुहादिषु । विदिता- | में आकाशका अभेद है। इस प्रकार
विदिताभ्यामन्यद्ब्रह्मेत्यागम- | 'ब्रह्म विदित और अविदित—दोनोंहीसे भिन्न है' इस शास्त्रवचनके
वाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो | अर्थका ही भली प्रकार शोधन करके यहाँ उपसंहार किया गया है। इसके
भवति । “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता | सिवा “वह दृष्टिका द्रष्टा है, श्रवणका श्रोता है, मतिका मनन करने-
मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता” इति | वाला है और विज्ञातिका विज्ञाता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है।
हि श्रुत्यन्तरम् । | [ उससे भी यही सिद्ध होता है ]।
वाक्य-भाष्य
तया यद्विदितं तद्ब्रह्म तदेव मतं | स्वरूपसे जाना जाता है वही ब्रह्म है,
ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगा- | वही माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वही सम्यग्ज्ञानके सहित प्रत्यगात्माका
त्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् । | ज्ञान है; विषयज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है।
आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्ष- | ‘प्रत्यगात्माको आत्मस्वरूपसे देखा’
दिति च काठके । | ऐसा कठोपनिषद्में कहा है। ‘अमृतत्वं
(आत्मज्ञानं अमृतत्व-निमित्तम्) 'अमृतत्वं हि विन्दते' | हि विन्दते’ (आत्मज्ञानसे अमरत्व ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य
इति हेतुवचनम्;विपर्यये | है, क्योंकि इससे विपरीत ज्ञानसे
मृत्युप्राप्तेः । विषया- | मृत्युकी प्राप्ति होती है। बुद्धि आदि
त्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत | विषयोंमें आत्मत्व बोध होनेसे ही
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
यदा पुनर्बोधक्रियाकर्तेति बोध- | जिस प्रकार, जो वृक्षकी
क्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजाना- | शाखाओंको चलायमान करता है
| उसे वायु कहते हैं उसी प्रकार—
तीति बोधलक्षणेन विदितं प्रति- | जिस समय 'प्रतिबोधविदितम्'
| इसका ऐसा अर्थ किया जाता है
बोधविदितमिति व्याख्यायते, | कि आत्मा बोधक्रियाका कर्ता है;
| अतः बोधक्रियारूप लिङ्गसे उसके
यथा यो वृक्षशाखाश्चालयति स | कर्ताको जानता है, इसलिये बोधरूप-
| से विदित होनेके कारण वह
वायुरिति तद्वत्; तदा बोधक्रिया- | 'प्रतिबोधविदितम्' कहलाता है
| उस समय—आत्मा बोधक्रियारूप
शक्तिमानात्मा द्रव्यम्, न बोध- | शक्तिसे युक्त एक द्रव्य सिद्ध होता है,
| साक्षात् बोधस्वरूप ही सिद्ध नहीं
स्वरूप एव । बोधस्तु जायते | होता । बोध ( बुद्धिगत प्रतीति )
विनश्यति च । यदा बोधो | तो उत्पन्न होता है और नष्ट भी
| हो जाता है। अतः जिस समय
जायते, तदा बोधक्रियया स- | बोध उत्पन्न होता है उस समय तो
वाक्य-भाष्य
इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् | मृत्युका आरम्भ होता है, अतः
इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि | आत्मविज्ञान अमरत्वका हेतु है;
| इसलिये 'अमृतत्वं हि विन्दते' यह
विन्दत इति । | हेतुवचन ठीक ही है।
आत्मज्ञानेन किममृतत्वमु- | पूर्व०-क्या आत्मज्ञानसे अमरत्व
त्पाद्यते ? | उत्पन्न किया जाता है ?
न। | सिद्धान्ती-नहीं।
कथं तर्हि ? | पूर्व०-तब कैसे ?
आत्मना विन्दते स्वेनैव नि- | सिद्धान्ती-अमरत्व तो आत्मासे—
| अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते
त्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते । | हैं, किसीके आश्रयसे नहीं। 'विन्दते'
नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति | इससे यह समझना चाहिये कि उसकी
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
पद-भाष्य
विशेषः। यदा बोधो नश्यति, तदा | वह बोधक्रियारूप विशेषणसे युक्त
| होता है और जब उसका नाश हो
नष्टबोधो द्रव्यमात्रं निर्विशेषः। | जाता है तो वह निर्विशेष द्रव्यमात्र
तत्रैवं सति विक्रियात्मकः साव- | रह जाता है। ऐसा माननेसे तो
| वह विकारी, सावयव, अनित्य और
यवोजनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा | अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके
न परिहर्तुं शक्यन्ते । | इन दोषोंका किसी प्रकार परिहार
| नहीं किया जा सकता ।
यदपि काणादानाम् आत्म- | तथा वैशेषिक मतावलम्बियोंका
कणादमत- मनः संयोगजो बोध | जो मत है कि 'आत्मा और मनके
समीक्षा | संयोगसे उत्पन्न होनेवाला बोध
आत्मनि समवैति; अतः | आत्मामें समवाय-सम्बन्धसे रहता
आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु | है, इसीसे आत्मामें बोद्धृत्व है,
विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्य- | वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है,
मात्रस्तु भवति घट इव रागसम- | वह तो नीलपीतादि वर्णोंके समवायी
| घटके समान केवल द्रव्यमात्र है'
वायी; अस्मिन् पक्षेऽप्यचेतनं | —सो इस पक्षमें भी ब्रह्म अचेतन
द्रव्यमात्रं ब्रह्मेति "विज्ञान- | द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और "ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म" (बृ०उ० ३।९।२८) | विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है"
वाक्य-भाष्य
आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि | प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखने-
विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं | वाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न
भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न | किया जाने योग्य होता तो कर्मफलके
| समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह
विद्योत्पाद्यम् । | विद्यासे उत्पाद्य नहीं है।
यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते | यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः
| ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या
किं पुन्र्विद्यया क्रियत इत्युच्यते । | करती है, तो इसमें हमें यह कहना है
७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
“प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) | “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियाँ
इत्याद्याः श्रुतयो बाधिताः स्युः । | बाधित हो जाती हैं। निरवयव होनेके
आत्मनो निरवयवत्वेन प्रदेशा- | कारण आत्मामें कोई देशविशेष नहीं
भावात् नित्यसंयुक्तत्वाच्च मनसः | है; और उससे मनका नित्यसंयोग है;
स्मृत्युत्पत्तिनियमानुपपत्तिरपरि- | इस कारण उसमें स्मृतिकी उत्पत्तिके
हार्या स्यात् । संसर्गधर्मित्वं | नियमकी अनुपपत्ति अनिवार्य हो
चात्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धं | जाती है तथा श्रुति, स्मृति और
कल्पितं स्यात् । “असङ्गो न हि | युक्तिसे विरुद्ध आत्माके संसर्गधर्मी
सज्जते” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) | होनेकी कल्पना भी होती है। “असङ्ग
“असक्तं सर्वभृत्” (गीता १३ । | [आत्मा] का किसीसे संग नहीं
१४) इति हि श्रुतिस्मृती । | होता” “संगरहित और सबका पालन
न्यायश्च—गुणवद्गुणवता सं- | करनेवाला है” ऐसी श्रुति और स्मृति
सृज्यते, नातुल्यजातीयम् । अतः | प्रसिद्ध हैं। युक्तिसे भी जो वस्तु
निर्गुणं निर्विशेषं सर्वविलक्षणं केन- | सगुण होती है उसीका गुणवान्से
चिदप्यतुल्यजातीयेन संसृज्यत | संसर्ग होता है; विजातीय वस्तुओं-
इत्येतत् न्यायविरुद्धं भवेत् । | का संयोग कभी नहीं होता । अतः
तस्मात् नित्यालुप्तज्ञानस्वरूप- | निर्गुण निर्विशेष और सबसे विलक्षण
आत्माका किसी भी विजातीय
वस्तुसे संयोग होता है—ऐसा
मानना न्यायविरुद्ध होगा । अतः
नित्य अविनाशी ज्ञानस्वरूप प्रकाश-
वाक्य-भाष्य
अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा | कि वह अनात्मविज्ञानको निवृत्त
तन्निवृत्त्या स्वाभाविकस्यामृत- | करती हुई उसकी निवृत्तिके द्वारा
त्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते । | स्वाभाविक अमृतत्वकी हेतु बनती है,
यत आह 'वीर्यं विद्यया विन्दते' । | क्योंकि [अगले वाक्यसे] 'विद्यासे
[अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका]
सामर्थ्य प्राप्त होता है' ऐसा कहा भी है।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
पद-भाष्य
ज्योतिरात्मा ब्रह्मेत्ययमर्थः सर्व- | मय आत्मा ही ब्रह्म है—यह अर्थ
बोधबोद्धृत्वे आत्मनः सिध्यति, | आत्माके सम्पूर्ण बोधोंके बोद्धा
नान्यथा । तस्मात् 'प्रतिबोध- | होनेपर ही सिद्ध हो सकता है,
विदितं मतम्' इति यथा- | और किसी प्रकार नहीं । इसलिये
व्याख्यात एवार्थोऽस्माभिः । | 'प्रतिबोधविदितम्' इसका—हमने
यत्पुनः स्वसंवेद्यता प्रतिबोध- | जैसी व्याख्या की है—वही अर्थ है ।
[ब्रह्मणः स्वपर-] विदितमित्यस्य वाक्य- | इसके सिवा 'प्रतिबोधविदितम्'
[संवेद्यताया] स्यार्थो वर्ण्यते, तत्र | इस वाक्यका जो स्वप्रकाशता अर्थ
[औपाधिकत्वम्] भवति सोपाधिकत्वे | बतलाया जाता है वहाँ आत्माको
आत्मनो बुद्ध्युपाधिरूपत्वेन | सोपाधिक मानकर उसमें बुद्धि
भेदं परिकल्प्यात्मात्मानं वेत्तीति | आदि उपाधिके रूपसे भेदकी
संव्यवहारः—"आत्मन्येवात्मानं | कल्पना कर 'आत्मासे आत्माको
पश्यति"(बृ० उ० ४।४।२३) | जानता है' ऐसा व्यवहार हुआ
“स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं | करता है, जैसा कि "आत्मामें ही
पुरुषोत्तम” (गीता १०।१५) | आत्माको देखता है" "हे पुरुषोत्तम !
इति । न तु निरुपाधिकस्यात्मन | तुम स्वयं अपनेसे ही अपनेको
एकत्वे स्वसंवेद्यता परसंवेद्यता | जानते हो" इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा
वा सम्भवति । संवेदनस्वरूप- | गया है । किन्तु निरुपाधिक आत्मा
| तो एक रूप होनेके कारण उसमें
| स्वसंवेद्यता अथवा परसंवेद्यता
| सम्भव ही नहीं है । जिस प्रकार
वाक्य-भाष्य
वीर्यं सामर्थ्यमनात्माध्यारोप- | विद्यासे वीर्य—सामर्थ्य यानी
मायास्वान्तध्वान्तानभिभाव्य- | अनात्माके अध्यारोप तथा माया और
लक्षणं बलं विद्यया विन्दते । तच्च | अन्तःकरणके कारण प्राप्त हुए अज्ञानसे
किंवैशिष्टम् ? अमृतमविनाशि । | जिसका पराभव नहीं हो सकता ऐसा
| बल प्राप्त होता है । वह किस विशेषणसे
| युक्त है? वह अमृत यानी अविनाशी है।
८० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
| संस्कृत (पद-भाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| त्वात्संवेदनान्तरापेक्षा च न | प्रकाशको किसी अन्य प्रकाशकी |
| सम्भवति, यथा प्रकाशस्य प्रका- | अपेक्षा होना सम्भव नहीं है उसी |
| शान्तरापेक्षाया न सम्भवः तद्वत् । | प्रकार ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे [ अपने ज्ञानके लिये ] किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं है। |
| बौद्धपक्षे स्वसंवेद्यतायां तु | तथा बौद्धमतानुसार तो विज्ञानकी |
| क्षणभङ्गुरत्वं निरात्मकत्वं च | स्वसंवेद्यता स्वीकार करनेपर भी उसकी |
| विज्ञानस्य स्यात्; “न हि विज्ञातु- | क्षणभङ्गुरता और निरात्मकता सिद्ध |
| र्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽवि- | होने लगेगी । [ ऐसा होनेपर ] |
| नाशित्वात्” (बृ० उ० ४।३।३०) | “अविनाशी होनेके कारण विज्ञाताकी |
| “नित्यं विभुं सर्वगतम्” (मु० | विज्ञातिका लोप नहीं होता” |
| उ० १ । १ । ६) “स वा एष | “नित्य विभु और सर्वगत है” “वह |
| महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽ- | यह महान् अज आत्मा अजर अमर |
| भयः” (बृ० उ० ४।४।२५) | अमृत और अभयरूप है” इत्यादि |
| इत्याद्याः श्रुतयो बाध्येरन् । | श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी । |
| यत्पुनः प्रतिबोधशब्देन | इसके सिवा जो लोग प्रति- |
| प्रतिबोधार्थ- निर्निमित्तो बोधः प्रति- | बोधशब्दसे, जैसा कि सुषुप्त पुरुषको |
| विचारः बोधः यथा सुप्तस्य | होता है वह निर्निमित्त बोध ही |
| इत्यर्थं परिकल्पयन्ति, सकृद्वि- | प्रतिबोध है—ऐसे अर्थकी कल्पना करते हैं अथवा जो दूसरे लोग |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत (वाक्य-भाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अविद्याजं हि वीर्यं विनाशि। | अविद्यासे होनेवाला बल नाशवान् |
| विद्ययाविद्याया बाध्यत्वात् । न | होता है, क्योंकि अविद्या विद्यासे बाधित |
| तु विद्याया बाधकोऽस्तीति | हो जाती है। किन्तु विद्याका बाधक |
| विद्याजममृतं वीर्यम् । अतो | और कोई नहीं है, अतः विद्याजनित |
| विद्यामृतत्वे निमित्तमात्रं भवति। | वीर्य अमृत होता है। इसलिये विद्या तो अमृतत्वमें केवल निमित्तमात्र होती |
| “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” | है। आथर्वण श्रुतिमें भी कहा है—"यह |
| इति चाथर्वणे (मु० उ० ३।२।४) | आत्मा बलहीनसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है"। |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
पद-भाष्य
ज्ञानं प्रतिबोध इत्यपरे; नि- | [मुक्तिके कारणभूत] एक बार
| होनेवाले विज्ञानको ही प्रतिबोध
र्निमित्तः सनिमित्तः सकृद्वासकृद्वा | समझते हैं—[वे कुछ भी माना
| करें] बिना निमित्तसे हो अथवा
प्रतिबोध एव हि सः। अमृतत्वम् | निमित्तसे तथा एक बार हो अथवा
| अनेक बार वह सबका सब प्रति-
अमरणभावं स्वात्मन्यवस्थानं | बोध ही है [इसका विशेष विवेचन
| करनेसे हमें कोई प्रयोजन नहीं है]।
मोक्षं हि यस्माद् विन्दते लभते | क्योंकि मुमुक्षुगण उपर्युक्त प्रतिबोध-
| से अर्थात् प्रत्येक बौद्ध प्रत्ययमें
यथोक्तात् प्रतिबोधात्प्रतिबोध- | होनेवाले आत्मज्ञानसे ही अमृतत्व—
| अमरणभाव अर्थात् अपने आत्मामें
विदितात्मकात्, तस्मात्प्रतिबोध- | .स्थित होनारूप मोक्ष प्राप्त करते हैं।
| अतः वह (ब्रह्म) प्रत्येक बोधमें
विदितमेव मतमित्यभिप्रायः । | अनुभव होनेवाला ही माना गया है—
| ऐसा इसका अभिप्राय है। क्योंकि
बोधस्य हि प्रत्यगात्मविषयत्वं | बोधका प्रत्यगात्मविषयक होना ही
| अमृतत्वमें कारण माना गया है।
च मतममृतत्वे हेतुः। न ह्यात्मनोऽ- | आत्माकी अनात्मरूपता उसके
| अमृतत्वका कारण नहीं हो सकती ।
नात्मत्वममृतत्वं भवति । आत्म- | आत्माका अमरत्व उसका स्वरूप-
त्वादात्मनोऽमृतत्वं निर्निमित्तमेव, | भूत होनेके कारण अहैतुक ही है।
वाक्य-भाष्य
लोकेऽपि विद्याजमेव बलमभि- | लोकमें भी विद्याजनित बल ही दूसरे
| बलोंका पराभव करता है, शरीर आदि-
भवति न शरीरादिसामर्थ्यं यथा | का बल नहीं; जैसे हाथी-घोड़े आदिके
| शारीरिक बल [मनुष्यके] विद्याजनित
हस्त्यादेः । | बलको नहीं दबा सकते।
८२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
८२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
पद-भाष्य
एवं मर्त्यत्वमात्मनो यद- | इसी प्रकार आत्माकी मृत्यु भी
विद्यया अनात्मत्वप्रतिपत्तिः। | अविद्यावश उसमें अनात्मत्वकी
| उपलब्धि ही है ।
कथं पुनर्यथोक्तयात्मविद्यया- | तो फिर उपर्युक्त आत्मज्ञानसे
| किस प्रकार अमरत्व लाभ कर
ज्ञानेनामृतत्व- मृतत्वं विन्दत इत्यत | लेता है ? इसपर कहते हैं—
प्राप्तिप्रकारः आह—आत्मना स्वेन | [ मुमुक्षु पुरुष ] आत्मा अर्थात्
रूपेण विन्दते लभते वीर्यं बलं | अपने स्वरूपके ज्ञानसे वीर्य—बल
| यानी [ अमरत्व-प्राप्तिका ] सामर्थ्य
सामर्थ्यम् । धनसहायमन्त्रौषधि- | प्राप्त करता है। धन, सहाय, मन्त्र,
| ओषधि, तप और योगसे प्राप्त
तपयोगकृतं वीर्यं मृत्युं न | होनेवाला वीर्य अनित्य वस्तुका किया
शक्नोत्यभिभवितुम् अनित्यवस्तु- | हुआ होनेसे मृत्युका पराभव करनेमें
कृतत्वात्; आत्मविद्याकृतं तु वीर्य- | समर्थ नहीं है; किन्तु आत्मविद्यासे
| होनेवाला वीर्य तो आत्माद्वारा ही
मात्मनैव विन्दते, नान्येन इत्यतो- | प्राप्त किया जाता है—अन्य किसीसे
| नहीं। इसलिये आत्मविद्याजनित
ऽन्यसाधनत्वादात्मविद्यावीर्यस्य | वीर्य किसी अन्य साधनसे प्राप्त
तदेव वीर्यं मृत्युं शक्नोत्य- | होनेवाला नहीं है; अतः वही वीर्य
वाक्य-भाष्य
अथवा प्रतिबोधविदितं मत- | अथवा 'प्रतिबोधविदितं मतम्' इस
मिति सकृदेवाशेषविपरीतनिरस्त- | वाक्यका ऐसा अर्थ समझना चाहिये कि
संस्कारेण स्वप्नप्रतिबोधवद्यद्वि- | स्वप्नसे जागे हुएके समान जिसके सम्पूर्ण
| विपरीत संस्कारोंका एक बार ही बाध हो
दितं तदेव मतं ज्ञातं भवतीति । | गया है, उसीसे जो जाना जाता है वही
अथवा गुरूपदेशः प्रतिबोधस्तेन | मत अर्थात् ज्ञात होता है। अथवा गुरू-
| का उपदेश ही प्रतिबोध है, उससे जाना
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
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पद-भाष्य
भिभवितुम् । यत एवमात्म- | मृत्युका पराभव कर सकता है ।
विद्याकृतं वीर्यमात्मनैव विन्दते, | क्योंकि [ मुमुक्षु पुरुष ] इस प्रकार
अतः विद्यया आत्मविषयया | आत्मविद्याजनित वीर्यको आत्माद्वारा
विन्दतेऽमृतम् अमृतत्वम् । | ही प्राप्त करता है, इसलिये आत्म-
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” | सम्बन्धिनी विद्यासे ही अमरत्व प्राप्त
( मु० उ० ३ । २ । ४ ) इत्या- | करता है । अथर्ववेदीय ( मुण्डक )
थर्वणे । अतः समर्थो हेतुः अमृ- | उपनिषदमें कहा है—“यह आत्मा
तत्वं हि विन्दत इति ॥४॥ | बलहीन पुरुषको प्राप्त होने योग्य
| नहीं है” । अतः यह आत्मविद्यारूप
| हेतु [ मृत्युका निवारण करनेमें ]
| समर्थ है क्योंकि इससे अमरत्व
| प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
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कष्टा खलु सुरनरतिर्यक्प्रेता- | जिनमें सांसारिक दुःखोंकी बहुलता
दिषु संसारदुःखबहुलेषु प्राणि- | है उन देवता, मनुष्य, तिर्यक् और
निकायेषु जन्मजरामरणरोगादि | प्रेतादि प्राणियोंमें अज्ञानवश
संप्राप्तिरज्ञानात् । अतः— | जन्म, जरा, मरण और रोगादिकी
| प्राप्ति होना निश्चय ही बड़े दुःखकी
| बात है । अतः—
वाक्य-भाष्य
वा विदितं मतमिति । उभयत्र | हुआ ही मत (जाना हुआ) है।
प्रतिबोधशब्दप्रयोगोऽस्ति सुप्त- | सोनेसे जागा हुआ तथा गुरुद्वारा
प्रतिबुद्धो गुरुणा प्रतिबोधित | प्रतिबोधित—दोनों ही जगह
इति । पूर्वं तु यथार्थम् ॥ ४ ॥ | ‘प्रतिबोध’ शब्दका प्रयोग होता है ।
| परन्तु इन तीनोंमें सबसे पहला अर्थ
| ही ठीक है ॥ ४ ॥
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८४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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आत्मज्ञान ही सार है
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती
विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद-
मृता भवन्ति ॥ ५ ॥
यदि इस जन्ममें ब्रह्मको जान लिया तब तो ठीक है और यदि
उसे इस जन्ममें न जाना तब तो बड़ी भारी हानि है। बुद्धिमान् लोग
उसे समस्त प्राणियोंमें उपलब्ध करके इस लोकसे जाकर (मरकर)
अमर हो जाते हैं॥ ५ ॥
पद-भाष्य
इह एव चेत् मनुष्योऽधिकृतः | यदि किसी अधिकारी पुरुषने
समर्थः सन् यदि अवेदीद् | सामर्थ्य लाभ कर इस लोकमें ही
आत्मानं यथोक्तलक्षणं विदित- | उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त आत्माको
वान् यथोक्तेन प्रकारेण, अथ | पूर्वोक्त प्रकारसे जान लिया, तब
तदा अस्ति सत्यं मनुष्यजन्म- | तो उसके इस मनुष्यजन्ममें सत्य—
न्यास्मिन्नविनाशोऽर्थवत्ता वा | अविनाशिता—सार्थकता—सद्भाव
वाक्य-भाष्य
इह चेदवेदीत् इत्यवश्यकर्त- | 'इहचेदवेदीदथ सत्यमस्ति' यह
व्यतोक्तिर्विपर्यये विनाशश्रुतेः। | श्रुति आत्मसाक्षात्कारकी अवश्य-
कर्तव्यता बतलानेवाली है, क्योंकि
इसकी विपरीत अवस्थामें श्रुतिने
इह मनुष्यजन्मनि सत्यवश्य- | विनाश बतलाया है। इह अर्थात् इस
मनुष्य-जन्मके रहते हुए आत्माको
मात्मा वेदितव्य इत्येतद्विधीयते। | अवश्य जान लेना चाहिये—ऐसा
कथमह चेदवेदीद्विदितवान्, अथ | विधान किया जाता है। किस प्रकार
कि यदि इस जन्ममें आत्माको जान
सत्यं परमार्थतत्त्वमस्त्यवाप्तं | लिया तो ठीक है, उसे परमार्थतत्त्व
प्राप्त हो गया; अभिप्राय यह कि
तस्य जन्म सफलमित्यभिप्रायः। | उसका जन्म सफल हो गया। और
न चेदिहावेदीन्न विदितवान् | यदि उसे इस जन्ममें न जाना-न
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
पद-भाष्य
सद्भावो वा परमार्थता वा सत्यं | अथवा परमार्थता विद्यमान है ।
विद्यते । न चेदिहावेदीदिति, न | और यदि न जाना अर्थात् इस लोकमें जीवित रहते हुए ही उस
चेद् इह जीवंश्चेद् अधिकृतः | अधिकारीने आत्मज्ञान प्राप्त न
अवेदीत् न विदितवान्, तदा | किया तो उसे महान्—दीर्घ यानी
महती दीर्घा अनन्ता विनष्टिः | अनन्त विनाश अर्थात् जन्म, जरा
विनाशनं जन्मजरामरणादि- | और मरण आदिकी परम्पराका
प्रबन्धाविच्छेदलक्षणा संसार- | विच्छेद न होनारूप संसारगतिकी
गतिः । | ही प्राप्ति होती है ।
तस्मादेवं गुणदोषौ विजा- | अतः इस प्रकार गुण और दोषको
नन्तो ब्राह्मणाः भूतेषु भूतेषु | जाननेवाले धीर—बुद्धिमान् ब्राह्मण-
सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च एक- | लोग प्राणी-प्राणीमें अर्थात् सम्पूर्ण
मात्मतत्त्वं ब्रह्म विचित्य विज्ञाय | चराचर जीवोंमें एक ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्वको 'विचित्य'—जानकर
वाक्य-भाष्य
वृथैव जन्म । अपि च महती | समझा तो उसका जन्म वृथा ही गया ।
विनष्टिर्महान्विनाशो जन्म- | यही नहीं, जन्म-मरणपरंपराकी
मरणप्रबन्धाविच्छेदप्राप्तिलक्षणः | अविच्छिन्नतारूप बड़ी भारी हानि भी
स्यात्ततस्तस्मादवश्यं तद्विच्छेदाय | है । अतः उस परम्पराके विच्छेदके लिये आत्माको अवश्य जान लेना
ज्ञेय आत्मा । | चाहिये ।
ज्ञानेन तु किं स्यादित्युच्यते । | आत्मज्ञानसे होगा क्या सो [भूतेषु
भूतेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेषु | भूतेषु आदि वाक्यसे] बतलाते हैं ।
इत्यर्थः । विचित्य पृथङ्निष्कृष्य | भूत-भूतमें अर्थात् सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंमें आत्माका शोधनकर—उसे
एकमात्रमतत्त्वं संसारधर्मैरस्पृष्ट- | उससे अलग निकालकर यानी संसारधर्मोंसे अस्पृष्ट एकमात्र आत्मतत्त्वको
८६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
८६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
साक्षात्कृत्य धीराः धीमन्तः प्रेत्य | अर्थात् साक्षात् कर यहाँसे लौटने-
व्यावृत्य ममाहंभावलक्षणाद- | पर अर्थात् ममता-अहंतारूप इस
विद्यारूपादस्माल्लोकाद् उपरम्य | अविद्यात्मक लोकसे उपरत होकर
सर्वात्मैकभावमद्वैतमापन्नाः सन्तः | सत्रमें आत्मैकत्वरूप अद्वैतभावको
अमृता भवन्ति ब्रह्मैव भवन्ती- | प्राप्त होकर अमर अर्थात् ब्रह्म ही
त्यर्थः । “स यो ह वै तत्परं ब्रह्म | हो जाते हैं, जैसा कि “जो पुरुष
वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० | निश्चयपूर्वक उस परब्रह्मको जानता
३।२।९) इति श्रुतेः ॥५॥ | है वह ब्रह्म ही हो जाता है” इस
श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ५ ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
मात्मभावेनोपलभ्येत्यर्थः अनेका- | आत्मभावसे उपलब्ध कर धीर—
र्थत्वाद्धांतूनां न पुनश्चित्वेति | बुद्धिमान् अर्थात् विवेकी पुरुष—
सम्भवति विरोधात् ; धीराः | जिनकी बाह्य विषयोंकी अभिलाषा
धीमन्तो विवेकिनो विनिवृत्त- | निवृत्त हो गयी है—मरकर अर्थात्
बाह्यविषयाभिलाषाः प्रेत्य मृत्वा- | इस शरीरादि अनात्मस्वरूप लोकसे
स्माल्लोकाच्छरीराद्यनात्मलक्षणात् | जिनका ममत्व और अहंकार निवृत्त
व्यावृत्तममत्वाहंकाराः सन्तः | हो गया है ऐसे होकर अमृत—अमरण-
इत्यर्थः । अमृता अमरणधर्माणो | धर्मी यानी नित्यविज्ञानामृतस्वभाववाले
नित्यविज्ञानामृतत्वस्वभावा एव | ही हो जाते हैं । धातुओंके अनेक अर्थ
भवन्ति ॥ ५ ॥ | होते हैं [ इसीलिये यहाँ ‘विचित्य’
क्रियाका उपर्युक्त अर्थ ठीक है ] यहाँ
इसका ‘चयन करके’ ऐसा अर्थ नहीं हो
सकता, क्योंकि आत्माके सम्बन्धमें ऐसा
अर्थ करनेसे विरोध आता है ॥ ५ ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
तृतीय खण्ड
यक्षोपाख्यान
वाक्य-भाष्य
ब्रह्म ह देवेभ्य इति ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोत्कीर्त्यता- 'ब्रह्म ह देवेभ्यो' इत्यादि वाक्यसे [ आरम्भ होनेवाली आख्यायिकाके
यक्षोपाख्यानस्य- दुर्विज्ञेयतोत्कीर्त्यता- द्वारा ] जो ब्रह्मकी दुर्विज्ञेयता बतलायी
प्रयोजने विवक्ष्यार्था। समाप्ता गयी है वह, ब्रह्मप्राप्तिके लिये अधिक
विकल्पाः ब्रह्मविद्या यदधीनः यत्न करना चाहिये—इस प्रयोजनके
पुरुषार्थः । अत लिये है। जिसके अधीन पुरुषार्थ है
ऊर्ध्वमर्थवादेन ब्रह्मणो दुर्विज्ञेय- वह ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। अब आगे अर्थवादद्वारा ब्रह्मकी
तोच्यते । तद्विज्ञाने कथं नु नाम दुर्विज्ञेयता बतलायी जाती है, जिससे
यत्नमधिकं कुर्यादिति । कि उसे प्राप्त करनेके लिये मनुष्य किसी-न-किसी तरह अधिक यत्न करे।
शमाद्यर्थो वाम्नायोऽभिमान- अथवा यह श्रुतिभाग अभिमानका
शातनात् । शमादि वा ब्रह्म- नाश करनेवाला होनेसे शमादिकी प्राप्ति-
विद्यासाधनं विधित्सितं तदर्थोऽय- के लिये हो सकता है। या शमादिको ब्रह्मविद्याका साधन बतलाना इष्ट है,
मर्थवादाम्नायः । न हि शमादि- अतः उसीके लिये यह अर्थवाद-श्रुति
साधनरहितस्याभिमानरागद्वेषा- है। जो पुरुष शमादि साधनसे रहित तथा अभिमान और राग-द्वेषादिसे
युक्तस्य ब्रह्मविज्ञाने सामर्थ्य- युक्त है उसका ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें
मस्ति। व्यावृत्तबाह्यमिथ्याप्रत्यय- सामर्थ्य नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म बाह्य मिथ्या प्रतीतियोंके निरसनद्वारा
ग्राह्यत्वाद्वह्मणः । यस्माच्चा- ही ग्रहण किया जाने योग्य है। यह
ग्न्यादीनां जयाभिमानं शातयति। आख्यायिका अग्नि आदिके विजय- सम्बन्धी अभिमानको नष्ट करती है,
ततश्च ब्रह्मविज्ञानं दर्शयत्यभि- इसलिये अभिमानके शान्त होनेपर ही
मानोवशमे । तस्माच्छमादि- ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति दिखलाती है। अतः इसका सारांश यह हुआ कि यह
साधनविधानार्थोऽयमर्थवाद इत्य- अर्थवाद शमादि साधनोंका विधान
वसीयते । करनेके लिये ही है।
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)]
सगुणोपासनार्थो वापोदित-
त्वात। नेदं यदिदमुपासत इत्यु-
पास्यत्वं ब्रह्मणोऽपोदितमपोदित-
त्वादतुपास्यत्वे प्राप्ते तस्यैव
ब्रह्मणः सगुणत्वेनाधिदैवमध्यात्मं
चोपासनं विधातव्यमित्येवमर्थो
वा। इत्यधिदैवतं तद्वनमित्युपा-
सितव्यमिति हि वक्ष्यति।
ब्रह्मेति परो लिङ्गात् । न
(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मपदामिप्रायः) ह्यन्यत्र परादीश्वरात्
नित्यसर्वज्ञात् परि-
भूयाग्न्यादींस्तृणं वज्रीकर्तुं
सामर्थ्यमस्ति तन्न शशाक
दग्धुमित्यादिलिङ्गाद्ब्रह्मशब्दवाच्य
ईश्वर इत्यवसीयते । न ह्यन्यथा-
ग्निस्तृणं दग्धुं नोत्सहेते वायुर्वा-
दातुम् । ईश्वरेच्छया तृणमपि
वज्रीभवतीत्युपपद्यते। तत्सिद्धि-
र्जगतो नियतप्रवृत्तेः ।
[हिन्दी-अनुवाद (दक्षिण स्तम्भ)]
अथवा यह सगुणोपासनाका विधान
करनेके लिये भी हो सकता है, क्योंकि
पहले ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध कर
चुके हैं। पहले 'नेदं यदिदमुपासते'
इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपास्यत्वका निषेध
हो चुका है; इस प्रकार निषिद्ध हो
जानेसे ब्रह्मकी अनुपास्यता प्राप्त
होनेपर उसी ब्रह्मकी सगुणभावसे
अधिदैव या अध्यात्म उपासना करनी
चाहिये इसीको बतलानेके लिये यह
अर्थवाद हो सकता है, जैसा कि आगे
चलकर 'तद्वनमित्युपासितव्यम्' इस
[४।६ मन्त्र] से उसके अधिदैवरूप-
के उपास्यत्वका वर्णन करेंगे।
'ब्रह्म' इस शब्दसे यहाँ परमात्मा
(ईश्वर) समझना चाहिये, क्योंकि
यहाँ उसीकी सूचना देनेवाले लिंग
(चिह्न) देखे जाते हैं । नित्यसर्वज्ञ
परमेश्वरको छोड़कर और किसीमें
अग्नि आदि देवताओंका पराभव करके
तृणको वज्र बना देनेकी शक्ति नहीं हो
सकती। अतः 'तन्न शशाक दग्धुम्'
(उसे अग्नि नहीं जला सका) इत्यादि
लिंगसे ब्रह्मशब्दका वाच्य ईश्वर ही
है—ऐसा निश्चित होता है। इसके
सिवा और किसी कारणसे अग्नि तृणको
जलानेमें और वायु उसे उड़ानेमें
असमर्थ नहीं हो सकते थे। हाँ, यह
ठीक है कि ईश्वरकी इच्छासे तो तृण
भी वज्र हो जाता है। उस ईश्वरकी
सिद्धि संसारकी नियमित प्रवृत्तिसे
होती है।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
वाक्य-भाष्य
[संस्कृत-मूल]
श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिभिर्नित्य-
सर्वविज्ञान ईश्वरे सर्वात्मनि सर्व-
शक्तौ सिद्धेऽपि शास्त्रार्थनिश्च-
यार्थमुच्यते । तस्येश्वरस्य सद्भाव-
सिद्धिः कुतो भवतीत्युच्यते ।
यदिदं जगद्देवगन्धर्वयक्षरक्षः-
(ईश्वरस्य जगन्नियन्तृत्व-निरूपणम्) पितृपिशाचादि-
लक्षणं द्युवियत्पृथिव्यादित्यचन्द्रग्रह-
नक्षत्रविचित्रं विविध-
प्राण्युपभोगयोग्यस्थानसाधन-
सम्बन्धि तदत्यन्तकुशलशिल्पि-
भिरपि दुर्निर्माणं देशकाल-
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति-
क्रममेतद्भोक्तृकर्मविभागज्ञप्रयत्न-
पूर्वकं भवितुमर्हति; कार्यत्वे
सति यथोक्तलक्षणत्वात् । गृह-
प्रासादरथशयनासनादिवत् ।
विपक्ष आत्मादिवत् ।
[हिन्दी-अनुवाद]
यद्यपि नित्यसर्वविज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् ईश्वर श्रुति, स्मृति और प्रसिद्धिसे सिद्ध भी है तो भी शास्त्रके अर्थको निश्चय करनेके लिये यहाँ यह [अनुमान] कहा जाता है । उस ईश्वरके सद्भावकी सिद्धि किस प्रकार होती है ? इसपर कहते हैं—
स्वर्ग, आकाश, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके कारण विचित्र दीखनेवाला तथा नाना प्रकारके प्राणियोंके उपभोगयोग्य स्थान और साधनोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह जितना देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और पिशाचादिरूप जगत् है वह अत्यन्त कुशल शिल्पियोंद्वारा भी बनाया जाना कठिन है । अतः यह देश, काल और निमित्तके अनुरूप नियमित प्रवृत्ति-निवृत्तिके क्रमवाला जगत् भोक्ता और कर्मके विभागको जाननेवाले किसी चेतनके प्रयत्नपूर्वक ही हो सकता है, क्योंकि कार्यरूप होनेके कारण यह उपर्युक्त लक्षणोंवाला है । जैसे कि गृह, प्रासाद, रथ, शय्या और आसन आदि [सभी कार्यरूप अनित्य पदार्थ देखे जाते हैं]; तथा इसके विपरीत [व्यतिरेकी दृष्टान्तरूप] आत्मा आकाश आदि [नित्य पदार्थ हैं] ।
९० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
कर्मण एवेति चेत् ? न । पर- | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति
[कर्मणाम्-] तन्त्रस्य निमित्तमात्र- | कर्मसे ही है तो ऐसा कहना ठीक
[स्वातन्त्र्यम्] त्वात् । यदिदमुपभोग- | नहीं, क्योंकि कर्म परतन्त्र होनेके
वैचित्र्यं प्राणिनां | कारण केवल उसका निमित्त हो सकता
तत्साधनवैचित्र्यं च देशकाल- | है । [ मीमांसककी युक्तिको स्पष्ट करके
| दिखलाते हैं ] यह जो प्राणियोंके
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- | उपभोगकी विचित्रता है तथा उनके
| साधनोंकी विभिन्नता और देश, काल
क्रमं च तन्न नित्यसर्वज्ञकर्तृकम् । | तथा निमित्तके अनुरूप प्रवृत्ति-निवृत्ति-
| का नियमित क्रम है वह किसी नित्य
किं तर्हि ? कर्मण एव तस्या- | सर्वज्ञका रचा हुआ नहीं है । तो
| किसका रचा हुआ है ? [ इसपर कहते
चिन्त्यप्रभावत्वात् सर्वैश्च फल- | हैं—] यह केवल कर्मका ही फल है
हेतुत्वाभ्युपगमात् । सति कर्मणः | क्योंकि वह अचिन्त्य प्रभाववाला है
| तथा सभीने उसे फलके हेतुरूपसे
फलहेतुत्वे किमीश्वराधिक- | स्वीकार किया है । इस प्रकार फलके
कल्पनयेति न नित्यस्येश्वरस्य | हेतुरूपसे कर्मके रहते हुए ईश्वरकी
| अधिक कल्पना करनेसे क्या लाभ है ?
नित्यसर्वज्ञशक्तेः फलहेतुत्वं | अतः नित्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान्
| ईश्वरमें फलका हेतुत्व नहीं है ।
चेति चेत् । | सिद्धान्ती—केवल कर्मसे ही उपभोग
न कर्मण एवोपभोगवैचित्र्या- | आदिकी विचित्रता सम्भव नहीं है ।
| किस कारणसे ? क्योंकि कर्म कर्ताके
द्युपपद्यते । कस्मात् ? कर्तृतन्त्र- | अधीन हैं । चेतन पुरुषके यत्नसे
त्वात्कर्मणः । चितिमत्प्रयत्न- | निष्पन्न होनेवाला कर्म उसके प्रयत्नके
निर्वृत्तं हि कर्म तत्प्रयत्नोपरमात्- | निवृत्त होनेसे निवृत्त होकर देशान्तर
| या कालान्तरमें किसी नियत निमित्त-
उपरतं सद्देशान्तरे कालान्तरे | विशेषकी अपेक्षासे ही कर्ताको फलकी
वा नियतनिमित्तविशेषापेक्षं | प्राप्ति करावेगा—ऐसी व्यवस्था होनेके
| कारण यह कहना उचित नहीं कि वह
कर्तुः फलं जनयिष्यतीति न युक्त- | अपने किसी दूसरे प्रवर्त्तककी अपेक्षा
मनपेक्ष्यान्यदात्मनः प्रयोक्तृ । | न करके ही फल दे देता है । यदि