केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
ओंहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
मन्त्रप्रतीकानि \t खं० \t सं० \t पृ०
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतत् \t ... \t ३ \t ७ \t ११२
अथाध्यात्मं यदेतत् \t ... \t ४ \t ५ \t १२३
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन् \t ... \t ३ \t ११ \t ११४
इह चेदवेदीदथ \t ... \t २ \t ५ \t ८४
उपनिषदं भो ब्रूहि \t ... \t ४ \t ७ \t १२८
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः \t ... \t १ \t १ \t १४
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् \t ... \t ३ \t ४ \t १०९
” \t ... \t ३ \t ८ \t ११२
तद्व तद्वनं नाम \t ... \t ४ \t ६ \t १२६
त ऐक्षन्तास्माकमेवायम् \t ... \t ३ \t २ \t १०५
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितराम् \t ... \t ४ \t ३ \t ११९
तस्माद्वा एते देवाः \t ... \t ४ \t २ \t ११८
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यम् \t ... \t ३ \t ५ \t ११०
” \t ... \t ३ \t ९ \t ११२
तस्मै तृणं निदधौ \t ... \t ३ \t ६ \t १११
” \t ... \t ३ \t १० \t ११२
तस्यै तपो दमः कर्मेति \t ... \t ४ \t ८ \t १३३
तस्यैष आदेशो यदेतत् \t ... \t ४ \t ४ \t १२०
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः \t ... \t ३ \t ३ \t १०९
न तत्र चक्षुर्गच्छति \t ... \t १ \t ३ \t ३१
नाहं मन्ये सुवेदेति \t ... \t २ \t २ \t ६३
प्रतिबोधविदितम् \t ... \t २ \t ४ \t ७३
ब्रह्म ह देवेभ्यः \t ... \t ३ \t १ \t १०४
यच्चक्षुषा न पश्यति \t ... \t १ \t ६ \t ५१
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति \t ... \t १ \t ७ \t ५२
यत्प्राणेन न प्राणिति \t ... \t १ \t ८ \t ५२
यदि मन्यसे सुवेदेति \t ... \t २ \t १ \t ५६
यद्वाचानभ्युदितं येन \t ... \t १ \t ४ \t ४५
यन्मनसा न मनुते \t ... \t १ \t ५ \t ४९
यस्यामतं तस्य मतम् \t ... \t २ \t ३ \t ६८
यो वा एतामेवम् \t ... \t ४ \t ९ \t १३७
श्रोत्रस्य श्रोत्रम् \t ... \t १ \t २ \t २०
स तस्मिन्नेवाकाशे \t ... \t ३ \t १२ \t ११५
सा ब्रह्मेति होवाच \t ... \t ४ \t १ \t ११७
कल्याणके पुनर्मुद्रित विशेषाङ्क
कल्याण वर्ष | सन् | नाम
८ | १९३४ | शिवाङ्क
९ | १९३५ | शक्ति-अङ्क
१० | १९३६ | योगाङ्क
१२ | १९३८ | संत-अङ्क
१५ | १९४१ | साधनाङ्क
१९ | १९४५ | सं० पद्मपुराणाङ्क
२१ | १९४७ | सं० मार्कण्डेय-ब्रह्मपुराणाङ्क
२२ | १९४८ | नारी-अङ्क
२४ | १९५० | हिन्दू-संस्कृति-अङ्क
२५ | १९५१ | सं० स्कन्दपुराणाङ्क
२६ | १९५२ | भक्त-चरिताङ्क
२७ | १९५३ | बालक-अङ्क
२८ | १९५४ | सं० नारद-विष्णुपुराणाङ्क
३० | १९५६ | सत्कथा-अङ्क
३१ | १९५७ | तीर्थाङ्क
३४ | १९६० | सं० श्रीमद्देवीभागवताङ्क
३५ | १९६१ | सं० योगवासिष्ठाङ्क
३६ | १९६२ | सं० शिवपुराण
३७ | १९६३ | सं० ब्रह्मवैवर्तपुराणाङ्क
३९ | १९६५ | श्रीभगवन्नाम महिमा
| | और प्रार्थना-अङ्क
४३ | १९६९ | परलोक और पुनर्जन्माङ्क
४४-४५ | १९७०-७१ | गर्गसंहिता
४९ | १९७५ | श्रीहनुमान-अङ्क
६७ | १९९३ | शिवोपासनाङ्क
॥ श्रीहरिः ॥
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॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे
प्रकाशित
उपनिषद्
ईशादि नौ उपनिषद् अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित
बृहदारण्यकोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
छान्दोग्योपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
ईशावास्योपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
केनोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
कठोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
माण्डूक्योपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
मुण्डकोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
प्रश्नोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
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श्वेताश्वतरोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित