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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कबीर शरण विना मुक्ति नहीं

३८

कर्बारुक्षणगीता ।

सत्कवीर कहहु मनमाहीं । बहुरि प्रगट कहु काल नसाहीं ॥
सुनके भीम कवीर कहि बोला । सत्कवीरको आसन डोला ॥
छिनभै समर्थ पहुँचे आई । कवीरसुनत यम चला पराई ॥
छांड भीमकहँ भागेउ काला । सत्कवीर भेटा जंजाला ॥
कृष्ण उठाय भीम कहँ लीन्हा । तब कवीरके स्तुति कीन्हा ॥
सकल देव उठ ठाढे भयऊ । सत्कवीर कहँ सोस नवायऊ ॥

दोहा-पगु छूवन सब चाहे, काहु न आवे हाथ ॥
जापर दया कवीरके, जिन पगु देहीं माथ ॥

योगयज्ञसे सैर न कामा । जबलग भजै न सदुरुनामा ॥
सदुरु सत्यकवीर दयाला । शरण कवीर भिटे ययजाला ॥

दोहा-सत्यकवीरके स्तुति, करे निरंजनराय ॥

विष्णु व्यास सुख गुरु कहत है, भाग दृश्श सतनाम ॥
अधर विवान ग्रानभै सोहा । अद्भुत चंद सूर नख मोहा ॥
स्तुति आप २ सब करहीं । जै २ सत्यकवीर उच्चरहीं ॥
कोटिन चंद सूर उगआये । अद्भुत लीला कला दिखाये ॥
विष्णु व्यास जै स्तुति सारा । सत्यकवीर जै सब उच्चार ॥
जै २ नमो २ सब कहहीं । अधर स्तुति सब एकटक रहहीं ॥
जै २ सत्यकवीर सुखदाई । विष्णु व्यास पंडौ गुण गाई ॥
जै २ सत्यकवीर दयाला । कवीरकृपाते जीतेऊँ काला ॥
जै जै समर्थ सत्य कवीर । सब घट व्यापक अजर शरीरा ॥

कवीरुष्णगीता ।

३९

सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥
जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥
जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥
जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥
थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥
तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥
जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥
जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥
जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥
जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥
जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥
आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥
प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥
सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥
माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥
जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥
तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥
जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥
जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥
तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥
कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥