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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 152 में से

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पृष्ठ 129

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
पद-भाष्य
सोऽयमादेश इत्युच्यते । किं | 'आदेश' कहा जाता है । वह
तत् ? यदेतत् प्रसिद्धं लोके विद्युतो | आदेश क्या है ? यह जो लोकमें
| प्रसिद्ध बिजलीका चमकना है ।
व्यद्युतद् विद्योतनं कृतवदित्ये- | यहाँ 'व्यद्युतत्' शब्दका 'प्रकाश
| किया' ऐसा अर्थ अनुपपन्न होनेके
तदनुपपन्नमिति विद्युतो विद्योत- | कारण 'विद्युतो विद्योतनम्—विद्युत्-
| का चमकना' ऐसा अर्थ माना
नमिति कल्प्यते । आ३ इत्युप- | जाता है । 'आ' यह अव्यय
मार्थः । विद्युतो विद्योतनमिवे- | उपमाके लिये है । अर्थात् बिजली
| चमकनेके समान [ऐसा तात्पर्य है] ।
त्यर्थः, “यथा सकृद्विद्युतम्” इति | जैसा कि “यथा सकृद्विद्युतम्” इस
| अन्य श्रुतिसे भी देखा जाता है,
श्रुत्यन्तरे च दर्शनात् । विद्यु- | क्योंकि ब्रह्म विद्युत्के समान ही
दिव हि सकृदात्मानं दर्शयित्वा | अपनेको एक बार प्रकाशित करके
| देवताओंके सामनेसे तिरोभूत हो
तिरोभूतं ब्रह्म देवेभ्यः । | गया था ।
अथवा विद्युतः 'तेजः' इत्य- | अथवा 'विद्युतः' इस पदके
| आगे 'तेजः' पदका अध्याहार
ध्याहार्यम् । व्यद्युतद् विद्योतित- | करना चाहिये । 'व्यद्युतत्' का अर्थ
वाक्य-भाष्य..
विद्युदिव सहसैव प्रादुर्भूतं ब्रह्म | के समान सहसा ( अकस्मात् ) ही
| प्रकट हो गया था, इसलिये जो यह
द्युतिमत्तत्त्वाद्विद्युतो विद्योतनं यथा | ब्रह्म प्रकाशमय है यह विद्युत्के प्रकाश-
| के समान प्रकाशित हुआ । 'आ' का
यदेतद्ब्रह्म व्यद्युतद्विद्योतितवत् । | अर्थ 'इव' है; यह 'आ' शब्द उपमाके
आ इवेत्युपमार्थ आशब्दः । यथा | लिये है । जिस प्रकार बिजली सघन्