केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली
| ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त
प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु-
| से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो
गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई
पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा
| समझ बैठता है और कोई समझता
रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय
| आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो
वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके
| सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और
अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही
| समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान
मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर
| भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके
ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे
| सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन
प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य
इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान
| लिया है' ऐसा मानता है तो]
आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको
नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है ।
रूपम् । |
वाक्य-भाष्य
देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—]
| देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है
सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ
| वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको
वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म
त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
पद-भाष्य
किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि | पूर्व०-क्या ब्रह्मके बड़े और
महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- | छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि
मेवेत्यादि ? | गुरु 'तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही
| जानता है' ऐसा कह रहे हैं ?
बाढम्; अनेकानि हि | सिद्धान्ती-हाँ, नाम-रूपात्मक
ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि | उपाधिके किये हुए तो ब्रह्मके अनेक
औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न | रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं। स्वतः
निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु | तो "जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित,
"अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध-
रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" ( क० | हीन है" इस श्रुतिके अनुसार
उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० | शब्दादिके सहित उसके सभी रूपों-
९, मुक्तिक० २ । ७२ ) इति | का प्रतिषेध किया जाता है ।
शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- |
षिध्यन्ते । | पूर्व०-जिस धर्मके द्वारा जिसका
ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते | निरूपण किया जाता है वही उसका
तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि | रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी
येन विशेषेण निरूपणं तदेव | जिस विशेषणसे निरूपण होता है वही
तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते- | उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः
चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- | कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदिका
तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा | अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य
वाक्य-भाष्य
अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं | अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध
मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविक- | लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो
मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | मनुष्योंमें आध्यात्मिक और देवताओंमें
सम्बन्धः । अथ न्विति हेतु- | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही
मीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सु | है। 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके
विदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि- | -विचारमें हेतु प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि
| 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है'—ऐसा कहे
| जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार
| जाना हुआ रूप तो अल्प ही है।
केनो० ३—
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोंमेंसे किसीका धर्म नहीं
नामन्तःकरणस्य च धर्मो न | है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा
भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म | अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव
रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् । | वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये
“विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० | ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया
३।९।२८) “विज्ञानघन एव” | जाता है। ऐसा ही कहा भी है—
(बृ० उ० २।४।१२) “सत्यं | “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है”
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० | “वह विज्ञानघन ही है” “ब्रह्म सत्य
२।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” | ज्ञान और अनन्तस्वरूप है” “प्रज्ञान
(ऐ० उ० ५ । ३) इति च | ब्रह्म है” इस प्रकार श्रुतियोंमें भी
ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु । | ब्रह्मके रूपका निरूपण किया
गया है ।
सत्यमेवम्; तथापि तदन्तः- | सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि
करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- | वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय-
रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि
ज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनु- | शब्दोंसे निरूपण किया जाता है,
कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योंकि देहादिके वृद्धि, संकोच,
वाक्य-भाष्य
तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेति च मन्य- | और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी
सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो | तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्रह्मके अल्प
स्वरूपको ही जानता है। क्योंकि ऐसी
रूपं यत्साद्य नु तत्सान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित
और अविदितका प्रतिषेध करनेवाले
एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव | शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक
तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा
यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- | यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ;
र्थानुभव इत्यर्थः । | यह इसका तात्पर्य है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
पद-भाष्य
च्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः । | उच्छेद और नाश आदिमें वह
स्वतस्तु "अविज्ञातं विजानतां | उनका अनुकरण करनेवाला है;
विज्ञातमविजानताम्" (के० उ० | परन्तु स्वतः वैसा नहीं है । स्वतः
२।३) इति स्थितं भविष्यति । | तो वह "जाननेवालोंके लिये अज्ञात
| है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात
| है" इस प्रकार निश्चय किया जायगा ।
यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण | 'यदस्य' इस पदसमूहका पूर्व-
सम्बन्धः । न केवलमध्यात्मो- | वर्ती 'ब्रह्मणो रूपम्' के साथ सम्बन्ध
| है । तू केवल आध्यात्मिक उपाधिसे
पाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो | परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्मके ही
रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधि- | अल्प रूपको नहीं जानता बल्कि
| अधिदैवत उपाधिसे परिच्छिन्न हुए
दैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य | इस ब्रह्मके भी जिस रूपको तू
ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् | देवताओंमें जानता है वह भी
| निश्चय तू इसके अल्प रूपको ही
तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति | जानता है—ऐसा मैं मानता हूँ ।
मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि | इसका जो अध्यात्मरूप है और जो
| देवताओंमें है वह भी उपाधि-
देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्न- | परिच्छिन्न होनेके कारण दहरत्व
त्वादहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु | ( अल्पत्व ) से दूर नहीं है । किन्तु
वाक्य-भाष्य
मन्ये विदितमिति शिष्यस्य | 'मन्ये विदितम्' यह शिष्यकी
| मीमांसा (विचार) करनेके अनन्तरकी
मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रय- | उक्ति है—क्योंकि ऐसा माननेपर ही
| तीन प्रकारकी प्रतीतियोंकी सङ्गति
सङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय | होती है । सम्यक् वस्तुके निश्चयके
| लिये विचलित किये हुए शिष्यसे जब
विचालितः शिष्य आचार्येण | आचार्यने कहा कि 'तुम्हारे लिये अभी
मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते | ब्रह्म विचारणीय ही है' तब शिष्यने
६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विध्वस्तसर्वोपाधिविशेषं शान्तम् | जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेषणोंसे
अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं | रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय
| भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह
ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः। | सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है—
| यह इसका अभिप्राय है।
यत एवम् अथ नु तस्मात् | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये
मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव | अभी तो मैं तेरे लिये ब्रह्मको
ते तव ब्रह्म। एवमाचार्योक्तः | विचारणीय ही समझता हूँ।
शिष्य एकान्ते उपविष्टः समा- | आचार्यके ऐसा कहनेपर शिष्यने
हितः सन्, यथोक्तमाचार्येण | एकान्तमें बैठकर समाहित हो
आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च | आचार्यके बतलाये हुए आगमको
निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, | अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा
आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच— | निश्चयकर आत्मानुभव करनेके
मन्येऽहमथेदानीं विदितं | अनन्तर आचार्यके समीप आकर
ब्रह्मेति ॥१॥ | कहा—मैं ऐसा मानता हूँ कि अब
| मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १ ॥
वाक्य-भाष्य
समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं | एकान्त देशमें समाहित चित्तसे पूर्वोक्त
सुपरिनिश्चितः सन्नाहागमाचा- | प्रकारसे ब्रह्मको विचारनेके अनन्तर
र्यात्मानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषय- | भलीभाँति निश्चय करके शास्त्र,
| आचार्य और अपना अनुभव—इन
त्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरि- | तीनों प्रतीतियोंकी एक ही विषयमें
निश्चिता विद्या सफला स्यान्न | संगति करनेके लिये कहा [ मैं ब्रह्मको
अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो | ज्ञात हुआ ही मानता हूँ ] । इससे यह
| न्याय दिखलाया गया है कि इस
भवति; मन्ये विदितमिति | प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही
परिनिश्चितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञा- | सफल होता है—अनिश्चित नहीं, क्योंकि
| 'मन्ये विदितम्' इस उक्तिसे परि-
हेतूकेः ॥ १ ॥ | निश्चित—निश्चित विज्ञानकी प्रतिज्ञाके
| हेतुका ही प्रतिपादन किया गया है ॥१॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
पद-भाष्य
कथमिति, शृणु— | कैसे विदित हुआ है सो सुनिये—
अनुभूतिका उल्लेख
नाहं* मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥
मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और
न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ
और नहीं भी जानता । हम शिष्योंमेंसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता-
विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥ २ ॥
पद-भाष्य
न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं | मैं अच्छी तरह जानता हूँ—
| ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको
मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि | अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी
| मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । 'तब
विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— | तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं
| हुआ'—ऐसा कहनेपर शिष्य कहता
| है—'मैं नहीं जानता, सो भी बात
नो न वेदेति वेद च । वेद | नहीं है, जानता भी हूँ । मूलके 'वेद
| च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नहीं
चेति चशब्दान्न वेद च । | भी जानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये ।
वाक्य-भाष्य
परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं | आचार्यका और अपना निश्चय
| समान ही है—यह दिखलानेके लिये
प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः | शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित
| किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा
तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह | करता है, क्योंकि 'नाह मन्ये सुवेद'—
| ऐसा कहकर वह उसका हेतु
मन्ये सुवेद इति । | बतलाता है ।
- यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है।
६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये | गुरु—'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता'
सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च | तथा 'मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ'
इति। यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि तू यह नहीं मानता कि 'उसे
कथं मन्यसे वेद चेति। अथ | अच्छी तरह जानता हूँ' तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता
मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूँ' और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यों नहीं
सुवेदेति। एकं वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ'। संशययुक्त और
तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है
इति विप्रतिषिद्धं, संशयविपर्ययौ | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती—ऐसा कहना तो
वर्जयित्वा। न च ब्रह्म संशयित- | ठीक नहीं है। और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि
त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति | ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे
वाक्य-भाष्य
अहेत्यवधारणार्थो निपातो | 'अह' यह निश्चयार्थक निपात
नैव मन्य इत्येतत्। यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ ] ऐसा
परिनिश्चितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नहीं। जबतक मुझे
सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो | ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
मम निश्चय आसीत् । | हूँ'—ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे ] विचलित किये
स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; | जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया,
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
पद-भाष्य
नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय
र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी
प्रसिद्धौ । | रूपसे ही प्रसिद्ध हैं ।
एवमाचार्येण विचाल्य- | आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित
मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, | किये जानेपर भी 'वह विदितसे
'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | अन्य ही है और अविदितसे भी
दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए
सम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभव- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति
बलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां | और अपने अनुभवके बलसे शिष्य
| विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म-
दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । | विद्यामें अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते
| हुए गर्जने लगा । किस प्रकार
वाक्य-भाष्य
यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् | क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा
स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- | (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा-
प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह | के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके
| विरुद्ध है । अतः 'मैं अच्छी तरह
मन्ये सु वेदेति । | जानता हूँ' ऐसा तो मानता ही नहीं।
यस्मान्नैतन्मैव न वेद नो न वेदेति | तथा, उस ब्रह्मको मैं नहीं
| जानता-ऐसा भी नहीं मानता
मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योंकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध
| किया गया है। यहाँ 'नो न वेदेति' इस
ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी
| अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि
मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । | 'तुम किस प्रकार मानते हो ?'
| शिष्य बोला-'वेद च' । यहाँ 'च'
| शब्दसे 'वेद च न वेद च' अर्थात्
चशब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता-
६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
पद-भाष्य
कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते हैं—
नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये | ब्रह्मचारियोंके सहित 'हम शिष्योंमें
तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, | जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको
स तद्ब्रह्म वेद । | तत्त्वतः जानता है—वही उस
| ब्रह्मको जानता है।'
किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह— | अच्छा तो वह वचन है क्या ?
| ऐसा प्रश्न करनेपर [ शिष्य ] कहता
नो न वेदेति वेद च इति । | है—'मैं नहीं जानता—ऐसा भी
| नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात
यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो | [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य
अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है'
| इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु-
वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां | को अपने अनुमान और अनुभवसे
वाक्य-भाष्य
विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः | ऐसा अभिप्राय है। क्योंकि ब्रह्म विदित
| और अविदित—दोनोंसे ही भिन्न है।
तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य | अतः 'ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता
इति वाक्यार्थः । | हूँ'—यही इस वाक्यका अर्थ है।
अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान- | अथवा 'वेद च' इसका यह
| अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म-
ब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव | स्वरूप होनेके कारण 'नहीं जानता'
| —ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता
चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । | ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूपमें कोई
| विकार नहीं है। तथा विशेष विज्ञान
विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न | भी दूसरोंका आरोपित किया हुआ ही
स्वत इति परमार्थतो न च | है स्वरूपसे नहीं है—इसलिये
वेदेति । | परमार्थतः नहीं भी जानता।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
पद-भाष्य
संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण | मिलाकर निश्चित करके आचार्यकी
नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् | बुद्धिको सम्यक् प्रकारसे बतलाने
आचार्यबुद्धिसंवादार्थं मन्दबुद्धि- | और मन्दबुद्धियोंकी बुद्धिकी पहुँचसे
ग्रहणव्यपोहार्थं च । तथा च | बचानेके लिये एक दूसरे वाक्यसे
गर्जितमुपपन्नं भवति 'यो नस्त- | 'मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है
द्वेद तद्वेद' इति ॥२॥ | जानता भी हूँ' ऐसा कहा है। ऐसा
| होनेपर ही 'हममेंसे जो इस [वाक्यके
| मर्म ] को जानता है वही जानता
| है' यह गर्जना उचित हो सकती
| है ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
यो नस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तर- | 'यो नस्तद्वेद तद्वेद' यह आगम
निरासार्थमाम्नाय उक्तार्थानु- | उपर्युक्त अर्थका अनुवाद होनेके
वादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स | कारण इससे अन्य पक्षोंका निषेध
एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः । उपास्य- | करनेके लिये है । हममेंसे जो
ब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथाहं | उस ब्रह्मको इस प्रकार विदित-
वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्म- | अविदितसे भिन्न जानता है वही जानता
वित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽ- | है, और कोई नहीं; क्योंकि जैसा
वसीयत इत्युच्यते । उक्तार्थानुवा- | मैं जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जानने-
दादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति | वाला तो उपास्य अर्थात् कार्यब्रह्मको ही
वेद चेति ॥ २ ॥ | जाननेवाला है । 'वेद च' इस पदसे
| अन्य पक्षवालेमें ब्रह्मवित्त्वका निरास
| किया जाता है । किस कारण यह
| निष्कर्ष निकाला जाता है ? सो बतलाते
| हैं । ऊपर कहे हुए अर्थका अनुवाद
| करनेके कारण; क्योंकि यहाँ 'नो न
| वेदेति वेद च' इस वाक्यसे पूर्वोक्तका
| ही अनुवाद करते हैं ॥ २ ॥
६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य | अब शिष्य और आचार्यके
स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवाद- | संवादसे निवृत्त होकर श्रुति समस्त
निर्वृत्तमर्थमेव बोधयति-यस्या- | संवादसे सम्पन्न होनेवाले अर्थको
मतमित्यादिना- | ही 'यस्यामतम्' इत्यादि अपने ही
रूपसे बतलाती है—
ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥
ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसीको ज्ञात है और जिसको ज्ञात है
वह उसे नहीं जानता; क्योंकि वह जाननेवालोंका बिना जाना हुआ
है और न जाननेवालोंका जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओंके समान
दृश्य न होनेसे वह विषयरूपसे नहीं जाना जा सकता] ॥ ३ ॥
पद-भाष्य
यस्य ब्रह्मविदः अमतम् | जिस ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मत—
अविज्ञातम् अविदितं ब्रह्मेति | अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि
मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य | ब्रह्म अमत—अविज्ञात यानी
मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मेत्यभिप्रायः। | अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक
यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं | मत अर्थात् ज्ञात हो गया है—ऐसा
इसका तात्पर्य है। और जिसे 'मुझे
ब्रह्म मत—ज्ञात अर्थात् विदित हो
वाक्य-भाष्य
यस्यामतम् इति श्रौतम् | 'यस्यामतम्' इत्यादि श्रुति-वचन
आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् । | इस आख्यायिकाका उपसंहार करनेके
शिष्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया | लिये है। शिष्य और आचार्यकी
अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायि- | उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है
कया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन | ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान
आख्यायिकासे जो अर्थ सिद्ध हुआ है
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२
पद-भाष्य
मया ब्रह्मेति निश्चयः, न वेदैव | गया है'—ऐसा निश्चय है वह
| जानता ही नहीं—उसे ब्रह्मका
सः-न ब्रह्म विजानाति सः । | ज्ञान नहीं है ।
विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ | अत्र 'अविज्ञातं विजानताम्'
| ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान्-
अवधारयति—अविज्ञातं विजान- | के उपर्युक्त पक्षोंका अवधारण
| ( निश्चय ) करते हैं—जाननेवालों
तामिति, अविज्ञातम् अमतम् | अर्थात् भली प्रकार समझनेवालों-
| को वह ब्रह्म अविज्ञात—अमत
अविदितमेव ब्रह्म विजानतां | यानी अविदित ( अज्ञेय ) ही है;
सम्यग्विदितवतामित्येतत् । |
वाक्य-भाष्य
वचनेनागमप्रधानेन निगमन- | वह सबका उपसंहार करनेवाले इस
| शास्त्रप्रधान श्रौतवचनसे संक्षेपमें कहा
स्थानीयेन संक्षेपत उच्यते। यदुक्तं | जाता है । जिसे वागादि इन्द्रियोंका
| अविषय होनेके कारण जाने हुए
विदितादन्यद्वागादीनामगोचर- | पदार्थोंसे भिन्न बतलाया था तथा
| अनुभव और उपपत्तिसे भी जिसकी
त्वात् मीमांसितं चानुभवोप- | मीमांसा की थी उस ब्रह्मको वैसा ही
पत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् । | जानना चाहिये ।
कस्मात् ? यस्यामतं यस्य | किस कारणसे ? [ सो बतलाते
विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य | हैं—] जिज्ञासासे प्रेरित होकर प्रवृत्त
| हुए जिस साधकको ब्रह्म अविज्ञात—
अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म | अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्वनिश्चय-
इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानाव- | रूप फलमें पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप-
बोधतया विविदिषा निवृत्ता | से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी
इत्यभिप्रायः, तस्य मतं ज्ञातं तेन | है उसीको वह विदित—ज्ञात है।
विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन | तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्मको
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजान- | तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय, मन और
ताम् असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रिय- | बुद्धि, आदिमें आत्मभाव करनेवाले
| असम्यग्दर्शी अज्ञानियोंके लिये ब्रह्म
मनोबुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; | विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है।*
वाक्य-भाष्य
आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः। स | अविषयरूपसे आत्मभावसे जाना है
सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्त- | उसीने उसे जाना है। जिसे विज्ञानकी
| प्राप्तिके अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्म-
रमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् | भावकी प्राप्ति हो जानेके कारण
सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण | कर्तव्यका अभाव हो जाता है वही
| सम्यग्दर्शी है। इससे विपरीत समझने-
मिथ्याज्ञानो भवति । कथम् ? मतं | वाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे ?
| [सो कहते हैं—] जिसका ऐसा
विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य | विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात
विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीत- | अर्थात् मालूम है वह विपरीत
| विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि
विज्ञानो विदितान्यत्वाद्वह्मणो | ब्रह्म विदितेसे भिन्न है; इसलिये वह
न वेद स न विजानाति । | ब्रह्मको नहीं जानता—नहीं समझता ।
ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञा- | इन कारणोंसे अवैदिक विज्ञानका
नस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषय- | मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्म-
तया निन्दितत्वात्तथा कपिल- | विषयक न होनेसे, निन्दित है ।
कणभुगादिसमयस्यापि विदित- | यही नहीं; कपिल और कणाद
ब्रह्मविषयत्पादनवस्थिततर्कजन्य- | आदिके सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक,
त्वाद्द्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्या- | अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासाकी
त्वमिति। स्मृतेश्च "या वेद- | निवृत्ति न करनेवाले होनेसे मिथ्या ही
बाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च | हैं। “जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा
- इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि 'जिन्हें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया है
वे तो उसे मन-बुद्धि आदिसे अग्राह्य होनेके कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं ।
और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदिको ही आत्मा समझनेके कारण ब्रह्मका उनके
साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है' ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
पद-भाष्य
न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न
नाम्। न हि तेषां विज्ञातम् | (अकुशल) है उनके लिये ऐसी
अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति । | बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो
| 'हमने ब्रह्मको जान लिया है' ऐसी
इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्म- | बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो
दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- | लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि
| उपाधियोंमें आत्मभाव करनेवाले हैं
पलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च | उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधिके
| पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि
वाक्य-भाष्य
कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः | और भी जो कोई कुविचार हैं वे
प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये हैं और सब-के-
स्मृताः” (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं” इस
इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और
र्नष्टत्वादिति । | मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञात- | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम-
मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु- | विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमें कहे
वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- | हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योंकि
मात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वो- | उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ
क्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- | होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात
ज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये
| 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे
अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन | हुए ज्ञान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही
अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् | यह कहा गया है ।
तस्मात्तदेव ज्ञानम्। यत्तेषां विज्ञातं | क्योंकि विज्ञानियोंको ब्रह्म आत्म-
विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं | स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोंका विषय
| न होनेसे अविज्ञात—अविदित है,
| इसलिये वही ज्ञान है । और जो
| अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युप- | आदि उपाधिके ज्ञातरूप होनेसे
पद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्य- | 'ब्रह्म विदित है' ऐसी भ्रान्ति होनी
ग्दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते— | उचित ही है । अतः यहाँ 'विज्ञात-
विज्ञातमविजानतामिति । अथवा | मविजानताम्' इस वाक्यद्वारा
हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञात- | असम्यग्दर्शनका पूर्वपक्षरूपसे उल्लेख
मित्यादिः ॥३॥ | किया गया है । अथवा 'अविज्ञातं
| विजानताम्' इत्यादि जो मन्त्रका
| उत्तरार्द्ध है वह* हेतु-अर्थमें है ॥३॥
वाक्य-भाष्य
˙ ब्रह्माविजानतां विदिताविदित- | ज्ञात और अज्ञात पदार्थोंसे रहित,
व्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञान- | अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप,
स्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमज- | आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर,
रमभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् | अभय और अनन्यरूप होनेके कारण
अविजानतां बुद्ध्यादिविषया- | ब्रह्म किसी इन्द्रियका विषय नहीं है—
त्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । | उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त
तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्त- | अर्थात् बुद्धि आदिके विषयरूपसे ही
धर्माध्यारोपेण कार्यकारणभावेन | प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि-
सविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । | के विषयरूपसे ही ब्रह्मका ज्ञान है। अतः
शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपण- | विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त
ज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥ ३ ॥ | आदि धर्मोंके आरोपसे [ उनका जाना
| हुआ ब्रह्म ] कार्य-कारणभाव रहनेसे
| सविकल्प ही है क्योंकि वह अयथार्थ-
| विषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति
| आदिमें आरोपित रजत आदि ज्ञानोंके
| समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥
* हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियोंको इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियोंको वह अज्ञात है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘
पद-भाष्य
'अविज्ञातं विजानताम्' | 'ब्रह्म जाननेवालोंको अविज्ञात
इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | है' ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार
एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है
विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- | तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओंमें
ज्ञातं विजानताम्' इति च | कोई भेद नहीं रह जाता; इसके
परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म | सिवा 'जाननेवालोंको अविज्ञात है'
सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- | यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है ।
| फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे
| जाना जाता है—यही बात
| बतलानेके लिये कहते हैं—
विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) में प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया
है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व-
की प्राप्ति होती है । अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो
अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
प्रतिबोधविदितं बोधं बोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो
प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धाः | बोध-बोधके प्रति विदित होता
प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया | है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे
| होनेवाली प्रतीतियों (ज्ञानों) का
| कथन हुआ है । अतः समस्त
वाक्य-भाष्य
प्रतिबोधविदितं मतम् इति | 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है,
वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- | क्योंकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी
द्वारत्वात् । बोधं प्रति | द्वार हैं । 'बोधं प्रति बोधं प्रति' (बोध-
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विषयीभवन्ति यस्य स आत्मा सर्व- प्रतीतियाँ जिसकी विषय होती हैं
बोधान्प्रति बुध्यते । सर्वप्रत्यय- वह आत्मा समस्त बोधोंके समय
जाना जाता है । सम्पूर्ण प्रतीतियों-
दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः का साक्षी और चिच्छक्तिस्वरूपमात्र
प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया होनेके कारण वह प्रतीतियोंद्वारा
सामान्यरूपसे प्रतीतियोंमें ही लक्षित
लक्ष्यते; नान्यद्द्वारमन्तरात्मनो होता है । उस अन्तरात्माका ज्ञान
विज्ञानाय । प्राप्त करनेके लिये कोई और मार्ग
नहीं है ।
अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया अतः जिस समय ब्रह्मको
प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, प्रतीतियोंके अन्तःसाक्षीस्वरूपसे
ब्रह्मणोऽभेद- तदा तन्मतं तत्- जाना जाता है उसी समय
'प्रतिपादनम् वह ज्ञात होता है; अर्थात् यही
सम्यग्दर्शनमित्यर्थः उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण
सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजनना- प्रतीतियोंका साक्षी होनेपर ही
वाक्य-भाष्य
बोधं प्रतीति वीप्सा सर्वप्रत्यय- बोधके प्रति ) यह द्विरुक्ति सम्पूर्ण
व्याप्त्यर्था । बौद्धा हि सर्वे प्रत्ययाः प्रतीतियोंमें [ ब्रह्मकी ] व्याप्ति सूचित
करनेके लिये है । बुद्धिजनित सम्पूर्ण
तप्तलोहवन्नित्यविज्ञानस्वरूपात्म- प्रतीतियाँ तपे हुए लोहेके समान नित्य
विज्ञानस्वरूप आत्मासे व्याप्त रहनेके
व्याप्तत्वाद् विज्ञानस्वरूपावभासाः, कारण उस विज्ञानस्वरूपसे ही
अवभासित हैं तथा उनसे पृथक् उनका
तदन्यावभासश्चात्मा तद्वि- अवभासक आत्मा [ लोहपिण्डमें व्याप्त
हुए ] अग्निके समान उनसे सर्वथा
लक्षणोऽग्निवदुपलभ्यत इति तेन विलक्षण उपलब्ध होता है । अतः वे
ते द्वारीभवन्त्यात्मोपलब्धौ । बौद्ध प्रत्यय आत्माकी उपलब्धिमें
द्वारस्वरूप हैं । इसलिये प्रत्येक बौद्ध
तस्मात्प्रतिबोधावभासप्रत्यगात्म- प्रत्ययके अवभासमें जो प्रत्यगात्म-
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
पद-भाष्य
पायवर्जितदृक्स्वरूपता नित्यत्वं | उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व,
विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्वि- | नित्यत्व, विशुद्धस्वरूपत्व, आत्मत्व,
शेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं | निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतोंमें [ अनुस्यूत ] एकत्व सिद्ध हो सकता
भवेत् ; लक्षणभेदाभावाद्द्योम्न | है, जिस प्रकार कि लक्षणोंमें भेद न होनेके कारण घट, पर्वत और गुहादि-
इव घटगिरिगुहादिषु । विदिता- | में आकाशका अभेद है। इस प्रकार
विदिताभ्यामन्यद्ब्रह्मेत्यागम- | 'ब्रह्म विदित और अविदित—दोनोंहीसे भिन्न है' इस शास्त्रवचनके
वाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो | अर्थका ही भली प्रकार शोधन करके यहाँ उपसंहार किया गया है। इसके
भवति । “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता | सिवा “वह दृष्टिका द्रष्टा है, श्रवणका श्रोता है, मतिका मनन करने-
मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता” इति | वाला है और विज्ञातिका विज्ञाता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है।
हि श्रुत्यन्तरम् । | [ उससे भी यही सिद्ध होता है ]।
वाक्य-भाष्य
तया यद्विदितं तद्ब्रह्म तदेव मतं | स्वरूपसे जाना जाता है वही ब्रह्म है,
ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगा- | वही माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वही सम्यग्ज्ञानके सहित प्रत्यगात्माका
त्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् । | ज्ञान है; विषयज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है।
आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्ष- | ‘प्रत्यगात्माको आत्मस्वरूपसे देखा’
दिति च काठके । | ऐसा कठोपनिषद्में कहा है। ‘अमृतत्वं
(आत्मज्ञानं अमृतत्व-निमित्तम्) 'अमृतत्वं हि विन्दते' | हि विन्दते’ (आत्मज्ञानसे अमरत्व ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य
इति हेतुवचनम्;विपर्यये | है, क्योंकि इससे विपरीत ज्ञानसे
मृत्युप्राप्तेः । विषया- | मृत्युकी प्राप्ति होती है। बुद्धि आदि
त्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत | विषयोंमें आत्मत्व बोध होनेसे ही
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
यदा पुनर्बोधक्रियाकर्तेति बोध- | जिस प्रकार, जो वृक्षकी
क्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजाना- | शाखाओंको चलायमान करता है
| उसे वायु कहते हैं उसी प्रकार—
तीति बोधलक्षणेन विदितं प्रति- | जिस समय 'प्रतिबोधविदितम्'
| इसका ऐसा अर्थ किया जाता है
बोधविदितमिति व्याख्यायते, | कि आत्मा बोधक्रियाका कर्ता है;
| अतः बोधक्रियारूप लिङ्गसे उसके
यथा यो वृक्षशाखाश्चालयति स | कर्ताको जानता है, इसलिये बोधरूप-
| से विदित होनेके कारण वह
वायुरिति तद्वत्; तदा बोधक्रिया- | 'प्रतिबोधविदितम्' कहलाता है
| उस समय—आत्मा बोधक्रियारूप
शक्तिमानात्मा द्रव्यम्, न बोध- | शक्तिसे युक्त एक द्रव्य सिद्ध होता है,
| साक्षात् बोधस्वरूप ही सिद्ध नहीं
स्वरूप एव । बोधस्तु जायते | होता । बोध ( बुद्धिगत प्रतीति )
विनश्यति च । यदा बोधो | तो उत्पन्न होता है और नष्ट भी
| हो जाता है। अतः जिस समय
जायते, तदा बोधक्रियया स- | बोध उत्पन्न होता है उस समय तो
वाक्य-भाष्य
इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् | मृत्युका आरम्भ होता है, अतः
इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि | आत्मविज्ञान अमरत्वका हेतु है;
| इसलिये 'अमृतत्वं हि विन्दते' यह
विन्दत इति । | हेतुवचन ठीक ही है।
आत्मज्ञानेन किममृतत्वमु- | पूर्व०-क्या आत्मज्ञानसे अमरत्व
त्पाद्यते ? | उत्पन्न किया जाता है ?
न। | सिद्धान्ती-नहीं।
कथं तर्हि ? | पूर्व०-तब कैसे ?
आत्मना विन्दते स्वेनैव नि- | सिद्धान्ती-अमरत्व तो आत्मासे—
| अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते
त्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते । | हैं, किसीके आश्रयसे नहीं। 'विन्दते'
नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति | इससे यह समझना चाहिये कि उसकी
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
पद-भाष्य
विशेषः। यदा बोधो नश्यति, तदा | वह बोधक्रियारूप विशेषणसे युक्त
| होता है और जब उसका नाश हो
नष्टबोधो द्रव्यमात्रं निर्विशेषः। | जाता है तो वह निर्विशेष द्रव्यमात्र
तत्रैवं सति विक्रियात्मकः साव- | रह जाता है। ऐसा माननेसे तो
| वह विकारी, सावयव, अनित्य और
यवोजनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा | अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके
न परिहर्तुं शक्यन्ते । | इन दोषोंका किसी प्रकार परिहार
| नहीं किया जा सकता ।
यदपि काणादानाम् आत्म- | तथा वैशेषिक मतावलम्बियोंका
कणादमत- मनः संयोगजो बोध | जो मत है कि 'आत्मा और मनके
समीक्षा | संयोगसे उत्पन्न होनेवाला बोध
आत्मनि समवैति; अतः | आत्मामें समवाय-सम्बन्धसे रहता
आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु | है, इसीसे आत्मामें बोद्धृत्व है,
विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्य- | वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है,
मात्रस्तु भवति घट इव रागसम- | वह तो नीलपीतादि वर्णोंके समवायी
| घटके समान केवल द्रव्यमात्र है'
वायी; अस्मिन् पक्षेऽप्यचेतनं | —सो इस पक्षमें भी ब्रह्म अचेतन
द्रव्यमात्रं ब्रह्मेति "विज्ञान- | द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और "ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म" (बृ०उ० ३।९।२८) | विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है"
वाक्य-भाष्य
आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि | प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखने-
विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं | वाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न
भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न | किया जाने योग्य होता तो कर्मफलके
| समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह
विद्योत्पाद्यम् । | विद्यासे उत्पाद्य नहीं है।
यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते | यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः
| ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या
किं पुन्र्विद्यया क्रियत इत्युच्यते । | करती है, तो इसमें हमें यह कहना है