केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ
पृष्ठ 122, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 122इन्द्रकी नियुक्ति
११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
इन्द्रकी नियुक्ति
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति
तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोधधे ॥ ११ ॥
तदनन्तर देवताओंने इन्द्रसे कहा—'मघवन् ! यह यक्ष कौन
है—इस बातको मालूम करो।' तब इन्द्र 'बहुत अच्छा' कह उस यक्षके
पास गया, किन्तु वह इन्द्रके सामनेसे अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥
पद-भाष्य
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजा- | फिर देवताओंने इन्द्रसे 'हे
नीहीत्यादि पूर्ववत् । इन्द्रः | मघवन् ! इसे जानो' इत्यादि पूर्ववत्
परमेश्वरो मघवा बलवत्त्वात् | कहा । इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जो
तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् | बलवान् होनेके कारण 'मघवा'
इन्द्रादात्मसमीपं गतात् तद्ब्रह्म | कहा गया है, बहुत अच्छा—ऐसा
तिरोधधे तिरोभूतम् । इन्द्रस्ये- | कहकर उसकी ओर चला । अपने
न्द्रत्वाभिमानोऽतितरां निरा- | समीप आये हुए उस इन्द्रके सामने-
कर्तव्य इत्यतः संवादमात्रमपि | से वह ब्रह्म अन्तर्धान हो गया ।
नादाद्ब्रह्मेन्द्राय ॥ ११ ॥ | इन्द्रका सबसे बढ़ा हुआ इन्द्रत्वका
अभिमान तोड़ना चाहिये— | इसलिये इन्द्रको ब्रह्मने संवादमात्रका
भी अवसर नहीं दिया ॥ ११ ॥
वाक्य-भाष्य
इन्द्र आदित्यो वज्रभृद्वा ; | इन्द्र आदित्य अथवा वज्रधारी
अविरोधात् । इन्द्रोपसर्पणे ब्रह्म | देवराजका नाम है, क्योंकि दोनों ही
तिरोधध इत्यत्रायमभिप्रायः— | अर्थोंमें कोई विरोध नहीं है । ब्रह्म जो
इन्द्रोऽहमित्यधिकतमोऽभिमानो- | इन्द्रके समीप आते ही अन्तर्धान हो
ऽस्य सोऽहमग्न्यादिभिः प्राप्तं | गया इसमें यह अभिप्राय था कि
[ब्रह्मने देखा—] इसे 'मैं इन्द्र
(देवराज) हूँ' ऐसा सोचकर सबसे
अधिक अभिमान है, अतः मेरे साथ
अग्नि आदिको जो वाणीका सम्भाषण-