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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished152 pages

About this granth

The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.

This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.

The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

ग्रन्थावगाहनका फल
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके
ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥
जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद्‌को इस प्रकार जानता है वह
पापको क्षीण करके अनन्त और महान् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है,
प्रतिष्ठित होता है ॥ ९ ॥
पद-भाष्य
यो वै एतां ब्रह्मविद्याम् | 'केनेषितम्' इत्यादि वाक्यद्वारा
'केनेषितम्' इत्यादिना यथो- | कही हुई तथा 'ब्रह्म ह देवेभ्यः'
क्ताम् एवं महाभागाम् 'ब्रह्म ह | आदि आख्यायिकाद्वारा स्तुत इस
देवेभ्यः' इत्यादिना स्तुतां सर्व- | महाभागा और सम्पूर्ण विद्याओंकी
विद्याप्रतिष्ठां वेद 'अमृतत्वं | आश्रयभूता ब्रह्मविद्याको जो पुरुष
हि विन्दते' इत्युक्तमपि ब्रह्म- | जानता है वह पापको छोड़कर
विद्याफलमन्ते निगमयति— | अर्थात् अविद्या, कामना और
| कर्मरूप संसारके बीजको त्यागकर
| अनन्त—जिसका कोई पार नहीं
| है उस स्वर्गलोकमें अर्थात् सुखरूप
वाक्य-भाष्य
तामेतां तपआद्यङ्गां तत्प्रतिष्ठां | तप आदि अंगोंवाली और उन्हींपर
ब्राह्मीमुपनिषदं सायतनामात्म- | प्रतिष्ठित इस ब्राह्मी उपनिषद्को, जो
ज्ञानहेतुभूतामेवं यथावद्यो वेद. | कि आत्मज्ञानकी हेतुभूत है, जो उसके
अनुवर्ततेऽनुतिष्ठति; तस्यैतत्फलम् | आयतनके सहित इस प्रकार यथायत्
आह—अपहत्य पाप्मानम् अप- | जानता है—जो उसका अनुवर्तन
क्षीय धर्माधर्मावित्यर्थः अन- | यानी अनुष्ठान करता है उसके लिये
न्तेऽपारेऽविद्यमानान्ते स्वर्गे | यह फल बतलाया गया है। वह पापको
लोके सुखप्राये निर्दुःखात्मनि | क्षीण करके अर्थात् धर्म और अधर्मका
| क्षय करके जिसका अन्त न हो उस
| स्वर्गलोकमें अर्थात् दुःखरहित आनन्द-
| प्राय और अनन्त—अपार अर्थात्

१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४

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१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
अपहत्य पाप्मानम् अविद्याकाम- | ब्रह्ममें, जो ज्येये—बड़ा अर्थात्
कर्मलक्षणं संसारबीजं विधूय | सबसे महान् है उस अपने मुख्य
अनन्ते अपर्यन्ते स्वर्गे लोके | आत्मामें स्थित हो जाता है।
सुखात्मके ब्रह्मणीत्येतत् । अनन्ते | तात्पर्य यह है कि वह फिर संसार-
इति विशेषणान्न त्रिविष्टपे अनन्त- | को प्राप्त नहीं होता । 'अमृतत्वं हि
शब्द औपचारिकोडपि स्याद् | विन्दते' इस वाक्यद्वारा पहले
इत्यत आह--ज्येये इति । ज्येये | ब्रह्मविद्याका फल कह भी दिया है,
ज्यायसि सर्वमहत्तरे स्वात्मनि | तो भी इस वाक्यद्वारा उसका अन्तमें
मुख्ये एव प्रतितिष्ठति । न पुनः | फिर उपसंहार करते हैं। 'अनन्त' ऐसा
संसारमापद्यत इत्यभिप्रायः ॥९॥ | विशेषण होनेके कारण 'स्वर्गे लोके'
से देवलोक नहीं समझना चाहिये;
क्योंकि उसमें भी उपचारसे 'अनन्त'
शब्दकी प्रवृत्ति हो सकती है
इसलिये 'ज्येये' यह विशेषण दिया
गया है ॥ ९ ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥
केनोपनिषत्पदभाष्यम्
सम्पूर्णम्
वाक्य-भाष्य
परे ब्रह्मणि ज्येये महति सर्व- | ज्येष्ठ—महान् यानी सबसे बड़े परब्रह्म-
महत्तरे प्रतितिष्ठति सर्ववेदान्तवेद्यं | में प्रतिष्ठित हो जाता है। अर्थात्
ब्रह्मात्मत्वेनावगम्य तदेव ब्रह्म | सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंसे वेद्य ब्रह्मको
प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | आत्मभावसे जानकर उसी ब्रह्मको
प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥
केनोपनिषद्वाक्यभाष्यम्
सम्पूर्णम्

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शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो
बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म
निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिरा-
करणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते
मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥

समाप्त

केनो० ६—

मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका

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ओंहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
मन्त्रप्रतीकानि \t खं० \t सं० \t पृ०
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतत् \t ... \t ३ \t ७ \t ११२
अथाध्यात्मं यदेतत् \t ... \t ४ \t ५ \t १२३
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन् \t ... \t ३ \t ११ \t ११४
इह चेदवेदीदथ \t ... \t २ \t ५ \t ८४
उपनिषदं भो ब्रूहि \t ... \t ४ \t ७ \t १२८
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः \t ... \t १ \t १ \t १४
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् \t ... \t ३ \t ४ \t १०९
” \t ... \t ३ \t ८ \t ११२
तद्व तद्वनं नाम \t ... \t ४ \t ६ \t १२६
त ऐक्षन्तास्माकमेवायम् \t ... \t ३ \t २ \t १०५
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितराम् \t ... \t ४ \t ३ \t ११९
तस्माद्वा एते देवाः \t ... \t ४ \t २ \t ११८
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यम् \t ... \t ३ \t ५ \t ११०
” \t ... \t ३ \t ९ \t ११२
तस्मै तृणं निदधौ \t ... \t ३ \t ६ \t १११
” \t ... \t ३ \t १० \t ११२
तस्यै तपो दमः कर्मेति \t ... \t ४ \t ८ \t १३३
तस्यैष आदेशो यदेतत् \t ... \t ४ \t ४ \t १२०
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः \t ... \t ३ \t ३ \t १०९
न तत्र चक्षुर्गच्छति \t ... \t १ \t ३ \t ३१
नाहं मन्ये सुवेदेति \t ... \t २ \t २ \t ६३
प्रतिबोधविदितम् \t ... \t २ \t ४ \t ७३
ब्रह्म ह देवेभ्यः \t ... \t ३ \t १ \t १०४
यच्चक्षुषा न पश्यति \t ... \t १ \t ६ \t ५१
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति \t ... \t १ \t ७ \t ५२
यत्प्राणेन न प्राणिति \t ... \t १ \t ८ \t ५२
यदि मन्यसे सुवेदेति \t ... \t २ \t १ \t ५६
यद्वाचानभ्युदितं येन \t ... \t १ \t ४ \t ४५
यन्मनसा न मनुते \t ... \t १ \t ५ \t ४९
यस्यामतं तस्य मतम् \t ... \t २ \t ३ \t ६८
यो वा एतामेवम् \t ... \t ४ \t ९ \t १३७
श्रोत्रस्य श्रोत्रम् \t ... \t १ \t २ \t २०
स तस्मिन्नेवाकाशे \t ... \t ३ \t १२ \t ११५
सा ब्रह्मेति होवाच \t ... \t ४ \t १ \t ११७

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कल्याणके पुनर्मुद्रित विशेषाङ्क
कल्याण वर्ष | सन् | नाम
८ | १९३४ | शिवाङ्क
९ | १९३५ | शक्ति-अङ्क
१० | १९३६ | योगाङ्क
१२ | १९३८ | संत-अङ्क
१५ | १९४१ | साधनाङ्क
१९ | १९४५ | सं० पद्मपुराणाङ्क
२१ | १९४७ | सं० मार्कण्डेय-ब्रह्मपुराणाङ्क
२२ | १९४८ | नारी-अङ्क
२४ | १९५० | हिन्दू-संस्कृति-अङ्क
२५ | १९५१ | सं० स्कन्दपुराणाङ्क
२६ | १९५२ | भक्त-चरिताङ्क
२७ | १९५३ | बालक-अङ्क
२८ | १९५४ | सं० नारद-विष्णुपुराणाङ्क
३० | १९५६ | सत्कथा-अङ्क
३१ | १९५७ | तीर्थाङ्क
३४ | १९६० | सं० श्रीमद्देवीभागवताङ्क
३५ | १९६१ | सं० योगवासिष्ठाङ्क
३६ | १९६२ | सं० शिवपुराण
३७ | १९६३ | सं० ब्रह्मवैवर्तपुराणाङ्क
३९ | १९६५ | श्रीभगवन्नाम महिमा
| | और प्रार्थना-अङ्क
४३ | १९६९ | परलोक और पुनर्जन्माङ्क
४४-४५ | १९७०-७१ | गर्गसंहिता
४९ | १९७५ | श्रीहनुमान-अङ्क
६७ | १९९३ | शिवोपासनाङ्क

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॥ श्रीहरिः ॥
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(नं० १); कोटा [ राजस्थान ] (नं० १); पटना जंक्शन, पुस्तक-ट्राली;
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(नं० ३-४); लखनऊ [ एन० ई० रेलवे ]; सिकन्दराबाद (नं० १);
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(नं० ५); मुजफ्फरपुर (नं० १); बीकानेर (नं० १)।
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॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे
प्रकाशित
उपनिषद्
ईशादि नौ उपनिषद् अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित
बृहदारण्यकोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
छान्दोग्योपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
ईशावास्योपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
केनोपनिषद् हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित
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