कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
शुकदेव कबीर सम्वाद
१०२
कबीरकृष्णगीता ।
बोले गरुड विहसिके वाणी । मम जीवन शुभ सट्टरु जानी ॥
चरणोदक ले निर्मल भयऊ । सट्टरु चरण हियभहँ धरऊं ॥
व्यासदेव सुखदेव सिर नाये । बडे भाग्य हम दर्शन पाये ॥
व्यासदेव सुनि नारद पूछा । हमहुको है भक्तिकी इच्छा ॥
पान प्रवाना हमको दीजे । सुत्कदान हमहूको कीजे ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । जीव दया विन मुक्त न होई ॥
जीवदया धर सट्टरु सेवे । सबसे गीत नाम चित देवे ॥
सबमें सोर मिता अब राधा । स्थिर सत्यनाम निज नामा ॥
विना भक्ति भगवंत न भेटे । सट्टरु विना ना संशय भेटे ॥
सट्टरु कहैं कबीर हम आहीं । सट्टरु अंश विष्णुके माहीं ॥
सट्टरु अंश जीव सत सबमें । राम कृष्ण मम अस कहो अवमें ॥
हमरे अंश निरंजन राधा । तीन लोक अधिकार तिन पाया ॥
तिन पुन आपन अंस उत्पाना । छल छुटम मान अभिमाना ॥
छल औ क्षुद्र विष्णु बहुरंगा । ब्रह्मा कुभत हंग रुद्रंगा ॥
रजगुण ब्रह्मा विष्णु सतोगुण । काल प्रले जन रुद्र तमोगुण ॥
अष्टंगी वटपारकी बुदिया । वटपार निरंजन सब जिव लटिया ॥
एक सै वै विष्णु सत भाषा । विष्णु नाम तब सट्टरु भाषा ॥
रजगुण तमगुण लोहु धातू । पुरुष अंस जीव सट्टरु सातू ॥
दोहा-निरंजन जीव झरकावे, सवा लक्ष नित खाय ।
कहैं कबीर जो मोही भजे, तेहि यम निकट न जाय ॥
कवीरकृष्णगीता ।
१०३
व्याससुखदेववचन ।
व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥
विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥
अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥
दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥
चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा
हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥
साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥
बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥
कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥
हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥
हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥
सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥
जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥
विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥
क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥
जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥
हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥
सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥