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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 152 में से

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पृष्ठ 115

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७

पद-भाष्य
हि तत् सर्वभूतकरणप्रयोक्तृ- | अन्तःकरणोंका प्रेरक होनेके कारण
त्वात् देवानां च मिथ्याज्ञान- | वह सबका साक्षी है । देवताओंके
| इस मिथ्या ज्ञानको जानकर 'इस
मुपलभ्य मैवासुरवद्देवा मिथ्या- | मिथ्या ज्ञानसे असुरोंकी ही भाँति
| देवताओंका भी पराभव न हो जाय'
भिमानात्पराभवेयुरिति तदनु- | इस प्रकार उनपर अनुकम्पा करते
कम्पया देवान्मिथ्याभिमाना- | हुए यह सोचकर कि 'देवताओंके
| मिथ्याज्ञानको निवृत्त करके मैं उन्हें
पनोदनेनानुगृह्णीयामिति तेभ्यः | अनुगृहीत करूँ' वह उन देवताओं-
देवेभ्यः ह किलार्थाय प्रादुर्बभूव | के लिये प्रादुर्भूत हुआ अर्थात्
वाक्य-भाष्य
स्माकमेवायं महिमेत्यात्मनो | ही महिमा है' इस प्रकार [ अभिमान
जयादि श्रेयोनिमित्तं सर्वात्मा- | करके ] अपनी विजय आदि कल्याणके
| हेतुभूत सर्वात्मा सर्वकल्याणास्पद
नमात्मस्थं सर्वकल्याणास्पदमी- | आत्मस्थ ईश्वरको ही आत्मभावसे न
श्वरमेवात्मत्वेनावुद्ध्य पिण्ड- | जानकर पिण्डमात्रके अभिमानी होकर
| उन्होंने जो मिथ्या प्रत्यय कर लिया था
मात्राभिमानाः सन्तो यं मिथ्या- | वह केवल पिण्डमात्रसे सम्बन्ध रखने-
प्रत्ययं चक्रुस्तस्य पिण्डमात्रविषय- | वाला होनेसे मिथ्या ज्ञानस्वरूप था ।
| अतः सर्वात्मा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपके
त्वेन मिथ्याप्रत्ययत्वात्सर्वात्मे- | बोधसे उसका हेयत्व प्रकट करनेके
श्वरयाथात्म्यावबोधेन हातव्यता- | लिये ही यह 'तद्वैषाम्' ( वह ब्रह्म उन