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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

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४९६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) हिरण्यभोगं भूमिभोगं वा मित्रमिति । 'हिरण्यभोगं गतिमत्त्वात्सर्वव्ययप्रतीकारकरम्' इत्याचार्याः ।

(२) नेति कौटिल्यः—'मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः' इत्युक्तं पुरस्तात् । तस्माद्भूमिभोगं मित्रं श्रेय इति ।

(३) तुल्ये पुरुषभोगे विक्रमः क्लेशसहत्वमनुरागः सर्वबललाभी वा मित्रकुलाद्विशेषः ।

(४) तुल्ये हिरण्यभोगे प्रार्थितार्थता प्राभूत्यमल्पप्रयासता सातत्यं च विशेषः ।

(५) तत्रैतद्भवति—

नित्यं वश्यं लघूत्थानं पितृपैतामहं महत् ।
अद्वैध्यं चेति सम्पन्नं मित्रं षड्गुणमुच्यते ॥

(६)

ऋते यदर्थं प्रणयाद्रक्ष्यते यच्च रक्षति ।
पूर्वोपचितसम्बन्धं तन्मित्रं नित्यमुच्यते ॥

(७)

सर्वचित्रमहाभोगं त्रिविधं वश्यमुच्यते ।


(१) 'हिरण्य देने वाला मित्र श्रेष्ठ है या भूमि देने वाला मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि हिरण्य देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है; क्योंकि धन को जहाँ चाहो, इच्छानुसार लगाया जा सकता है और हर तरह का व्यय उससे पूरा किया जा सकता है ।

(२) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'मित्र और हिरण्य दोनों ही भूमि से प्राप्त किए जा सकते हैं' इस बात को पहिले ही बताया जा चुका है । इसलिए भूमि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है ।

(३) यदि दो मित्र समान रूप से पुरुषों की सहायता पहुँचाने वाले हों तो उनमें जो पराक्रमी, क्लेशसह; अनुरागी और मौलभृत आदि सभी प्रकार की सेनाएँ देने वाला हो वही श्रेष्ठ है ।

(४) इसी प्रकार समानरूप से हिरण्य आदि की सहायता पहुँचाने वाले दो मित्रों में वही मित्र श्रेष्ठ है; जो थोड़ा ही कहने पर बहुत धन दे और निरंतर ही ऐसा देता रहे ।

(५) मित्र और उनके गुण : गुण भेद से मित्र छह प्रकार के होते हैं; नित्य, वश्य, लघूत्थान, पितृ-पैतामह, महत् और अद्वैध्य ।

(६) निस्वार्थ भाव से पुराने संबंधों के कारण स्नेहवश विजिगीषु जिसकी रक्षा करता है और जो विजिगीषु की रक्षा करता है उसको नित्यमित्र कहते हैं ।

(७) वश्यमित्र तीन प्रकार का होता है : सर्वभोग, चित्रभोग और महाभोग ।

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प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९७

एकतोभोग्युभयतः सर्वतोभोगि चापरम् ॥
(१) आदातृ वा दात्रपि वा जीवत्यरिषु हिंसया ।
मित्रं नित्यमवश्यं तद् दुर्गाटव्यपसारि च ॥
(२) अन्यतो विगृहीतं यल्लघुव्यसनमेव वा ।
सन्धत्ते चोपकाराय तन्मित्रं वश्यमध्रुवम् ॥
(३) एकार्थानर्थसम्बन्धमुपकार्यविकारि च ।
मित्रभावि भवत्येतन्मित्रमद्वैध्यमापदि ॥
(४) मित्रभावाद्ध्रुवं मित्रं शत्रुसाधारणाच्चलम् ।
न कस्यचिदुदासीनं द्वयोरुभयभावि तत् ॥


जो सेना, धन, भूमि आदि सभी तरह से विजिगीषु की सहायता करता है वह सर्वभोग वश्यमित्र, जो केवल सेना एवं धन से विजिगीषु का महान् उपकार करे वह महाभोग वश्यमित्र; और जो रत्न, ताँबा, लोहा, लकड़ी के जंगल आदि से विजिगीषु की सहायता करता है वह चित्रभोग वश्यमित्र कहलाता है । अनर्थ-निवारण की दृष्टि से वश्यमित्र के तीन भेद और हैं; एकतोभोगी, उभयतोभोगी और सर्वतोभोगी । जो केवल शत्रु का प्रतीकार करे वह एकतोभोगी, जो शत्रु तथा शत्रुमित्र दोनों का प्रतीकार करे वह उभयतोभोगी; और जो शत्रु, शत्रुमित्र तथा आटविक आदि सब का प्रतीकार करे वह सर्वतोभोगी वश्यमित्र कहलाता है ।

( १ ) जो विजिगीषु का उपकार न करने पर भी शत्रुओं की लूट-मार करके अपना निर्वाह करता हो और जो दुर्ग एवं अटवी में सुरक्षित हो वह वश्यमित्रता हीन नित्यमित्र कहलाता है ।

( २ ) किन्तु जिस-जिस पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो, जिस पर थोड़ी विपत्ति आ पड़ी हो, इसलिए जो सहायतार्थ विजिगीषु से सन्धि करना चाहता है वह नित्यमित्रताहीन वश्यमित्र कहलाता है । उपकारक होने से वश्य और अपनी उन्नति-काल तक ही मित्रता रखने के कारण वह अनित्य है ।

( ३ ) जो दुःख-सुख को समान रूप से अनुभव करे, सदा उपकार करने वाला हो, कभी भी विमुख न हो और जो आपत्तिकाल में साथ न छोड़े वह अद्वैध्य मित्र है । उसके साथ मित्रता का नित्य संबंध होने के कारण उसको मित्रभावि भी कहते हैं ।

( ४ ) जो शत्रु और विजिगीषु, दोनों का उपकार न करे, जो दोनों का समान उपकार करे, जो दुर्बलतावश दोनों का सेवक बना रहे, वह उभयभावि मित्र कहलाता है ।

३२ कौ०

४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

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४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) विजिगीषोरमित्रं यन्मित्रमन्तर्धितां गतम् ।
उपकारे निविष्टं वाशक्तं वानुपकारि तत् ॥
(२) प्रियं परस्य वा रक्ष्यं पूज्यसम्बन्धमेव वा ।
अनुगृह्णाति यन्मित्रं शत्रुसाधारणं हि तत् ॥
(३) प्रकृष्टभौमं सन्तुष्टं बलवच्चालसं च यत् ।
उदासीनं भवत्येतद्व्यसनादवमानितम् ॥
(४) अरेर्नेतुश्च यद्वृद्धि दौर्बल्यादनुवर्तते ।
उभयस्याप्यविद्विष्टं विद्यादुभयभावि तत् ।
(५) कारणाकरणध्वस्तं कारणाकरणागतम् ।
यो मित्रं समपेक्षेत स मृत्युमुपगूहति ॥

(६) क्षिप्रमल्पो लाभश्चिरान्महानिति वा । 'क्षिप्रमल्पो लाभः कार्य-देशकालसंवादकः श्रेयान्' इत्याचार्याः ।

(७) नेति कौटिल्यः । चिरादविनिपाती बीजसधर्मा महान् लाभः श्रेयान्, विपर्यये पूर्वः ।


( १ ) जो विजिगीषु राजा अमित्र तथा शत्रु-विजिगीषु के बीच होने के कारण मित्र हो तथा इच्छा होने पर भी जो दोनों का उपकार न कर सके वह भी उभय-भावि मित्र है।

( २ ) जो विजिगीषु का मित्र हो तथा शत्रु का भी प्रिय एवं रक्ष्य ( रक्षा किए जाने योग्य ) हो और शत्रु के साथ जिसका कोई पूज्य सम्बन्ध हो, वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ३ ) दूसरे देश में रहने वाला, सन्तोषी, बलवान् और आलस्य एवं व्यसनों के कारण तिरस्कृत मित्र उपकार करने के समय उदासीन हो जाया करता है ।

( ४ ) जो मित्र दुर्बल होने के कारण शत्रु और विजिगीषु दोनों का अनुगामी होता है । किसी से भी द्वेष न करके दोनों की आज्ञा को मानता है वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ५ ) अकारण गत और अकारण आगत मित्र को जो आश्रय देता है । वह निश्चय ही अपनी मौत को स्वयं बुलाता है ।

( ६ ) 'शीघ्र होने वाला थोड़ा लाभ अच्छा है या देर में होने वाला बड़ा लाभ अच्छा है?' इस पर पूर्वाचार्यों का कथन है कि शीघ्र हो जाने वाला थोड़ा लाभ श्रेयस्कर है, क्योंकि उससे देश, काल और कार्य के लाभ को जाना जा सकता है ।

( ७ ) किन्तु कौटिल्य इससे सहमत नहीं है । उसका कहना है कि देर में होने

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प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९९

(१) एवं दृष्ट्वा ध्रुवे लाभे लाभांशे च गुणोदयम् ।
स्वार्थसिद्धिपरो यायात् संहितः सामवायिकैः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धिनम नवमोऽध्याय,
आदितः षट्छत्ततमः ।

— : ० : —


वाला विघ्नरहित बीज आदि का महान लाभ ही उत्तम है । यदि महान लाभ में निधन होने की सम्भावना हो तो शीघ्र मिलनेवाला थोड़ा ही लाभ श्रेष्ठ है ।

( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने निश्चित लाभ या लाभांश के परिणाम को ठीक तरह से जानकर दूसरे राजाओं के साथ सन्धि करके अपनी कार्य सिद्धि के लिए तत्पर रहे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धि नामक नौवाँ अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

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प्रकरण ११६# भूमिसन्धि
अध्याय १०

(१) 'त्वं चाहं च भूमिं लभावहे' इति भूमिसन्धिः ।
(२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थः सम्पन्नां भूमिमवाप्नोति सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तुल्ये सम्पन्नालाभे यो बलवन्तमाक्रम्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । भूमिलाभं शत्रुकर्शनं प्रतापं च हि प्राप्नोति । दुर्बलाद् भूमिलाभे सत्यं सौकर्यं भवति । दुर्बल एव च भूमिलाभः, तत्सामन्तश्च मित्रममित्रभावं गच्छति ।
(४) तुल्ये बलीयस्त्वे यः स्थिरं शत्रुमुत्पाट्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । दुर्गावाप्तिर्हि स्वभूमिरक्षणममित्राटवीप्रतिषेधं च करोति ।


भूमिसन्धि

( सन्धि-विचार-२ )

( १ ) 'तुम और हम मिलकर भूमि को प्राप्त करें' इस प्रकार की गई भूमि-विषयक सन्धि को भूमिसन्धि कहते हैं ।

( २ ) शत्रु और विजिगीषु, दोनों में जो भी धन और गुणी भृत्यों को शीघ्र उपस्थित कर सम्पन्न भूमि को प्राप्त करता है, वह विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) दोनों को समान रूप से सम्पन्न भूमि के प्राप्त हो जाने पर भी जो बलवान् शत्रु पर आक्रमण करके भूमि को प्राप्त करता है वही विशेष लाभ में रहता है; क्योंकि एक तो उसे भूमि का लाभ होता है और दूसरे अपने बलवान् शत्रु का नाश कर वह अपने प्रताप का भी विस्तार करता है । यद्यपि दुर्बल से भूमि प्राप्त करना निःसन्देह सुगम है, तथापि इस प्रकार का भूमि लाभ निकृष्ट कोटि का होता है: क्योंकि यह लाभ दुर्बल की हिंसा करके प्राप्त होता है और दूसरे में दुर्बल के पड़ोसी सामंत तथा विजिगीषु के मित्र भी उसके आचरण से क्षुब्ध होकर उसके शत्रु बन जाते हैं । इसलिए दुर्बल से भूमि लेना श्रेयस्कर नहीं है ।

( ४ ) दो समान बलशाली शत्रुओं के होने पर, जो विजिगीषु स्थायी शत्रु का नाश कर भूमि प्राप्त करता है, वही विशेष लाभ में है; क्योंकि शत्रु के दुर्ग आदि अपने हाथों में आ जाने पर विजिगीषु की भूमि की रक्षा हो जाती है और आटविकों का प्रतीकार करना भी उसके लिए सरल हो जाता है ।

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प्र० ११६ : अ० १० ] सन्धि विचार ( २ ) ५०१

(१) चलामित्राद्भूमिलाभे शक्यसामन्ततो विशेषः । दुर्बलसामन्ता हि क्षिप्राप्यायनयोगक्षेमा भवति । विपरीता बलवत्सामन्ता कोशदण्डावच्छेदनी च भूमिर्भवति ।

(२) सम्पन्ना नित्याममित्रा मन्दगुणा वा भूमिरनित्याममित्रेति । 'सम्पन्ना नित्याममित्रा श्रेयसी भूमिः । सम्पन्ना हि कोशदण्डौ सम्पादयति । तौ चामित्रप्रतिघातकौ' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः—नित्याममित्रालाभे भूयाञ्छत्रुलाभो भवति । नित्यश्च शत्रुरुपकृते चापकृते च शत्रुरेव भवति । अनित्यस्तु शत्रुरुपकारादनपकाराद्वा शाम्यति ।

(४) यस्या हि भूमेर्बहुदुर्गाश्चोरगणैर्म्लेंच्छाटवीभिर्वा नित्याविरहताः प्रत्यन्ताः, सा नित्याममित्रा । विपर्यये त्वनित्याममित्रेति ।

(५) अल्पा प्रत्यासन्ना महती व्यवहिता वा भूमिरिति । अल्पा प्रत्यासन्ना श्रेयसी । सुखा हि प्राप्तुं पालयितुमभिसारयितुं च भवति । विपरीता व्यवहिता ।


( १ ) चलायमान शत्रु से भूमि लाभ करने पर उसी दशा में विशेष लाभ होता है जब उस चलायमान शत्रु का पड़ोसी दुर्बल हो; क्योंकि ऐसी भूमि विजिगीषु को शीघ्र ही योग क्षेम की देने वाली होती है। इसके विपरीत जिस विजित भूमि का सामन्त बलवान् हो वह सर्वदा अनिष्टकर होती है; विजिगीषु के कोश और बल को क्षीण करने वाली होती है ।

( २ ) 'विजिगीषु के लिए सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है या अत्यल्प सम्पन्न एवं अनित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है ?' इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का मन्तव्य है कि सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि सम्पन्न भूमि के द्वारा कोश तथा सेना, दोनों को बढ़ाया जा सकता है, जिससे कि शत्रुओं का उच्छेद किया जा सकता है ।

( ३ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य को स्वीकार नहीं करता है । उसका कहना है कि नित्य शत्रु की भूमि लेने से शत्रुता बहुत बढ़ जाती है; क्योंकि जो नित्य शत्रु है उसका उपकार किया जाय या अपकार; वह रहता शत्रु ही है । किन्तु अनित्य शत्रु का उपकार या अपकार करने पर वह शान्त हो जाता है ।

( ४ ) जिस भूमि के सीमा प्रान्तों के बहुत से दुर्ग चोरों, म्लेच्छों तथा आटविकों से सदा घिरे रहते हैं वह भूमि नित्याममित्रा कहलाती है; और इसके विपरीत भूमि अनित्याममित्रा कहलाती है ।

( ५ ) 'प्राप्त होने वाली भूमियों में निकटवर्ती थोड़ी भूमि ठीक है या दूर की

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५०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) व्यवहिताव्यवहितयोरपि दण्डधारणात्मधारणा वा भूमिरिति । आत्मधारणा श्रेयसी । सा हि स्वसमुत्थाभ्यां कोशदण्डाभ्यां धार्यते । विपरीता दण्डधारणा दण्डस्थानमिति ।
(२) बालिशात् प्राज्ञाद् वा भूमिलाभ इति । बालिशाद् भूमिलाभः श्रेयान् । सुप्राप्यानुपाल्या हि भवत्यप्रत्यादेया च । विपरीता प्राज्ञादनुरक्तेति ।
(३) पीडनीयोच्छेदनीययोरुच्छेदनीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । उच्छेदननीयो ह्यनपाश्रयो दुर्बलापाश्रयो वाभियुक्तः कोशदण्डावादायापसर्तुकामः प्रकृतिभिस्त्यज्यते । न पीडनीयो दुर्गमित्रप्रतिस्तब्ध इति ।
(४) दुर्गप्रतिस्तब्धयोरपि स्थलनदीदुर्गीयाभ्यां स्थलदुर्गीयाद् भूमि-


बहुत-सी भूमि' ऐसी स्थिति में समीप की थोड़ी भूमि ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सरलता से उसकी प्राप्ति और रक्षा की जा सकती है और विपत्ति काल में उसका आश्रय लिया जा सकता है। परन्तु बहुत दूर की अधिक भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है।

(१) 'दूर और पास की भूमि में पर-रक्षित भूमि लेना ठीक है या स्वयं रक्षित भूमि ?' इन दोनों में स्वयं रक्षित भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि स्वयं स्थापित कोष और सेना द्वारा उसकी रक्षा की जा सकती है । किन्तु पररक्षित भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है; क्योंकि दूसरे के स्थापित कोष और सेना द्वारा उसकी रक्षा की जाती है।

(२) 'मूर्ख शत्रु और बुद्धिमान् शत्रु दोनों में किससे भूमि प्राप्त करना श्रेयस्कर है ?' मूर्खशत्रु राजा से भूमि लेना श्रेयस्कर है; क्योंकि वह बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाती है और एक तो उसकी रक्षा सुगमता से की जा सकती है तथा दूसरे वह लौटानी भी नहीं पड़ती है। परन्तु बुद्धिमान् शत्रु राजा से प्राप्त भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है; उसके प्रकृतिजन तथा प्रजाजन उसमें सदा ही अनुराग रखने वाले होते हैं।

(३) पीडनीय और उच्छेदनीय, इन दोनों शत्रु राजाओं में उच्छेदनीय शत्रु की भूमि लेना श्रेयस्कर है; क्योंकि निराश्रय तथा दुर्बल आश्रय का होने के कारण, जब उस पर चढ़ाई की जाती है तो, वह सेना तथा कोष सहित भाग निकलता है। ऐसी दशा में प्रकृति जन उसकी सहायता नहीं करते । परन्तु पीडनीय शत्रु दुर्ग और मित्रों की सहायता प्राप्त करके अपने ही स्थान पर जमा रहता है। उसके प्रकृति जन भी उससे अनुराग रखते हैं ।

(४) दुर्गों से सुरक्षित शत्रुओं में स्थल दुर्ग में रहने वाले शत्रु की भूमि प्राप्त करना ठीक है या नदी दुर्ग में रहने वाले शत्रु की ?' स्थल दुर्ग में रहने वाले शत्रु की

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प्र० ११६ : अ० १०] सन्धि विचार (२) ५०३

लाभः श्रेयान् । स्थलीयं हि सुरोधावमर्दावस्कन्दमनिःस्राविशत्रु च । नदी-
दुर्गं तु द्विगुणक्लेशकरमुदकं च पातव्यं वृत्तिकरं चामित्रस्य ।
(१) नदीपर्वतदुर्गीयाभ्यां नदीदुर्गीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । नदीदुर्गं
हि हस्तिस्तम्भसङ्क्रमसेतुबन्धनौभिः साध्यमनित्यगाम्भीर्यमवस्त्राव्युदकं च,
पार्वतं तु स्वारक्षं दुरपरोधि कृच्छ्रारोहणं भग्ने चैकस्मिन् न सर्ववधः,
शिलावृक्षप्रमोक्षश्च महापकारिणाम् ।
(२) निम्नस्थलयोधिभ्यो निम्नयोधिभ्यो भूलाभः श्रेयान् । निम्नयो-
धिनो ह्यपरुद्धदेशकालाः, स्थलयोधिनस्तु सर्वदेशकालयोधिनः ।
(३) खनकाकाशयोधिभ्यः खनकेभ्यो भूमिलाभः श्रेयान् । खनका हि
खातेन शस्त्रेण चोभयथा युध्यन्ते, शस्त्रेणैवाकाशयोधिनः ।


भूमि लेना ही ठीक है; क्योंकि स्थल-दुर्ग को सरलता से घेरा जा सकता है, उच्छिन्न किया जा सकता है और शत्रु को भी उससे भाग निकलने का सुयोग नहीं मिल पाता है । इसलिए शीघ्र ही वह आक्रमणकारी की आधीनता स्वीकार कर लेता है । परन्तु नदी-दुर्ग को इससे दुगुना कष्ट उठा कर भी काबू में नहीं किया जा सकता है । वहाँ पर जल और जलाधीन अन्न, फल आदि के होने से शत्रु के निर्वाह में कोई बाधा नहीं पड़ती । इसलिए उसका उच्छेद करना कठिन होता है ।

(१) नदी दुर्ग और पर्वत दुर्ग दोनों में से नदी दुर्ग में रहने वाले राजा से ही भूमि लाभ होना श्रेष्ठ है; क्योंकि हाथी, लकड़ी, पुल, बाँध और नौकाओं द्वारा पार करके उसको हस्तगत किया जा सकता है । किनारों को तोड़ कर उसके जल को भी निकाला जा सकता है । परन्तु पर्वतीय दुर्ग पत्थर आदि से सुदृढ़ बना होने के कारण न तो उसको सरलता से घेरा जा सकता है और न ही उस पर चढ़ा जा सकता है । अस्त्रों में से एक को ही नष्ट किया जा सकता है बाकी सुरक्षित बने रहते हैं । बड़े शक्तिशाली आक्रमणकारी का भी, ऊपर से पत्थर, पेड़ आदि गिरा कर प्रतीकार किया जा सकता है ।

(२) निम्नयोधी (नौका में बैठ कर युद्ध करने वाले) और स्थलयोधी शत्रुओं में निम्नयोधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके युद्ध का निश्चित समय एवं निश्चित स्थान होता है । इसलिए उस पर विजय प्राप्त करना कठिन नहीं है । परन्तु स्थलयोधी सभी परिस्थितियों में युद्ध करता है । इसलिए उसको शीघ्र ही नहीं जीता जा सकता है ।

(३) खनकयोधी (खाई युद्ध करने वाले) और आकाशयोधी शत्रुओं में खनक योधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उनके लिए खाई तथा अस्त्र दोनों की आवश्यकता होती है । कभी-कभी खाई के लिए उचित स्थान न मिलने के कारण वे

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५०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) एवंविधेभ्यः पृथिवीं लभमानोऽर्थशास्त्रवित् ।
संहितेभ्यः परेभ्यश्च विशेषमधिगच्छति ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे भूमिसन्धिर्नाम दशमोऽध्यायः,
आदितः सप्तशततमः ।

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युद्ध नहीं करने पाते हैं । इसलिए उनको सरलता से वश में किया जा सकता है । परन्तु आकाशयोधी शत्रु केवल शस्त्र द्वारा ही युद्ध करता है । इसलिए उसको जीतना कठिन है ।

( १ ) इस प्रकार अर्थशास्त्रज्ञ विजिगीषु राजा, ऊपर बताये गए संहित एवं दूसरे राजाओं से, पृथ्वी को प्राप्त करता हुआ अपनी उन्नति करता जाय ।

इति षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में भूमिसन्धि नामक दसवां अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण ११६
अध्याय ११

अनवसितसन्धि


(१) 'त्वं चाहं च शून्यं निवेशयावह' इत्यनवसितसन्धिः ।
(२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थो यथोक्तगुणां भूमिं निवेशयति सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तत्रापि स्थलमौदकं वेति । महतः स्थलादलपमौदकं श्रेयः, सातत्यादवस्थितत्वाच्च फलानाम् ।
(४) स्थलयोरपि प्रभूतपूर्वापरसस्यमल्पवर्षपाकमसक्तारम्भं श्रेयः ।
(५) औदकयोरपि धान्यवापमधान्यवापाच्छ्रेयः । तयोरल्पबहुत्वे धान्यकान्तादलपान्महद्धान्यकान्तं श्रेयः । महत्यवकाशे हि स्थाल्याश्चानूप्याश्चौषधयो भवन्ति । दुर्गादीनि च कर्माणि प्राभूत्येन क्रियन्ते । कृत्रिमा हि भूमिगुणाः ।


अनवसित संधि

( संधि-विचार ३ )

( १ ) 'आओ, तुम और हम मिलकर शून्य भूमि में उपनिवेश बसायें !' इस प्रकार से जो सन्धि की जाय उसको अनवसित ( अनिश्चित ) सन्धि कहते हैं ।

( २ ) उन दोनों में से जो, पूर्ण साधनों को साथ लेकर पूर्वोक्त गुणसंपन्न भूमि में उपनिवेश बसाता है वही विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) सर्वगुणसंपन्न स्थलभूमि और जलभूमि, दोनों में जलभूमि को बसाना ही श्रेष्ठ है । अधिक स्थलभूमि की अपेक्षा थोड़ी ही जलभूमि अच्छी है; क्योंकि सदा ही वह फल-फूल आदि से गुलजार बनी रहती है ।

( ४ ) दो स्थल भूमियों में भी वही स्थलभूमि अच्छी होती है, जहाँ वसंत और शरद की फसलें एक समान अच्छी होती हैं तथा जहाँ थोड़ी ही वृष्टि से फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं और जिनको सरलता से जोता-बोया जा सकता है ।

( ५ ) दो जलमय भूमियों में वही भूमि उत्तम है, जहाँ सभी धान्य बोये जा सकें और जहाँ धान्य न हों वह भूमि अच्छी नहीं है । उनमें भी कम-ज्यादा को दृष्टि में रखकर उपजाऊ अधिक भूमि ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अधिक विस्तार होने से उसके जल स्थल युक्त विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के अन्न उपजाये जा सकते हैं । क्योंकि

५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

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५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) खनिधान्यभोगयोः खनिभोगः कोशकरः, धान्यभोगः कोशकोष्ठा-गारकरः धान्यमूला हि दुर्गादीनां कर्मणामारम्भाः । महाविषयविक्रयो वा खनिभोगः श्रेयान् ।

(२) 'द्रव्यहस्तिवनभोगयोर्द्रव्यवनभोगः सर्वकर्मणां योनिः प्रभूतनिधान-क्षमश्च । विपरीतो हस्तिवनभोगः' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । शक्यं द्रव्यवनमनेकमनेकस्यां भूमौ वापयितुं न हस्तिवनं, हस्तिप्रधानो हि परानीकवध इति ।

(४) वारिस्थलपथभोगयोरनित्यो वारिपथभोगः, नित्यः स्थलपथभोग इति ।

(५) भिन्नमनुष्या श्रेणीमनुष्या वा भूमिरिति । भिन्नमनुष्या श्रेयसी ।


भूमि को अधिक उपजाऊ बनाना अपने हाथ में निर्भर है; इसलिए अधिक भूमि को लेना ही श्रेष्ठ है ।

( १ ) खानयुक्त तथा धान्ययुक्त भूमियों में खानयुक्त भूमि केवल कोष की वृद्धि करती है; किन्तु धान्ययुक्त भूमि कोष और कोष्ठागार दोनों को संपन्न करती है । क्योंकि दुर्ग आदि कर्मों की उन्नति भी धान्यमूलक ही है; अतः धान्ययुक्त भूमि ही श्रेयस्कर होती है । अथवा खानयुक्त भूमि भी उत्तम है, क्योंकि वहाँ से उत्पन्न वस्तुओं का बड़ा भारी व्यापार किया जा सकता है ।

( २ ) 'लकड़ी के जंगल और हाथी के जंगल, दोनों में से कौन श्रेष्ठ है ?' इस संबंध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि लकड़ियों का जंगल ही श्रेष्ठ है; क्योंकि एक तो दुर्ग आदि कर्मों में लकड़ी की बड़ी आवश्यकता होती है और दूसरे उसका अधिक-से अधिक संचय सरलता से किया जा सकता है । किन्तु हाथी के जंगलों में यह उपयो-गिता नहीं होती है ।

( ३ ) आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है । उसका कथन है कि 'लकड़ी के जंगल अपनी इच्छानुसार बनाये जा सकते हैं; हाथियों के जंगल स्वयं नहीं बनाये जा सकते हैं । शत्रु की सेना को नाश करने वाले साधनों में हाथी प्रमुख साधन है । इसलिए हाथियों के जंगल ही श्रेष्ठ हैं ।'

( ४ ) जलमार्ग और स्थलमार्ग में दोनों ही अनित्य ( अस्थायी ) हों तो उनमें जलमार्ग ही उत्तम है । यदि दोनों ही नित्य ( स्थायी ) हों तो स्थलमार्ग ही उत्तम समझना चाहिए ।

( ५ ) 'भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि अच्छी है या समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि श्रेष्ठ है ?' इन दोनों में भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ समझनी

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प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०७

भिन्नमनुष्याभोग्या भवत्यनुपजाप्या चान्येषाम् । अनापत्सहा तु । विपरीता श्रेणीमनुष्या कोपे महादोषा ।
(१) तस्यां चातुर्वर्ण्याभिनिवेशे सर्वभोगसहत्वादवरवर्णप्राया श्रेयसी । बाहुल्याद्ध्रुवत्वाच्च कृष्याः कर्षणवती । कृष्याश्चान्येषां चारम्भाणां प्रयोजकत्वाद् गोरक्षकवती । पण्यनिचयार्णनुग्रहादाढ्यवणिक्वती ।
(२) भूमिगुणानामपाश्रयः श्रेयान् ।
(३) दुर्गापाश्रया पुरुषापाश्रया वा भूमिरिति । पुरुषापाश्रया श्रेयसी । पुरुषवद्धि राज्यम् । अपुरुषा गौर्वन्ध्येव किं दुहीत ।
(४) महाक्षयव्ययनिवेशां तु भूमिमवाप्तुकामः पूर्वमेव क्रेतारं पणेत । दुर्बलमराजबीजिनं निरुत्साहमपक्षमन्‍यायवर्त्तिं व्यसनिनं दैवप्रमाणं यत्किञ्चनकारिणं वा ।


चाहिए; क्योंकि ऐसी भूमि को विजिगीषु शीघ्र ही अपने कब्जे में कर लेता है, और क्योंकि भिन्न प्रकृति के कारण दूसरे शत्रु भी उन्हें बहका नहीं सकते हैं । ऐसे लोग आपत्तिसह भी नहीं होते हैं । किन्तु समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि को शत्रु बहका सकते हैं । एकता के कारण वहाँ की प्रजा हर तरह की आपत्तियों को सहन करने के लिए तैयार रहती हैं और कुपित होने पर राजा का भी उच्छेद कर देती है ।

( १ ) उस भूमि में चारों वर्णों के लोगों की स्थिति के संबंध में यह विचार कर लेना चाहिए कि सब तरह के दुःख-सुख सहन करने वाले शूद्र, ग्वाले आदि नीची जाति के मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ होती है । क्योंकि खेती की अधिकता और निश्चित फलवती होने के कारण ऐसी भूमि श्रेयस्कर होती है । कृषि संबंधी व्यापार तथा अन्य अनेक कार्य गाय एवं गोपालकों पर ही निर्भर हैं । इसलिए गाय और ग्वालों से युक्त भूमि ही श्रेष्ठ है । व्यापार के लिए धान्य आदि का संचय तथा ब्याज पर ऋण आदि देकर उपकार करने के कारण व्यापारी और धनवान् व्यक्तियों से युक्त भूमि भी श्रेष्ठ होती है ।

( २ ) भूमि के उक्त सभी गुणों में से आश्रय या रक्षा, उसके सर्वोच्च गुण हैं ।

( ३ ) 'दुर्गों का आश्रय देने वाली भूमि अच्छी होती है या मनुष्यों का ?' इन दोनों में मनुष्यों का सहारा देने वाली भूमि श्रेष्ठ है, क्योंकि राज्य कहते ही उसको है, जहाँ बहुत से पुरुष निवास करते हों; 'पुरुषवद्धि राज्यम्' । पुरुषहीन भूमि तो वन्ध्या गो के समान है ।

( ४ ) जन-धन का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने वाली भूमि को यदि विजिगीषु प्राप्त करना चाहे तो पहिले वह उस भूमि का ऐसा खरीदार राजा तैयार कर ले, जो दुर्बल, अराजजीवी ( जो किसी राजवंश का न हो ), उत्साहहीन, अपक्ष

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५०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) महाक्षयव्ययनिवेशायां हि भूमौ दुर्बलो राजबीजी निविष्टः सगन्धाभिः प्रकृतिभिः सह क्षयव्ययेनावसीदति ।
(२) बलवानराजबीजी क्षयव्ययभयादसगन्धाभिः प्रकृतिभिस्त्यज्यते ।
(३) निरुत्साहस्तु दण्डवानपि दण्डस्याप्रणेता सदण्डः क्षयव्ययेनावभज्यते ।
(४) कोशवानप्यपक्षः क्षयव्ययानुग्रहहीनत्वान्न कुतश्चित्प्राप्नोति ।
(५) अन्यायवृत्तिर्निविष्टमप्युत्थापयेत्, स कथमिनिविष्टं निवेशयेत् ।
(६) तेन व्यसनी व्याख्यातः ।
(७) दैवप्रमाणो मानुषहीनो निरारम्भो विपन्नकर्मारम्भो वावसीदति ।
(८) यत्किञ्चनकारी न किंचिदासादयति । स चैषां पापिष्ठतमो भवति ।

( बेसहारा ), अन्यायवृत्ति, व्यसनी, भाग्यवादी और यत्किंचनकारी ( जो मन में आया, कर दिया ) हो ।

( १ ) जन-धन आदि का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने योग्य भूमि में जब शक्तिहीन राजवंश में पैदा हुआ राजा उपनिवेश बसाता है तो अत्यधिक पुरुषों का 'क्षय और धन का व्यय होने के कारण अपने सहायकों, सजातियों और अमात्य आदि प्रकृतियों के साथ वह क्षीण हो जाता है ।

( २ ) राजवंश में पैदा न हुए बलवान् राजा को क्षय-व्यय के भय से उसके विजातीय अमात्य आदि सहायक उसको छोड़ देते हैं ।

( ३ ) सेना के होते हुए भी उत्साहहीन राजा उसका यथोचित उपयोग नहीं कर पाता है । इसलिए धन-जन का व्यय-क्षय हो जाने के कारण सेना के सहित ही वह नष्ट हो जाता है ।

( ४ ) कोषसंपन्न मित्रहीन राजा क्षय-व्यय में उचित सहायता न मिलने के कारण नष्ट हो जाता है ।

( ५ ) प्रजा पर अन्याय करने वाले स्थायी रूप से बसे हुए राजा को जब प्रजा उखाड़ फेंकती है तब नये उपनिवेशों को बसाना उसके लिए कैसे संभव हो सकता है ?

( ६ ) यही हाल व्यसनी राजा का भी होता है ।

( ७ ) भाग्य पर भरोसा करने वाला पौरुषहीन राजा किसी नये कार्य को आरंभ नहीं करता है; यदि आरंभ करता भी है तो विघ्न के भय से उसे अधूरा ही छोड़ देता है; और इस प्रकार जन-धन की व्यर्थ हानि करने के बाद वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।

( ८ ) बिना विचारे कार्य करने वाला राजा कभी फूलता-फलता नहीं है; किन्तु

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प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०९

(१) 'यत्किंचिदारभमाणो हि विजिगीषोः कदाचिच्छिद्रमासादयेत्' इत्याचार्याः।
(२) 'यथा छिद्रं तथा विनाशमप्यासादयेत्' इति कौटिल्यः ।
(३) तेषामलाभे यथा पाष्णिग्राहोपग्रहे वक्ष्यामस्तथा भूमिमवस्थाप-
येत् । इत्यभिहितसन्धिः ।
(४) गुणवतीमादेयां वा भूमिं बलवता क्रयेण याचितः सन्धिमवस्थाप्य
दद्यात् । इत्यनिभृतसन्धिः ।
(५) समेन वा याचितः कारणमवेक्ष्य दद्यात् । 'प्रत्यादेया मे भूमि-
र्वश्या वा, अनया प्रतिबद्धः परो मे वश्यो भविष्यति, भूमिविक्रयाद्वा मित्र-
हिरण्यलाभः कार्यसामर्थ्यकरो मे भविष्यति' इति ।

ऊपर कहे गए सभी राजाओं की अपेक्षा विजिगीषु के लिए वह बहुत खतरनाक सिद्ध होता है ।

( १ ) पूर्वाचार्यों का कहना है कि किसी कार्य को प्रारंभ करता हुआ शत्रु यदि विजिगीषु के किसी दोष का पता लगा ले तो वह यत्किंचनकारी राजा के द्वारा विजिगीषु को हानि पहुँचा सकता है; क्योंकि विजिगीषु उसे मूर्ख समझ कर उससे पीठ फेरे रहता है ।

( २ ) परन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि वह यत्किंचनकारी विजिगीषु के दोषों को जानने की तरह स्वयं को भी नष्ट कर सकता है; क्योंकि विजिगीषु तो उसके अनेक दोषों से परिचित रहता है ।

( ३ ) यदि इन उपर्युक्त राजाओं में से कोई उस व्यय-क्षयी भूमि को खरीदने के लिए तैयार न हो तो जो तरीका आगे पाष्णिग्राह के साथ सन्धि के लिए बताया जायेगा उसी के अनुसार उस भूमि को बसाने की व्यवस्था करे । इसीका नाम अभिहितसंधि है । अभिहितसन्धि, अर्थात् लेन-देन से विचलित न होकर बराबर बनी रहना ।

( ४ ) गुणवती और अदेय भूमि को यदि बलवान् सामंत खरीदना चाहे तो उससे 'अवसर आने पर आप मेरी सहायता करेंगे' ऐसी सामान्य संधि करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए, क्योंकि प्रबल सामंत दुर्बल से अविश्वास करके अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ भी सकता है । इसको अनिभृतसन्धि कहते हैं ।

( ५ ) यदि समानशक्ति राजा उस भूमि को खरीदना चाहे तो नीचे लिखे कारणों पर अच्छी तरह विचार करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए । वे कारण हैं : बेच देने पर यह भूमि कालान्तर में मेरे पास आ सकेगी, अथवा बेच देने पर भी मैं इससे लाभ उठाता रहूँगा, अथवा इस भूमि के साथ संबंध बना रहने के कारण दूसरा

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५१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) तेन हीनः क्रेता व्याख्यातः ।
(२) एवं मित्रं हिरण्यं च सजनामजनां च गाम् ।
लभमानोऽतिसन्धत्ते शास्त्रवित्सामवायिकान् ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणेऽनवसितसन्धिनार्म एकादशोऽध्यायः,
आदितोऽष्टशततमः ।

—: ० :—


शत्रु मेरे वश में हो जायेगा, अथवा इसको बेच देने पर मैं मित्र तथा धन-संपति से संपन्न हो जाऊँगा ।'

( १ ) इसी प्रकार हीनशक्ति खरीददार के संबंध में भी समझना चाहिए ।

( २ ) अर्थशास्त्रज्ञ राजा इस प्रकार मित्र, धन, संपत्ति, आवाद और वंजर भूमि को प्राप्त करता हुआ दूसरे राजाओं की अपेक्षा सदा ही विशेष लाभ प्राप्त करता है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में अनवसितसन्धि नामक
ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण ११६
अध्याय १२# कर्मसन्धि

(१) ‘त्वं चाहं च दुर्गं कारयावहे’ इति कर्मसन्धिः ।
(२) तयोर्यो दैवकृतमविषह्यमल्पव्ययारम्भं दुर्गं कारयति, सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तत्रापि स्थलनदीपर्वतदुर्गाणामुत्तरोत्तरं श्रेयः ।
(४) सेतुबन्धयोरप्याहार्योदकात्सहोदकः श्रेयान् । सहोदकयोरपि प्रभूतवापस्थानः श्रेयान् ।
(५) द्रव्यवनयोरपि यो महत् सारवद्द्रव्याटवीकं विषयान्ते नदीमातृकं द्रव्यवनं छेदयति, सोऽतिसन्धत्ते । नदीमातृकं हि स्वाजीवमपाश्रयश्चापदि भवति ।
(६) हस्तिवनयोरपि यो बहुशूरमृगं दुर्बलप्रतिवेशमन्तावक्लेशं विषयान्ते हस्तिवनं बध्नाति, सोऽतिसन्धत्ते ।


कर्मसन्धि

( सन्धि-विचार ४ )

( १ ) ‘आप और मैं मिलकर दुर्ग बनवायें’ इस प्रकार किसी कार्य सम्बन्धी वस्तु का नाम लेकर जो सन्धि की जाती है उसको कर्मसन्धि कहते हैं।

( २ ) इस प्रकार की सन्धि करने वाले विजिगीषु और उसका साथी राजा, दोनों में से वही विशेष लाभ में रहता है जो शत्रुओं से दुर्भेद्य दुर्गम स्थान में अल्प व्यय करके दुर्ग बनवाता है।

( ३ ) ऐसे दुर्गों में भी स्थल में बने दुर्ग की अपेक्षा जल में बना दुर्ग श्रेष्ठ है और उससे भी पर्वतीय प्रदेश में बना हुआ दुर्ग श्रेष्ठ होता है।

( ४ ) सेतुबंधों में वर्षा जल से भरने वाले की अपेक्षा स्वाभाविक अर्थात् नहर आदि के जल से भरने वाला सेतुबंध उत्तम है। उनमें भी वह सेतुबन्ध श्रेष्ठ है जो खेती योग्य पर्याप्त भूमि के निकट हो।

( ५ ) जो राजा अनेक पदार्थों को पैदा करने वाले जंगलों में नदियों से सींचे जाने योग्य फल-फूलों को पैदा करने वाले अपने सीमाप्रान्त के जंगलों को ठीक करता है। वही विशेष लाभ में रहता है। क्योंकि नदियों से सींचे जाने वाले स्थान आजीविका के साधन होने के साथ-साथ विपत्ति काल में आश्रय देने वाले भी होते हैं।

( ६ ) हाथी और मृग के जंगलों में भी जो राजा शक्तिशाली जंगली जानवरों

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५१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) तत्रापि 'बहुकुण्ठालपशूरयोरल्पशूरं श्रेयः। शूरेषु हि युद्धम्। अल्पाः शूरा बहूनशूरान् भञ्जन्ति, ते भग्नाः स्वसैन्यावघातिनो भवन्ति' इत्याचार्याः।

(२) नेति कौटिल्यः। कुण्ठा बहवः श्रेयांसः, स्कन्धविनियोगादनेकं कर्म कुर्वाणाः स्वेषामपाश्रया युद्धे, परेषां दुर्धर्षा विभीषणाश्च।

(३) बहुषु हि कुण्ठेषु विनयकर्मणा शक्यं शौर्यमाधातुं, न त्वेवाल्पेषु शूरेषु बहुत्वमिति।

(४) खन्योरपि यः प्रभूतसारामदुर्गमार्गामल्पव्ययारम्भां खनिं खानयति, सोऽतिसन्धत्ते।

(५) तत्रापि 'महासारमल्पसारं वा प्रभूतमिति। महासारमल्पं श्रेयः। वज्रमणिमुक्ताप्रवालहेमरूप्यधातुर्हि प्रभूतमल्पसारमत्यर्थेण ग्रसते' इत्याचार्याः।


से युक्त, दुर्बलों के लिए भी सुखकर और अनेक जाने-आने के मार्गों से युक्त हस्तिवनों को अपने प्रदेश में स्थापित करता है वह विशेष लाभ में रहता है।

(१) उन हाथी के जंगलों में भी अशक्त अधिक संख्यावाले हस्तिवन की अपेक्षा शक्तिशाली थोड़े हाथियों वाले जंगल ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि बलवान् हाथियों के भरोसे ही युद्ध होता है। इसके विपरीत पुरातन आचार्यों का कहना है कि अल्पसंख्यक शूर हाथी बहुसंख्यक कायर हाथियों को भगा देते हैं और वे तितर-वितर हो कर अपनी ही सेना को कुचल डालते हैं।

(२) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कथन है कि शक्तिहीन बहुत हाथियों का होना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सेना के अनेक विभागों में उनसे अनेक कार्य लिए जा सकते हैं। इसलिए युद्ध में वे अच्छे सहायक, शत्रुओं को घबड़ा देने वाले (अधिक होने के कारण) और शत्रु के वश में न आने वाले होते हैं।

(३) संख्या में अधिक हाथी यदि सामर्थ्यहीन भी हों तो कोई हानि नहीं है; क्योंकि युद्ध सम्बन्धी शिक्षाओं के द्वारा उन्हें समर्थ बनाया जा सकता है; किन्तु शक्तिशाली थोड़े हाथियों की संख्या सहसा बढ़ाई नहीं जा सकती है।

(४) खानों में भी, जो राजा उत्तम वस्तुएँ देने वाली, दुर्गम मार्गों से युक्त और अल्प व्ययकर खानों को खुदवाता है वह विशेष लाभ प्राप्त करता है।

(५) उन खानों में भी मणि-माणिक्य आदि बहुमूल्य वस्तुओं को थोड़े परिमाण में उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? अथवा अधिक परिमाण वाली अल्पमूल्य की वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का कथन है कि 'बहुमूल्य थोड़ी वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान अच्छी है; क्योंकि हीरा,

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प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१३

(१) नेति कौटिल्यः। चिरादल्पो महासारस्य क्रेता विद्यते। प्रभूतः सातत्यादल्पसारस्य।
(२) एतेन वणिकपथो व्याख्यातः।
(३) तत्रापि 'वारिस्थलपथयोर्वारिपथः श्रेयान्, अल्पव्ययव्यायामः प्रभूतपण्योदयश्च' इत्याचार्याः।
(४) नेति कौटिल्यः। संरुद्धगतिरसार्वकालिकः प्रकृष्टभययोनिर्निष्प्रतिकारश्च वारिपथः। विपरीत: स्थलपथः।
(५) वारिपथे तु कूलसंयानपथयोः कूलपथः पण्यपट्टणबाहुल्याच्छ्रेयान्। नदीपथो वा सातत्याद्विषह्याबाधत्वाच्च।
(६) स्थलपथेऽपि। 'हैमवतो दक्षिणापथाच्छ्रेयान् हस्त्यश्वगन्धदन्ताजिनरूप्यसुवर्णपण्याः सारवत्तराः' इत्याचार्याः।

मणि, मोती, मूंगा, सोना, चाँदी आदि बहुमूल्य थोड़ी वस्तुएँ, अल्प मूल्य की अधिक वस्तुओं को भी दबा लेती हैं।'

( १ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य से सहमत नहीं है। वह कहता है कि 'मूल्यवान् वस्तु का खरीददार बहुत समय बाद कोई विरला ही मिलता है; किन्तु अल्पमूल्य वस्तुओं के खरीदारों की कमी नहीं रहती है।'

( २ ) इसी प्रकार व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए।

( ३ ) स्थलमार्ग और जलमार्ग में से जलमार्ग द्वारा व्यापार करना श्रेयस्कर है; क्योंकि उसमें श्रम तथा व्यय अधिक नहीं करना पड़ता और उसके द्वारा माल आसानी से लाया-ले-जाया जा सकता है—ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है।

( ४ ) इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'विपत्तिकाल में जलमार्ग सब ओर से रोका जा सकता है। सभी ऋतुओं में उससे जाना-आना भी नहीं हो सकता है। स्थल मार्ग की अपेक्षा वह भयजनक और अप्रतीकारक भी है। किन्तु स्थल मार्ग में ये सभी दिक्कतें नहीं होती हैं। इसलिए स्थलमार्ग ही श्रेष्ठ है।'

( ५ ) जलमार्ग दो प्रकार का होता है : एक तो किनारे-किनारे का मार्ग ( कूलपथ ) और दूसरा जल के बीच का मार्ग ( संयानपथ )। इन दोनों में कूलपथ ही श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उस पर अनेक व्यापारिक नगर बसे होते हैं, जिससे बड़ा लाभ उठाया जा सकता है। अथवा संयानपथ भी उत्तम समझना चाहिए; क्योंकि नदी में निरन्तर पानी भरा रहता है, जिससे मार्ग में कोई उत्कट बाधा उपस्थित नहीं हो पाती है।

( ६ ) 'स्थलमार्ग में भी दक्षिणापथ की अपेक्षा उत्तरापथ श्रेष्ठ है, क्योंकि उस

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५१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

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५१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । कम्बलाजिनाश्वपण्यवर्ज्याः शंखवज्रमणिमुक्ता-सुवर्णपण्याश्च प्रभूततरा दक्षिणापथे ।

(२) दक्षिणापथेऽपि बहुखनिः सारपण्यः प्रसिद्धगतिरल्पव्यायामो वा वणिक्पथः श्रेयान् । प्रभूतविषयो वा फल्गुपण्यः ।

(३) तेन पूर्वः पश्चिमश्च वणिक्पथो व्याख्यातः ।

(४) तत्रापि चक्रपादपथयोश्चक्रपथो विपुलारम्भत्वाच्छ्रेयान् । देशकालसम्भावनो वा खरोष्ट्रपथः ।

(५) आभ्यामंसपथो व्याख्यातः ।

(६) परकर्मोदयो नेतुः क्षयो वृद्धिविपर्यये ।
तुल्ये कर्मपथे स्थानं ज्ञेयं स्वं विजिगीषुणा ॥


ओर हाथी, घोड़े, कस्तूरी, दांत, चाप, चांदी और सुवर्ण आदि बहुमूल्य विक्रेय वस्तुयें अधिकता से मिल जाती हैं।' यह प्राचीन आचार्यों का मत है ।

( १ ) परन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'कंबल, चमड़ा और घोड़े इन वस्तुओं को छोड़ कर हाथी आदि तथा शंख, हीरा, मणि, मोती, सुवर्ण आदि अन्य अनेक विक्रेय वस्तुएँ उत्तर की अपेक्षा दक्षिण की ओर अधिक होती हैं । इसलिए दक्षिणापथ ही श्रेष्ठ है ।'

( २ ) दक्षिणापथ में भी वह मार्ग उत्तम समझना चाहिए, जो खान तथा विक्रेय वस्तुओं से युक्त, आने-जाने में सुगम और थोड़े से परिश्रम से सिद्ध होने वाला हो । अथवा वह मार्ग श्रेष्ठ समझना चाहिए जहाँ थोड़े कीमत की वस्तुयें बहुतायत से मिल सकें या जहाँ बहुमूल्य वस्तुओं से अधिक खरीदार हों ।

( ३ ) इसी प्रकार पूरब और पश्चिम के व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।

( ४ ) इन व्यापारिक मार्गों में भी पैदल मार्ग की अपेक्षा सवारी योग्य मार्ग को उत्तम समझना चाहिए । क्योंकि ऐसे मार्गों से बहुत व्यापार किया जा सकता है । विक्रेय वस्तुएँ अधिक तादाद में लायी-ले जायी जा सकती हैं। देश-काल के अनुसार गधों और ऊँटों का मार्ग भी श्रेष्ठ समझना चाहिए, क्योंकि उनसे भी अधिक व्यापार किया जा सकता है ।

( ५ ) इसी प्रकार कन्धों के द्वारा भार ढोने वाले बैल आदि के व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।

( ६ ) शत्रु का अपने कार्यों से लाभ होना ही विजिगीषु का क्षय समझना चाहिए और अपने कार्यों की सिद्धि में ही सफलता समझनी चाहिए । यदि कार्यफल दोनों को बराबर मिले तो विजीगीषु को पूर्ववत् एक जैसा समझना चाहिए । उसने न तो उन्नति की न तो अवनति ।

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प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१५

(१) अल्पागमातिव्ययता क्षयो वृद्धिविपर्यये ।
समायव्ययता स्थानं कर्मसु ज्ञेयमात्मनः ॥
(२) तस्मादल्पव्ययारम्भं दुर्गादिषु महोदयम् ।
कर्म लब्ध्वा विशिष्टाः स्यादित्युक्ताः कर्मसन्धयः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे कर्मसन्धिर्नाम द्वादशोऽध्यायः आदितो नवोत्तरशततमः ।

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( १ ) थोड़ी आय तथा अधिक खर्च हो तो क्षय, इसके विपरीत वृद्धि समझनी चाहिए । इसी प्रकार बराबर आय व्यय में समान अवस्था समझनी चाहिए ।

( २ ) इसलिये विजिगीषु को चाहिए कि वह दुर्ग आदि के कार्यों में थोड़ा खर्च करके ही महान् फल प्राप्त करने की चेष्टा करे । महान् फल देने वाले कार्य को प्राप्त करके ही विजिगीषु अपने शत्रु से बढ़ सकता है । यही कर्मसन्धि है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिककरण में कर्मसन्धि नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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