केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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आत्मज्ञान ही सार है
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती
विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद-
मृता भवन्ति ॥ ५ ॥
यदि इस जन्ममें ब्रह्मको जान लिया तब तो ठीक है और यदि
उसे इस जन्ममें न जाना तब तो बड़ी भारी हानि है। बुद्धिमान् लोग
उसे समस्त प्राणियोंमें उपलब्ध करके इस लोकसे जाकर (मरकर)
अमर हो जाते हैं॥ ५ ॥
पद-भाष्य
इह एव चेत् मनुष्योऽधिकृतः | यदि किसी अधिकारी पुरुषने
समर्थः सन् यदि अवेदीद् | सामर्थ्य लाभ कर इस लोकमें ही
आत्मानं यथोक्तलक्षणं विदित- | उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त आत्माको
वान् यथोक्तेन प्रकारेण, अथ | पूर्वोक्त प्रकारसे जान लिया, तब
तदा अस्ति सत्यं मनुष्यजन्म- | तो उसके इस मनुष्यजन्ममें सत्य—
न्यास्मिन्नविनाशोऽर्थवत्ता वा | अविनाशिता—सार्थकता—सद्भाव
वाक्य-भाष्य
इह चेदवेदीत् इत्यवश्यकर्त- | 'इहचेदवेदीदथ सत्यमस्ति' यह
व्यतोक्तिर्विपर्यये विनाशश्रुतेः। | श्रुति आत्मसाक्षात्कारकी अवश्य-
कर्तव्यता बतलानेवाली है, क्योंकि
इसकी विपरीत अवस्थामें श्रुतिने
इह मनुष्यजन्मनि सत्यवश्य- | विनाश बतलाया है। इह अर्थात् इस
मनुष्य-जन्मके रहते हुए आत्माको
मात्मा वेदितव्य इत्येतद्विधीयते। | अवश्य जान लेना चाहिये—ऐसा
कथमह चेदवेदीद्विदितवान्, अथ | विधान किया जाता है। किस प्रकार
कि यदि इस जन्ममें आत्माको जान
सत्यं परमार्थतत्त्वमस्त्यवाप्तं | लिया तो ठीक है, उसे परमार्थतत्त्व
प्राप्त हो गया; अभिप्राय यह कि
तस्य जन्म सफलमित्यभिप्रायः। | उसका जन्म सफल हो गया। और
न चेदिहावेदीन्न विदितवान् | यदि उसे इस जन्ममें न जाना-न