सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सर्वाधिकरणरक्षण नामक नवाँ अध्याय समाप्त ।

प्र० ८४ : अ० ९ ] राजकीय विभागों की निगरानी ३८५

(१) एवमर्थचरान् पूर्वं राजा दण्डेन शोधयेत् ।
शोधयेयुश्च शुद्धास्ते पौरजानपदान् दमैः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे सर्वाधिकरणरक्षणं नाम नवमोऽध्यायः
आदितः पञ्चाशीतितमः ।

— : ० : —


मध्यम साहस दंड, यदि तोड़कर निकाले तो प्राणदंड दिया जाय । यदि प्रदेष्टा ऐसा करे तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर उसे प्राणदंड की सजा दी जाय ।

( १ ) इस प्रकार राजा को चाहिए कि पहिले वह अपने कर्मचारियों को दंड से शुद्ध करे । फिर वे विशुद्ध हुए राजकर्मचारी दंड-व्यवस्था के द्वारा नगर तथा प्रदेश की जनता को सही रास्ते पर लायें ।

कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सर्वाधिकरणरक्षण नामक नवाँ अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

२५ कौ०

प्रकरण ८५# एकाङ्गवधनिष्क्रयः
अध्याय १०

(१) तीर्थघातग्रन्थिभेदोर्ध्वकराणां प्रथमेऽपराधे [सन्दंशच्छेदनं चतु-ष्पञ्चाशतपणो वा दण्डः । द्वितीये छेदनं पणस्य शत्यो वा दण्डः । तृतीये दक्षिणहस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । चतुर्थे यथाकामी वधः ।

(२) पञ्चविंशतिपणावरेषु कुक्कुटनकुलमार्जारश्वसूकरस्तेयेषु हिंसायां वा चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः, नासाग्रच्छेदनं वा । चण्डालारण्यचराणामर्ध-दण्डः ।

(३) पाशजालकूटावपातेषु बद्धानां मृगपशुपक्षिव्यालमात्स्यानामादाने तच्च तावच्च दण्डः ।

(४) मृगद्रव्यवनान्मृगद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । बिम्बविहारमृगपक्षि-स्तेये हिंसायां वा द्विगुणो दण्डः ।


एकांग वध अथवा उसकी जगह द्रव्य-दण्ड

( १ ) तीर्थस्थानों में रहने वाले उठाईगीर ( तीर्थघात ), गिरहकट ( ग्रंथिभेद ) और छत फोड़ने वाले ( ऊर्ध्वकर ) व्यक्तियों का अंगूठा तथा कनिष्ठिका उँगली कटवा दी जांय; अथवा उन पर चौवन पण दण्ड किया जाय । दूसरी बार अपराध करने पर उनकी सब उँगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उन पर सौ-पण जुर्माना किया जाय । तीसरी बार यदि वे अपराध करें तो उनका दाहिना हाथ कटवा दिया जाय या उन पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । चौथी बार भी वे अपराध कर बैठें तो उन्हें प्राणदण्ड दिया जाय ।

( २ ) यदि कोई व्यक्ति पच्चीस पण से कम कीमत के मुर्गों, नेवले, बिल्ली, कुत्ते और सुअर की चोरी करे या उन्हें मार डाले तो उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय या उसकी नाक का अगला हिस्सा काट दिया जाय । यदि वे मुर्गे आदि किसी चाण्डाल के अथवा जंगली हों तो उक्त दण्ड से आधा दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति फाँस कर, जाल बिछाकर और घास-फूस से ढके गढों द्वारा संरक्षित राजकीय मृग तथा अन्य पशु, पक्षी, हिंसक जीव और मछली आदि पकड़े, उससे उनकी कीमत वसूली जाय और उतना ही उस पर जुर्माना किया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति सुरक्षित जंगल के जानवरों तथा लकड़ी आदि की चोरी करे उस पर सौ पण जुर्माना किया जाय । रंग-विरंगी सुंदर चिड़ियों, पालतू हरिणों तथा तोतों को पकड़ने वाले या मारने वाले व्यक्ति पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

प्र० ८५ : अ० १० ] एकाङ्गवध अथवा द्रव्यदण्ड ३८७

(१) कारुशिल्पिकुशीलवतपस्विनां क्षुद्रकद्रव्यापहारे शत्यो दण्डः । स्थूलकद्रव्यापहारे द्विशतः । कृषिद्रव्यापहारे च ।
(२) दुर्गमकृतप्रवेशस्य प्रविशतः प्राकारच्छिद्राद्वा निक्षेपं गृहीत्वाऽपसरतः कन्धरावधो द्विशतो वा दण्डः ।
(३) चक्रयुक्तां नावं क्षुद्रपशुं वापहरत एकपादवधः त्रिशतो वा दण्डः ।
(४) कूटकाकपण्यक्षारला शलाकाहस्तविषमकारिण एकहस्तवधः, चतुःशतो वा दण्डः ।
(५) स्तेनपारदारिकयोः साचिव्यकर्मणि स्त्रियाः संगृहीतायाश्च कर्णनासाछेदनं पञ्चशतो वा दण्डः । पुंसो द्विगुणः ।
(६) महापशुमेकं दासं दासीं वापहरतः प्रेतभाण्डं वा विक्रीणानस्य द्विपादवधः, षट्छतो वा दण्डः ।
(७) वर्णोत्तमानां गुरूणां च हस्तपादलंघने राजयानवाहनाद्यारोहणे चैकहस्तपादवधः सप्तशतो वा दण्डः ।


( १ ) जो व्यक्ति बढ़इयों, छोटे कारीगरों, कथकों और तपस्वियों की छोटी-छोटी चीजों की चोरी करे उस पर सौ पण दण्ड किया जाय और बड़ी-बड़ी चीजों की चोरी करे तो दो-सौ पण दण्ड किया जाय । खेती के साधन हल आदि चुराने वाले पर भी दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( २ ) यदि अनधिकारी व्यक्ति किले में प्रवेश करे अथवा परकोटे की दीवार तोड़ कर माल उड़ा ले जाय तो उसके पैर के पीछे की दो मुख्य नसें कटवा दी जाँय, या उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।

( ३ ) चक्रयुक्त ( धन, शस्त्र या यंत्र युक्त ) नाव को अथवा छोटे-छोटे पशुओं की चोरी करने वाले का एक पैर कटवा दिया जाय या उस पर तीन-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) जो व्यक्ति जाली कौड़ी, पांसें, अरला और शलाका आदि जुआ संबंधी सामान बनाये, तथा जो व्यक्ति इसी प्रकार की अन्य कूट-कपट की चीजें बनाये, उसका एक हाथ काट दिया, या उस पर चार सौ पण जुर्माना किया जाय ।

( ५ ) चोरों और व्यभिचारियों की दूतियों के नाक, कान काट लिये जाँय या उन पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । यदि पुरुष ऐसा दूतकर्म करें तो उन पर दुगुना ( एक हजार पण ) दण्ड दिया जाय ।

( ६ ) गाय, भैंस आदि पशुओं, एक दास, एक दासी को चुराने वाले अथवा मुर्दे के कपड़े बेचने वाले पुरुष के दोनों पैर काट लिये जाँय या उस पर छह-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

( ७ ) जो व्यक्ति श्रेष्ठ पुरुषों या गुरुजनों को हाथ-पैर से मारे या राजा की सवारी एवं घोड़े पर चढ़े उसका या तो एक हाथ और एक पैर काट दिया जाय अथवा उस पर सात-सौ पण दण्ड दिया जाय ।

३८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) शूद्रस्य ब्राह्मणवादिनो देवद्रव्यमवस्तृणतो राजद्विष्टमादिशतो द्विनेत्रभेदिनश्च योगाञ्जनेनान्धत्वमष्टशतो वा दण्डः ।

(२) चोरं पारदारिकं वा मोक्षयतो राजशासनमूनमतिरिक्तं वा लिखतः कन्यां दासीं वा सहिरण्‍यमपहरतः कूटव्यवहारिणो विमांसविक्रयिणश्च वामहस्तद्विपादवधो नवशतो वा दण्डः । मानुषमांसविक्रये वधः ।

(३) देवपशुप्रतिमामनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णरत्नसस्यापहारिण उत्तमो दण्डः शुद्धवधो वा ।

(४)

पुरुषं चापराधं च कारणं गुरुलाघवम् ।
अनुबन्धं तदात्वं च देशकालौ समीक्ष्य च ॥
उत्तमावरमध्यत्वं प्रदेष्टा दण्डकर्मणि ।
राज्ञश्च प्रकृतीनां च कल्पयेदन्तरा स्थितः ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे एकाङ्गवधनिष्क्रयो नाम दशमोऽध्यायः; आदितः षडशीतितमः ।

—: ० :—

(१) जो शूद्र अपने को ब्राह्मण बताये और देव-निमित्त द्रव्य का अपहरण करे तथा ज्योतिषी बनकर जो राजा के भावी अनिष्ट को बताये अथवा बगावत करे या किसी की दोनों आँखें फोड़ दे, ऐसे व्यक्ति को औषधियों का सुरमा लगा कर अंधा कर दिया जाय अथवा उस पर आठ-सौ पण जुरमाना किया जाय ।

(२) चोर या व्यभिचारी को छोड़ देने वाले, राजा की आज्ञा को घटा-बढ़ा कर लिखने वाले, आभूषणों सहित कन्या या दासी का अपहरण करने वाले, छल-कपट का व्यवहार करने वाले, अभक्ष्य पशुओं का मांस बेचने वाले, पुरुष का बायाँ हाथ और दोनों पैर काट दिये जाँय, या उस पर नौ-सौ पण दण्ड किया जाय । आदमी का मांस बेचने वाले को प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।

(३) देवता के निमित्त पशु, प्रतिमा, मनुष्य, खेत, घर, हिरण्य, सोना, रत्न और अन्न, इन नौ चीजों की जो भी व्यक्ति चोरी करे उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय या उसको पीडारहित प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

(४) राजा और आमात्यों को साथ लेकर प्रदेष्टा को चाहिए कि वह दण्ड देते समय अपराध को, अपराध के कारणों को, अपराधी की हैसियत को, वर्तमान तथा भावी परिणामों को और देश-काल की स्थिति को भली-भाँति सोच समझ ले, तदनन्तर न्याय के अनुसार प्रथम, मध्यम तथा उत्तम आदि दण्डों की सजा सुनाये ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में एकाङ्गवधनिष्क्रय नामक दशवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण ८६## शुद्धश्चित्रश्च दण्डकल्पः
अध्याय ११

(१) कलहे घ्नतः पुरुषं चित्रो घातः । सप्तरात्रस्यान्तः मृते शुद्धवधः पक्षस्यान्तरुत्तमः । मासस्यान्तः पञ्चशतः समुत्थानव्ययश्च ।

(२) शस्त्रेण प्रहरत उत्तमो दण्डः । मदेन हस्तवधः । मोहेन द्विशतः । वधे वधः ।

(३) प्रहारेण गर्भं पातयत उत्तमो दण्डः । भैषज्येन मध्यमः । परिक्लेशेन पूर्वः साहसदण्डः ।

(४) प्रसभं स्त्रीपुरुषघातकाभिसारकनिग्राहकावघोषकावस्कन्दकोपवेधकान् पथि वेश्मप्रतिरोधकान् राजहस्त्यश्वरथानां हिंसकान् स्तेनान् वा शूलानारोहयेयुः ।


शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड

( १ ) कोई व्यक्ति यदि लड़ाई-झगड़े में किसी व्यक्ति को जान से मार डाले तो उसको कष्टपूर्वक प्राणदण्ड ( चित्रघात ) की सजा दी जाय । झगड़ा होने के बाद चोट खाया व्यक्ति यदि सात दिन बाद मरे तो मारने वाले को शुद्ध प्राणदण्ड ( कष्टरहित वध ) दिया जाय । यदि पन्द्रह दिन बाद मरे तो उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । एक महीने के बाद मरे तो पाँच-सौ पण जुर्माना और साथ ही मृतक की दवाई-दारू का सारा व्यय भी मरने वाले से वसूल किया जाय ।

( २ ) किसी शस्त्र द्वारा चोट पहुँचाने पर उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि बल के घमंड से चोट पहुँचाये तो उसका हाथ काट दिया जाय । यदि क्रोधावेश में प्रहार करे तो उस पर दो सौ पण दण्ड दिया जाय । यदि जान से मार डाले तो उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।

( ३ ) जो व्यक्ति प्रहार द्वारा गर्भ गिराये उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । औषध द्वारा गर्भ गिराने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । कठोर काम कराकर गर्भ गिराने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से किसी स्त्री या पुरुष की हत्या कर डाले, बलात्कार से किसी स्त्री को अपहरण कर ले जाय, बलात्कार से किसी स्त्री की नाक-

३९०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

(१) यश्चैनान् दहेदपनयेद्वा स तमेव दण्डं लभेत, साहसमुत्तमं वा।
(२) हिंस्रस्तेनानां भक्तवासोपकरणाग्निमंत्रदानवैयावृत्यकर्मसूत्तमो दण्डः। परिभाषणमविज्ञाने। हिंस्रस्तेनानां पुत्रदारमसमंत्रं विसृजेत्, समंत्रमाददीत।
(३) राज्यकामुकमन्तःपुरप्रधर्षकमटव्यमित्रोत्साहकं दुर्गराष्ट्रदण्डकोपकं वा शिरोहस्तप्रादीपकं घातयेत्।
(४) ब्राह्मणं तमः प्रवेशयेत्।
(५) मातृपितृपुत्रभ्रात्राचार्यतपस्विघातकं वात्वक्छिरःप्रादीपकं घातयेत्। तेषामाक्रोशे जिह्वाच्छेदः। अङ्गाभिरदने तदङ्गान्मोच्यः।


कान काट ले, धमकी देकर हत्या, चोरी की घोषणा करने वाला, बलात्कार से नगर तथा गाँवों का धन ले जाने वाला; भीत तोडकर सेंध लगाने वाला, रास्ते की धर्म-शालाओं तथा प्याउओं की चोरी करने वाला और राजा के हाथी; घोड़े तथा रथों को नष्ट करने, मारने या चुराने वाला, इन सभी प्रकार के अपराधियों को शूली पर लटका दिया जाय।

(१) इन लोगों को जो दाह-संस्कार या क्रिया-कर्म करे या उनको उठा कर गंगा-प्रवाह आदि के लिए ले जाय उसको भी शूली पर चढ़ाया जाय या उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।

(२) जो लोग हत्यारों को खाना, रहना, वस्त्र, आग और सलाह दें तथा उनके यहाँ नौकरी करें उन्हें भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। जिन्हें यह पता नहीं है कि वे हत्यारे या चोर हैं, उन्हें वाक् ताड़ना दी जाय। हत्यारों और चोरों के स्त्री-पुत्र यदि हत्या-चोरी में शामिल न हों तो उन्हें छोड़ दिया जाय, यदि उन्होंने भी किसी प्रकार की सहायता की हो तो उन्हें गिरफ्तार कर यथोचित दण्ड दिया जाय।

(३) राजसिंहासन को हथियाने की इच्छा रखने वाले, अंतःपुर में व्यर्थ का झमेला खड़ा कर देने वाले, आटवी एवं पुलिंद आदि शत्रु राजाओं को उभाड़ने वाले, किले की सेना तथा बाहर की सेना में बगावत फैला देने वाले, पुरुषों के सिर और हाथ में आग लगाकर उनको कत्ल किया जाय।

(४) यदि ऐसा दुष्कर्म करने वाला कोई ब्राह्मण हो तो उसे आजीवन के लिए काल-कोठरी में बंद कर दिया जाय।

(५) जो व्यक्ति माता, पिता, पुत्र, भाई, आचार्य और तपस्वी की हत्या कर डाले, उसके शिर की खाल उतरवा कर उसमें आग लगायी जाय और तब उसको कत्ल कराया जाय। माता-पिता को गाली देने वाले की जीभ कटवा दी जाय। माता-पिता के किसी अंग को कोई जिस अंग से नोचे-खसोटे उसका वही अंग कटवा दिया जाय।

प्र० ८६ : अ० ११ ] शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड [ ३९१

(१) यदृच्छाघाते पुंसः, पशुयूथस्तेये च शुद्धवधः । दशावरं च यूथं विद्यात् ।
(२) उदकधारणं सेतुं भिन्दतस्तत्रैवाप्सु निमज्जनम् । अनुदकमुत्तमः साहसदण्डः । भग्नोत्सृष्टकं मध्यमः ।
(३) विषदायकं पुरुषं स्त्रियं च पुरुषघ्नीमपः प्रवेशयेद्गर्भिणीम् । गर्भिणीं मासावरप्रजाताम् ।
(४) पतिगुरुप्रजाघातिकामग्निविषदां सन्धिच्छेदिकां वा गोभिः पादयेत् ।
(५) विवीतक्षेत्रखलवेश्मद्रव्यहस्तिवनादीपिकमग्निना दाहयेत् ।
(६) राजाक्रोशकमन्त्रभेदकयोरनिष्टप्रवृत्तिकस्य ब्राह्मणमहानसावलेहिनश्च जिह्वामुत्पाटयेत् ।
(७) प्रहरणावरणास्तेनमनायुधीयमिषुभिर्घातयेत् । आयुधीयस्योत्तमः ।


( १ ) जो व्यक्ति किसी दूसरे को अचानक ही मार डाले या पशुओं के झुंड की तथा घोड़ों की चोरी करे उसको शुद्ध प्राणदण्ड दिया जाय । कम-से-कम दस पशुओं का एक झुंड समझना चाहिए ।

( २ ) जो व्यक्ति पानी के बाँध को तोड़े, उसको वहीं जल में डुबा कर मार दिया जाय । यदि जल-बाँध में पानी न हो तो तोड़ने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि वह पहिले ही से टूटा-फूटा हो और तब उसे तोड़ा जाय तो मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) विष देकर किसी की हत्या करने वाले स्त्री-पुरुष को जल में डुबाकर खत्म कर दिया जाय, बशर्ते कि वह स्त्री गर्भिणी न हो। यदि गर्भिणी हो तो बच्चा पैदा होने के एक मास बाद उसका ऐसा ही प्राणांत किया जाय ।

( ४ ) अपने पति, गुरु और बच्चे की हत्या करने वाली, आग लगाने वाली, विष देने वाली, सेंध लगाकर चोरी करने वाली, स्त्री को गायों के पैरों के नीचे कुचलवा कर मारा जाय ।

( ५ ) जो व्यक्ति चारागाह, खेत, खलिहान, घर और लकड़ियों तथा हथियारों से सुरक्षित जंगल में आग लगा दे उसको आग में ही जला दिया जाय ।

( ६ ) जो व्यक्ति राजा को गाली दे, गुप्त रहस्य को खोल दे, राजा के अनिष्ट को फैलाये और ब्राह्मण की भोजनशाला से जबर्दस्ती अन्न लेकर खाने लगे उसकी जिह्वा कटवा दी जाय ।

( ७ ) जो आयुधजीवी न होकर भी हथियार और कवच आदि चुराये, उसे सामने खड़ा करके बाणों से मरवा दिया जाय । यदि वह आयुधजीवी हो तो उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।