कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) विजिगीषोरमित्रं यन्मित्रमन्तर्धितां गतम् ।
उपकारे निविष्टं वाशक्तं वानुपकारि तत् ॥
(२) प्रियं परस्य वा रक्ष्यं पूज्यसम्बन्धमेव वा ।
अनुगृह्णाति यन्मित्रं शत्रुसाधारणं हि तत् ॥
(३) प्रकृष्टभौमं सन्तुष्टं बलवच्चालसं च यत् ।
उदासीनं भवत्येतद्व्यसनादवमानितम् ॥
(४) अरेर्नेतुश्च यद्वृद्धि दौर्बल्यादनुवर्तते ।
उभयस्याप्यविद्विष्टं विद्यादुभयभावि तत् ।
(५) कारणाकरणध्वस्तं कारणाकरणागतम् ।
यो मित्रं समपेक्षेत स मृत्युमुपगूहति ॥
(६) क्षिप्रमल्पो लाभश्चिरान्महानिति वा । 'क्षिप्रमल्पो लाभः कार्य-देशकालसंवादकः श्रेयान्' इत्याचार्याः ।
(७) नेति कौटिल्यः । चिरादविनिपाती बीजसधर्मा महान् लाभः श्रेयान्, विपर्यये पूर्वः ।
( १ ) जो विजिगीषु राजा अमित्र तथा शत्रु-विजिगीषु के बीच होने के कारण मित्र हो तथा इच्छा होने पर भी जो दोनों का उपकार न कर सके वह भी उभय-भावि मित्र है।
( २ ) जो विजिगीषु का मित्र हो तथा शत्रु का भी प्रिय एवं रक्ष्य ( रक्षा किए जाने योग्य ) हो और शत्रु के साथ जिसका कोई पूज्य सम्बन्ध हो, वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।
( ३ ) दूसरे देश में रहने वाला, सन्तोषी, बलवान् और आलस्य एवं व्यसनों के कारण तिरस्कृत मित्र उपकार करने के समय उदासीन हो जाया करता है ।
( ४ ) जो मित्र दुर्बल होने के कारण शत्रु और विजिगीषु दोनों का अनुगामी होता है । किसी से भी द्वेष न करके दोनों की आज्ञा को मानता है वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।
( ५ ) अकारण गत और अकारण आगत मित्र को जो आश्रय देता है । वह निश्चय ही अपनी मौत को स्वयं बुलाता है ।
( ६ ) 'शीघ्र होने वाला थोड़ा लाभ अच्छा है या देर में होने वाला बड़ा लाभ अच्छा है?' इस पर पूर्वाचार्यों का कथन है कि शीघ्र हो जाने वाला थोड़ा लाभ श्रेयस्कर है, क्योंकि उससे देश, काल और कार्य के लाभ को जाना जा सकता है ।
( ७ ) किन्तु कौटिल्य इससे सहमत नहीं है । उसका कहना है कि देर में होने
प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९९
(१) एवं दृष्ट्वा ध्रुवे लाभे लाभांशे च गुणोदयम् ।
स्वार्थसिद्धिपरो यायात् संहितः सामवायिकैः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धिनम नवमोऽध्याय,
आदितः षट्छत्ततमः ।
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वाला विघ्नरहित बीज आदि का महान लाभ ही उत्तम है । यदि महान लाभ में निधन होने की सम्भावना हो तो शीघ्र मिलनेवाला थोड़ा ही लाभ श्रेष्ठ है ।
( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने निश्चित लाभ या लाभांश के परिणाम को ठीक तरह से जानकर दूसरे राजाओं के साथ सन्धि करके अपनी कार्य सिद्धि के लिए तत्पर रहे ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धि नामक नौवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ११६ | # भूमिसन्धि |
|---|---|
| अध्याय १० |
(१) 'त्वं चाहं च भूमिं लभावहे' इति भूमिसन्धिः ।
(२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थः सम्पन्नां भूमिमवाप्नोति सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तुल्ये सम्पन्नालाभे यो बलवन्तमाक्रम्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । भूमिलाभं शत्रुकर्शनं प्रतापं च हि प्राप्नोति । दुर्बलाद् भूमिलाभे सत्यं सौकर्यं भवति । दुर्बल एव च भूमिलाभः, तत्सामन्तश्च मित्रममित्रभावं गच्छति ।
(४) तुल्ये बलीयस्त्वे यः स्थिरं शत्रुमुत्पाट्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । दुर्गावाप्तिर्हि स्वभूमिरक्षणममित्राटवीप्रतिषेधं च करोति ।
भूमिसन्धि
( सन्धि-विचार-२ )
( १ ) 'तुम और हम मिलकर भूमि को प्राप्त करें' इस प्रकार की गई भूमि-विषयक सन्धि को भूमिसन्धि कहते हैं ।
( २ ) शत्रु और विजिगीषु, दोनों में जो भी धन और गुणी भृत्यों को शीघ्र उपस्थित कर सम्पन्न भूमि को प्राप्त करता है, वह विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) दोनों को समान रूप से सम्पन्न भूमि के प्राप्त हो जाने पर भी जो बलवान् शत्रु पर आक्रमण करके भूमि को प्राप्त करता है वही विशेष लाभ में रहता है; क्योंकि एक तो उसे भूमि का लाभ होता है और दूसरे अपने बलवान् शत्रु का नाश कर वह अपने प्रताप का भी विस्तार करता है । यद्यपि दुर्बल से भूमि प्राप्त करना निःसन्देह सुगम है, तथापि इस प्रकार का भूमि लाभ निकृष्ट कोटि का होता है: क्योंकि यह लाभ दुर्बल की हिंसा करके प्राप्त होता है और दूसरे में दुर्बल के पड़ोसी सामंत तथा विजिगीषु के मित्र भी उसके आचरण से क्षुब्ध होकर उसके शत्रु बन जाते हैं । इसलिए दुर्बल से भूमि लेना श्रेयस्कर नहीं है ।
( ४ ) दो समान बलशाली शत्रुओं के होने पर, जो विजिगीषु स्थायी शत्रु का नाश कर भूमि प्राप्त करता है, वही विशेष लाभ में है; क्योंकि शत्रु के दुर्ग आदि अपने हाथों में आ जाने पर विजिगीषु की भूमि की रक्षा हो जाती है और आटविकों का प्रतीकार करना भी उसके लिए सरल हो जाता है ।
प्र० ११६ : अ० १० ] सन्धि विचार ( २ ) ५०१
(१) चलामित्राद्भूमिलाभे शक्यसामन्ततो विशेषः । दुर्बलसामन्ता हि क्षिप्राप्यायनयोगक्षेमा भवति । विपरीता बलवत्सामन्ता कोशदण्डावच्छेदनी च भूमिर्भवति ।
(२) सम्पन्ना नित्याममित्रा मन्दगुणा वा भूमिरनित्याममित्रेति । 'सम्पन्ना नित्याममित्रा श्रेयसी भूमिः । सम्पन्ना हि कोशदण्डौ सम्पादयति । तौ चामित्रप्रतिघातकौ' इत्याचार्याः ।
(३) नेति कौटिल्यः—नित्याममित्रालाभे भूयाञ्छत्रुलाभो भवति । नित्यश्च शत्रुरुपकृते चापकृते च शत्रुरेव भवति । अनित्यस्तु शत्रुरुपकारादनपकाराद्वा शाम्यति ।
(४) यस्या हि भूमेर्बहुदुर्गाश्चोरगणैर्म्लेंच्छाटवीभिर्वा नित्याविरहताः प्रत्यन्ताः, सा नित्याममित्रा । विपर्यये त्वनित्याममित्रेति ।
(५) अल्पा प्रत्यासन्ना महती व्यवहिता वा भूमिरिति । अल्पा प्रत्यासन्ना श्रेयसी । सुखा हि प्राप्तुं पालयितुमभिसारयितुं च भवति । विपरीता व्यवहिता ।
( १ ) चलायमान शत्रु से भूमि लाभ करने पर उसी दशा में विशेष लाभ होता है जब उस चलायमान शत्रु का पड़ोसी दुर्बल हो; क्योंकि ऐसी भूमि विजिगीषु को शीघ्र ही योग क्षेम की देने वाली होती है। इसके विपरीत जिस विजित भूमि का सामन्त बलवान् हो वह सर्वदा अनिष्टकर होती है; विजिगीषु के कोश और बल को क्षीण करने वाली होती है ।
( २ ) 'विजिगीषु के लिए सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है या अत्यल्प सम्पन्न एवं अनित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है ?' इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का मन्तव्य है कि सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि सम्पन्न भूमि के द्वारा कोश तथा सेना, दोनों को बढ़ाया जा सकता है, जिससे कि शत्रुओं का उच्छेद किया जा सकता है ।
( ३ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य को स्वीकार नहीं करता है । उसका कहना है कि नित्य शत्रु की भूमि लेने से शत्रुता बहुत बढ़ जाती है; क्योंकि जो नित्य शत्रु है उसका उपकार किया जाय या अपकार; वह रहता शत्रु ही है । किन्तु अनित्य शत्रु का उपकार या अपकार करने पर वह शान्त हो जाता है ।
( ४ ) जिस भूमि के सीमा प्रान्तों के बहुत से दुर्ग चोरों, म्लेच्छों तथा आटविकों से सदा घिरे रहते हैं वह भूमि नित्याममित्रा कहलाती है; और इसके विपरीत भूमि अनित्याममित्रा कहलाती है ।
( ५ ) 'प्राप्त होने वाली भूमियों में निकटवर्ती थोड़ी भूमि ठीक है या दूर की
५०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) व्यवहिताव्यवहितयोरपि दण्डधारणात्मधारणा वा भूमिरिति । आत्मधारणा श्रेयसी । सा हि स्वसमुत्थाभ्यां कोशदण्डाभ्यां धार्यते । विपरीता दण्डधारणा दण्डस्थानमिति ।
(२) बालिशात् प्राज्ञाद् वा भूमिलाभ इति । बालिशाद् भूमिलाभः श्रेयान् । सुप्राप्यानुपाल्या हि भवत्यप्रत्यादेया च । विपरीता प्राज्ञादनुरक्तेति ।
(३) पीडनीयोच्छेदनीययोरुच्छेदनीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । उच्छेदननीयो ह्यनपाश्रयो दुर्बलापाश्रयो वाभियुक्तः कोशदण्डावादायापसर्तुकामः प्रकृतिभिस्त्यज्यते । न पीडनीयो दुर्गमित्रप्रतिस्तब्ध इति ।
(४) दुर्गप्रतिस्तब्धयोरपि स्थलनदीदुर्गीयाभ्यां स्थलदुर्गीयाद् भूमि-
बहुत-सी भूमि' ऐसी स्थिति में समीप की थोड़ी भूमि ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सरलता से उसकी प्राप्ति और रक्षा की जा सकती है और विपत्ति काल में उसका आश्रय लिया जा सकता है। परन्तु बहुत दूर की अधिक भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है।
(१) 'दूर और पास की भूमि में पर-रक्षित भूमि लेना ठीक है या स्वयं रक्षित भूमि ?' इन दोनों में स्वयं रक्षित भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि स्वयं स्थापित कोष और सेना द्वारा उसकी रक्षा की जा सकती है । किन्तु पररक्षित भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है; क्योंकि दूसरे के स्थापित कोष और सेना द्वारा उसकी रक्षा की जाती है।
(२) 'मूर्ख शत्रु और बुद्धिमान् शत्रु दोनों में किससे भूमि प्राप्त करना श्रेयस्कर है ?' मूर्खशत्रु राजा से भूमि लेना श्रेयस्कर है; क्योंकि वह बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाती है और एक तो उसकी रक्षा सुगमता से की जा सकती है तथा दूसरे वह लौटानी भी नहीं पड़ती है। परन्तु बुद्धिमान् शत्रु राजा से प्राप्त भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है; उसके प्रकृतिजन तथा प्रजाजन उसमें सदा ही अनुराग रखने वाले होते हैं।
(३) पीडनीय और उच्छेदनीय, इन दोनों शत्रु राजाओं में उच्छेदनीय शत्रु की भूमि लेना श्रेयस्कर है; क्योंकि निराश्रय तथा दुर्बल आश्रय का होने के कारण, जब उस पर चढ़ाई की जाती है तो, वह सेना तथा कोष सहित भाग निकलता है। ऐसी दशा में प्रकृति जन उसकी सहायता नहीं करते । परन्तु पीडनीय शत्रु दुर्ग और मित्रों की सहायता प्राप्त करके अपने ही स्थान पर जमा रहता है। उसके प्रकृति जन भी उससे अनुराग रखते हैं ।
(४) दुर्गों से सुरक्षित शत्रुओं में स्थल दुर्ग में रहने वाले शत्रु की भूमि प्राप्त करना ठीक है या नदी दुर्ग में रहने वाले शत्रु की ?' स्थल दुर्ग में रहने वाले शत्रु की
प्र० ११६ : अ० १०] सन्धि विचार (२) ५०३
लाभः श्रेयान् । स्थलीयं हि सुरोधावमर्दावस्कन्दमनिःस्राविशत्रु च । नदी-
दुर्गं तु द्विगुणक्लेशकरमुदकं च पातव्यं वृत्तिकरं चामित्रस्य ।
(१) नदीपर्वतदुर्गीयाभ्यां नदीदुर्गीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । नदीदुर्गं
हि हस्तिस्तम्भसङ्क्रमसेतुबन्धनौभिः साध्यमनित्यगाम्भीर्यमवस्त्राव्युदकं च,
पार्वतं तु स्वारक्षं दुरपरोधि कृच्छ्रारोहणं भग्ने चैकस्मिन् न सर्ववधः,
शिलावृक्षप्रमोक्षश्च महापकारिणाम् ।
(२) निम्नस्थलयोधिभ्यो निम्नयोधिभ्यो भूलाभः श्रेयान् । निम्नयो-
धिनो ह्यपरुद्धदेशकालाः, स्थलयोधिनस्तु सर्वदेशकालयोधिनः ।
(३) खनकाकाशयोधिभ्यः खनकेभ्यो भूमिलाभः श्रेयान् । खनका हि
खातेन शस्त्रेण चोभयथा युध्यन्ते, शस्त्रेणैवाकाशयोधिनः ।
भूमि लेना ही ठीक है; क्योंकि स्थल-दुर्ग को सरलता से घेरा जा सकता है, उच्छिन्न किया जा सकता है और शत्रु को भी उससे भाग निकलने का सुयोग नहीं मिल पाता है । इसलिए शीघ्र ही वह आक्रमणकारी की आधीनता स्वीकार कर लेता है । परन्तु नदी-दुर्ग को इससे दुगुना कष्ट उठा कर भी काबू में नहीं किया जा सकता है । वहाँ पर जल और जलाधीन अन्न, फल आदि के होने से शत्रु के निर्वाह में कोई बाधा नहीं पड़ती । इसलिए उसका उच्छेद करना कठिन होता है ।
(१) नदी दुर्ग और पर्वत दुर्ग दोनों में से नदी दुर्ग में रहने वाले राजा से ही भूमि लाभ होना श्रेष्ठ है; क्योंकि हाथी, लकड़ी, पुल, बाँध और नौकाओं द्वारा पार करके उसको हस्तगत किया जा सकता है । किनारों को तोड़ कर उसके जल को भी निकाला जा सकता है । परन्तु पर्वतीय दुर्ग पत्थर आदि से सुदृढ़ बना होने के कारण न तो उसको सरलता से घेरा जा सकता है और न ही उस पर चढ़ा जा सकता है । अस्त्रों में से एक को ही नष्ट किया जा सकता है बाकी सुरक्षित बने रहते हैं । बड़े शक्तिशाली आक्रमणकारी का भी, ऊपर से पत्थर, पेड़ आदि गिरा कर प्रतीकार किया जा सकता है ।
(२) निम्नयोधी (नौका में बैठ कर युद्ध करने वाले) और स्थलयोधी शत्रुओं में निम्नयोधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके युद्ध का निश्चित समय एवं निश्चित स्थान होता है । इसलिए उस पर विजय प्राप्त करना कठिन नहीं है । परन्तु स्थलयोधी सभी परिस्थितियों में युद्ध करता है । इसलिए उसको शीघ्र ही नहीं जीता जा सकता है ।
(३) खनकयोधी (खाई युद्ध करने वाले) और आकाशयोधी शत्रुओं में खनक योधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उनके लिए खाई तथा अस्त्र दोनों की आवश्यकता होती है । कभी-कभी खाई के लिए उचित स्थान न मिलने के कारण वे
५०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) एवंविधेभ्यः पृथिवीं लभमानोऽर्थशास्त्रवित् ।
संहितेभ्यः परेभ्यश्च विशेषमधिगच्छति ॥इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे भूमिसन्धिर्नाम दशमोऽध्यायः,
आदितः सप्तशततमः ।
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युद्ध नहीं करने पाते हैं । इसलिए उनको सरलता से वश में किया जा सकता है । परन्तु आकाशयोधी शत्रु केवल शस्त्र द्वारा ही युद्ध करता है । इसलिए उसको जीतना कठिन है ।
( १ ) इस प्रकार अर्थशास्त्रज्ञ विजिगीषु राजा, ऊपर बताये गए संहित एवं दूसरे राजाओं से, पृथ्वी को प्राप्त करता हुआ अपनी उन्नति करता जाय ।
इति षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में भूमिसन्धि नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ११६ |
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| अध्याय ११ |
अनवसितसन्धि
(१) 'त्वं चाहं च शून्यं निवेशयावह' इत्यनवसितसन्धिः ।
(२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थो यथोक्तगुणां भूमिं निवेशयति सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तत्रापि स्थलमौदकं वेति । महतः स्थलादलपमौदकं श्रेयः, सातत्यादवस्थितत्वाच्च फलानाम् ।
(४) स्थलयोरपि प्रभूतपूर्वापरसस्यमल्पवर्षपाकमसक्तारम्भं श्रेयः ।
(५) औदकयोरपि धान्यवापमधान्यवापाच्छ्रेयः । तयोरल्पबहुत्वे धान्यकान्तादलपान्महद्धान्यकान्तं श्रेयः । महत्यवकाशे हि स्थाल्याश्चानूप्याश्चौषधयो भवन्ति । दुर्गादीनि च कर्माणि प्राभूत्येन क्रियन्ते । कृत्रिमा हि भूमिगुणाः ।
अनवसित संधि
( संधि-विचार ३ )
( १ ) 'आओ, तुम और हम मिलकर शून्य भूमि में उपनिवेश बसायें !' इस प्रकार से जो सन्धि की जाय उसको अनवसित ( अनिश्चित ) सन्धि कहते हैं ।
( २ ) उन दोनों में से जो, पूर्ण साधनों को साथ लेकर पूर्वोक्त गुणसंपन्न भूमि में उपनिवेश बसाता है वही विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) सर्वगुणसंपन्न स्थलभूमि और जलभूमि, दोनों में जलभूमि को बसाना ही श्रेष्ठ है । अधिक स्थलभूमि की अपेक्षा थोड़ी ही जलभूमि अच्छी है; क्योंकि सदा ही वह फल-फूल आदि से गुलजार बनी रहती है ।
( ४ ) दो स्थल भूमियों में भी वही स्थलभूमि अच्छी होती है, जहाँ वसंत और शरद की फसलें एक समान अच्छी होती हैं तथा जहाँ थोड़ी ही वृष्टि से फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं और जिनको सरलता से जोता-बोया जा सकता है ।
( ५ ) दो जलमय भूमियों में वही भूमि उत्तम है, जहाँ सभी धान्य बोये जा सकें और जहाँ धान्य न हों वह भूमि अच्छी नहीं है । उनमें भी कम-ज्यादा को दृष्टि में रखकर उपजाऊ अधिक भूमि ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अधिक विस्तार होने से उसके जल स्थल युक्त विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के अन्न उपजाये जा सकते हैं । क्योंकि