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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 152 में से

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पृष्ठ 123

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
उमाका प्रादुर्भाव
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना-
मुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥१२॥
वह इन्द्र उसी आकाशमें [ जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था ]
एक अत्यन्त शोभामयी स्त्रीके पास आया और उस सुवर्णभूषणभूषिता
[ अथवा हिमालयकी पुत्री ] उमा ( पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या ) से बोला—
'यह यक्ष कौन है ?' ॥ १२ ॥
पद-भाष्य
तद्यक्षं यस्मिन्नाकाशे आकाश- | वह यक्ष जिस आकाशमें—
प्रदेशे आत्मानं दर्शयित्वा तिरो- | आकाशके जिस भागमें अपना दर्शन
भूतमिन्द्रश्च ब्रह्मणस्तिरोधान- | देकर तिरोहित हुआ था और उसके
काले यस्मिन्नाकाशे आसीत्, | तिरोहित होनेके समय इन्द्र जिस
स इन्द्रः तस्मिन्नेव आकाशे | आकाशमें था, वह इन्द्र यह सोचता
तस्थौ किं तद्यक्षमिति ध्यायन्; | हुआ कि 'यह यक्ष कौन है ?' उसी
न निवृत्तेऽग्न्यादिवत् । | आकाशमें खड़ा रहा । अग्नि आदि-
| के समान पीछे नहीं लौटा ।
वाक्य-भाष्य
वाक्सम्भाषणमात्रमप्यनेन न | मात्र भी प्राप्त हो गया था उसके
| लिये भी मैं इसे प्राप्त न हो सका—
प्राप्तोऽस्मीत्यभिमानं कथं न नाम | ऐसा सोचकर यह किसी तरह अपना
जह्यादिति तदनुग्रहायैवान्तर्हितं | अभिमान छोड़ दे । अतः उसपर
| कृपा करनेके लिये ही ब्रह्म अन्तर्धान
तद्ब्रह्म बभूव ॥ ११ ॥ | हो गया ॥ ११ ॥
स शान्ताभिमान इन्द्रोऽत्यर्थं | इस प्रकार अभिमान शान्त हो
ब्रह्म विजिज्ञासुर्यस्मिन्नाकाशे | जानेपर इन्द्र ब्रह्मका अत्यन्त जिज्ञासु
ब्रह्मणः प्रादुर्भाव आसीत्तिरोधानं | होकर उसी आकाशमें, जिसमें कि
च तस्मिन्नेव स्त्रियमतिरूपिणीं | ब्रह्मका आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ
| था, एक अत्यन्त रूपवती स्त्री—