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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 152 में से

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पृष्ठ 98

९० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
कर्मण एवेति चेत् ? न । पर- | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति
[कर्मणाम्-] तन्त्रस्य निमित्तमात्र- | कर्मसे ही है तो ऐसा कहना ठीक
[स्वातन्त्र्यम्] त्वात् । यदिदमुपभोग- | नहीं, क्योंकि कर्म परतन्त्र होनेके
वैचित्र्यं प्राणिनां | कारण केवल उसका निमित्त हो सकता
तत्साधनवैचित्र्यं च देशकाल- | है । [ मीमांसककी युक्तिको स्पष्ट करके
| दिखलाते हैं ] यह जो प्राणियोंके
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- | उपभोगकी विचित्रता है तथा उनके
| साधनोंकी विभिन्नता और देश, काल
क्रमं च तन्न नित्यसर्वज्ञकर्तृकम् । | तथा निमित्तके अनुरूप प्रवृत्ति-निवृत्ति-
| का नियमित क्रम है वह किसी नित्य
किं तर्हि ? कर्मण एव तस्या- | सर्वज्ञका रचा हुआ नहीं है । तो
| किसका रचा हुआ है ? [ इसपर कहते
चिन्त्यप्रभावत्वात् सर्वैश्च फल- | हैं—] यह केवल कर्मका ही फल है
हेतुत्वाभ्युपगमात् । सति कर्मणः | क्योंकि वह अचिन्त्य प्रभाववाला है
| तथा सभीने उसे फलके हेतुरूपसे
फलहेतुत्वे किमीश्वराधिक- | स्वीकार किया है । इस प्रकार फलके
कल्पनयेति न नित्यस्येश्वरस्य | हेतुरूपसे कर्मके रहते हुए ईश्वरकी
| अधिक कल्पना करनेसे क्या लाभ है ?
नित्यसर्वज्ञशक्तेः फलहेतुत्वं | अतः नित्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान्
| ईश्वरमें फलका हेतुत्व नहीं है ।
चेति चेत् । | सिद्धान्ती—केवल कर्मसे ही उपभोग
न कर्मण एवोपभोगवैचित्र्या- | आदिकी विचित्रता सम्भव नहीं है ।
| किस कारणसे ? क्योंकि कर्म कर्ताके
द्युपपद्यते । कस्मात् ? कर्तृतन्त्र- | अधीन हैं । चेतन पुरुषके यत्नसे
त्वात्कर्मणः । चितिमत्प्रयत्न- | निष्पन्न होनेवाला कर्म उसके प्रयत्नके
निर्वृत्तं हि कर्म तत्प्रयत्नोपरमात्- | निवृत्त होनेसे निवृत्त होकर देशान्तर
| या कालान्तरमें किसी नियत निमित्त-
उपरतं सद्देशान्तरे कालान्तरे | विशेषकी अपेक्षासे ही कर्ताको फलकी
वा नियतनिमित्तविशेषापेक्षं | प्राप्ति करावेगा—ऐसी व्यवस्था होनेके
| कारण यह कहना उचित नहीं कि वह
कर्तुः फलं जनयिष्यतीति न युक्त- | अपने किसी दूसरे प्रवर्त्तककी अपेक्षा
मनपेक्ष्यान्यदात्मनः प्रयोक्तृ । | न करके ही फल दे देता है । यदि