केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा | अथवा आगे कही जानेवाली
सर्वं ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां | समस्त उपनिषद् विधिपरक है।
कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या | और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियों-
| का जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका अभि-
वाक्य-भाष्य
त्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्ति- | कारण लौकिक पदार्थोंकी अभिव्यक्ति
निमित्तत्वे सति लोकदृष्टिविपर्य- | और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता
येणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृ- | है तथापि लोकोंकी दृष्टिमें विपरीत
त्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे | भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोप-
नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञाना- | का पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त
पोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे | और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी
सति लोकविपरीतबुद्ध्याध्यारो- | प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमें
पितं विपरीतलक्षणत्वं सुख- | भी लोकोंके ज्ञानका विनाश तथा सुख,
दुःखाश्रयश्च न स्वतः। | दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता
आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च। | उपस्थित होनेपर लोकोंकी विपरीत
यथा घनादिविप्रकीर्णेऽम्बरे येनैव | बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख-
सवितृप्रकाशो न दृश्यते स | दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया
आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति | जाता है, उसमें स्वतः ऐसा कोई भाव
सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति | नहीं है।
सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या। | इसके सिवा सभी जीव अपनी-
| अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमें
| आरोप करते हैं [ इसलिये भी वह उन
| सब आरोपोंसे अछूता है]। जिस प्रकार
| आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो
| जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश
| दिखलायी नहीं देता वही-वही अन्यत्र
| प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी
| दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है
| कि 'इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान
| नहीं है।' इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमें