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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

१. यमकवग्गो (यमक वर्ग)

१० ] धम्मपदं [ १।२०
( अल्पामपि संहितां भाषमाणो
धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी ।
रागं च द्वेषं च प्रहाय मोहं
सम्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः।
अनुपादान इह वाऽमुत्र वा,
स भागवान् श्रामण्यस्य भवति ॥२०॥)
अनुवाद-चाहे अल्पमात्र ही सहिताका भाषण करे, किन्तु यदि
वह धर्मके अनुसार आचरण करनेवाला हो, राग,
द्वेष, और मोहको त्यागकर, अच्छी प्रकार सचेत और
अच्छी प्रकार मुक्तचित्त हो, यहाँ और वहाँ (दोनों
जगह) बटोरनेवाला न हो; (तो) वह श्रमणपनका भागी
होता है ।
१-यमकवर्ग समाप्त

२—अप्पमादवग्गो
कौशाम्बी (घोषिताराम) - सामावती (रानी)
२१—अप्पमादो अमत-पदं पमादो मच्चुनो पदं ।
अप्पमत्ता न मीयन्ति ये पमत्ता यथा मता ॥१॥
( अप्रमादोऽमृतपदं प्रमादो मृत्योः पदम् ।
अप्रमत्ता न म्रियन्ते ये प्रमत्ता यथा मृताः ॥१॥ )
२२-एतं विसेसतो ञत्वा अप्पमादम्हि पण्डिता ।
अप्पमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता ॥२॥
( एवं विशेषतो ज्ञात्वाऽप्रमादे, पण्डिताः ।
अप्रमादे प्रमोद्न्त आर्याणां गोचरे रताः ॥२॥ )
२३-ते झायिनो साततिका निच्चं दळ्ह-परक्कमा ।
फुसन्ति धीरा निब्वाणं योगक्खेमं अनुत्तरं ॥३॥
( ते ध्यायिनः साततिका नित्यं दृढपराक्रमाः ।
स्पृशन्ति धीरा निर्वाणं योगक्षेमं अनुत्तरम् ॥३॥ )
[ ११

१२ ] धम्मपदं [ २।५

अनुवाद—प्रमाद (=आलस्य ) न करना अमृतपद है, और प्रमाद
( करना ) मृत्युपद । अप्रमादी ( वैसे ) नहीं मरते, जैसे
कि प्रमादी मरते हैं। पंडित लोग अप्रमादके विषयमें
इस प्रकार विशेषतः जान, आर्योंके आचरणमें रत हो,
अप्रमादमें प्रमुदित होते हैं। (जो) वह निरन्तर ध्यानरत
निश्चय दृढ़ पराक्रमी हैं, वह धीर अनुपम योग-क्षेम ( आनन्द
मंगल ) वाले निर्वाणको प्राप्त करते हैं ।
राजगृह ( वेणुवन ) कुम्भघोसक
२४—उट्ठानवतो सतिमतो
सु चिकम्मस्स निसम्मकारिणो ।
सञ्‍ञतस्स च धम्मजीविनो
अप्प मत्तस्स यसोऽभिवड्ढति ॥४॥
( उत्थानवतः स्मृतिमन्तः शुचिकर्मणो निशाम्य-कारिणः ।
संयतस्य च धर्मजीविनोऽप्रमत्तस्य यशोभिवर्द्धते ॥४॥ )
अनुवाद—( जो ) उद्योगी, सचेत, शुचि कर्मवाला, तथा सोचकर
काम करनेवाला है, और संयत, धर्मानुसार जीविकावाला
एवं अप्रमादी है, ( उसका ) यश बढ़ता है ।
राजगृह ( वेणुवन ) चुल्लपन्थक ( थेर )
२५—उट्ठानेन'प्पमादेन संञमेन दमेन च ।
दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीरति ॥५॥
( उत्थानेनाऽप्रमादेन संयमेन दमेन च ।
द्वीपं कुर्यात् मेधावी यं ओघो नाभिकिरति ॥५॥ )

२८ ] अप्पमादवग्गो [ १३
अनुवाद—मेधावी (पुरुष) उद्योग, अप्रमाद, संयम, और दम द्वारा
(अपने लिये ऐसा) द्वीप बनावें, जिसे बाढ़ नहीं डुबा सके।
जेतवन बालनक्खतधुट्ठ (होळी)
२६—पमादमनुयुञ्जन्ति बाला दुम्मेधिनो जना ।
अप्पमादञ्च मेधावी धनं सेट्ठं 'व रक्खति ॥६॥
(प्रमादमनुयुञ्जन्ति बाला दुर्मेधसो जनाः ।
अप्रमादं च मेधावी धनं श्रेष्ठमिव रक्षति ॥६॥)
अनुवाद—मूर्ख दुर्मेध जन प्रमादमें लगते हैं; मेधावी श्रेष्ठ धनकी
भाँति अप्रमादकी रक्षा करता है।
२७-मा पमादमनुयुञ्जेथ मा कामरतिसन्थवं ।
अप्पमत्तो हि झायन्तो पप्पोति विपुलं सुखं ॥७॥
(मा प्रमादमनुयुंजीत मा कामरतिसंस्तवम् ।
अप्रमत्तो हि ध्यायन् प्राप्नोति विपुलं सुखम् ॥७॥)
अनुवाद—मत प्रमादमें फँसो, मत कामोंमें रत होओ, मत काम
रतिमें लिप्त हो । प्रमादरहित (पुरुष) ध्यान करते महान्
सुखको प्राप्त होता है।
जेतवन महाकस्सप (थेर)
२८—पमादं अप्पमादेन यदा नुदति पण्डितो ।
पञ्ञापासादमारुह्य असोको सोकिनिं पजं ।
पब्बतट्ठो 'व भूम्मट्ठे धीरो बाले अवेक्खति ॥८॥

१४ ] धम्मपदं [ २।१०
( प्रमादमप्रमादेन यदा नुदति पण्डितः ।
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोकः शोकिनीं प्रजाम् ।
पर्वतस्थ इव भूमिस्थान् धीरो बालान् अवेक्षते ॥८॥
अनुवाद—पंडित जब अप्रमादसे प्रमादको हटाता है, तो निःशोक
हो शोकाकुल प्रजाको, प्रज्ञारूपी प्रासादपर चढ़कर—
जैसे पर्वतपर खड़ा ( पुरुष ) भूमिपर स्थित ( वस्तु )
को देखता है—( वैसे ही ) धीर ( पुरुष ) अज्ञानियोंको
( देखता है ) ।
जेतवन दो मित्र भिक्षु
२६—अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो ।
अबलस्सं 'व सीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो ॥६॥
( अप्रमत्तः प्रमत्तेषु सुप्तेषु बहुजागरः ।
अबलाश्वमिव शीघ्राश्वो हित्वा याति सुमेधाः ॥९॥
अनुवाद—प्रमादियोंके बीचमें अप्रमादी, सोतोंके बीचमें बहुत
जागनेवाला, अच्छी बुद्धिवाला ( पुरुष )—जैसे निर्बल घोड़ेको
( पीछे ) छोड़ शीघ्रगामी घोड़ा ( आगे ) चला जाता है—
( वैसे ही जाता है ) ।
वैशाली ( कूटागार ) महाली
३०-अप्पमादेन मघवा देवानं सेट्ठतं गतो ।
अप्पमादं पसंसन्ति पमादो गरहितो सदा ॥१०॥
( अप्रमादेन मघवा देवानां श्रेष्ठतां गतः ।
अप्रमादं प्रशंसन्ति प्रमादो गर्हितः सदा ॥१०॥ )

२।१२ ] अप्पमादवग्गो [ १५
अनुवाद—अप्रमाद (=आलस्य रहित होने ) के कारण इन्द्र देव-
ताओंमें श्रेष्ठ बना। अप्रमादकी प्रशंसा करते हैं, और
प्रमादकी सदा निन्दा होती है ।
जेतवन कोई भिक्षु
३१—अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
सञ्ञोजनं अणुं थूलं डहं अग्गीव गच्छति ॥११॥
( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भयदर्शी वा ।
संयोजनं अणुं स्थूलं दहन् अग्निरिव गच्छति ॥११॥ )
अनुवाद—( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत है, या प्रमादसे भय खाने-
वाला ( हे ), ( वह ), आगकी भाँति छोटे मोटे बन्धनोंको
जलाते हुये जाता है ।
जेतवन ( निगम-वासी ) तिस्स ( थेर )
३२-अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा ।
अभब्बो परिहाणाय निब्बाणस्सेव सन्तिके ॥१२॥
( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भयदर्शी वा ।
अभव्यः परिहाणाय निर्वाणस्यैव अन्तिके ॥१२॥ )
अनुवाद—( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत है, या प्रमादसे भय खाने-
वाला है, उसका पतन होना सम्भव नहीं, ( वह ) निर्वाण-
के समीप है ।
२—अप्रमादवर्ग समाप्त

/ ३—चित्तवग्गो
चालिय पर्वत मेघिय (थेर)
३३-फन्दनं चपलं चित्तं दूरक्खं दुन्निवारयं ।
उजुं करोति मेधावी उसुकारो'व तेजनं ॥१॥
( स्पंदनं चपलं चित्तं दुरक्ष्यं दुर्নিবার्यम् ।
ऋजुं करोति मेधावी इषुकार इव तेजनम् ॥ १ ॥ )
अनुवाद--(इस) चचल, चपल, दुर्-रक्ष्य, दुर्-निवार्य चित्तको मेधावी
(पुरुष, उसी प्रकार) सीधा करता है, जैसे बाण बनाने-
वाला बाणको ।
३४-वारिजो'व थले खित्तो ओकमोकत उब्भतो ।
परिफन्दति'दं चित्तं मारधेय्यं पहातवे ॥२॥
( वारिजं इव स्थले क्षिप्तं उदकौकत उद्धृतम् ।
परिस्पन्दत इदं चित्तं मारधेयं प्रहातुम् ॥ २ ॥)
अनुवाद—जैसे जलाशयसे निकालकर स्थलपर फेंक दी गई मछली
(=वारिज) तड़फड़ाती है, (वैसे ही) मार (=राग,
१६]

३५ ] चित्तवग्गो [ १७
द्वेष, मोह ) के फन्देसे निकलनेके लिए यह चित्त
( तडफडाता है ) ।
श्रावस्ती कोई
३५-दुन्निग्गहस्स लहुनो यत्थ कामनिपातिनो ।
चित्तस्स दमथो साधु चित्तं दन्तं सुखावहं ॥ ३॥
( दुर्निग्रहस्य लघुनो यत्र-काम-निपातिनः ।
चित्तस्य दमनं साधु, चित्तं दान्तं सुखावहम् ॥ ३ ॥ )
अनुवाद—( जो ) कठिनाईसे निग्रह योग्य, शीघ्रगामी, जहाँ
चाहता है वहाँ चला जानेवाला है; ( ऐसे ) चित्तका दमन
करना उत्तम है; दमन किया गया चित्त सुखप्रद होता है ।
श्रावस्ती कोई उत्कण्ठित भिक्षु
३६-सुदुद्दसं सुनिपुणं यत्थ कामनिपातिनं ।
चित्तं रक्खेय्य मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं ॥४॥
( सुदुर्दर्शं सुनिपुणं यत्र-कामनिपाति ।
चित्तं रक्षेत् मेधावी, चित्तं गुप्तं सुखावहम् ॥ ४ ॥ )
अनुवाद—कठिनाईसे जानने योग्य, अत्यन्त चालाक, जहाँ चाहे
वहाँ ले जानेवाले चित्तकी, बुद्धिमान् रक्षा करे; सुर-
क्षित चित्त सुखप्रद होता है ।
श्रावस्ती सङ्घरक्खित ( थेर )
३७-दूरङ्गमं एकचरं असरीरं गुहासयं ।
ये चित्तं सञ्ञमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारबन्धना ॥५॥
२

१८ ] धम्मपद [ ३७
( दूरंगमं एकचरं ' अशरीरं गुहाशयम् ।
ये चित्तं संयंस्यन्ति मुच्यन्ते मारबन्धनात् ॥ ५ ॥ )
अनुवाद—दूरगामी, अकेला विचरनेवाले, निराकार, गुहाशायी
( इस ) चित्तका, जो संयम करेंगे, वही मारके बन्धनसे
मुक्त होंगे ।
सावत्थी चित्तहत्थ ( थेर )
३८-अनवट्ठितचित्तस्स सद्धम्मं अविजानतो ।
परिप्लवपसादस्स पञ्ञा न परिपूरति ॥६॥
( अनवस्थितचित्तस्य सद्धर्मं अविजानतः ।
परिप्लवप्रसादस्य प्रज्ञा न परिपूर्यते ॥ ६ ॥ )
अनुवाद—जिसका चित्त अवस्थित नहीं, जो सच्चे धर्मको नहीं जानता,
जिसका ( चित्त ) प्रसन्नताहीन है, उसे प्रज्ञा (=परम
ज्ञान ) नहीं मिल सकता ।
३६-अनवस्सुतचित्तस्स अनन्वाहतचेतसो ।
पुञ्जपापपहीणस्स नत्थि जागरतो भयं ॥७॥
( अनवस्स्रुतचित्तस्य अनन्वाहतचेतसः ।
पुण्यपापप्रहीणस्य नास्ति जाग्रतो भयम् ॥ ७॥ )
अनुवाद—जिसका चित्त मलरहित है, जिसका मन अकम्प्य है, जो
पाप-पुण्य-विहीन है, उस सजग रहनेवाले ( पुरुष ) केलिये
भय नहीं ।