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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 585

प्र० ११६ : अ० १० ] सन्धि विचार ( २ ) ५०१

(१) चलामित्राद्भूमिलाभे शक्यसामन्ततो विशेषः । दुर्बलसामन्ता हि क्षिप्राप्यायनयोगक्षेमा भवति । विपरीता बलवत्सामन्ता कोशदण्डावच्छेदनी च भूमिर्भवति ।

(२) सम्पन्ना नित्याममित्रा मन्दगुणा वा भूमिरनित्याममित्रेति । 'सम्पन्ना नित्याममित्रा श्रेयसी भूमिः । सम्पन्ना हि कोशदण्डौ सम्पादयति । तौ चामित्रप्रतिघातकौ' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः—नित्याममित्रालाभे भूयाञ्छत्रुलाभो भवति । नित्यश्च शत्रुरुपकृते चापकृते च शत्रुरेव भवति । अनित्यस्तु शत्रुरुपकारादनपकाराद्वा शाम्यति ।

(४) यस्या हि भूमेर्बहुदुर्गाश्चोरगणैर्म्लेंच्छाटवीभिर्वा नित्याविरहताः प्रत्यन्ताः, सा नित्याममित्रा । विपर्यये त्वनित्याममित्रेति ।

(५) अल्पा प्रत्यासन्ना महती व्यवहिता वा भूमिरिति । अल्पा प्रत्यासन्ना श्रेयसी । सुखा हि प्राप्तुं पालयितुमभिसारयितुं च भवति । विपरीता व्यवहिता ।


( १ ) चलायमान शत्रु से भूमि लाभ करने पर उसी दशा में विशेष लाभ होता है जब उस चलायमान शत्रु का पड़ोसी दुर्बल हो; क्योंकि ऐसी भूमि विजिगीषु को शीघ्र ही योग क्षेम की देने वाली होती है। इसके विपरीत जिस विजित भूमि का सामन्त बलवान् हो वह सर्वदा अनिष्टकर होती है; विजिगीषु के कोश और बल को क्षीण करने वाली होती है ।

( २ ) 'विजिगीषु के लिए सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है या अत्यल्प सम्पन्न एवं अनित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है ?' इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का मन्तव्य है कि सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि सम्पन्न भूमि के द्वारा कोश तथा सेना, दोनों को बढ़ाया जा सकता है, जिससे कि शत्रुओं का उच्छेद किया जा सकता है ।

( ३ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य को स्वीकार नहीं करता है । उसका कहना है कि नित्य शत्रु की भूमि लेने से शत्रुता बहुत बढ़ जाती है; क्योंकि जो नित्य शत्रु है उसका उपकार किया जाय या अपकार; वह रहता शत्रु ही है । किन्तु अनित्य शत्रु का उपकार या अपकार करने पर वह शान्त हो जाता है ।

( ४ ) जिस भूमि के सीमा प्रान्तों के बहुत से दुर्ग चोरों, म्लेच्छों तथा आटविकों से सदा घिरे रहते हैं वह भूमि नित्याममित्रा कहलाती है; और इसके विपरीत भूमि अनित्याममित्रा कहलाती है ।

( ५ ) 'प्राप्त होने वाली भूमियों में निकटवर्ती थोड़ी भूमि ठीक है या दूर की