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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 152 में से

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पृष्ठ 94

८६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
साक्षात्कृत्य धीराः धीमन्तः प्रेत्य | अर्थात् साक्षात् कर यहाँसे लौटने-
व्यावृत्य ममाहंभावलक्षणाद- | पर अर्थात् ममता-अहंतारूप इस
विद्यारूपादस्माल्लोकाद् उपरम्य | अविद्यात्मक लोकसे उपरत होकर
सर्वात्मैकभावमद्वैतमापन्नाः सन्तः | सत्रमें आत्मैकत्वरूप अद्वैतभावको
अमृता भवन्ति ब्रह्मैव भवन्ती- | प्राप्त होकर अमर अर्थात् ब्रह्म ही
त्यर्थः । “स यो ह वै तत्परं ब्रह्म | हो जाते हैं, जैसा कि “जो पुरुष
वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० | निश्चयपूर्वक उस परब्रह्मको जानता
३।२।९) इति श्रुतेः ॥५॥ | है वह ब्रह्म ही हो जाता है” इस
श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ५ ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
मात्मभावेनोपलभ्येत्यर्थः अनेका- | आत्मभावसे उपलब्ध कर धीर—
र्थत्वाद्धांतूनां न पुनश्चित्वेति | बुद्धिमान् अर्थात् विवेकी पुरुष—
सम्भवति विरोधात् ; धीराः | जिनकी बाह्य विषयोंकी अभिलाषा
धीमन्तो विवेकिनो विनिवृत्त- | निवृत्त हो गयी है—मरकर अर्थात्
बाह्यविषयाभिलाषाः प्रेत्य मृत्वा- | इस शरीरादि अनात्मस्वरूप लोकसे
स्माल्लोकाच्छरीराद्यनात्मलक्षणात् | जिनका ममत्व और अहंकार निवृत्त
व्यावृत्तममत्वाहंकाराः सन्तः | हो गया है ऐसे होकर अमृत—अमरण-
इत्यर्थः । अमृता अमरणधर्माणो | धर्मी यानी नित्यविज्ञानामृतस्वभाववाले
नित्यविज्ञानामृतत्वस्वभावा एव | ही हो जाते हैं । धातुओंके अनेक अर्थ
भवन्ति ॥ ५ ॥ | होते हैं [ इसीलिये यहाँ ‘विचित्य’
क्रियाका उपर्युक्त अर्थ ठीक है ] यहाँ
इसका ‘चयन करके’ ऐसा अर्थ नहीं हो
सकता, क्योंकि आत्माके सम्बन्धमें ऐसा
अर्थ करनेसे विरोध आता है ॥ ५ ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥