केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
१०२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा | अथवा आगे कही जानेवाली
सर्वं ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां | समस्त उपनिषद् विधिपरक है।
कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या | और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियों-
| का जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका अभि-
वाक्य-भाष्य
त्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्ति- | कारण लौकिक पदार्थोंकी अभिव्यक्ति
निमित्तत्वे सति लोकदृष्टिविपर्य- | और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता
येणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृ- | है तथापि लोकोंकी दृष्टिमें विपरीत
त्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे | भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोप-
नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञाना- | का पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त
पोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे | और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी
सति लोकविपरीतबुद्ध्याध्यारो- | प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमें
पितं विपरीतलक्षणत्वं सुख- | भी लोकोंके ज्ञानका विनाश तथा सुख,
दुःखाश्रयश्च न स्वतः। | दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता
आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च। | उपस्थित होनेपर लोकोंकी विपरीत
यथा घनादिविप्रकीर्णेऽम्बरे येनैव | बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख-
सवितृप्रकाशो न दृश्यते स | दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया
आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति | जाता है, उसमें स्वतः ऐसा कोई भाव
सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति | नहीं है।
सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या। | इसके सिवा सभी जीव अपनी-
| अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमें
| आरोप करते हैं [ इसलिये भी वह उन
| सब आरोपोंसे अछूता है]। जिस प्रकार
| आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो
| जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश
| दिखलायी नहीं देता वही-वही अन्यत्र
| प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी
| दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है
| कि 'इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान
| नहीं है।' इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमें
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
पद-भाष्य
इत्येतद्दर्शनार्थं वा आख्यायिका, मान है वह देवताओंके जय
आदिके अभिमानके समान मिथ्या
यथा देवानां जयाद्यभिमानः है—यह बात दिखानेके लिये ही
तद्वदिति । प्रस्तुत आख्यायिका है।
वाक्य-भाष्य
एवमिह बौद्धादिवृत्त्युद्भववि- भी बुद्धि आदिकी वृत्तियोंके उदय
भवाकुलभ्रान्त्याध्यारोपितः सुख- और अस्तसे वैचित्र्यको प्राप्त हुई
भ्रान्तिसे आरोपित सुख-दुःखादिका
दुःखादियोग उपपद्यते । योग हो सकता है।
तत्स्मरणाच्च । तस्यैवेश्वरस्यैव इस विषयमें उसीकी स्मृति भी है
हि स्मरणम्—"मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- अर्थात् उस ईश्वरके ही स्मृतिवाक्य
भी हैं; जैसे—"मुझहीसे प्राणियोंको
मपोहनं च" (गीता १५ । १५) स्मृति, ज्ञान और अज्ञान प्राप्त
"नादत्ते कस्यचित्पापम्" (गीता होते हैं" "ईश्वर किसीके पापको
५ । १५) इत्यादि । अतो नित्य- स्वीकार नहीं करता" इत्यादि । अतः
मुक्त एकस्मिन्सवितरीव लोका- सूर्यके समान एक ही नित्यमुक्त ईश्वरमें
विद्याध्यारोपितमीश्वरे संसारि- लोकने अविद्यावश संसारित्वका आरोप
कर रखा है, तथा शास्त्रादि प्रमाणों-
त्वम् । शास्त्रादिप्रामाण्यादभ्युप- से उसका असंसारित्व जाना गया है;
गतमसंसारित्वमित्यविरोध इति। इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है।
एतेन प्रत्येकं ज्ञानादिभेदः इससे प्रत्येक जीवके ज्ञानादि भेदका
प्रत्युक्तः सौक्ष्म्यचैतन्यसर्वगतत्वा- प्रत्याख्यान हो गया, क्योंकि उन सभीमें
सूक्ष्मता, चैतन्य और सर्वगतत्वादि धर्म
द्यविशेषे च भेदहेत्वभावात् । समानरूपसे रहनेके कारण भेदके हेतुका
अभाव है। यदि उन्हें विकारी माना जाय
विक्रियावत्त्वे चानित्यत्वात् । तो वे अनित्य हो जायेंगे । इसके सिवा
मुक्तावस्थामें किसीने भी आत्माका
मोक्षे च विशेषानभ्युपगमादभ्युप- कोई विशेष भाव नहीं माना, यदि
कोई मानेगा तो अनित्यत्वका प्रसंग
गमे चानित्यत्वप्रसङ्गात्। अविद्या- उपस्थित हो जायगा। तथा भेद तो
वदुपलभ्यत्वाच्च भेदस्य । केवल अविद्यावान्को ही उपलब्ध होता
१०४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
देवताओंका गर्व
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये
देवा अमहीयन्त ॥ १ ॥
यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्मने देवताओंके लिये विजय प्राप्त की। कहते
हैं, उस ब्रह्मकी विजयमें देवताओंने गौरव प्राप्त किया ॥ १ ॥
पद-भाष्य
ब्रह्म यथोक्तलक्षणं परं ह किल देवेभ्योऽर्थाय विजिग्ये जयं लब्धवत् देवानामसुरार्णा च | यह प्रसिद्ध है कि उपर्युक्त लक्षणोंवाले परब्रह्मने देवताओंके लिये जय प्राप्त की। अर्थात् देवता और असुरोंके संग्राममें संसारके
वाक्य-भाष्य
तत्क्षयेऽनुपपत्तिरिति सिद्धम् एकत्वम् । | है, अविद्याका क्षय होनेपर उसकी सिद्धि नहीं होती। अतः [जीव और ईश्वरका] एकत्व ही सिद्ध होता है।
तस्माच्छरीरेन्द्रियमनोबुद्धि- | अतः अहंकारके सम्बन्धसे अज्ञानके बीजभूत शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि,
[बन्धमोक्ष-व्यवस्था] विषयवेदनासन्तानस्य अहङ्कारसम्बन्धादज्ञान-बीजस्य नित्यविज्ञाना-न्यनिमित्तस्यात्मतत्त्वयाथात्म्यवि-ज्ञानाद्विनिवृत्तावज्ञानबीजस्य वि-च्छेद आत्मनो मोक्षसंज्ञा; विपर्यये च बन्धसंज्ञा, स्वरूपापेक्षत्वा-दुभयोः । | विषय और इन्द्रियज्ञानके प्रवाहका, जो नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मासे भिन्न किसी अन्य निमित्तसे स्थित है, आत्म-तत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे उस निमित्तके निवृत्त हो जानेपर जो अज्ञानके बीजका उच्छेद हो जाना है वही आत्माका मोक्ष कहलाता है और उससे विपरीत-का नाम बन्ध है, क्योंकि वे [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही [बुद्ध्यादि उपाधिविशिष्ट] स्वरूपकी अपेक्षासे हैं।
ब्रह्म ह इत्यैतिहासार्थः । पुरा किल देवासुरसंग्रामे जगत्स्थिति-परिपिपालयिष्यात्मानुशासनानु-वर्तिभ्यो देवेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय | 'ब्रह्म ह' इसमें 'ह' ऐतिह्य (इतिहास) का द्योतक है। कहते हैं, पूर्वकालमें देवासुरसंग्राममें ब्रह्मने जगत्-स्थिति (लोक-मर्यादा) की रक्षाके लिये अपनी आज्ञामें चलनेवाले विजयार्थी देवताओंके लिये असुरोंको
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
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पद-भाष्य
संग्रामेऽसुराञ्जित्वा जगदराती- | शत्रु तथा ईश्वरकी मर्यादा भङ्ग
नीश्वरसेतुभेत्तॄन् देवेभ्यो जयं | करनेवाले असुरोंको जीतकर जगत्-
तत्फलं च प्रायच्छज्जगतः स्थेम्ने । | की स्थितिके लिये वह जय और
तस्य ह किल ब्रह्मणो विजये | उसका फल देवताओंको दे दिया ।
देवाः अग्न्यादयः अमहीयन्त | कहते हैं, ब्रह्मकी उस विजयमें अग्नि
महिमानं प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | आदि देवगण महिमाको प्राप्त हुए ॥१॥
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यक्षका प्रादुर्भाव
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ।
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत
किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥
उन्होंने सोचा हमारी ही यह विजय है, और हमारी ही यह
महिमा है । कहते हैं, वह ब्रह्म देवताओंके अभिप्रायको जान गया और
उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवतालोग [ यक्षरूपमें प्रकट
हुए ] उस ब्रह्मको 'यह यक्ष कौन है ?' ऐसा न जान सके ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
विजिग्येऽजैषीदसुरान् । ब्रह्मण | जीत लिया । अर्थात् ब्रह्मकी इच्छारूप
इच्छानिमित्तो विजयो देवानां | निमित्तसे देवताओंकी विजय हो
बभूवेत्यर्थः । तस्य ह ब्रह्मणो | गयी । ब्रह्मकी उस विजयमें देवताओं-
विजये देवा अमहीयन्त । यज्ञा- | को महत्ता प्राप्त हुई । लोककी स्थितिके
दिलोकस्थित्यपहारिष्वसुरेषु परा- | हेतुभूत यज्ञादिको नष्ट करनेवाले
जितेषु देवा वृद्धिं पूजां वा | असुरोंके पराजित हो जानेपर देवताओं-
प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | ने वृद्धि अथवा खूब सत्कार प्राप्त
| किया ॥ १ ॥
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त ऐक्षन्त इति मिथ्याप्रत्यय- | 'त ऐक्षन्त' इत्यादि शास्त्रवाक्य,
| मिथ्याप्रत्ययरूप होनेके कारण
त्वाद्धेयत्वख्यापनार्थमाम्नायः । | [ अभिमानका ] हेयत्व प्रतिपादन
| करनेके लिये है ।
१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
तदा आत्मसंस्थस्य प्रत्यगात्मन | तत्र, अन्तःकरणमें स्थित,
ईश्वरस्य सर्वज्ञस्य सर्वक्रियाफल- | प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियोंके
| सम्पूर्ण कर्मफलोंका संयोग कराने-
संयोजयितुः प्राणिनां सर्वशक्तेः | वाले, सर्वशक्तिमान् एवं जगत्की
जगतः स्थितिं चिकीर्षोः अयं | रक्षा करनेके इच्छुक ईश्वरकी ही
| यह सम्पूर्ण जय और महिमा है यह
जयो महिमा चेत्यजानन्तः ते देवाः | न जानते हुए आत्माको अग्नि
ऐक्षन्त ईक्षितवन्तः अग्न्यादि | आदि रूपोंसे परिच्छिन्न माननेवाले
स्वरूपपरिच्छिन्नात्मकृतोऽस्माक- | देवता सोचने लगे कि--हमलोगों-
| की ही यह विजय हुई है, और इस
मेवाय विजयः अस्माकमेवायं | विजयकी फलभूत अग्नित्व, वायुत्व
महिमा अग्निर्वाय्विन्द्रत्वादि- | एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी
| हमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही
लक्षणो जयफलभूतोऽस्माभिरनु- | इसका अनुभव किया जाता है; यह
भूयते; नास्मत्प्रत्यगात्मभूतेश्वर- | विजय अथवा महिमा हमारे अन्तरात्म-
| भूत ईश्वरकी की हुई नहीं है।
कृत इति ।
एवं मिथ्याभिमानेक्षणवतां | इस प्रकार मिथ्या अभिमानसे
| विचार करनेवाले उन देवताओंके
तत् ह किल एषां मिथ्येक्षणं | इस मिथ्या विचारको ब्रह्मने जान
विजज्ञौ विज्ञातवद्ब्रह्म । सर्वेशितृ | लिया, क्योंकि समस्त जीवोंके
वाक्य-भाष्य
ईश्वरनिमित्ते विजये स्वसाम- | जो विजय ईश्वरके निमित्तसे प्राप्त
| हुई थी उसमें 'यह हमारी सामर्थ्यसे
र्थ्यनिमित्तोऽस्माकमेवायं विजयोऽ- | प्राप्त हुई हमारी ही विजय है, हमारी
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
पद-भाष्य
हि तत् सर्वभूतकरणप्रयोक्तृ- | अन्तःकरणोंका प्रेरक होनेके कारण
त्वात् देवानां च मिथ्याज्ञान- | वह सबका साक्षी है । देवताओंके
| इस मिथ्या ज्ञानको जानकर 'इस
मुपलभ्य मैवासुरवद्देवा मिथ्या- | मिथ्या ज्ञानसे असुरोंकी ही भाँति
| देवताओंका भी पराभव न हो जाय'
भिमानात्पराभवेयुरिति तदनु- | इस प्रकार उनपर अनुकम्पा करते
कम्पया देवान्मिथ्याभिमाना- | हुए यह सोचकर कि 'देवताओंके
| मिथ्याज्ञानको निवृत्त करके मैं उन्हें
पनोदनेनानुगृह्णीयामिति तेभ्यः | अनुगृहीत करूँ' वह उन देवताओं-
देवेभ्यः ह किलार्थाय प्रादुर्बभूव | के लिये प्रादुर्भूत हुआ अर्थात्
वाक्य-भाष्य
स्माकमेवायं महिमेत्यात्मनो | ही महिमा है' इस प्रकार [ अभिमान
जयादि श्रेयोनिमित्तं सर्वात्मा- | करके ] अपनी विजय आदि कल्याणके
| हेतुभूत सर्वात्मा सर्वकल्याणास्पद
नमात्मस्थं सर्वकल्याणास्पदमी- | आत्मस्थ ईश्वरको ही आत्मभावसे न
श्वरमेवात्मत्वेनावुद्ध्य पिण्ड- | जानकर पिण्डमात्रके अभिमानी होकर
| उन्होंने जो मिथ्या प्रत्यय कर लिया था
मात्राभिमानाः सन्तो यं मिथ्या- | वह केवल पिण्डमात्रसे सम्बन्ध रखने-
प्रत्ययं चक्रुस्तस्य पिण्डमात्रविषय- | वाला होनेसे मिथ्या ज्ञानस्वरूप था ।
| अतः सर्वात्मा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपके
त्वेन मिथ्याप्रत्ययत्वात्सर्वात्मे- | बोधसे उसका हेयत्व प्रकट करनेके
श्वरयाथात्म्यावबोधेन हातव्यता- | लिये ही यह 'तद्वैषाम्' ( वह ब्रह्म उन
१०८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
स्वयोगमाहात्म्यनिर्मितेनात्यद्भु- | अपनी योगमायाके प्रभावसे सबको
तेन विस्मापनीयेन रूपेण देवाना- | विस्मित करनेवाले अति अद्भुतरूपसे
मिन्द्रियगोचरे प्रादुर्बभूव प्रादु- | देवताओंकी इन्द्रियोंका विषय होकर
र्भूतवत् । तत् प्रादुर्भूतं ब्रह्म | प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हुआ । उस
न व्यजानत नैव विज्ञातवन्तः | प्रकट हुए ब्रह्मको देवतालोग यह
देवाः किमिदं यक्षं पूज्यं | न जान सके कि यह यक्ष अर्थात्
महद्भूतमिति ॥२॥ | पूजनीय महान् प्राणी कौन है ?॥२॥
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वाक्य-भाष्य
ख्यापनार्थस्तद्धैषामित्याद्याख्या- | देवताओंके अभिप्रायको जान गया)
यिकाम्नायः। | आदि आख्यायिकारूप आम्नाय
| (शास्त्र) है।
तद्ब्रह्म ह किलैषां देवानामभि- | कहते हैं, वह ब्रह्म इन देवताओंके
प्रायं मिथ्याहङ्काररूपं विज्ञज्ञौ | मिथ्या अहंकाररूप अभिप्रायको समझ
विज्ञातवत् । ज्ञात्वा च मिथ्याभि- | गया—उसे इसका ज्ञान हो गया ।
मानशातनेन तदनुजिघृक्षया | उसे जानकर उस मिथ्याभिमानके
देवेभ्योऽर्थाय तेषामेवेन्द्रियगोचरे | छेदनद्वारा देवताओंपर अनुग्रह करने-
नातिदूरे प्रादुर्बभूव । महेश्वर- | की इच्छासे वह देवताओंके ही लिये
शक्तिमायोपात्तेनात्यन्ताद्भुतेन | उनकी इन्द्रियोंका विषय होकर उनसे
प्रादुर्भूतं किलकेनचिद्रूपविशेषेण। | थोड़ी ही दूरपर प्रकट हुआ। यह
तत्किलोपलभमाना अपि देवा | महेश्वरकी मायाशक्तिसे ग्रहण किये हुए
न व्यजानत न विज्ञातवन्तः | किसी बड़े ही विचित्र रूपविशेषसे
किमिदं यदेतद्यक्षं पूज्यमिति ॥ २॥ | प्रकट हुआ, जिसे देखकर भी देवता
| लोग यह न जान सके—न पहचान
| सके कि यह यक्ष अर्थात् पूज्य
| कौन है ? ॥ २ ॥
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९
अग्निकी परीक्षा
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति
तथेति ॥ ३ ॥
उन्होंने अग्निसे कहा—‘हे अग्ने ! इस बातको मालूम करो कि
यह यक्ष कौन है ?’ उसने कहा—‘बहुत अच्छा’ ॥ ३ ॥
पद-भाष्य
ते तदजानन्तो देवाः सान्त- | उसे न जाननेवाले देवताओंने
र्भयास्तद्विजिज्ञासवः अग्निम् | भीतरसे डरते-डरते उसे जाननेकी
अग्रगामिनं जातवेदसं सर्वज्ञ- | इच्छासे सत्रसे आगे चलनेवाले
कल्पम् अब्रुवन् उक्तवन्तः । हे | सर्वज्ञकल्प जातवेदा अग्निसे कहा—
जातवेदः एतद् अस्मद्गोचरस्थं | ‘हे जातवेदः ! हमारे नेत्रोंके सम्मुख
यक्षं विजानीहि विशेषतो बुध्य- | स्थित इस यक्षको जानो—विशेष-
स्व त्वं नस्तेजस्वी किमेतद्य- | रूपसे मालूम करो कि यह यक्ष
क्षमिति ॥ ३ ॥ | कौन है; क्योंकि तुम हम सत्रमें तेजस्वी हो’ ॥ ३ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्य-
ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥
अग्नि उस यक्षके पास गया । उसने अग्निसे पूछा, ‘तू कौन है ?’
उसने कहा, ‘मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ’ ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
तथा अस्तु इति तद् यक्षम् | तब ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर
अभि अद्रवत् तत्प्रति गतवा- | अग्नि उस यक्षकी ओर अभिद्रुत
नग्निः । तं च गतवन्तं | हुआ अर्थात् उसके पास गया ।
पिपृच्छिषुं तत्समीपेऽप्रगल्भत्वा- | इस प्रकार गये हुए और धृष्ट न
तूष्णींभूतं तद्यक्षम् अभ्यवदद् | होनेके कारण अपने समीप चुपचाप खड़े हुए प्रश्न करनेकी इच्छावाले उस अग्निसे यक्षने कहा—‘तू
११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
अग्निं प्रति अभाषत कोऽसीति । | कौन है ?' ब्रह्मके इस प्रकार
एवं ब्रह्मणा पृष्टोऽग्निः अब्रवीत्— | पूछनेपर—'मैं अग्नि हूँ—मैं अग्नि
अग्निर्वे अग्निनामाहं प्रसिद्धो जात- | नामसे प्रसिद्ध जातवेदा हूँ'— इस
वेदा इति च नामद्वयेन प्रसिद्ध- | प्रकार अग्निने दो नामसे प्रसिद्ध
तयात्मानं श्लाघयन्निति ॥ ४ ॥ | होनेके कारण अपनी प्रशंसा करते
| हुए कहा ॥ ४ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वं दहेयं यदिदं
पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
[ फिर यक्षने पूछा— ] 'उस [ जातवेदारूप ] तुझमें सामर्थ्य क्या
हैं ?' [ अग्निने कहा— ] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको जला
सकता हूँ' ॥ ५ ॥
पद-भाष्य
एवमुक्तवन्तं ब्रह्मावोचत् | इस प्रकार बोलते हुए उस
तस्मिन् एवं प्रसिद्धगुणनामवति | अग्निसे ब्रह्मने कहा—'ऐसे प्रसिद्ध
त्वयि किं वीर्यं सामर्थ्यम् इति । | गुण और नामवाले तुझमें क्या
सोऽब्रवीद् इदं जगत् सर्वं दहेयं | वीर्य—सामर्थ्य है ?' वह बोला—
भस्मीकुर्यां यद् इदं स्थावरादि | 'पृथिवीपर जो यह चराचररूप
पृथिव्याम् इति । पृथिव्यामि- | जगत् है इस सबको जला सकता
त्युपलक्षणार्थम्, यतोऽन्तरिक्षस्थ- | हूँ—भस्म कर सकता हूँ।' 'पृथिवीमें'
मपि दह्यत एवाग्निना ॥ ५ ॥ | यह केवल उपलक्षणके लिये है,
| क्योंकि जो वस्तु आकाशमें रहती
| है वह भी अग्निसे जल ही
| जाती है ॥ ५ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन
तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं
विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥
तब यक्षने उस अग्निके लिये एक तिनका रख दिया और कहा—
'इसे जला' । अग्नि उस तृणके समीप गया, परन्तु अपने सारे वेगसे भी
उसे जलानेमें समर्थ नहीं हुआ । वह उसके पाससे ही लौट आया और
बोला, 'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान सका' ॥ ६ ॥
पद-भाष्य
तस्मै एवमभिमानवते ब्रह्म | इस प्रकार अभिमान करनेवाले
तृणं निदधौ पुरोग्रेः स्थापितवत् । | उस अग्निके लिये ब्रह्मने एक तृण
ब्रह्मणा 'एतत् तृणमात्रं ममाग्रतः | रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल
दह; न चेदसि दग्धुं समर्थः, | दिया । ब्रह्मके ऐसा कहनेपर कि
मुञ्च दग्धृत्वाभिमानं सर्वत्र' | 'तू मेरे सामने इस तिनकेको जला;
इत्युक्तः तत् तृणम् उपप्रेयाय | यदि तू इसे जलानेमें समर्थ नहीं है
तृणसमीपं गतवान् सर्वजवेन | तो सर्वत्र जलानेवाला होनेका
सर्वोत्साहकृतेन वेगेन । गत्वा | अभिमान छोड़ दे' वह अपने सारे
तत् न शशाक नाशकद्दग्धुम् । | बल अर्थात् उत्साहकृत सम्पूर्ण
सः जातवेदाः तृणं दग्धुम- | वेगसे उस तृणके पास गया ।
शक्तो व्रीडितो हतप्रतिज्ञः तत | किन्तु वहाँ जाकर भी वह उसे
एव यक्षादेव तूष्णीं देवान्प्रति | जलानेमें समर्थ न हुआ ।
निववृते निवृत्तः प्रतिगतवान् न | इस प्रकार उस तिनकेको
एतत् यक्षम् अशकं शक्तवानहं | जलानेमें असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ
विज्ञातुं विशेषतः यदेतद्यक्ष- | होनेके कारण लज्जित होकर उस
मिति ॥ ६ ॥ | यक्षके पाससे चुपचाप देवताओंके
प्रति निवृत्त हुआ—अर्थात् उनके
पास लौट आया [और बोला—]
'इस यक्षको मैं विशेषरूपसे ऐसा
नहीं जान सका कि यह यक्ष
कौन है ?' ॥ ६ ॥
११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वायुकी परीक्षा
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति
तथेति ॥ ७ ॥
तदनन्तर, उन देवताओंने वायुसे कहा—'हे वायो ! इस बातको
मालूम करो कि यह यक्ष कौन है?' उसने कहा—'बहुत अच्छा' ॥ ७ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्य-
ब्रवोन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥
वायु उस यक्षके पास गया, उसने वायुसे पूछा—'तू कौन है?'
उसने कहा—'मैं वायु हूँ—मैं निश्चय मातरिश्वा ही हूँ' ॥ ८ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वमाददीय
यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥
[ तत्र यक्षने पूछा—] 'उस [ मातरिश्वारूप ] तुझमें क्या सामर्थ्य
है ?' [ वायुने कहा—] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको ग्रहण
कर सकता हूँ ॥ ९ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन
तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं
यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥
तत्र यक्षने उस वायुके लिये एक तिनका रखा और कहा—'इसे
ग्रहण कर'। वायु उस तृणके समीप गया । परन्तु अपने सारे वेगसे भी
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
वह उसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। तब वह उसके पाससे लौट
आया और बोला—'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान
सका' ॥१०॥
पद-भाष्य
अथ अनन्तरं वायुमब्रुवन् | तदनन्तर उन्होंने वायुसे कहा—
हे वायो एतद्विजानीहीत्यादि | 'हे वायो ! इसे जानो' इत्यादि सब अर्थ पहलेहीके समान है।
समानार्थं पूर्वेण। वानाद्गमना- | [ वायुको ] वान अर्थात् गमन या गन्धग्रहण करनेके कारण 'वायु'
द्वन्धनाद्वा वायुः। मातर्यन्त- | कहा जाता है। 'मातरि' अर्थात्
रिक्षे श्वयतीति मातरिश्वा। इदं | अन्तरिक्षमें श्वयन (विचरण) करनेके कारण वह 'मातरिश्वा'
सर्वमपि आददीय गृह्णीयाम् | है। पृथिवीमें जो कुछ है मैं इस सभीको ग्रहण कर सकता हूँ—
यदिदं पृथिव्यामित्यादिसमान- | इत्यादि शेष अर्थ पहलेहीके समान है ॥१०॥
मेव ॥१०॥
वाक्य-भाष्य
तद्विज्ञानायाग्निमब्रुवन्। तृण- | देवताओंने उसे जाननेके लिये अग्निसे कहा। अग्नि और वायुके
निधानेऽयमभिप्रायोऽत्यन्तसम्भा- | सामने तृण रखनेमें ब्रह्मका यह
वितयोरग्निमारुतयोस्तृणदहनादा- | अभिप्राय था कि एक तिनकेको जलाने और ग्रहण करनेमें असमर्थ होनेसे इन
नाशकत्यात्मसम्भावना शातिता | अत्यन्त प्रतिष्ठित अग्नि और वायुका आत्माभिमान क्षीण हो जाय ॥३-१०॥
भवेदिति ॥ ३-१० ॥
११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
इन्द्रकी नियुक्ति
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति
तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोधधे ॥ ११ ॥
तदनन्तर देवताओंने इन्द्रसे कहा—'मघवन् ! यह यक्ष कौन
है—इस बातको मालूम करो।' तब इन्द्र 'बहुत अच्छा' कह उस यक्षके
पास गया, किन्तु वह इन्द्रके सामनेसे अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥
पद-भाष्य
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजा- | फिर देवताओंने इन्द्रसे 'हे
नीहीत्यादि पूर्ववत् । इन्द्रः | मघवन् ! इसे जानो' इत्यादि पूर्ववत्
परमेश्वरो मघवा बलवत्त्वात् | कहा । इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जो
तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् | बलवान् होनेके कारण 'मघवा'
इन्द्रादात्मसमीपं गतात् तद्ब्रह्म | कहा गया है, बहुत अच्छा—ऐसा
तिरोधधे तिरोभूतम् । इन्द्रस्ये- | कहकर उसकी ओर चला । अपने
न्द्रत्वाभिमानोऽतितरां निरा- | समीप आये हुए उस इन्द्रके सामने-
कर्तव्य इत्यतः संवादमात्रमपि | से वह ब्रह्म अन्तर्धान हो गया ।
नादाद्ब्रह्मेन्द्राय ॥ ११ ॥ | इन्द्रका सबसे बढ़ा हुआ इन्द्रत्वका
अभिमान तोड़ना चाहिये— | इसलिये इन्द्रको ब्रह्मने संवादमात्रका
भी अवसर नहीं दिया ॥ ११ ॥
वाक्य-भाष्य
इन्द्र आदित्यो वज्रभृद्वा ; | इन्द्र आदित्य अथवा वज्रधारी
अविरोधात् । इन्द्रोपसर्पणे ब्रह्म | देवराजका नाम है, क्योंकि दोनों ही
तिरोधध इत्यत्रायमभिप्रायः— | अर्थोंमें कोई विरोध नहीं है । ब्रह्म जो
इन्द्रोऽहमित्यधिकतमोऽभिमानो- | इन्द्रके समीप आते ही अन्तर्धान हो
ऽस्य सोऽहमग्न्यादिभिः प्राप्तं | गया इसमें यह अभिप्राय था कि
[ब्रह्मने देखा—] इसे 'मैं इन्द्र
(देवराज) हूँ' ऐसा सोचकर सबसे
अधिक अभिमान है, अतः मेरे साथ
अग्नि आदिको जो वाणीका सम्भाषण-
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
उमाका प्रादुर्भाव
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना-
मुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥१२॥
वह इन्द्र उसी आकाशमें [ जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था ]
एक अत्यन्त शोभामयी स्त्रीके पास आया और उस सुवर्णभूषणभूषिता
[ अथवा हिमालयकी पुत्री ] उमा ( पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या ) से बोला—
'यह यक्ष कौन है ?' ॥ १२ ॥
पद-भाष्य
तद्यक्षं यस्मिन्नाकाशे आकाश- | वह यक्ष जिस आकाशमें—
प्रदेशे आत्मानं दर्शयित्वा तिरो- | आकाशके जिस भागमें अपना दर्शन
भूतमिन्द्रश्च ब्रह्मणस्तिरोधान- | देकर तिरोहित हुआ था और उसके
काले यस्मिन्नाकाशे आसीत्, | तिरोहित होनेके समय इन्द्र जिस
स इन्द्रः तस्मिन्नेव आकाशे | आकाशमें था, वह इन्द्र यह सोचता
तस्थौ किं तद्यक्षमिति ध्यायन्; | हुआ कि 'यह यक्ष कौन है ?' उसी
न निवृत्तेऽग्न्यादिवत् । | आकाशमें खड़ा रहा । अग्नि आदि-
| के समान पीछे नहीं लौटा ।
वाक्य-भाष्य
वाक्सम्भाषणमात्रमप्यनेन न | मात्र भी प्राप्त हो गया था उसके
| लिये भी मैं इसे प्राप्त न हो सका—
प्राप्तोऽस्मीत्यभिमानं कथं न नाम | ऐसा सोचकर यह किसी तरह अपना
जह्यादिति तदनुग्रहायैवान्तर्हितं | अभिमान छोड़ दे । अतः उसपर
| कृपा करनेके लिये ही ब्रह्म अन्तर्धान
तद्ब्रह्म बभूव ॥ ११ ॥ | हो गया ॥ ११ ॥
स शान्ताभिमान इन्द्रोऽत्यर्थं | इस प्रकार अभिमान शान्त हो
ब्रह्म विजिज्ञासुर्यस्मिन्नाकाशे | जानेपर इन्द्र ब्रह्मका अत्यन्त जिज्ञासु
ब्रह्मणः प्रादुर्भाव आसीत्तिरोधानं | होकर उसी आकाशमें, जिसमें कि
च तस्मिन्नेव स्त्रियमतिरूपिणीं | ब्रह्मका आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ
| था, एक अत्यन्त रूपवती स्त्री—
११६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
तस्येन्द्रस्य यक्षे भक्तिं बुद्ध्वा | उस इन्द्रकी यक्षमें भक्ति
विद्या उमारूपिणी प्रादुरभूत्स्त्री- | जानकर स्त्रीवेषधारिणी उमारूपा
रूपा । स इन्द्रः ताम् उमां | विद्यादेवी प्रकट हुई । वह इन्द्र उस
बहुशोभमानाम्—सर्वेषां हि | अत्यन्त शोभामयी हैमवती उमाके
शोभमानानां शोभनतमा विद्या, | पास गया । समस्त शोभायमानोंमें
तदा बहुशोभमानेति विशेषण- | विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी
मुपपन्नं भवति; हैमवतीं हेम- | है; इसलिये उसके लिये 'बहु
कृताभरणवतीमिव बहुशोभ- | शोभमाना' यह विशेषण उचित ही
मानामित्यर्थः; अथवा उमैव | है। हैमवती अर्थात् हेम ( सुवर्ण )
हिमवतो दुहिता हैमवती नित्य- | निर्मित आभूषणोंवालीके समान
मेव सर्वज्ञेनेश्वरेण सह वर्तत | अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान्-
इति ज्ञातुं समर्थेति कृत्वा ताम्— | की कन्या होनेसे उमा ( पार्वती )
उपजगाम इन्द्रस्तां ह उमां किल | ही हैमवती है। वह सर्वदा उस सर्वज्ञ
उवाच पप्रच्छ—ब्रूहि किमेतद्दर्श- | ईश्वरके साथ वर्तमान रहती है; अतः
यित्वा तिरोभूतं यक्षमिति ॥१२॥ | उसे जाननेमें समर्थ होगी—यह
| सोचकर इन्द्र उसके पास गया,
| और उससे पूछा—'बतलाइये, इस
| प्रकार दर्शन देकर छिप जानेवाला
| यह यक्ष कौन है?' ॥ १२ ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
वाक्य-भाष्य
विद्यामाजगाम । अभिप्रायोद्बोध- | विद्यादेवीके पास आया । ब्रह्मके गुप्त
हेतुत्वादुद्रपत्न्युमा हैमवतीव सा | हो जानेके अभिप्रायको प्रकट करनेके
शोभमाना विद्यैव । विरूपोऽपि | कारण रुद्रपत्नी हिमालयपुत्री पार्वती-
विद्यावान्बहु शोभते ॥ १२ ॥ | के समान शोभामयी यह ब्रह्मविद्या ही
| थी, क्योंकि विद्यावान् पुरुष रूपहीन
| होनेपर भी बहुत शोभा पाता है॥१२॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
चतुर्थ खण्ड
उमाका उपदेश
सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीय-
ध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥
उस विद्यादेवीने स्पष्टतया कहा—'यह ब्रह्म है, तुम ब्रह्मके ही
विजयमें इस प्रकार महिमान्वित हुए हो'। कहते हैं, तभीसे इन्द्रने यह
जाना कि यह ब्रह्म है ॥ १ ॥
पद-भाष्य
सा ब्रह्मेति होवाच ह किल | उसने 'यह ब्रह्म है' ऐसा कहा।
ब्रह्मणो वै ईश्वरस्यैव विजये— | 'निस्सन्देह ब्रह्म—ईश्वरके विजयमें
ईश्वरेणैव जिता असुराः; यूयं | ही [ तुम महिमाको प्राप्त हुए हो ]।
असुरोंको ईश्वरने ही जीता था;
तत्र निमित्तमात्रम्; तस्यैव | तुम तो उसमें निमित्तमात्र थे ।
अतः उसके ही विजयमें तुम्हें
विजये—यूयं महीयध्वं महिमानं | यह महिमा मिली है।' मूलमें
प्राप्नुथ । एतदिति क्रियाविशेष- | 'एतत्' यह क्रियाविशेषणके लिये
वाक्य-भाष्य
तां च पृष्ट्वा तस्या एव वचनाद् | इन्द्रने उस उमासे पूछकर उसीके
विदाञ्चकार विदितवान् । अत | वचनसे [ ब्रह्मको ] जाना था; अतः
इन्द्रस्य बोधहेतुत्वाद्विद्यैवोमा । | इन्द्रके बोधकी हेतुभूता होनेसे उमा
विद्यासहायवानीश्वर इति | विद्या ही है। 'ईश्वर विद्यासहायवान् है'
ऐसी स्मृति भी है। क्योंकि इन्द्रके
स्मृतिः। यस्मादिन्द्रविज्ञानपूर्वकम् | विज्ञानपूर्वक अग्नि वायु और इन्द्र
अग्निवाय्विन्द्रास्ते ह्येनन्नेदिष्ठमति- | इन देवताओंने ही ब्रह्मको, उसके
११८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
११८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
णार्थम् । मिथ्याभिमानस्तु | है। 'यह हमारी ही विजय है, यह
युष्माकम्—अस्माकमेवायं वि- | हमारी ही महिमा है' यह तो
जयोऽस्माकमेवायं महिमिति। ततः | तुम्हारा मिथ्या अभिमान ही है।
तस्मादुमावाक्याद् ह एव विदां- | तत्र उमादेवीके उस वाक्यसे ही
चकार ब्रह्मेति इन्द्रः; अवधार- | इन्द्रने जाना कि 'यह ब्रह्म है'।
णात् ततो हैव इति, न | 'ततः' पदके साथ 'ह' और 'एव'
स्वातन्त्र्येण ॥ १ ॥ | ये अव्यय निश्चय करानेके लिये ही
| प्रयुक्त हुए हैं। [अर्थात् उमा
| देवीके वाक्यसे ही इन्द्रने ब्रह्मको
| जाना] स्वतन्त्रतासे नहीं ॥ १ ॥
यस्मादग्निर्वायुश्चेन्द्रा एते देवा | क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र—
ब्रह्मणः संवाददर्शनादिना सामी- | ये देवता ही ब्रह्मके साथ संवाद
प्यमुपगताः— | और दर्शनादि करनेके कारण
| उसकी समीपताको प्राप्त हुए थे—
तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्द्देवान्यदग्निर्वायु-
रिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार
ब्रह्मेति ॥ २ ॥
क्योंकि अग्नि वायु और इन्द्र—इन देवताओंने ही इस समीपस्थ
ब्रह्मको स्पर्श किया था और उन्होंने ही उसे पहले-पहल 'यह ब्रह्म है'
ऐसा जाना था, अतः वे अन्य देवताओंसे बढ़कर हुए ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
समीपं ब्रह्मविद्यया ब्रह्म प्राप्ताः | नेदिष्ठ अर्थात् अत्यन्त समीप पहुँचकर
सन्तः पस्पृशुः स्पृष्टवन्तः—ते हि | ब्रह्मविद्याद्वारा स्पर्श किया था—उन्होंने
प्रथमः प्रथमं विदाञ्चकार विदा- | प्रथम यानी पहले-पहल उसे जाना था
ञ्चकुरित्येतत्—तस्मादतितराम् | इसलिये वे अन्य देवताओंसे बढ़े हुए
अतीत्यान्यानतिशयेन दीप्यन्ते | हैं—उनसे अधिक देदीप्यमान होते हैं;
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९
पद-भाष्य
तस्मात् स्वैर्गुणैः अतितरामिव | इसलिये निश्चय ही ये देवगण
शक्तिगुणादिमहाभाग्यैः अन्यान् | अपने शक्ति एवं गुण आदि महान्
देवान् अतितराम् अतिशेरत | सौभाग्योंके कारण अन्य देवताओंसे
इव एते देवाः । इव | बढ़कर हुए । 'इव' शब्द निरर्थक
शब्दोऽनर्थकोऽवधारणार्थो वा । | अथवा निश्चयार्थबोधक है। क्योंकि
यद् अग्निः वायुः इन्द्रः ते हि | अग्नि, वायु और इन्द्र—इन
देवा यस्मात् एनत् ब्रह्म नेदिष्ठम् | देवताओंने इस ब्रह्मको पूर्वोक्त
अन्तिकतमं प्रियतमं पस्पर्शः | संवाद आदि प्रकारोंसे नेदिष्ठ
स्पृष्टवन्तो यथोक्तैर्ब्रह्मणः सं- | अर्थात् अत्यन्त निकटवर्ती एवं
वादादिप्रकारैः, ते हि यस्माच्च | प्रियतम भावसे स्पर्श किया था
हेतोः एनद् ब्रह्म प्रथमः प्रथमाः | और उन्होंने ही इस ब्रह्मको प्रथम
प्रधानाः सन्त इत्येतत्, विदांचकार | अर्थात् प्रधानरूपसे 'यह ब्रह्म है'
विदांचकुरित्येतद्ब्रह्मेति ॥२॥ | ऐसा जाना था ॥ २ ॥
यस्मादग्निवायू अपि इन्द्र- | क्योंकि अग्नि और वायुने भी
वाक्यादेव विदांचक्रतुः, इन्द्रेण हि | इन्द्रके वाक्यसे ही उसे जाना था,
कारण कि उमाके वाक्यसे तो इन्द्रने
उमावाक्यात्प्रथमं श्रुतं ब्रह्मेति— | ही पहले सुना था कि 'यह ब्रह्म है'—
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं
पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥
इसलिये इन्द्र अन्य सब देवताओंसे बढ़कर हुआ क्योंकि उसने ही
इस समीपस्थ ब्रह्मको स्पर्श किया था—उसने ही पहले-पहल 'यह ब्रह्म
है' इस प्रकार इसे जाना था ॥ ३ ॥
वाक्य-भाष्य
अन्यान्देवांस्ततोऽपीन्द्रोऽतितरां | उनमें भी इन्द्र सबसे अधिक
| दीप्तिमान् है, क्योंकि सबसे पहले उसे
दीप्यते। आदौ ब्रह्मविज्ञानात् ॥१-३॥ | ही ब्रह्मका ज्ञान हुआ था ॥ १-३ ॥
१२० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
१२० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
तस्माद्वै इन्द्रः अतितरामिव अतिशेरत इव अन्यान् देवान् । स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श यस्मात् स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेत्युक्तार्थं वाक्यम् ॥ ३ ॥
अतः इन्द्र इन अन्य देवताओंकी अपेक्षा भी बढ़कर हुआ, क्योंकि उसीने इसे सबसे समीपसे स्पर्श किया था—उसीने इसे सबसे पहले जाना था कि ‘यह ब्रह्म है’ इस प्रकार इस वाक्यका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है ॥ ३ ॥
ब्रह्मविषयक अधिदेव आदेश
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इती-
न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥
उस ब्रह्मका यह [उपासना-सम्बन्धी] आदेश है। जो बिजलीके चमकनेके समान तथा पलक मारनेके समान प्रादुर्भूत हुआ वह उस ब्रह्मका अधिदैवत रूप है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
तस्य प्रकृतस्य ब्रह्मण एष आदेश उपमोपदेशः। निरुपमस्य ब्रह्मणो येनोपमानेनोपदेशः
उस प्रस्तावित ब्रह्मके विषयमें यह आदेश यानी उपमोपदेश है। जिस उपमासे उस निरुपम ब्रह्मका उपदेश किया जाता है वह
वाक्य-भाष्य
तस्यैष आदेशः । तस्य ब्रह्मण एष वक्ष्यमाण आदेश उपासनोपदेश इत्यर्थः । यस्माद्देवेभ्यो
उसका यह आदेश है। अर्थात् उस ब्रह्मका यह आगे कहा जानेवाला आदेश—उपासनासम्बन्धी उपदेश है। क्योंकि ब्रह्म देवताओंके सामने विद्युत्-
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
पद-भाष्य
सोऽयमादेश इत्युच्यते । किं | 'आदेश' कहा जाता है । वह
तत् ? यदेतत् प्रसिद्धं लोके विद्युतो | आदेश क्या है ? यह जो लोकमें
| प्रसिद्ध बिजलीका चमकना है ।
व्यद्युतद् विद्योतनं कृतवदित्ये- | यहाँ 'व्यद्युतत्' शब्दका 'प्रकाश
| किया' ऐसा अर्थ अनुपपन्न होनेके
तदनुपपन्नमिति विद्युतो विद्योत- | कारण 'विद्युतो विद्योतनम्—विद्युत्-
| का चमकना' ऐसा अर्थ माना
नमिति कल्प्यते । आ३ इत्युप- | जाता है । 'आ' यह अव्यय
मार्थः । विद्युतो विद्योतनमिवे- | उपमाके लिये है । अर्थात् बिजली
| चमकनेके समान [ऐसा तात्पर्य है] ।
त्यर्थः, “यथा सकृद्विद्युतम्” इति | जैसा कि “यथा सकृद्विद्युतम्” इस
| अन्य श्रुतिसे भी देखा जाता है,
श्रुत्यन्तरे च दर्शनात् । विद्यु- | क्योंकि ब्रह्म विद्युत्के समान ही
दिव हि सकृदात्मानं दर्शयित्वा | अपनेको एक बार प्रकाशित करके
| देवताओंके सामनेसे तिरोभूत हो
तिरोभूतं ब्रह्म देवेभ्यः । | गया था ।
अथवा विद्युतः 'तेजः' इत्य- | अथवा 'विद्युतः' इस पदके
| आगे 'तेजः' पदका अध्याहार
ध्याहार्यम् । व्यद्युतद् विद्योतित- | करना चाहिये । 'व्यद्युतत्' का अर्थ
वाक्य-भाष्य..
विद्युदिव सहसैव प्रादुर्भूतं ब्रह्म | के समान सहसा ( अकस्मात् ) ही
| प्रकट हो गया था, इसलिये जो यह
द्युतिमत्तत्त्वाद्विद्युतो विद्योतनं यथा | ब्रह्म प्रकाशमय है यह विद्युत्के प्रकाश-
| के समान प्रकाशित हुआ । 'आ' का
यदेतद्ब्रह्म व्यद्युतद्विद्योतितवत् । | अर्थ 'इव' है; यह 'आ' शब्द उपमाके
आ इवेत्युपमार्थ आशब्दः । यथा | लिये है । जिस प्रकार बिजली सघन्