केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
३० केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
“न कर्मणा न प्रजया धनेन “कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” नहीं, किन्हीं-किन्हींने केवल त्यागसे
(कैवल्य० १।२) “पराञ्चि ही अमरत्व लाभ किया है” “स्वयम्भू-
खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित
पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कर दिया है इसलिये जीव बाह्य
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदा- वस्तुओंको ही देखता है, अपने
वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्”(क०उ० अन्तरात्माको नहीं देखता । कोई
२।१।१) “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते बुद्धिमान् पुरुष अमरत्वकी इच्छासे
कामा येऽस्य हृदि श्रिताः•••••• इन्द्रियोंको रोककर अपने प्रत्य-
अत्र ब्रह्म समश्नुते” (क० उ० गात्माको देखता है” “जिस समय
२।३।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः। इसके हृदयकी कामनाएँ छूट जाती
अथवा, अतिमुच्येत्यनेनैवैषणा- हैं••••इस अवस्थामें वह ब्रह्मको प्राप्त
त्यागस्य सिद्धत्वाद् अस्माल्लोकात् कर लेता है” इत्यादि श्रुतियोंसे
प्रेत्य अस्माच्छरीरादपेत्य मृत्वे- भी यही सिद्ध होता है । अथवा
त्यर्थः ॥२॥ एषणात्याग तो ‘अतिमुच्य’ इस
पदसे ही सिद्ध हो जाता है, अतः
‘अस्माल्लोकात्प्रेत्य’ का यह भाव
समझना चाहिये कि इस शरीरसे
अलग होकर यानी मरकर [अमर
हो जाते हैं] ॥ २ ॥
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यस्माच्छ्रोत्रादेरपि श्रोत्राद्यात्म- क्योंकि ब्रह्म श्रोत्रादिका भी
भूतं ब्रह्म, अतः । श्रोत्रादिरूप है, इसलिये—
वाक्य-भाष्य
मृत्युवियोगात्पूर्वमप्यमृताः सन्तो की हुई अज्ञानरूप मृत्युका वियोग
नित्यात्मस्वरूपवत्त्वादमृता भवन्ति होनेसे पूर्व भी नित्य आत्मस्वरूप
होनेके कारण यद्यपि अमृत ही रहते
इत्युपचर्यते ॥ २ ॥ हैं तथापि अमर होते हैं—ऐसा
उपचारसे कहा जाता है ॥ २ ॥
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न
विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो
अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥३॥
वहाँ (उस ब्रह्मतक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती,
मन नहीं जाता। अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश
करना चाहिये, वह हम नहीं जानते—वह हमारी समझमें नहीं आता।
वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है—ऐसा हमने पूर्व-
पुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था ॥ ३ ॥
पद-भाष्य
न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि चक्षुः | वहाँ—उस ब्रह्ममें नेत्रेन्द्रिय
गच्छति, स्वात्मनि गमना- | नहीं जाती, क्योंकि अपनेहीमें अपनी
सम्भवात्। तथा न वाग् गच्छति। | गति होनी असम्भव है। और न वाणी
वाचा हि शब्द उच्चार्यमाणोऽभि- | ही पहुँचती है। जिस समय वाणी-
धेयं प्रकाशयति यदा, तदाभि- | से उच्चारण किया हुआ शब्द अपने
धेयं प्रति वाग्गच्छतीत्युच्यते। | वाच्यको प्रकाशित करता है उस
| समय ही, अपने वाच्यतक वाणी
| पहुँचती है—ऐसा कहा जाता है।
वाक्य-भाष्य
न तत्र चक्षुर्गच्छति इत्युक्तेऽपि | यद्यपि आचार्यने तत्त्वका निरूपण
पर्यनुयोगे हेतुप्रतिपत्तेः। | कर दिया तो भी न समझनेके कारण
श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्येवमादिना | शिष्यके पुनः प्रश्न करनेमें 'वहाँ
उक्तेऽप्यात्मतत्त्वेऽप्रतिपन्नतवात् | नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती' इत्यादि कारण
सूक्ष्मत्वहेतोर्वस्तुनः पुनः | है। अर्थात् 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि
पुनः पर्यनुयुयुक्षाकारणमाह—न | श्रुतिसे आत्मतत्त्वका निरूपण कर
| दिये जानेपर भी आत्मतत्त्व अत्यन्त
| सूक्ष्म होनेके कारण समझमें न आनेसे
| शिष्यको जो पुनः पूछनेकी इच्छा
| हुई उसका कारण 'न तत्र चक्षुर्गच्छति'
३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
तस्य च शब्दस्य तन्निर्वर्तकस्य च | किन्तु ब्रह्म तो शब्द और उसका
करणस्यात्मा ब्रह्म । अतो न | व्यवहार करनेवाले इन्द्रियका आत्मा
है । अतः वाणी वहाँ उसी प्रकार
वाग्गच्छति यथाग्निद्राइकः | नहीं पहुँच सकती, जैसे कि अग्नि
प्रकाशकश्चापि सन् न ह्यात्मानं | दाहक और प्रकाशक होनेपर भी
अपनेको न जलाता है और न
प्रकाशयति दहति वा, तद्वत् । | प्रकाशित ही करता है ।
नो मनः मनश्चान्यस्य | और न मन ही [ वहाँतक जाता
है ] । मन भी अन्य पदार्थोंका
सङ्कल्पयितृ अध्यवसायितृ च सत् | सङ्कल्प और निश्चय करनेवाला
नात्मानं सङ्कल्पयत्यध्यवस्यति | होता हुआ भी अपना सङ्कल्प या
निश्चय नहीं करता है, क्योंकि ब्रह्म
च, तस्यापि ब्रह्मात्मेति। इन्द्रिय- | उसका भी आत्मा है । इन्द्रिय और
मनोभ्यां हि वस्तुनो विज्ञानम् । | मनसे ही वस्तुका ज्ञान हुआ करता
है; उनका अविषय होनेके कारण
तद्गोचरत्वान्न विद्मः तद्ब्रह्म | हम यह नहीं जानते कि वह ब्रह्म
ईदृशमिति । | ऐसा है ।
वाक्य-भाष्य
तत्र चक्षुर्गच्छतीति। तत्र श्रोत्रा- | इत्यादि श्रुतिसे बतलाया गया है ।
श्रोत्रादिके आत्मस्वरूप उस आत्म-
द्यात्मभूते चक्षुरादीनि वाक्- | तत्त्वके विषयमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ
चक्षुषोः सर्वेन्द्रियोपलक्षणार्थ- | ज्ञान उत्पन्न नहीं कर सकतीं,
क्योंकि यहाँ वाक् और चक्षु सभी
त्वात्न विज्ञानमुत्पादयन्ति । | इन्द्रियोंका उपलक्षण करनेके लिये हैं ।
सुखादिवत्तर्हि गृह्येतान्तःकर- | [ इसपर सन्देह होता है-] तो
फिर सुखादिके समान उसकाः
अन्तःकरणसे ग्रहण हो सकता होगा ?
णेनात आह-नो मनः । न | [ इसपर कहते हैं-] मन भी उसतक
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
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पद-भाष्य
अतो न विजानीमो यथा येन | अतः जिस प्रकारसे इस ब्रह्मका
प्रकारेण एतद् ब्रह्म अनुशिष्यात् | अनुशासन—शिष्यके प्रति उपदेश
उपदिशेच्छिष्यायेत्यभिप्रायः । | किया जाय—यह हम नहीं जानते
| ऐसा इसका अभिप्राय है। जो वस्तु
यद्धि करणगोचरं तदन्यस्मै | इन्द्रियोंका विषय होती है उसीका
उपदेष्टुं शक्यं जातिगुणक्रिया- | जाति, गुण और क्रियारूप
विशेषणैः। न तज्जात्यादिविशेषण- | विशेषणोंद्वारा दूसरेको उपदेश
वद्ब्रह्म तस्माद्विपमं शिष्यानुपदेशेन | किया जा सकता है। किन्तु ब्रह्म
| उन जाति आदि विशेषणोंवाला
प्रत्याययितुमिति उपदेशे तदर्थ- | नहीं है। अतः शिष्योंको उपदेश-
| द्वारा उसकी प्रतीति कराना बहुत
ग्रहणे च यत्नातिशयकर्त्तव्यतां | कठिन है—इस प्रकार श्रुति
दर्शयति । | उपदेश और उसके अर्थका ग्रहण
| करनेमें अधिक प्रयत्न करनेकी
| आवश्यकता दिखलाती है।
वाक्य-भाष्य
सुखादिवन्मनसो विषयस्तत् ; | नहीं पहुँचता। वह सुखादिके समान्
इन्द्रियाविषयत्वात्। | मनका भी विषय नहीं है, क्योंकि वह
| इन्द्रियोंका अविषय है।
न विद्मो न विजानीमोऽन्तः- | यह ब्रह्म मन आदि इन्द्रियसूहका
करणेन यथैतद्ब्रह्म मन आदिकरण- | जिस प्रकार अनुशासन करता है
जातमन्विशष्याद् अनुशासनं | अर्थात् जिस प्रकार उनकी प्रवृत्तिका
कुर्यात्प्रवृत्तिनिमित्तं भवेत्तथा- | कारण होता है—इन्द्रियोंका अविषय
विषयत्वान्न विद्मो न विजानीमः। | होनेके कारण—इस सम्बन्धमें अपने
| अन्तःकरणद्वारा हम कुछ नहीं जानते
| अर्थात् कुछ नहीं समझते ।
३४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
‘न विद्मो न विजानीमो यथै- | [पूर्वोक्त श्रुतिके] ‘न विद्मो
| न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्’
तदनुशिष्यात्’ इति अत्यन्तम्
| इस वाक्यसे उपदेशके प्रकारका
एवोपदेशप्रकारप्रत्याख्याने प्राप्ते | अत्यन्त निषेध प्राप्त होनेपर उसका
तदपवादोऽयमुच्यते । सत्यमेवं | यह अपवाद कहा जाता है । यह
| ठीक है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे
प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैर्न परः | परमात्माकी प्रतीति नहीं करायी
प्रत्याययितुं शक्यः; आगमेन तु | जा सकती, किन्तु शास्त्रसे तो
| उसकी प्रतीति करायी ही जा
शक्यत एव प्रत्याययितुमिति | सकती है—अतः उसके उपदेशके
| लिये शास्त्रप्रमाण देते हैं—
तदुपदेशार्थमागममाह—
वाक्य-भाष्य
अथवा श्रोत्रादीनां श्रोत्रादि- | अथवा शिष्यके यह कहनेपर कि
लक्षणं ब्रह्म विशेषेण दर्शयेत्युक्त | ‘श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको विशेष-
| रूपसे दिखलाओ’ आचार्य कहते हैं
आचार्य आह न शक्यते दर्श- | कि ‘उसे दिखाया नहीं जा सकता।’
| क्यों ? ‘क्योंकि उसतक नेत्र नहीं पहुँच
यितुम्। कस्मात् ? न तत्र चक्षु- | सकते’ इत्यादि प्रकारसे सबका आशय
र्गच्छति इत्यादि पूर्ववत्सर्वम्। अत्र | पूर्ववत् समझना चाहिये । यहाँ
| ‘यथैतदनुशिष्यात्’ इस वाक्यका
तु विशेषो यथैतदनुशिष्यादिति । | विशेष तात्पर्य है; अर्थात् जिस किसी
यथैतदनुशिष्यात् प्रतिपादयेत् | अन्य विधिसे कोई अन्य गुरु अपने
| शिष्योंको इसका अनुशासन—
अन्योऽपि शिष्यानितोऽन्येन | प्रतिपादन कर सकता है [ वह हम
विधिनेत्यभिप्रायः । | नहीं जानते ] ।
सर्वथापि ब्रह्म बोधयेत्युक्त | ‘परन्तु मुझे तो किसी भी तरह
| ब्रह्मका बोध करा ही दीजिये’—
आचार्य आह, अन्यदेव तद्वि- | शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य कहते
| हैं—‘वह ब्रह्म जाने हुएसे अन्य है
दितादथो अविदितादधीत्या- | तथा बिना जानेसे भी परे है’—जाने
| और न जाने हुएसे भिन्न होना यही
गमम् विदिताविदिताभ्यामन्य- | उपदेशकी परम्परा है । इसके सिवा
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
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पद-भाष्य
अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | ‘वह विदितसे अन्य ही है और
दितादधीति । अन्यदेव पृथगेव | अविदितसे भी परे है ।’ यहाँ जिस
तत् यत्प्रकृतं श्रोत्रादीनां श्रोत्रा- | प्रकरणप्राप्त श्रोत्रादिके श्रोत्रादि और
दीत्युक्तमविषयश्च तेषाम् । तद् | उनके अविषय ब्रह्मका उल्लेख किया
विदिताद् अन्यदेव हि । विदितं | गया है वह विदितसे अन्य—पृथक्
नाम यद्विदिक्रिययातिशयेनाप्तं | ही है । वेदन-क्रियासे अत्यन्त
| व्याप्त अर्थात् वेदन-क्रियाकी कर्म-
| भूत जो कुछ [नामरूपात्मक]
वाक्य-भाष्य
त्वम् । यो हि ज्ञाता स एव सः , | जो कोई भी उसको जाननेवाला है
सर्वात्मकत्वात् । अतः सर्वात्मनो | वह स्वयं वही है, क्योंकि ब्रह्म
ज्ञातुर्ज्ञातृन्तराभावाद्दिदितादन्य- | सर्वात्मक है । अतः सबके आत्मारूप
त्वम् । “स वेत्ति वेद्यं न च | उस ज्ञाताके सिवा अन्य ज्ञाताका
तस्यास्ति वेत्ता” (श्वे० उ० | अभाव होनेके कारण वह, जितना
३।१९) इति च मन्त्रवर्णात् । | कुछ जाना जाता है उससे भिन्न है;
“विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” | जैसा कि मन्त्रवर्ण भी कहता है—
(बृ० उ० २।४।१४) इति च | “वह सम्पूर्ण ज्ञेयको जानता है तथा
वाजसनेयके । अपि च व्यक्तमेव | उसका ज्ञाता और कोई नहीं है”
विदितं तस्मादन्यदित्यभिप्रायः । | तथा वाजसनेय-श्रुतिमें भी कहा है—
यद्विदितं व्यक्तं तदन्यविषय- | “अरे ! उस विज्ञाताको किससे जाने ?”
त्वादल्पं सविरोधं ततोऽनित्यमत | इसके सिवा व्यक्तको ही विदित कहा
एवानेकत्वादशुद्धमत एव तद्वि- | गया है, उससे भिन्न [यानी अव्यक्त]
लक्षणं ब्रह्मेति सिद्धम् । | है यही इस [अन्यदेव विदितात्]
| का तात्पर्य है जो विदित अर्थात् व्यक्त
| होता है वह दूसरेका विषय होनेके
| कारण अल्प और सविरोध होता है
| ऐसा होनेसे अनित्य होता है, अतः
| अनेक होनेके कारण अशुद्ध भी होता
| है; इसलिये सिद्ध हुआ कि ब्रह्म उससे
| भिन्न प्रकारका ही है ।
३६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
३६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
| विदिक्रियाकर्मभूतं क्वचित् किञ्चित्कस्यचिद्विदितं स्यादिति । | वस्तु कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी-को ज्ञात है उसीको 'विदित' कहते |
| सर्वमेव व्याकृतं विदितमेव; तस्मादन्यदेवेत्यर्थः । | हैं । अतः सम्पूर्ण व्याकृत वस्तु 'विदित' ही है । उस [विदित वस्तु] से ब्रह्म पृथक् ही है—यह इसका तात्पर्य है । |
| अविदितमज्ञातं तर्हीति प्राप्ते आह—अथो अपि अविदिताद् विदितविपरीतादव्याकृताविद्या- | तो फिर ब्रह्म अज्ञात है—ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं—'वह अविदित—विदितसे विपरीत व्याकृत पदार्थोंकी बीजभूत अविद्यारूप |
वाक्य-भाष्य
| तर्ह्यविदितम् । | पूर्व०—तो फिर ब्रह्म अज्ञात हुआ ? |
| न; विज्ञानानपेक्षत्वात् । यद्ध्य- | सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि उसे विज्ञान (ज्ञात होने) की अपेक्षा नहीं है । |
| [ब्रह्मणः स्वीय प्रकाशने अन्यानपेक्षत्वम्] विदितं तद्विज्ञानापेक्षम् । अविदितविज्ञानाय हि लोकप्रवृत्तिः । इदं तु | जो वस्तु अज्ञात होती है उसके विज्ञानकी अपेक्षा हुआ करती है । अज्ञात वस्तुको जाननेके लिये ही सम्पूर्ण लोकोंकी प्रवृत्ति है, किन्तु ब्रह्मको |
| विज्ञानानपेक्षं । कस्मात् ? विज्ञानस्वरूपत्वात् । न हि यस्य यत्स्वरूपं | अपने विज्ञानकी अपेक्षा नहीं है; क्यों ? क्योंकि वह विज्ञानस्वरूप ही है । जिसका जो स्वरूप होता है वह |
| तत्त्वेनान्यतोऽपेक्ष्यते । न च स्वत एवापेक्षा अनपेक्षमेव सिद्धत्वात् । प्रदीपः स्वरूपाभिव्यक्तौ | उसीकी दूसरेसे अपेक्षा नहीं रखता और अपनेसे तो अपेक्षा हुआ ही नहीं करती, क्योंकि अपना-आप तो सिद्ध (प्राप्त) होनेके कारण अपेक्षासे रहित ही है । दीपक अपने स्वरूपकी |
| न प्रकाशान्तरमन्यतोऽपेक्षते स्वतो वा । यद्ध्यनपेक्षं तत्स्वत एव सिद्धम् प्रकाशात्मकत्वात् | अभिव्यक्तिके लिये अपनेसे अथवा किसी अन्यसे प्रकाशान्तरकी अपेक्षा नहीं रखता । इस प्रकार जो अपेक्षा नहीं रखता वह स्वतः सिद्ध ही है । दीपक प्रकाशस्वरूप ही है; अतः अपने स्वरूपकी अभिव्यक्तिके लिये |
| प्रदीपस्यापेक्षितोऽप्यनर्थकः स्यात्, | यदि वह प्रकाशान्तरकी अपेक्षा करे |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
पद-भाष्य
लक्षणाद्व्याकृतबीजात्, अधि | अव्याकृतसे भी 'अधि' है।"'अधि' का
इति उपर्येर्थे, लक्षणया अन्यद् | अर्थ ऊपर होता है; परन्तु लक्षणासे
इत्यर्थः । यद्धि यस्मादधि उपरि | इसका अर्थ 'अन्य' करना चाहिये, क्योंकि जो वस्तु जिससे अधि—
भवति, तत्तस्मादन्यदिति | ऊपर होती है वह उससे अन्य हुआ
प्रसिद्धम् । | करती है—यह प्रसिद्ध ही है ।
वाक्य-भाष्य
प्रकाशे विशेषाभावात् । न हि | तो व्यर्थ ही होगा, क्योंकि प्रकाशमें
प्रदीपस्य स्वरूपाभिव्यक्तौ प्रदोप- | कोई विशेषता नहीं हुआ करती। एक दीपकके स्वरूपकी अभिव्यक्तिमें किसी
प्रकाशोऽर्थवान् । न चैवमात्म- | अन्य दीपकका प्रकाश सार्थक नहीं
नोऽन्यत्र विज्ञानमस्ति येन | होता। इसी प्रकार आत्मासे भिन्न ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जो उसके
स्वरूपविज्ञानेऽप्यपेक्ष्येत । | स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपेक्षित हो ।
विरोध इति चेन्नान्यत्वात् । | यदि कहो कि इससे विरोध प्रतीत
स्वरूपविज्ञाने विज्ञानस्वरूपत्वाद् | होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [ आत्मा ] इससे भिन्न है ।
विज्ञानान्तरं नापेक्षत इत्येतदसत् । | पूर्व०-तुमने जो कहा कि आत्मा विज्ञानस्वरूप है, इसलिये उसके
दृश्यते हि विपरीतज्ञानमात्मनि | स्वरूपको जाननेमें किसी अन्य विज्ञान-
सम्यग्ज्ञानं च । न जानाम्यात्मा- | की अपेक्षा नहीं है—सो ठीक नहीं, क्योंकि आत्मामें भी विपरीत ज्ञान
नमिति । श्रुतेश्च “तत्त्वमसि” | और सम्यक् ज्ञान होता देखा ही जाता
(छा० उ० ६।८-१६) "आत्मा- | है; जैसा कि "मैं आत्माको नहीं जानता" इत्यादि कथनसे तथा "तू वह
नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) | (ब्रह्म) है" "आत्माको ही जाना"
३८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
यद्विदितं तदल्पं मर्त्यं दुःखा- | जो वस्तु विदित होती है वह
[ब्रह्मण] त्मकं चेति हेयम् । | अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती
[आत्मभिन्नत्व-] तस्माद्विदितादन्यद्ब्रह्म | है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है ।
[प्रतिपादनम्] इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं | ब्रह्म उस विदित वस्तुसे भिन्न है—
स्यात् । तथा अविदितादधि | ऐसा कहनेसे उसका अहेयत्व
इत्युक्तेऽनुपादेयत्वमुक्तं स्यात् । | बतलाया गया । तथा ‘वह अविदित-
| से भी ऊपर है' ऐसा कहनेपर उसका
| अनुपादेयत्व प्रतिपादन किया गया ।
वाक्य-भाष्य
“एतं वै तमात्मानं विदित्वा” | “उस इस आत्माको निश्चयपूर्वक जान-
(बृ० उ० ३ । ५ । १) इति च । | कर” आदि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञा- | श्रुतियोंमें आत्माके ज्ञानके लिये सर्वत्र
नान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् | ही विज्ञानान्तरकी अपेक्षा देखी जाती
प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् । | है । इसलिये [ उपर्युक्त कथनका ]
न; कस्मात् ? अन्यो हि स | प्रत्यक्ष ही श्रुतिसे विरोध है ।
आत्मा बुद्ध्यादिकार्यकरणसङ्घा- | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं ।
ताभिमानसन्तानाविच्छेद लक्षणो- | क्यों ? क्योंकि बुद्धि आदि कार्य और
ऽविवेकात्मको बुद्धयवभासप्रधानः | करणके संघातमें जो अभिमान है उसकी
चक्षुरादिकरणो नित्यचित्स्वरू- | परम्पराका विच्छेद न होना ही जिसका
पात्मान्तःसारो यत्रानित्यं विज्ञानम् | लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही
अवभासते । बौद्धप्रत्ययानाम् आ- | जिसका आन्तरिक सार है और जिसमें
विर्भावतिरोभावधर्मकत्वात्तद्धर्म- | अनित्य विज्ञानका अवभास हुआ
तयैव विलक्षणमपि चावभासते । | करता है यह अविवेकात्मक, चिदाभास-
| प्रधान तथा चक्षु आदि करणोंवाला
| आत्मा ( जीवात्मा ) [ शुद्ध चेतनसे ]
| भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियोंका
| आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है;
| अतः अपने उस धर्मके कारण वह उस-
| से पृथक् दिखलायी भी देता है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
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पद-भाष्य
कार्यार्थं हि कारणमन्यदन्येन | किसी कार्यके लिये ही किसी अन्य
उपादीयते । अतश्च न वेदितुः | पुरुषद्वारा एक अन्य कारण यानी साधनको ग्रहण किया जाता है; अतः
अन्यस्मै प्रयोजनायान्यदुपादेयं | वेत्ता (आत्मा) को किसी अन्य प्रयोजनके लिये कोई अन्य साधन
भवतीति । एवं विदिताविदिता- | उपादेय नहीं है । इस प्रकार वह विदित और अविदित दोनोंसे भिन्न
भ्यामन्यदिति हेयोपादेय- | है—इस कथनद्वारा हेय और उपादेयका प्रतिषेध कर दिया जाने-
प्रतिषेधेन स्वात्मनोऽनन्यत्वाद् | से [ ज्ञेय वस्तु ] अपने आत्मासे अभिन्न सिद्ध होनेके कारण शिष्यकी
ब्रह्मविषया जिज्ञासा शिष्यस्य | ब्रह्मविषयक जिज्ञासा पूर्ण हो जाती
वाक्य-भाष्य
अन्तःकरणस्य मनसोऽपि | [ किन्तु वह शुद्ध चेतन तो ]
मनोऽन्तर्गतत्वात्सर्वान्तरश्रुतेः । | 'आत्मा सर्वान्तर है' ऐसा बतलाने-वाली श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण
अन्तर्गतेन नित्यविज्ञानस्वरूपेण | यानी मनका भी मन है। उस अन्तर्गत,
आकाशवदप्रचलितात्मनान्तर्गर्भ- | नित्यविज्ञानस्वरूप, आकाशके समान
भूतेन बाह्यो बुद्ध्यात्मा तद्विलक्षणः | अविचल और अन्तर्गर्भभूत चिदात्मासे बाह्य और विलक्षण अनित्य विज्ञानवान्
अर्चिर्भिरिवाग्निः प्रत्ययैरावि- | विज्ञानात्मा ही, आविर्भाव-तिरोभाव
र्भावतिरोभावधर्मकैर्विज्ञानाभास- | धर्मवाले विज्ञानाभासरूप अनित्य
रूपैरनित्यविज्ञान आत्मा सुखी | प्रत्ययोंके कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा आत्मा सुखी-दुःखी है—ऐसा माना
दुःखीत्यभ्युपगतो लौकिकैः । | जाता है, जैसे ज्वालाओंके कारण अग्नि ।
अतोऽन्यो नित्यविज्ञानस्वरूपादा- | अतः यह नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मा-
त्मनः। तत्र हि विज्ञानापेक्षा विप- | से भिन्न है । उसीमें विज्ञानकी अपेक्षा
रीतज्ञानत्वं चोपपद्यते न पुन- | तथा विपरीत ज्ञानत्वकी सम्भावना है—
र्नित्यविज्ञाने । | नित्यविज्ञानस्वरूप चिदात्मामें नहीं ।
४० केनोपनिषद् [ खण्ड १
४० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
निर्वर्तिता स्यात् । न ह्यन्यस्य | है, क्योंकि अपने आत्मासे भिन्न
स्वात्मनो विदिताविदिताभ्याम् | किसी और वस्तुका विदित और
अन्यत्वं वस्तुनः सम्भवतीत्यात्मा | अविदित दोनोंसे भिन्न होना सम्भव
ब्रह्मेत्येष वाक्यार्थः; “अयमात्मा | नहीं है । अतः आत्मा ही ब्रह्म
ब्रह्म” (माण्डू० २) “य आत्मा- | है—यह इस वाक्यका अर्थ है ।
पहतपाप्मा,” (छा० उ० ८।७।१) | यही बात “यह आत्मा ब्रह्म है”
| “जो आत्मा पापसे रहित है”
वाक्य-भाष्य
तत्त्वमसीति बोधोपदेशो न | पूर्व०—[ ऐसा माननेसे तो ]
उपपद्यत इति चेत् । “आत्मानमे- | “तत्त्वमसि” ( यह ब्रह्म तू है) यह
वावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) | उपदेश भी नहीं बन सकता और न
इत्येवमादीनि च नित्यबोधात्म- | “अपने आत्माको ही जाना [ कि मैं
कत्वात् । न ह्यादित्योऽन्येन | ब्रह्म हूँ ]” इत्यादि वाक्य ही सार्थक
प्रकाश्यतेऽतस्तदर्थबोधोपदेशः | हो सकते हैं—क्योंकि ब्रह्म तो नित्य-
अनर्थक इति चेत् । | बोधस्वरूप है । सूर्य दूसरेसे प्रकाशित
| कभी नहीं हो सकता । इसलिये
| आत्माके विषयमें ज्ञानका उपदेश
| करना व्यर्थ ही होगा ।
न; लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
बोधोपदेशस्य सर्वात्मनि हि नित्य- | वह उपदेश लोगोंद्वारा किये हुए
अध्यास- विज्ञाने बुद्ध्याद्यनित्य- | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये है ।
निरासार्थत्वम् धर्मा लोकैरध्या- | लोगोंने आत्मतत्त्वके अज्ञानवश उस
रोपिता आत्माविवेकतस्तदपो- | नित्यविज्ञानस्वरूप सर्वात्मापर बुद्धि
हार्था बोधोपदेशो बोधात्मनः । | आदि अनित्य धर्मोंका आरोप किया
तत्र च बोधाबोधौ समञ्जसौ, | हुआ है । उसकी निवृत्तिके लिये ही
| उस ज्ञानस्वरूपके ज्ञानका उपदेश
| किया जाता है ।
| तथा उस बोधस्वरूपमें बोध और
| अबोध समीचीन भी हैं, क्योंकि जैसे
अन्यनिमित्तत्वादुदक इवौष्ण्यम् | अग्निके कारण जलमें उष्णता रहती है
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
पद-भाष्य
“यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० | “जो साक्षात् अपरोक्षरूपसे ब्रह्म ही
उ० ३।४।१) “य आत्मा | है” “जो आत्मा सर्वान्तर है” इत्यादि
सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३।४।१) | अन्य श्रुतियोंसे भी प्रमाणित
इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यश्चेति । | होती है ।
वाक्य-भाष्य
अह्निमित्तम्, रात्रयहनी इवादित्य- | तथा सूर्यके कारण दिन और रात
निमित्ते। लोके नित्याचौष्ण्य- | हुआ करते हैं, वैसे ही उनका कारण
| भी अन्य (आरोपित धर्म) ही
प्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावा- | है। उष्णता और प्रकाश-ये अग्नि
| और सूर्यके तो नित्य-धर्म हैं, किन्तु
भावयोर्निमित्तत्वाद नित्याविव | लोकमें अन्यत्र अपने भाव और
| अभावके कारण वे अनित्यवत् उपचरित
उपचर्येते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाश- | होते हैं; जैसे- 'अग्नि जला देगा',
यिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं | 'सूर्य प्रकाशित करेगा' इत्यादि
| वाक्योंमें; वैसे ही [आत्माके विषयमें
च सुखदुःखबन्धमोक्षाद्यध्यारोपो | समझना चाहिये]। इस प्रकार लोकका
| जो सुख-दुःख एवं बन्ध-मोक्षरूप
लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मा- | अध्यारोप है उसकी अपेक्षासे ही
| 'तत्त्वमसि' 'आत्मानमेवावेत्' इत्यादि
नमेवावेदित्यात्मावबोधोपदेशेन | श्रुतियाँ आत्मज्ञानके उपदेशसे केवल
श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः। | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये ही हैं।
यथा सवितासौ प्रकाशयति | जिस प्रकार 'यह सूर्य अपने-आपको
| प्रकाशित करता है' [ इस वाक्यसे
आत्मानम् इति | प्रकाशस्वरूप सूर्यमें प्रकाशकर्तृत्वका
ब्रह्मणो विदिता- | तद्वत्, बोधाबोध- | उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार
विदिताभ्या- | कर्तृत्वं च नित्य- | नित्यबोधस्वरूप आत्मामें भी ज्ञान
मन्यत्वम् | बोधात्मनि।तस्मात्- | और अज्ञानका कर्तृत्व माना गया है।
| इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से
अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च | भी अन्य है। यहाँ 'अधि' शब्द 'अन्य'
अन्यार्थे । यद्वा यदि यस्याधि | अर्थमें है। अथवा जो जिससे अधि
४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
पद-भाष्य
एवं सर्वात्मनः सर्वविशेष- | इस प्रकार सर्वात्मा सर्वविशेष-
रहितस्य चिन्मात्रज्योतिषो | रहित चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप वस्तुका
ब्रह्मत्वप्रतिपादकस्य वाक्यार्थस्य | ब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्यार्थ--
वाक्य-भाष्य
तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि | (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही
हुआ करता है, क्योंकि उस शब्दकी
भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव | शक्तिसे यही बोध होता है; जिस प्रकार
सेवक आदिसे ऊपर राजा । १ अव्यक्त
अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः । | ही अविदित है, उससे यह आत्मा
पृथक् है—यही इसका तात्पर्य है ।
विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्ते | विदित और अविदित यानी
व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य
कार्यकारणत्वेन विकल्पिते | तथा कारणभावसे माने गये हैं उनसे
भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणोंसे
ताभ्यामन्यद्ब्रह्म विज्ञानस्वरूपं | रहित विज्ञानस्वरूप है—यह इस समस्त
सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं | वाक्यसमुदायका तात्पर्य है । अतः
आत्मस्वरूप होनेके कारण यह त्याज्य
समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न | या ग्राह्य भी नहीं है । अन्य वस्तु ही
किसी अन्यकी त्याज्य या ग्राह्य हुआ
हेय उपादेयो वा । अन्यद्ध्यन्येन | करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई
हेयमुपादेयं वा । न तेनैव | भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती ।
आत्मा ही ब्रह्म है और सबका
तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा | अन्तर्यामी होनेसे वह किसी इन्द्रियका
विषय भी नहीं है । इसलिये यह किसी
भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्त- | अन्यका भी हेय या उपादेय नहीं है ।
रात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापिन | इसके सिवा आत्मासे भिन्न कोई और
वस्तु न होनेके कारण भी [वह
हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच्च । | हेयोपादेयरहित है]।
१. जिस प्रकार सेवकोंके ऊपर होनेके कारण राजा उनसे भिन्न है उसी प्रकार
अविदितसे ऊपर होनेके कारण आत्मा उससे भिन्न है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
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पद-भाष्य
आचार्योपदेशपरम्परया प्राप्त- | का ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ इत्यादि
त्वमाह—इति शुश्रुमेत्यादि । | वाक्यद्वारा आचार्योंके उपदेशकी
ब्रह्म च एवमाचार्योपदेशपरम्परया | परम्परासे प्राप्त होना दिखलाया गया
एवाधिगन्तव्यं न तर्कतः प्रवचन- | है। इस प्रकार वह ब्रह्म आचार्योंकी
मेधाबहुश्रुततपोयज्ञादिभ्यश्च, इति | उपदेश-परम्परासे ही ज्ञातव्य है,
एवं शुश्रुम श्रुतवन्तो वयं पूर्वे- | तर्कसे अथवा प्रवचन, मेधा, बहुश्रुत,
षाम् आचार्याणां वचनम्; ये | तप एवं यज्ञादिसे नहीं—ऐसा हमने
आचार्याः नः अस्मभ्यं तद् ब्रह्म | पूर्ववर्ती आचार्योंका वचन सुना है।
व्याचचक्षिरे व्याख्यातवन्तः | जिन आचार्योंने हमारे प्रति उस
| ब्रह्मका व्याख्यान—स्पष्ट कथन
वाक्य-भाष्य
इति शुश्रुम पूर्वेषामित्यागमो- | ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ (यह हमने
[हाशिये में: यथोक्तस्य आत्म-] पदेशः । व्याचच- | पूर्व आचार्योंके मुँहसे सुना है) ऐसा
[हाशिये में: प्रामाणिकत्वम्] क्षिरे इत्यस्वातन्त्र्यं | कहकर यह दिखलाते हैं कि यह
तर्कप्रतिषेधार्थम् । ये | [परम्परागत] शास्त्रका उपदेश है।
| हमसे [शास्त्रीय मतका] व्याख्यान
नस्तद्ब्रह्मोक्तवन्तस्ते नित्यमेवागमं | किया था [यह उनकी स्वतन्त्र कल्पना
| नहीं है] ऐसा कहकर जो उन
ब्रह्मप्रतिपादकं व्याख्यातवन्तो | आचार्योंकी परतन्त्रता दिखलायी
| है यह तर्कका प्रतिषेध करनेके लिये है;
न पुनः स्वबुद्धिप्रभवेण तर्केण | जिन्होंने हमसे उस ब्रह्मका वर्णन किया
| था। अर्थात् उन्होंने ब्रह्म का प्रति-
उक्तवन्त इत्यागमपारम्पर्या- | पादन करनेवाले नित्य आगमका ही
| व्याख्यान करके बतलाया था अपनी
विच्छेदं दर्शयति विद्यास्तुतये । | बुद्धिसे ही प्रकट हुए तर्कद्वारा नहीं
| कहा। इस प्रकार ज्ञानकी स्तुतिके
तर्कस्त्वनवस्थितो भ्रान्तोऽपि | लिये शास्त्रपरम्पराका अविच्छेद
| दिखलाया है, क्योंकि तर्क तो
भवतीति ॥ ३ ॥ | अनवस्थित और भ्रमपूर्ण भी
| होता है ॥ ३ ॥
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४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
विस्पष्टं कथितवन्तः, तेषाम् | किया था, उन्हींके [वचनसे हमें उसे जानना चाहिये] यह इसका तात्पर्य
इत्यर्थः ॥३॥ | है ॥ ३ ॥
'अन्यदेव तद्विदितादथो | 'वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है' इस वाक्य-
अविदितादधि' इत्यनेन वाक्येन | द्वारा आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसा
आत्मा ब्रह्मेति प्रतिपादिते | प्रतिपादन किये जानेपर श्रोताको
श्रोतुराशङ्का जाता-कथंन्वात्मा | यह शंका हुई—आत्मा किस
ब्रह्म । आत्मा हि नामाधिकृतः | प्रकार ब्रह्म है ? आत्मा तो कर्म
कर्मण्युपासने च संसारी कर्मो- | और उपासनामें अधिकृत संसारी
पासनं वा साधनमनुष्ठाय ब्रह्मादि- | जीवको कहते हैं, जो कर्म या
देवान्स्वर्गं वा प्राप्तुमिच्छति । | उपासनारूप साधनका अनुष्ठान कर
तत्तस्मादन्य उपास्यो विष्णु- | ब्रह्मा आदि देवताओं अथवा स्वर्गको
रीश्वर इन्द्रः प्राणो वा ब्रह्म | प्राप्त करना चाहता है । अतः
भवितुमर्हति, न त्वात्मा; लोक- | उससे भिन्न उसका उपास्य विष्णु,
प्रत्ययविरोधात् । यथान्ये | ईश्वर, इन्द्र अथवा प्राण ही ब्रह्म
तार्किका ईश्वरादन्य आत्मा | होना चाहिये—आत्मा नहीं,
इत्याचक्षते, तथा कर्मिणोऽमुं | क्योंकि यह बात लोक-विश्वासके
यजामुं यजेत्यन्या एव देवता | विरुद्ध है । जिस प्रकार अन्य
उपासते । तस्माद्युक्तं यद्विदित- | तार्किक लोग आत्माको ईश्वरसे
मुपास्यं तद्ब्रह्म भवेत्, ततोऽन्य | भिन्न बतलाते हैं उसी प्रकार कर्म-
उपासक इति । तामेतामाशङ्कां | काण्डी भी 'इसका यजन करो—
शिष्यलिङ्गेनोपलक्ष्य तद्वाक्याद्वा | इसका यजन करो' इस प्रकार अन्य
आह-मैवं शङ्किष्ठाः, | देवताकी ही उपासना करते हैं । अतः उचित यही है कि जो उपास्य विदित है वह ब्रह्म हो और उससे भिन्न उसका उपासक.हो । शिष्यके व्याज अथवा उसके वाक्यसे उसकी इस आशंकाको उपलक्षित कर कहते हैं—ऐसी शंका मत करो,
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥
जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती
है उसीको तू ब्रह्म जान, जिस इस [ देशकालावनिच्छन्न वस्तु ] की लोक
उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
यत् चैतन्यमात्रसत्ताकम्, | जो चैतन्यसत्तास्वरूप ब्रह्म वाणी-
वाचा वागिति जिह्वामूलादिष्वष्टसु | से [अप्रकाशित है]—जिह्वामूल आदि
स्थानेषु विवक्तमाग्रेयं वर्णानाम् | आठ स्थानोंमें* आश्रित तथा अग्नि-
अभिव्यञ्जकं करणम्, वर्णाश्चार्थ- | देवतासे अधिष्ठित वर्णोंको अभिव्यक्त
सङ्केतपरिच्छिन्ना एतावन्त एवं | करनेवाली इन्द्रिय एवं अर्थ-संकेतसे
क्रमप्रयुक्ता इति; एवं तद्- | परिच्छिन्न और इतने तथा इस
| क्रमसे† प्रयुक्त होनेवाले हैं, ऐसे
वाक्य-भाष्य
यद्वाचा इति मन्त्रानुवादो | 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्रोंका उल्लेख
दृढप्रतीतेः । अन्यदेव तद्वि- | आत्मतत्त्वकी दृढप्रतीतिका लिये किया
दितादिति योऽयमागमार्थो | गया है । 'यह विदितसे भिन्न है' ऐसा
ब्राह्मणोक्तोऽस्यैव द्रढिम्ने मन्त्रा | जो शास्त्रका तात्पर्य इस ब्राह्मण-ग्रन्थने
यद्वाचेत्यादयः पठ्यन्ते । | ऊपर कहा है उसकी पुष्टिके लिये ही
| ये 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं।
- जिह्वामूल, हृदय, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, नासिका, ओष्ठ और तालु ।
† यह मीमांसकोंका मत है, जैसे 'गौः' यह पद गकार, औकार तथा विसर्ग—
इस क्रमविशेषसे अवच्छिन्न वर्णरूप ही है ।
. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
भिद्यङ्गचः शब्दः पदं वागिति | नियमवाले वर्ण 'वाक्' कहे जाते
उच्यते; "अकारो वै सर्वा वाक्सैषा | हैं। तथा उनसे अभिव्यक्त होनेवाला
स्पर्शान्तस्थोष्मभिर्व्यज्यमाना | शब्द भी 'पद' या 'वाक्' कहा
जाता है । श्रुति कहती है—
बह्वी नानारूपा भवति" | "अकार* ही सम्पूर्ण वाक् है, और
(ऐ० आ० २।३।७।१३) इति | यह वाक् ही अपने स्पर्श¹ अन्तस्थ² और
उष्म³ आदि भेदोंसे अभिव्यक्त होकर
श्रुतेः । मितममितं स्वरः | अनेक रूपवाली हो जाती है।"
इस प्रकार मितं⁴ अमितं⁵ स्वरं⁶ एवं
सत्यानृते एष विकारो यस्यास्तया | सत्य और मिथ्या—ये जिसके विकार
वाक्य-भाष्य
यद्ब्रह्म वाचा शब्देनानभ्युदितम् | जो ब्रह्म वाणीसे अर्थात् शब्दसे
अनभ्युदित—अनुक्त अर्थात् अप्रकाशित
अनभ्युक्तमप्रकाशितमित्येतत्, | है। और जिससे वाणी अभ्युदित होती
है—ऐसा कहकर उसे वाणीके प्रकाश-
येन वागभ्युद्यत इति वाक्प्रकाश- | का हेतु बतलाया है। 'जिससे वाणी
प्रकाशित होती है' ऐसा कहकर
हेतुत्वोक्तिः। येन प्रकाश्यत इति | वाणीके अभिधान (उच्चारण) के
अभिधेय (वाच्य) को प्रकाशित
वाचोऽभिधानस्याभिधेयप्रकाश- | करनेमें ब्रह्मको हेतु बतलाया है [अर्थात्
यह दिखलाया है कि वाणीमें जो
कत्वस्य हेतुत्वमुच्यते ब्रह्मणः । | अर्थको अभिव्यञ्जित करनेका सामर्थ्य
है वह ब्रह्मका ही है ] ।
- अकार प्रधान ॐकारसे उपलक्षित स्फोट नामक चिच्छक्ति।
१. क से म तक सभी वर्ग। २. य र ल व । ३. श ष स ह । ४. जिनके पादका
अन्त नियत अक्षरोंवाला है उन वाक्योंको मित (ऋग्वेद) कहते हैं। ५. जिनके पादका
अन्त नियत अक्षरोंवाला नहीं है उन वाक्योंको अमित (यजुर्वेद) कहते हैं। ६. गायन-
प्रधान सामवेद 'स्वर' कहलाता है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
पद-भाष्य
वाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया | हैं उस पदरूपसे परिच्छिन्न एवं
करणगुणवत्या—अनभ्युदितम् | वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणीसे
अप्रकाशितमनभ्युक्तम् । | जो अनभ्युदित—अप्रकाशित
| अर्थात् नहीं कहा गया है—
येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थे | बल्कि जिस ब्रह्मके द्वारा
सकरणा वाक् अभ्युद्यते चैतन्य- | वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित
ज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत | अर्थमें बोली जाती अर्थात् अपने
इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, | चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपसे प्रकाशित
“वदन्वाक्” (बृ० उ० १ । | यानी प्रयुक्त की जाती है, जो
४।७) “यो वाचमन्तरो यम- | 'वाणीकी वाणी है' इस प्रकार
यति” (बृ० उ० ३ । ७ । १७) | बतलाया गया है [जिसके विषयमें]
इत्यादि च वाजसनेयके । “या | बृहदारण्यकोपनिषद्में “बोलनेके
वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता | कारण वाणी है” “जो भीतरसे वाणी-
| का नियमन करताहै” इत्यादि कहा
| है, तथा “चेतन प्राणियोंमें जो वाणी
| (वाक्शक्ति) है वह घोषों (वर्णों) में
वाक्य-भाष्य
उक्तं च केनेषितां वाचमिमां | ऊपर 'लोग किसकी प्रेरणासे इस
वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । | वाणीको बोलते हैं' इस प्रश्नके उत्तरमें
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्यविषयत्वेन | 'जो वाणीका वाणी है' इत्यादि कहा
ग्रहणं आत्मन्यवस्थापनार्थं | भी जा चुका है। 'तू उसीको ब्रह्म
आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं | जान' यह आगम ब्रह्मको अविषय-
वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्म- | रूपसे बुद्धिमें बिठानेके लिये है ।
णोऽविषयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां | 'जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि
| वाणीके प्रकाशित होनेका हेतु है'
| इस कथनसे ब्रह्मका अविषयत्व
| सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुषको
| अन्य वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छासे
कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही
प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् | जानता है" इस प्रकार प्रश्न उठा-
"सा वाग्यया स्वप्ने भाषते" इति। | कर यह उत्तर दिया है कि "जिसके
सा हि वक्तुर्वक्तिर्नित्या वाक् | द्वारा जीव स्वप्नमें बोलता है वह
चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, "न हि | वाक् है" वक्ताकी वह नित्य वाचन-
वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते" | शक्तिही चैतन्य-ज्योतिःस्वरूप वाक्
(बृ० उ० ४ । ३ । २६) इति | है जैसा कि "वक्ताकी वाचन-
श्रुतेः। | शक्तिका लोप कभी नहीं होता"
| इस श्रुतिसे सिद्ध होता है।
तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म | उस आत्मस्वरूपको ही तू बृहत्
निरतिशयं भूमाख्यं बृहत्त्वाद् | होनेके कारण 'ब्रह्म' यानी भूमा-
ब्रह्मेति विद्धि विजानीहि त्वम् । | संज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान। जिन वाक्
यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् | आदि उपाधियोंके कारण, वाणीका
चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो | वाणी, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र,
मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता | मनका मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता,
नियन्ता प्रशासिता विज्ञान- | नियन्ता, शासनकर्ता, तथा ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः | विज्ञान और आनन्दस्वरूप है—
संव्यवहारा असंव्यवहारे नि- | इत्यादि प्रकारके व्यवहार उस
र्विशेषे परे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, | अव्यवहार्य निर्विशेष सर्वोत्कृष्ट
| समस्वरूप ब्रह्ममें प्रवृत्त होते हैं,
वाक्य-भाष्य
निवर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापयति | निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूपमें ही
| जोड़ता है और 'उसीको तू ब्रह्म जान'
आज्ञायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति | इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्नसे
| उपरत करता है तथा 'नेदं यदिद-
यत्नत उपरमयति । नेदमित्युपा- | मुपासते' इस कथनसे भी ब्रह्मका
| उपास्यत्व निषेध करनेके कारण
स्यप्रतिषेधाच्च ॥ ४॥ | [वह अन्य सब ओरसे उसे निवृत्त
| करता है] ॥ ४॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
पद-भाष्य
तान्युदस्य आत्मानमेव नि- | उन सब उपाधियोंका बाधकर अपने
र्विशेषं ब्रह्म विद्धीति एवशब्दार्थः। | निर्विशेष आत्माको ही ब्रह्म जान—
नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेद- | यही 'एव' शब्दका अर्थ है । जिस
विशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते | इस उपाधिविशिष्ट अनात्मा ईश्वरादि-
ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि | की उपासना—ध्यान करते हैं यह
इत्युक्तेऽपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्म- | ब्रह्म नहीं है । 'उसीको तू ब्रह्म
| जान' इतना कह देनेपर भी
| [ अनात्मवस्तुमें ब्रह्मभावनाका
| निषेध हो ही जाता ] पुन: 'यह
नोऽब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् | ब्रह्म नहीं है' इस वाक्यके द्वारा
| जो अनात्माका अब्रह्मत्व प्रतिपादन
अन्यब्रह्मबुद्धिपरिसंख्यानार्थं | किया है वह आत्मामें ही ब्रह्म-
| बुद्धिका नियमन करनेके लिये अथवा
| अन्य उपास्य देवताओंमें ब्रह्म-बुद्धि-
वा ॥४॥ | की निवृत्ति करनेके लिये है ॥४॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया
हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान। जिस इस [देश-कालावच्छिन्न
वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥