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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages
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२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सम्बन्ध—सुषुप्तिकालमें जो परमात्माके साथ हृदयदेशमें जीवात्माकी
स्थिति बतायी गयी है, उसीकी पुष्टि करते हैं—
अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३ । २ । ८ ॥
अतः = इसलिये; अस्मात् = यहाँसे; प्रबोधः = जीवात्माका जगना ( श्रुतिमे
कहा गया है ) ।
व्याख्या—जो वस्तु जिसमें विलीन होती है, वह वहींसे प्रकट भी होती
है । इस न्यायसे जीवात्मा सुषुप्तिका अन्त होनेपर जब जगता है, तब यहाँसे
अर्थात् परमात्माके निवास-स्थान हृदयसे ही जाग्रत् होता है, इसलिये उसके लय
होनेका स्थान भी वही है, यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है। यह जगना उस
परमात्माकी ही व्यवस्थासे होता है। जितने समयतक उसके प्रारब्धानुसार
सुषुप्तिका सुखभोग होना चाहिये, उतना समय पूरा हो जानेपर उस परमेश्वरकी
व्यवस्थासे जीवात्मा जाग्रत् हो जाता है; यह भाव भी यहाँ समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्थामें
विलीन होता है, वही जगकर वापस आता है या शरीरके किसी अङ्गमें पड़ा
हुआ दूसरा ही कोई जीव जगता है ? इसपर कहते हैं—
स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३ । २ । ९ ॥
तु = निस्संदेह; स एव = वही जगता है; कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः =
क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, वेदप्रमाण और कर्म करनेकी आज्ञा इन सबकी सिद्धि
तभी होगी, इसलिये यही मानना ठीक है।
व्याख्या—जो जीवात्मा सोता है, वही जागता है। सोता दूसरा है और
जगता दूसरा है, ऐसा माननेमे बहुत दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं माना जा
सकता; क्योंकि यह देखा जाता है कि मनुष्य पहले दिन जिस कर्मको आरम्भ
करता है, उसके शेष भागकी पूर्ति दूसरे-तीसरे दिनोंतक करता रहता है। आधा काम
दूसरेने किया हो और शेष आधे कामको अपना ही छोड़ा हुआ समझकर उसकी पूर्ति
दूसरा करे यह सम्भव नहीं है। तथा जगनेके बाद पहलेकी सब बातोंकी स्मृतिके साथ-
साथ यह भी स्मरण अपने-आप होता ही है कि जो अबतक सोता था, वही मैं अब जगा
हूँ। दूसरे जीवात्माकी कल्पना करनेसे किसी प्रकार भी इसकी सङ्गति नहीं हो

सूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३

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सूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३
सकती; एवं श्रुतिमे भी जगह-जगह जो सोता है, उसीके जगनेकी बात कही गयी
है ( बृह० उ० ४ । ३ । १६ )। और कर्म करनेकी जो वेदोंमे आज्ञा दी
गयी है, उसकी सफलता भी जो सोता है, उसीके जगनेसे होगी; क्योकि एकको
दी हुई आज्ञाका दूसरा कैसे पालन कर सकेगा। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध
होता है कि जो जीवात्मा सुषुप्तिकालमे विलीन होता है, वही जगता है।
सम्बन्ध—जब मनुष्य किसी औषध आदिसे मूर्च्छित कर दिया जाता है
अथवा अन्य किन्हीं बीमारी आदि कारणोंसे अचेत हो जाता है, उस समय
भी न तो बाहरी जगत्‌का ज्ञान रहता है, न स्वप्न देखता है और न सुखका
ही अनुभव करता है, वह कौन-सी अवस्था है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
मुग्धेऽर्द्धसम्पत्तिः परिशेषात् ॥ ३ । २ । १० ॥
मुग्धे=मूर्च्छाकालमे; अर्द्धसम्पत्तिः=अधूरी सुषुप्ति-अवस्था माननी चाहिये;
परिशेषात्=क्योकि अन्य कोई अवस्था शेष नहीं है।
व्याख्या—जन्मके बाद मरनेसे पहले जीवकी पूर्वोक्त तीन अवस्थाएँ ही
प्रसिद्ध हैं। किसी विशेष कारणसे कभी-कभी हो जानेवाली यह मुग्धावस्था
सबकी और सदैव नहीं होती, अतः इसके लक्षण कुछ-कुछ सुषुप्तिमे ही सङ्गत
हो सकते हैं। इसलिये इसे अधूरी सुषुप्ति मानना ही उचित है; क्योकि उस
अवस्थामे सुषुप्तिका सुखलाभ नहीं होता, केवल अज्ञानमात्रमे ही सुषुप्तिसे इसकी
समता है; अतः इसे पूर्णतया सुषुप्ति भी नहीं कहा जा सकता।
सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणसे जीवात्माकी जाग्रत् आदि अवस्थाओंका निरूपण
किया गया। उसमें प्रसङ्गवश यह बात भी कही गयी कि उस परब्रह्म परमेश्वरका
निरन्तर चिन्तन करनेपर यह जीव कर्मबन्धनसे मुक्त हो सकता है। जिसके
ध्यानका यह महान् फल बताया गया है, उस परब्रह्म परमात्माका क्या स्वरूप
है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है।
यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि श्रुतियोंमें कहीं तो उस परमेश्वरको सर्वथा
निर्विशेष निर्गुण बताया गया है ( क० उ० १ । ३ । १५, मा० उ० ७ )। कहीं
उसको सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सर्वसाक्षी तथा समस्त
प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहा गया है ( मा० उ० ६ )। कहीं
उसे सर्वव्यापी और कहीं अङ्गुष्ठमात्र बताया गया है। कहीं क्रियाशील और

प्रकरणमें नाना प्रकारके दिव्य गुणोंसे युक्त भी बताया है (श्वे० उ० ३ । १९)

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२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
कहीं अक्रिय कहा गया है; अतः उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? तथा
हृदय आदि जिन-जिन स्थानोंमें परमात्माकी स्थिति बतायी गयी है। उनके
दोषोंसे वह लिप्त होता है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि॥ ३ । २ । ११ ॥
स्थानतः=स्थानके सम्बन्धसे; अपि=भी; परस्य=परब्रह्म परमात्माका; न=
किसी प्रकारके दोषसे संसर्ग नहीं होता; हि=क्योंकि; सर्वत्र=सभी वेदवाक्योंमें
उस ब्रह्मको; उभयलिङ्गम्=दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त अर्थात् सब प्रकारके
दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न बताया गया है।
व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य
जन्तोर्निहितो गुहायाम्' (क० उ० १ । २ । २०) इस जीवात्माके हृदयरूप
गुहामे रहनेवाला परमात्मा छोटे-से-छोटा तथा बड़े-से-बड़ा है। 'वह ब्रह्म बैठा हुआ ही
दूर चला जाता है, सोता हुआ ही सब ओर चला जाता है।' (क० उ० १ । २ । २१)
'वह जीवात्माके साथ उसकी हृदयगुहामे स्थित है' (क० उ० १ । ३ । १), 'वह
सब धर्मोंसे रहित है।' (क० उ० १ । ३ । १५) 'भूत और भविष्यका शासक है।'
(क० उ० २ । १ । १२-१३) 'उस परब्रह्ममें नाना भेद नहीं है।' (क० उ० २ ।
१ । ११) 'उसके भयसे अग्नि आदि देवता अपने-अपने कार्योंमें संलग्न रहते हैं।' (क०
उ० २ । ३ । ३) इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी जहाँ इसको निर्विशेष कहा है, उसी
प्रकरणमें नाना प्रकारके दिव्य गुणोंसे युक्त भी बताया है (श्वे० उ० ३ । १९)
तथा जो इसके दिव्य गुण बताये गये हैं, वे जीव और प्रकृति—इन दोनोंसे
विलक्षण हैं। अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये दिव्य गुण जीवात्माके
या जड प्रकृतिके हैं अथवा उपाधिके कारण उस परब्रह्ममें इनका आरोप किया
गया है, क्योंकि परब्रह्म परमात्मा उपाधिसे रहित है। अतः यही सिद्ध होता
है कि वह परमात्मा स्वभावसे ही दोनों प्रकारके लक्षणवाला है अर्थात् वह सब
प्रकारके दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है, इसलिये सर्वत्र
व्याप्त और समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर भी वह परमात्मा उन-उन
वस्तुओं और स्थानोंके दोषोंसे लिप्त नहीं होता। उसमे परस्परविरोधी लक्षण
एक साथ रह सकते हैं; क्योकि वह सर्वशक्तिमान् और सांसारिक पदार्थोंसे
सर्वथा विलक्षण है। लौकिक वस्तुओंके साथ तुलना करके उसका स्वरूप

सूत्र ११—१२ ] अध्याय ३ २३५

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सूत्र ११—१२ ] अध्याय ३ २३५
समझाया नहीं जा सकता; क्योकि वह मन, वाणीका विषय नहीं है। अतः वेदने
उसको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त बताकर उसकी अपार महिमाको लक्ष्य कराया है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हुए
पूर्वोक्त बातको दृढ़ करते हैं—
न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ ३ । २ । १२ ॥
चेत्=यदि कहो कि; भेदात्=सगुण (अपरब्रह्म या कार्यब्रह्म) और निर्गुण
(परब्रह्म) ये ब्रह्मके पृथक्-पृथक् दो स्वरूप माने गये हैं, इसलिये; (वह एक ही
परमात्मा दोनो लक्षणोंवाला) न=नहीं हो सकता; इति न=तो ऐसी बात नहीं
है; प्रत्येकम् अतद्वचनात्=क्योंकि प्रत्येक श्रुतिमे इसके विपरीत एक परब्रह्म
परमेश्वरको ही दोनो प्रकारके लक्षणोवाला बताया गया है।
व्याख्या—यदि कहा जाय कि 'जहाँ परमात्माको सब श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न
बताया गया है, वहाँ मायाविशिष्ट कार्यब्रह्म या अपरब्रह्मका वर्णन है तथा जहाँ
उसके निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन हुआ है, वही परब्रह्मका वर्णन है, इस
प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण दोनो एक नहीं है तथा उस
परब्रह्म परमात्माको उभयलिङ्गवाला मानना ठीक नहीं है।' तो ऐसी बात नहीं है;
क्योकि अन्तर्यामि-ब्राह्मणमे पृथिवीसे लेकर जीवात्मापर्यन्त सबका अन्तर्यामी और
अमृत एक ही परब्रह्म परमात्माको बताया गया है (बृह० उ० ३। ७। ३ से २२ तक)
तथा माण्डूक्योपनिषद्में भी एक ही परब्रह्म परमात्माका वर्णन करते हुए उसे
समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न (मा० उ० ६) और सर्वथा निर्विशेष (मा० उ०
७) कहा गया है।* श्वेताश्वतरोपनिषद् (३। १, २) में उस एक ही
ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे सूर्यके समान स्वयंप्रकाश और
मायासे सर्वथा अतीत बताया गया है, फिर 'उससे श्रेष्ठ, महान् तथा सूक्ष्म
दूसरा कोई नहीं है' ऐसा कहकर उसे सर्वत्र परिपूर्ण बताया है (श्वे० उ० ३।
८, ९)। आगे चलकर उसीको आकार और दोषोंसे रहित कहा है (श्वे० उ०
३। १०)। फिर उसके सभी जगह मुख, सिर आदि अङ्ग बताये गये है
(श्वे० उ० ३। ११) तथा उसे सबपर शासन करनेवाला, महान्, सबका प्रेरक,
ज्ञानस्वरूप और निर्मल बताया है (श्वे० उ० ३। १२)। तदनन्तर उस परमेश्वर-
को जगत्स्वरूप, सब जगह हाथ, पैर आदि अङ्गोवाला, सब इन्द्रियोसे युक्त

  • ये दोनो मन्त्र पृष्ठ २ और ३ की टिप्पणीमे आ गये हैं।
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२३६ वेदान्त-दर्शन [.पाद २
और समस्त इन्द्रियोंसे रहित, सबका स्वामी, शासक और आश्रय बताया है।'
(३ । १५-१७) । इस प्रकार वहाँ प्रत्येक श्रुति-वाक्यमे एक परब्रह्म
परमेश्वरको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त कहा गया है। उससे भिन्न अपर
(कार्य) ब्रह्मका वहाँ वर्णन नहीं है; इसलिये पर और अपर ब्रह्म भिन्न-भिन्न
है—यह कहना ठीक नहीं है। अतएव यही सिद्ध हुआ कि वह परब्रह्म परमात्मा
ही निर्गुण-निराकार है और वही सगुण-साकार भी है। इन दोनों प्रकारके
लक्षणोंसे युक्त होना उसका स्वभाव ही है; किसी उपाधिके कारण या कार्य-
कारण-भेदसे नहीं।
सम्बन्ध—दूसरी श्रुतिके प्रमाणसे पुनः उसके एकत्वको दृढ़ करते हैं—
अपि चैवमेके ॥ ३ । २ । १३ ॥
अपि च=इसके सिवा; एके=किसी एकशाखावाले (विशेषरूपसे); एवम्=
इस बातका प्रतिपादन करते हैं।
व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे उस परब्रह्म परमेश्वरको सत्य,'ज्ञान और अनन्त
बतलाकर उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है (तै०उ० २। १) तथा यह
भी कहा है कि 'उसने स्वयं अपने-आपको ही इस रूपमे बनाया है' तथा
उसको रसरूप और सबको आनन्दयुक्त करनेवाला कहा है। फिर उसके
निर्विशेष लक्षणोंका वर्णन करके उस परमात्मामे स्थिति लाभ करनेवाले साधकका
निर्भय पदमे स्थित होना कहा है (तै० उ० २ । ७)। उसके बाद उसकी स्तुति
करते हुए कहा है किं 'इसीके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य उदय
होता है, इसीके भयसे अग्नि और इन्द्र तथा पाँचवाँ मृत्यु अपने-अपने कार्यमे
प्रवृत्त होते हैं।' (तै० उ० २ । ८) इस प्रकार तैत्तिरीय शाखाके मन्त्रोद्वारा भी उस
एक ही परमात्माके दोनो प्रकारके लक्षणोका कथन होनेसे भी एक ही परमेश्वरका
निर्गुण और सगुण रूप होना सिद्ध होता है।
सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं—
अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ ३ । २ । १४ ॥
हि=क्योंकि; अरूपवत्=रूपरहित निर्विशेष लक्षणोकी भाँति; एव=ही,
तत्प्रधानत्वात्=उन सगुण स्वरूपके लक्षणोकी भी प्रधानता है, इसलिये
(यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म दोनो लक्षणोवाला है)।

सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७

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सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७
व्याख्या-जिस प्रकार उस परब्रह्म परमात्माको निर्गुण-निराकार बतानेवाले
वेदवाक्य मुख्य हैं, ठीक उसी प्रकार उसे सगुण साकार, सर्वदिव्यगुणसम्पन्न
बतानेवाले वेदवाक्य भी प्रधान हैं; उनमेंसे किसी एकको मुख्य और दूसरेको
गौण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि एक ही प्रकरणमें और एक ही मन्त्रमें एक
परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे दोनों लक्षणोंवाला बताया गया
है ( श्वे० उ० ६ । ११ ) अतएव रूपरहित निर्विशेष लक्षणोंकी भाँति
ही सगुण साकाररूपकी भी प्रधानता ज्ञात होती है यही सिद्ध होता है कि
वह परब्रह्म परमेश्वर दोनों लक्षणोंवाला है ।
सम्बन्ध-अब दूसरे दृष्टान्तसे उसी बातको सिद्ध करते हैं-
प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३ । २ । १५ ॥
च=तथा; प्रकाशवत्=प्रकाशकी भाँति; अवैयर्थ्यात्=दोनोंमेंसे कोई भी
लक्षण या उसके प्रतिपादक वेदवाक्य व्यर्थ नहीं हैं, इसलिये ( यही सिद्ध होता
है कि परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला है ) ।
व्याख्या-जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदिके दो रूप होते हैं-
एक प्रकट और दूसरा अप्रकट-उन दोनोंमेंसे कोई भी व्यर्थ नहीं है, दोनों ही सार्थक
हैं, उसी प्रकार उस ब्रह्मके भी दोनों रूप सार्थक हैं, व्यर्थ नहीं हैं; क्योंकि
ऐसा माननेसे ही उसकी उपासना आदिकी सार्थकता होगी, दोनोंमेंसे किसी एक-
को प्रधान और दूसरेको गौण या अनावश्यक मान लेंगे तो उसकी सार्थकता
नहीं होगी । श्रुतिमें उसके दोनों लक्षणोंका वर्णन है; श्रुतिके वचन कभी व्यर्थ
नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वतः प्रमाण हैं, अतः उन वेदवाक्योंकी सार्थकताके लिये
भी ब्रह्मको सविशेष और निर्विशेष दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त मानना ही उचित है ।
सम्बन्ध-अब श्रुतिमें प्रतीत होनेवाले विरोधका दो सूत्रोंद्वारा समाधान किया
जाता है--
आह च तन्मात्रम् ॥ ३ । २ । १६ ॥
तन्मात्रम्=( श्रुति उस परमात्माको ) केवल सत्य; ज्ञान और अनन्तमात्र;
च=ही; आह=बताती है, वहाँ सगुणवाचक शब्दोंका प्रयोग नहीं है ।
व्याख्या-ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिये कि तैत्तिरीय-श्रुतिमें 'सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० उ० २ । १ ) अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है'-

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२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
इस प्रकार ब्रह्मको केवल ज्ञानस्वरूप ही बताया है, सत्यसङ्कल्पत्व आदि गुणोंवाला
नहीं बताया, अतः उसको दोनों लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता।
सम्बन्ध—क्योंकि—
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ ३ । २ । १७ ॥
अथो=उक्त कथनके अनन्तर; दर्शयति=श्रुति उसीको अनेक रूपवाला भी
दिखाती है; च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=स्मृतिमें भी उसके सगुण खरूपका
वर्णन आया है।
व्याख्या—पूर्वोक्त 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इस मन्त्रमे आगे चलकर उस परमात्माको
सबके हृदयमे निहित बताया है और उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन
किया है (तै० उ० २ । १); फिर उसे रस-स्वरूप, सबको आनन्द देनेवाला (२ । ७)
और सबका संचालक (२ । ८) कहा है। इसलिये उस श्रुतिको केवल
निर्गुणपरक मानना उचित नहीं है। इसी प्रकार स्मृतिमें भी जगह-जगह उस
परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन दोनो प्रकारसे उपलब्ध होता है। जैसे—'जो मुझे
अजन्मा, अनादि और लोकमहेश्वर जानता है, वह मनुष्योमे ज्ञानी है और सब
पापोंसे मुक्त हो जाता है।'* (गीता १० । ३) 'मुझे सब यज्ञ और तपोका
भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोका महान् ईश्वर, समस्त प्राणियोका सुहृद् जानकर मनुष्य
शान्तिको प्राप्त होता है।'† (गीता ५ । २९) 'ऐसे सगुण रूपवाला मैं
केवल अनन्य भक्तिके द्वारा देखा जा सकता हूँ, तत्त्वसे जाननेमे आ सकता
हूँ और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।'‡ (गीता ११ । ५४) ।
श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें अध्यायमें क्षर और अक्षरका लक्षण बताकर यह स्पष्ट
रूपसे कहा गया है कि 'उत्तम पुरुष इन दोनोंसे भिन्न है, जो कि परमात्मा
नामसे कहा जाता है, जो तीनो लोकोंमे प्रविष्ट होकर सबको धारण करता है

  • यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
    असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
    † भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
    सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
    ‡ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
    ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥

सूत्र १७-१८] अध्याय ३ २३९

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सूत्र १७-१८] अध्याय ३ २३९
तथा जो सबका ईश्वर एवं अविनाशी है ।'* ( १५ । १७ ) इस प्रकार
परब्रह्म पुरुषोत्तमके सगुण स्वरूपका वर्णन करके अन्तमे यह भी कहा है कि
'जो मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जाननेवाला है ।'†
( १५ । १९ ) । इस प्रकारके बहुत-से वचन स्मृतियोंमें पाये जाते हैं, जिनमे
भगवान्के सगुण रूपका वर्णन है और उसे वास्तविक बताया गया है। इसी
तरह श्रुतियो और स्मृतियोंमे परमेश्वरके निर्गुण-निर्विशेष रूपका भी वर्णन पाया
जाता है ‡ और वह भी सत्य है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म दोनो
प्रकारके लक्षणोंवाला है ।
सम्बन्ध—उस परब्रह्म परमेश्वरका सगुणरूप उपाधि-भेदसे नहीं, किन्तु
स्वाभाविक है, इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा प्रमाण देते हैं—
अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ ३ । २ । १८ ॥
च=और; अत एव=इसीलिये अर्थात् उस परमेश्वरका उभय रूप स्वाभाविक
हैं, यह सिद्ध करनेके लिये ही; सूर्यकादिवत्=सूर्य आदिके प्रतिबिम्बकी भाँति;
उपमा=उपमा दी गयी है ।
व्याख्या—'सब भूतोका आत्मा परब्रह्म परमेश्वर एक है, तथापि वह भिन्न-
भिन्न प्राणियोमे स्थित है. अतः जलमे प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति एक और
अनेक रूपसे भी दीखता है ।'§ ( ब्रह्मविन्दु उ० १२ ) इस दृष्टान्तसे यह बात
दिखायी गयी है कि वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर सगुण और निर्गुण-भेदसे अलग-
अलग नहीं, किन्तु एक ही है; तथापि प्रत्येक जीवात्मामे अलग-अलग दिखायी
दे रहा है। यहाँ चन्द्रमाके प्रतिबिम्बका दृष्टान्त देकर यह भाव दिखाया गया
है कि जैसे सूर्य और चन्द्रमा आदिमें जो प्रकाश गुण है, वह स्वाभाविक
है, उपाधिसे नहीं है; उसी प्रकार परमात्मामे भी सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व

  • उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
    यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
    † यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
    स सर्वविद् ............ ॥
    ‡ देखिये कठोपनिषद् १ । ३ । १५, मुण्डक० १ । १ । ६ तथा माण्डूक्य० ७ ।
    § एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः ।
    एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥
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२४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
और सर्वव्यापित्वादि गुण स्वाभाविक हैं, उपाधिसे नहीं हैं। दूसरा यह भाव
दिखाया है कि जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमे अलग-अलग दीखता
हुआ भी एक है, उसी प्रकार परमात्मा सब प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे , अलग-
अलगकी भाँति स्थित हुआ भी एक ही है, तथा वह सबमें रहता हुआ भी
उन-उनके गुण-दोषोंसे अलिप्त है। गीताके निम्नाङ्कित वचनसे भी इसी सिद्धान्त-
की पुष्टि होती है 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' 'वह परमात्मा
विभागरहित है तो भी विभक्तकी भाँति सब प्राणियोमे स्थित है' इत्यादि
(गी० १३ । १६) यही उसकी विचित्र महिमा है।
सम्बन्ध—यहाँ प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया जानेके कारण यह भ्रम हो
सकता है कि परमात्माका सब प्राणियोंमें रहना प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या ही
है, वास्तवमें नहीं है; अतः इस भ्रमकी निवृत्तिके लिये अगला सूत्र कहते हैं—
अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥ ३ । २ । १९ ॥
तु=किन्तु; अम्बुवत्=जलमे स्थित चन्द्रमाकी भाँति; अग्रहणात्=परमात्मा-
का ग्रहण न होनेके कारण (उस परमेश्वरको); तथात्वम्=सर्वथा वैसा; न=नहीं
समझना चाहिये ।
व्याख्या—पूर्व सूत्रमे परमेश्वरको समस्त प्राणियोमे स्थित बताते हुए
जलमें दीखनेवाले चन्द्रमाका दृष्टान्त दिया; किन्तु पूर्णतया वह दृष्टान्त परमात्मामे
नहीं घटता; क्योंकि चन्द्रमा वस्तुतः जलमे नहीं है, केवल उसका प्रतिबिम्ब
दीखता है। किन्तु परमात्मा तो स्वयं सबके हृदयमें सचमुच ही स्थित है और
उन-उन जीवोके कर्मानुसार उनको अपनी शक्तिके द्वारा संसारचक्रमे भ्रमण
कराता है (गीता १८ । ६१) । अतः चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति
परमेश्वरकी स्थिति नहीं है। यहाँ दृष्टान्तका केवल एक अंश लेकर ऐसा समझना
चाहिये कि परमेश्वर एक होकर भी नाना-सा दीखता है, वास्तवमे वह नाना
नहीं है, तथापि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण अलग-अलग प्राणियोमे एक रूपसे
स्थित है।
सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त क्यों दिया गया ?
इस जिज्ञासापर कहते हैं—
वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ॥ ३ । २ । २० ॥

सूत्र १९-२१ ] अध्याय ३ २४१

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सूत्र १९-२१ ] अध्याय ३ २४१
अन्तर्भावात् = शरीरके भीतर स्थित होनेके कारण; वृद्धिहासभाक्त्वम् =
शरीरकी भाँति परमात्माके बढ़ने-घटनेवाला होनेकी सम्भावना होती है, अतः
(उसके निषेधमे); उभयसामञ्जस्यात् = परमात्मा और चन्द्रप्रतिविम्ब—इन दोनोंकी
समानता है, इसलिये; एवम् = इस प्रकारका दृष्टान्त दिया गया है।
व्याख्या—उपमा उपमेय वस्तुके किसी एक अंशकी समानताको लेकर
दी जाती है। पूर्णतया दोनोंकी एकता हो जाय तब तो वह उपमा
ही नहीं कही जायगी; अपितु वास्तविक वर्णन हो जायगा। अतः यहाँ
जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमे रहता हुआ भी जलके घटने-बढने आदि
विकारोसे सम्बद्ध नहीं होता, वैसे ही परब्रह्म परमेश्वर सबमे रहता हुआ भी
निर्विकार रहता है, उनके घटने-बढने आदि किसी भी विकारसे वह लिप्त नहीं
होता। इतना ही आशय इस दृष्टान्तका है, इसलिये इस दृष्टान्तसे यह शङ्का
नहीं करनी चाहिये कि परमात्माकी सब प्राणियोमे जो स्थिति बतायी गयी है,
यह भी चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति अवास्तविक (झूठी) होगी।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उस भ्रमकी निवृत्ति की जाती है—
दर्शनाच्च ॥ ३ । २ । २१ ॥
दर्शनात् = श्रुतिमे दूसरे दृष्टान्त देखे जाते हैं, इसलिये; च = भी (यही सिद्ध
होता है कि परमात्माकी स्थिति प्रतिबिम्बकी भाँति अवास्तविक नहीं है)।
व्याख्या—कठोपनिषद् (२।२।९) मे कहा है कि—
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
'जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्डमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि नाना रूपोंमे उनके
सदृश रूपवाला हो रहा है, उसी प्रकार सब प्राणियोका अन्तरात्मा परमेश्वर एक
होता हुआ ही नाना रूपोमे प्रत्येकके रूपवाला-सा हो रहा है तथा उनके बाहर
भी है।' अग्निकी ही भाँति वहाँ वायु और सूर्यके दृष्टान्तसे भी परमेश्वरकी वस्तुगत
गुण-दोषसे निर्लेपता सिद्ध की गयी है। (क० उ० २ । २ । १०-११) इस
प्रकार प्रतिबिम्बके अतिरिक्त दूसरे दृष्टान्त, जो उस ब्रह्मकी स्थितिके सत्यत्वका
प्रतिपादन करनेवाले हैं, वेदमे देखे जाते हैं; इसलिये भी प्राणियोंमें और प्रत्येक
वस्तुमे उस परब्रह्म परमेश्वरकी स्थिति प्रतिबिम्बकी भाँति आभासमात्र नहीं; किन्तु
वे० द० १६—

प्रकरण आरम्भ किया गया है। वहाँ भौतिक जगत्में तो पृथिवी, जल और

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२४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सत्य है। अतएव वह सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है, यही
मानना युक्तिसङ्गत है।
सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि परब्रह्म परमेश्वर दोनों प्रकारके
लक्षणोंवाला है। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें ब्रह्मको दोनों प्रकारवाला
बताकर अन्तमें जो ऐसा कहा गया है 'नेति नेति' अर्थात् ऐसा नहीं है, ऐसा
नहीं है, इन निषेधपरक श्रुतियोंका क्या अभिप्राय है? अतः इसका निर्णय करने-
के लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च
भूयः ॥ ३ । २ । २२ ॥
प्रकृतैतावत्त्वम् = प्रकरणमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनकी इयत्ताका;
प्रतिषेधति = 'नेति नेति' श्रुति निषेध करती है; हि = क्योंकि; ततः = उसके बाद;
भूयः = दुबारा; ब्रवीति च = कहती भी है।
व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे ब्रह्मके मूर्त्त और अमूर्त्त दो रूप बताकर
प्रकरण आरम्भ किया गया है। वहाँ भौतिक जगत्में तो पृथिवी, जल और
तेज—इन तीनोंको उनके कार्यसहित, मूर्त्त बताया है तथा वायु और आकाशको
अमूर्त्त कहा है। उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत्मे प्राण और हृदयाकाशको
अमूर्त्त तथा उससे भिन्न शरीर और इन्द्रियगोलकादिको मूर्त्त बताया है। उनमेंसे
जिनको मूर्त्त बताया, उनको नाशवान् अर्थात् उस रूपमें न रहनेवाले, किन्तु
प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेके कारण 'सत्' कहा, उसी प्रकार अमूर्त्तको अमृत अर्थात्
नष्ट न होनेवाला बतलाया। इस प्रकार उन जड तत्त्वोंका विवेचन करते समय ही
आधिभौतिक जगत्मे सूर्यमण्डलको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रको मूर्त्तका सार
बताया है। इसी प्रकार आधिदैविक जगत्मे सूर्यमण्डलस्थ पुरुषको और आध्यात्मिक
जगत्में नेत्रस्थ पुरुषको अमूर्त्तका सार कहा है। इस तरह सगुण परमेश्वरके
साकार और निराकार—इन दो रूपोंका वर्णन करके फिर कहा गया है कि 'नेति
नेति' अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं। इससे बढ़कर कोई उपदेश नहीं
है। तदनन्तर यह बताया गया है 'उस परम तत्त्वका नाम सत्यका सत्य है, यह
प्राण अर्थात् जीवात्मा सत्य है और उसका भी सत्य वह परब्रह्म परमेश्वर है।'
(बृह० उ० २ । ३ । १- ६)। इस प्रकार उस परमेश्वरके साकार रूपका

सूत्र २२-२३ ] अध्याय ३ २४३

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सूत्र २२-२३ ] अध्याय ३ २४३
वर्णन करके यह भाव दिखाया गया कि इनमें जो जड अंश है, वह तो उसकी
अपरा प्रकृतिका विस्तार है और जो चेतन है, वह जीवात्मारूप उसकी परा प्रकृति है
और इन दोनों सत्योंका आश्रयभूत वह परब्रह्म परमेश्वर इनसे भी पर अर्थात् श्रेष्ठ
है। अतः यहाँ 'नेति नेति' श्रुति सगुण परमात्माका प्रतिषेध करनेके लिये नहीं
है; किन्तु इसकी इयत्ता अर्थात् वह इतना ही है, इस परिमित भावका निषेध करके
उस परमेश्वरकी असीमता-अनन्तता सिद्ध करनेके लिये है। इसीलिये 'नेति नेति'
कहकर सत्यके सत्य परमेश्वरका होना सिद्ध किया गया है। अत यह परब्रह्म
परमेश्वर केवल निर्गुण निर्विशेष ही है, सगुण नहीं; ऐसी बात नहीं समझनी चाहिये।
सम्बन्ध-उस परब्रह्म परमात्माके सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूप
वास्तवमें प्राकृत मन-बुद्धि और इन्द्रियोंसे अतीत हैं, इस भावको स्पष्ट करनेके
लिये कहते हैं-
तदव्यक्तमाह हि ॥ ३ । २ । २३ ॥
हि=क्योंकि (श्रुति); तत्=उस सगुण रूपको; अव्यक्तम्=इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें
न आनेवाला; आह=कहती है।
व्याख्या-केवल निर्गुण-निराकाररूपसे ही वह परब्रह्म परमेश्वर अव्यक्त
अर्थात् मन-इन्द्रियोंद्वारा जाननेमे न आनेवाला है, इतना ही नहीं, इसीकी भाँति
उसका सगुण स्वरूप भी इन प्राकृत मन और इन्द्रिय आदिका विषय नहीं है;
क्योंकि श्रुति और स्मृतियोंमें उसको भी अव्यक्त कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में
पहले परमेश्वरके सगुण स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है-
यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥
'जब यह द्रष्टा ( जीवात्मा ) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण,
समस्त जगत्के रचयिता, दिव्यप्रकाशस्वरूप परम पुरुष परमात्माको प्रत्यक्ष कर
लेता है, उस समय पुण्य-पाप दोनोंकों भलीभाँति धो-बहाकर निर्मल हुआ ज्ञानी
सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है।' (मु० उ० ३ । १ । ३) इसके बाद चौथे-
से सातवें मन्त्रतक सत्य, तप और ज्ञान आदिको उसकी प्राप्तिका उपाय बताया
गया। फिर अनेक विशेषणोंद्वारा उसके स्वरूपका वर्णन करके अन्तमें कहा है-
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।

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२४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
'यह परमात्मा न तो नेत्रोंसे, न वाणीसे, न दूसरी इन्द्रिय या मनसे और न
कर्मोंसे ही देखा जा सकता है।' इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोंमें भी
है, विस्तारभयसे यहाँ अधिक प्रमाण नहीं दिये गये हैं।
सम्बन्ध—इससे यह नहीं समझना चाहिये कि परब्रह्म परमेश्वरका किसी
भी अवस्थामें प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता; क्योंकि—
अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ ३ । २ । २४ ॥
अपि च=इस प्रकार अव्यक्त होनेपर भी; संराधने=आराधना करनेपर
( उपासक परमेश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन पाते हैं ); प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्=यह बात
वेद और स्मृति—दोनोंके ही कथनसे सिद्ध होती है।
व्याख्या—श्रुतियों और स्मृतियोमे जहाँ सगुण और निर्गुण परमेश्वरको
इन्द्रियादिके द्वारा देखनेमें न आनेवाला बताया है, वहीं यह भी कहा है कि वह
परमात्मा नामजप, स्मरण, ध्यान आदि आराधनाओंद्वारा प्रत्यक्ष होनेवाला भी
है। (मु० उ० ३ । १ । ८ श्वेता० १ । ३, १०; २ । १५ तथा
श्रीमद्भगवद्गीता ११ । ५४ )। इस तरहके अनेक प्रमाण हैं। वेद और स्मृतियो-
के इन वचनोंमें उस सगुण-निर्गुणस्वरूप परब्रह्म परमात्माको आराधनाके द्वारा
प्रत्यक्ष होनेवाला बताया गया है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि उसके प्रत्यक्ष
दर्शन होते है। भगवान्ने स्वयं कहा है—'हे अर्जुन ! अनन्य भक्तिके द्वारा
ही मुझे तत्त्वसे जाना जा सकता है। मेरा दर्शन हो सकता और मुझमें प्रवेश
किया जा सकता है।' (११ । ५४) इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि वह
परब्रह्म परमेश्वर अवश्य है और वह सगुण तथा निर्गुण — दोनो ही लक्षणोंवाला है।
सम्बन्ध—उस परमेश्वरका स्वरूप आराधनासे जाननेमें आता है, अन्यथा
नहीं, इस कथनसे तो यह सिद्ध होता है कि वास्तवमें परमात्मा निर्विशेष ही
है, केवल भक्तके लिये आराधनाकालमें सगुण होता है; ऐसी शङ्का होनेपर
कहते हैं—
प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॥ ३ । २ । २५ ॥
प्रकाशादिवत्=अग्नि आदिके प्रकाशादि गुणोंकी भाँति; च=ही;
अवैशेष्यम्=( परमात्मामे भी ) भेद नहीं है; प्रकाशः=प्रकाश; च=भी;
कर्मणि=कर्ममें; अभ्यासात्=अभ्यास करनेसे ही ( प्रकट होता है )।

सूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २४५

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सूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २४५
व्याख्या—जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदि तत्त्व प्रकाश और उष्णता आदि
गुणोंसे युक्त हैं, उनका वह रूप जब प्रकट हो, उस अवस्थामे भी वे उन-उन स्वाभाविक
गुणोंसे युक्त है और प्रकट न हो—छिपा हो, उस समय भी वे उन गुणोंसे युक्त
है । व्यक्त और अव्यक्त स्थितिमे उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त होनेमे कोई अन्तर
नहीं आता । उसी प्रकार वह परमेश्वर उपासनाद्वारा प्रत्यक्ष होनेके समय जिस
प्रकार समस्त कल्याणमय विशुद्ध दिव्य-गुणोंसे सम्पन्न है, वैसे ही अप्रकट
अवस्थामे भी है; ऐसा समझना चाहिये । अग्नि आदि तत्त्वोको प्रकट करनेके
लिये जो साधन बताये गये हैं, उनका अभ्यास करनेपर ही वे अपने गुणोंसहित
प्रकट होते हैं । उसी प्रकार आराधना करनेपर अप्रकट परमेश्वरका प्रकट हो
जाना उचित ही है ।
सम्बन्ध-उभयलिङ्गवाले प्रकरणको समाप्त करते हुए अन्तमें कहते हैं—
अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥ ३ । २ । २६ ॥
अतः=इन ऊपर बताये हुए कारणोंसे यह सिद्ध हुआ कि; अनन्तेन=
( वह ब्रह्म ) अनन्त दिव्य कल्याणमय गुण-समुदायसे सम्पन्न है; हि=क्योंकि;
तथा=वैसे ही; लिङ्गम्=लक्षण उपलब्ध होते हैं ।
व्याख्या—पूर्वोक्त कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर
सत्यसङ्कल्पता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सौहार्द, पतितपावनता, आनन्द,
विज्ञान, असङ्गता और निर्विकारता आदि असंख्य कल्याणमय गुण-समुदायसे
सम्पन्न और निर्विशेष—समस्त गुणोंसे रहित भी है, क्योकि श्रुतिमें ऐसा ही
लक्षण मिलता है ( श्वे० उ० ३ । ८—२१ ) ।
सम्बन्ध—अब परम पुरुष और उसकी प्रकृति भिन्न है या अभिन्न ? इस
विषयपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है । यहाँ पहले यह
बात बतायी जाती है कि शक्ति और शक्तिमान्में किस प्रकार अभेद है—
उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ॥ ३ । २ । २७ ॥
उभयव्यपदेशात्=दोनों प्रकारका कथन होनेसे; अहिकुण्डलवत्=सर्पके
कुण्डलाकारत्वकी भाँति; तु=ही (उसका भाव समझना चाहिये)।

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२४६ वेदान्त-दर्शन । [ पाद २
व्याख्या-जिस प्रकार सर्प कभी सङ्कुचित हो कुण्डलाकार हो जाता है
और कभी अपनी साधारण 'अवस्थामे रहता है; किन्तु दोनों अवस्थाओमे वह
सर्प एक ही है। साधारण अवस्थामें रहना उसका कारणभाव 'है, उस समय
उसकी कुण्डलादिभावमें प्रकट होनेकी शक्ति अप्रकट 'है, तथापि वह उसमें
विद्यमान है और उससे अभिन्न है। एवं कुण्डलादि आकारमें स्थित होना उसका
कार्यभाव है, यही उसकी पूर्वोक्त अप्रकट शक्तिका प्रकट होना है। उसी प्रकार वह
परब्रह्म जब कारण-अवस्थामें रहता है, उस समय उसकी अपरा तथा परा प्रकृति-
रूप दोनो शक्तियाँ सृष्टिके पूर्व उसमे अभिन्नरूपसे विद्यमान रहती हुईं भी अप्रकट
रहती है और वही जब कार्यरूपमें स्थित होता है, तब उसकी उक्त दोनों शक्तियाँ
ही भिन्न-भिन्न नाम-रूपोमे प्रकट हो जाती है। अतः श्रुतिमे जो ब्रह्मको निर्विशेष
बताया गया है, वह उसकी कारणावस्थाको लेकर है और जो उसे अपनी
शक्तियोंसे युक्त एवं सविशेष बताया है, वह उसकी कार्यावस्थाको लेकर है।
इस प्रकार श्रुतिमे उसके कारण और कार्य दोनो स्वरूपोका वर्णन हुआ है,
इसलिये यह सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमात्मामे उसकी शक्ति सदा ही अभिन्न
रूपसे विद्यमान रहती है।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं—
प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ ३ । २ । २८ ॥
वा=अथवा; प्रकाशाश्रयवत्=प्रकाश और उसके आश्रयकी भाँति उनका
अभेद है; तेजस्त्वात्=क्योंकि तेजकी दृष्टिसे दोनो एक ही हैं।
व्याख्या-जिस प्रकार प्रकाश और उसका आश्रय सूर्य वास्तवमें तेजकी दृष्टिसे
अभिन्न हैं तो भी दोनोंको पृथक्-पृथक् कहा जाता है; उसी प्रकार परमेश्वर और उसकी
शक्ति-विशेष वास्तवमें अभिन्न होनेपर भी उनका अलग-अलग वर्णन किया
जाता है। भाव यह कि प्रकाश और सूर्यकी भाँति परमात्मा और उसकी
प्रकृतिमें परस्पर भेद नहीं है तो भी इनमें भेद माना जा सकता है।
सम्बन्ध-पुनः उसी बातको समझानेके लिये कहते हैं—
पूर्ववद्वा ॥ ३ । २ । २९ ॥
वा=अथवा; पूर्ववत्=जिस प्रकार पहले सिद्ध किया जा चुका है, वैसे ही
(दोनोंका अभेद समझ लेना चाहिये)।

सूत्र २८—३१ ] अध्याय ३ २४७

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सूत्र २८—३१ ] अध्याय ३ २४७
व्याख्या—अथवा पहले ( सूत्र २ । ३ । ४३ में ) जिस प्रकार परमात्मा-
का अपने अंशभूत जीवसमुदायसे अभेद सिद्ध किया गया है, उसी प्रकार यहाँ
शक्ति और शक्तिमान्‌का अभेद समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—शक्ति और शक्तिमान्‌के अभेदका मुख्य कारण बताते हैं—
प्रतिषेधाच्च ॥ ३ । २ । ३० ॥
च=तथा; प्रतिषेधात्=दूसरेका प्रतिषेध होनेसे ( भी अभेद ही सिद्ध
होता है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमे कहा गया है कि 'यह जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र
परमात्मा ही था, दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था ( ऐ० उ० १ । १ ।
१ ) । इस कथनमे अन्यका प्रतिषेध होनेके कारण भी यही समझा जाता है कि
जगत्की उत्पत्तिके पहले प्रलयकालमे उस परब्रह्म परमेश्वरकी दोनो प्रकृतियों
उसमे विलीन रहती हैं; अतः उनमे किसी प्रकारके भेदकी प्रतीति नहीं होती
हैं; इसीलिये उनका अभेद बताया गया है ।
सम्बन्ध—यहाँतक उस परब्रह्म परमात्माका अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अभेद
किस प्रकार है ? इसका स्पष्टीकरण किया गया । अब उन दोनोंसे उसकी
विलक्षणता और श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं—
परमतः सेतून्मानसंबंधभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३ । २ । ३१ ॥
अतः=इस जड-चेतनरूप दोनों प्रकृतियोंके समुदायसे; परम्=( वह ब्रह्म )
अत्यन्त श्रेष्ठ है; सेतून्मानसंबंधभेदव्यपदेशेभ्यः=क्योंकि श्रुतिमे सेतु, उन्मान,
सम्बन्ध तथा भेदका वर्णन ( करके यही सिद्ध ) किया गया है ।
व्याख्या—इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्‌की कारणभूता जो भगवान्‌की
अपरा एवं परा नामवाली दो प्रकृतियाँ हैं ( गीता ७ । ४, ५ ), श्वेताश्वतरोप-
निषद् ( १ । १० ) में जिनका 'क्षर' और 'अक्षर' के नामसे वर्णन हुआ है,
श्रीमद्भगवद्गीतामें कहीं क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके नामसे ( १३ । १ ) तथा कहीं प्रकृति
और पुरुषके नामसे ( १३ । १९ ) जिनका उल्लेख किया गया है, उन दोनो
प्रकृतियोंसे तथा उन्हींके विस्ताररूप इस दृश्य जगत्‌से वह परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वथा
विलक्षण एवं परम श्रेष्ठ है ( गीता १५ । ७ ) । क्योंकि वेदमें उसकी श्रेष्ठता-
को सिद्ध करनेवाले चार हेतु उपलब्ध होते हैं—१ सेतु, २ उन्मान, ३ सम्बन्ध

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२४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
'और ४ भेदका वर्णन । सेतुका वर्णन श्रुतिमें इस प्रकार आया है—'अथ य
आत्मा स सेतुर्विधृतिः ।' ( छा० उ० ८ । ४ । १ )—'यह जो परमात्मा
है, यही सबको धारण करनेवाला सेतु है ।' 'एष सेतुर्विधरणः' ( बृह०
उ० ४ । ४ । २२ )—'यह सबको धारण करनेवाला सेतु है ।' इत्यादि ।
दूसरा हेतु है उन्मानका वर्णन । उन्मानका अर्थ है सबसे बड़ा माप—महत्
परिमाण । श्रुतिमे उस परमेश्वरको सबसे बड़ा बताया गया है—'तावानस्य
महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।'
( छा० उ० ३ । १२ । ६ )—'उतनी उसकी महिमा है, वह परम पुरुष
परमात्मा इससे भी श्रेष्ठ है । सम्पूर्ण भूत-प्राणी इसका एक पाद है और शेष
तीन अमृतस्वरूप पाद अप्राकृत परमधाममे है ।' तीसरा हेतु है सम्बन्धका
प्रतिपादन । परब्रह्म परमेश्वरको पूर्वोक्त प्रकृतियोका स्वामी, शासक एवं सञ्चालक
बताकर श्रुतिने इनमें स्वामि-सेवकभाव, शास्य-शासकभाव तथा नियन्तृ-नियन्तव्य-
भावरूप सम्बन्धका उपपादन किया है । जैसे—'ईश्वरोके भी परम महेश्वर,
देवताओके भी परम देवता, पतियोंके भी परम पति, समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी एवं
स्तुति करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हम जानते हैं ।'* (श्वेता० उ० ६।७)
'वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सबका स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु,
कालका भी महाकाल, समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला
है । वह प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, समस्त गुणोंका शासक तथा जन्म-मृत्यु-
रूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ।'†
चौथा हेतु है भेदका प्रतिपादन । उस परब्रह्म परमात्माको इन दोनों
प्रकृतियोंका अन्तर्यामी एवं धारण-पोषण करनेवाला बताकर तथा अन्य प्रकारसे
भी श्रुतिने इनसे उसकी भिन्नताका निरूपण किया है ।‡

  • यह मन्त्र पृष्ठ ७७'मे आ चुका है ।
    † स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद् यः ।
    प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥(श्वेता०६।१६)
    ‡ देखिये ( श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय ४ के ६, ७, ८-१४-१५ आदि मन्त्र ),
    ( मु० उ० ३ । १ । १, २ ), ( श्वेता० उ० १ । ९ ) ( बृह० उ० ३ । ४ । १-२ तथा
    ३ । ७ । १ से २३ तक ) ।

सूत्र ३२ ] अध्याय ३ २४९

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सूत्र ३२ ] अध्याय ३ २४९
इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ,
सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार, सबका स्वामी परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियोंसे अत्यन्त
विलक्षण और परम श्रेष्ठ है; क्योंकि इन श्रुतियोंमें कहा हुआ उन परमात्माका
स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधिरहित है तथा उस परब्रह्मको जाननेका फल
परम शान्तिकी प्राप्ति,* सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होना† तथा अमृतको
प्राप्त होना बताया गया है ।‡
सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि उस परब्रह्म परमात्माका
अपनी अपरा और परा नामक प्रकृतियोंके साथ अभेद भी है और भेद भी ।
अब यह जिज्ञासा होती है कि इन दोनोंमेंसे अभेदपक्ष उत्तम है या भेदपक्ष ?
अतः इसका निर्णय करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं—
सामान्यात्तु ॥ ३ । २ । ३२ ॥
सामान्यात् = श्रुतिमें भेद-वर्णन और अभेद-वर्णन दोनों समानभावसे हैं
इससे; तु = तो (यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं)।
व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको सबका ईश्वर§, अधिपति×, प्रेरक+, शासक-
और अन्तर्यामी= बतानेवाली भेदप्रतिपादक श्रुतियाँ जिस प्रकार प्रमाणभूत हैं,
उसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ (छा० उ० ६ । ८ वेंसे १६ वें खण्डतक)—‘वह
ब्रह्म तू है’, ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृह० उ० २ । ५ । १९)—‘यह आत्मा

  • तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति। (श्वेता० उ० ४ । ११)
    ‘ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ।’ (श्वेता० उ० ४ । १४)
    ‘तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥’
    (क० उ० २ । २ । १३)
    † ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः । (श्वेता० उ० १ । ११)
    ‡ तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय । (श्वेता० उ० ३ । ८)
    § ‘एष सर्वेश्वरः’ (मा० उ० ६)
    × ‘एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः ।’ (बृह० उ० ४ । ४ । २२)
  • ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’ (श्वेता० उ० १ । १२)
  • ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’
    (बृह० उ० ३ । ८ । ९)
    = ‘एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।’ (बृह० उ० ३ । ७ । ३)

पादवत् =** अवयवरहित परमात्माके चार पाद बताये जानेकी भाँति;

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२५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
ब्रह्म है।' इत्यादि अभेदप्रतिपादक श्रुतियाँ भी प्रमाण हैं। दोनोंकी प्रामाणिकता-
मे किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं है। इसलिये किसी एक पक्षको श्रेष्ठ और दूसरेको
इसके विपरीत बताना कदापि सम्भव नहीं है। अतः भेद और अभेद दोनो ही
पक्ष मान्य हैं।
सम्बन्ध—श्रुतिमें कहीं तो उस ब्रह्मको अपनेसे भिन्न मानकर उसकी
उपासना करनेके लिये कहा है; यथा—'तंह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै
शरणमहं प्रपद्ये' (श्वेता० उ० ६।१८)—'परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट
करनेवाले उन प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मै संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छावाला
उपासक शरण लेता हूँ।' इस मन्त्रके अनुसार उपासक अपनेसे भिन्न उपास्य-
देवकी शरण ग्रहण करता है। इससे भेदोपासना सिद्ध होती है और कहीं
'तत्त्वमसि' (छा० उ० ६।८।७)—'वह ब्रह्म तू है।' 'अयमात्मा ब्रह्म'
(बृह० उ० २।५।१९)—'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म
तज्जलानिति शान्त उपासीत' (छा० उ० ३।१४।१)—'यह सब जगत्
ब्रह्म है; क्योंकि उसीसे उत्पन्न होता, उसीमें रहकर जीवन धारण करता और
उसीमें लीन हो जाता है; इस प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना करे।' इत्यादि
वचनोंद्वारा केवल अभेदभावसे उपासनाका उपदेश मिलता है। इस प्रकार कहीं
भेदभावसे और कहीं अभेदभावसे उपासनाके लिये आदेश देनेका क्या अभिप्राय
है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
बुद्ध्यर्थः पादवत् ॥ ३ । २ । ३३ ॥
पादवत् = अवयवरहित परमात्माके चार पाद बताये जानेकी भाँति;
बुद्ध्यर्थः = मनन-निदिध्यासन आदि उपासनाके लिये वैसा उपदेश है।
व्याख्या— जिस प्रकार अवयवरहित एकरस परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व
समझानेके लिये उसके चार पादोंकी कल्पना करके श्रुतिमें उसके स्वरूपका
वर्णन किया गया है, (मा० उ० २) उसी प्रकार पूर्वोक्त रीतिसे भेद या
अभेदभावसे उपासनाका उपदेश उस परमात्माके तत्त्वका बोध करानेके लिये ही
किया गया है; क्योंकि साधककी प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। कोई
भेदोपासनाको ग्रहण करते हैं, कोई अभेदोपासनाको। किसी भी भावसे उपासना
करनेवाला साधक एक ही लक्ष्यपर पहुँचता है। दोनों प्रकारकी उपासनाओंसे
होनेवाला तत्त्वज्ञान और भगवत्प्राप्तिरूप फल एक ही है। अतः परमात्माके तत्त्वका

सूत्र ३३—३५ ] अध्याय ३ २५१

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सूत्र ३३—३५ ] अध्याय ३ २५१
बोध करानेके लिये साधककी प्रकृतिके अनुसार श्रुतिमे भेद यां अभेद उपासनाका
वर्णन सर्वथा उचित ही है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि ब्रह्म और उसकी दोनों
प्रकृतियोंमें भेद नहीं है तो ब्रह्मकी परा प्रकृतिरूप जो जीव-समुदाय हैं, उनमें
भी परस्पर भेद सिद्ध नहीं होगा। ऐसा सिद्ध होनेसे श्रुतियोंमें जो उसके नानात्व-
का वर्णन है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं—
स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ॥ ३ । २ । ३४ ॥
प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदिकी भाँति; स्थानविशेषात् = शरीररूप स्थानकी
विशेषताके कारण ( उनमें नानात्व आदि भेदका होना विरुद्ध नहीं है )।
व्याख्या—जिस प्रकार सभी प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जातिकी दृष्टिसे एक
हैं, किन्तु दीपक, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदिमे स्थान और
शक्तिका भेद होनेके कारण इन सबमे परस्पर भेद एवं नानात्व है ही; उसी
प्रकार चैतन्य-धर्मको लेकर सब जीव-समुदाय अभिन्न हैं, तथापि जीवोंके अनादि
कर्म-संस्कारोंका जो समूह है, उसके अनुसार फलरूपमे प्राप्त हुए शरीर, बुद्धि
एवं शक्ति आदिके तारतम्यसे उनमें परस्पर भेद होना असङ्गत नहीं है।
सम्बन्ध—उसी बातको दृढ करनेके लिये कहते हैं—
उपपत्तेश्च ॥ ३ । २ । ३५ ॥
उपपत्तेः=श्रुतिकी संगतिसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है )।
व्याख्या—श्रुतिमें जगत्की उत्पत्तिसे पहले एकमात्र अद्वितीय परमात्माकी ही
सत्ता बतायी गयी है। फिर उसीसे सबकी उत्पत्तिका वर्णन करके उसे सबका
अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया है। उसके बाद 'तत्त्वमसि' (वह
ब्रह्म तू है ) इत्यादि वचनोंद्वारा उस परमात्माको अपनेसे अभिन्न मानकर उसकी
उपासना करनेके लिये उपदेश दिया गया है। फिर उसीको भोक्ता, भोग्य आदिसे
युक्त इस विचित्र जड-चेतनात्मक जगत्का स्रष्टा, सञ्चालक तथा जीवोंके कर्मफल-
भोग एवं बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेवाला कहा गया है। जीवसमुदाय तथा
उनके कर्मसंस्कारोंको अनादि बताकर उनकी उत्पत्तिका निषेध किया गया हैं।
इन सब प्रसङ्गोंपर विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि जीव-समुदाय चैतन्य-
जातिके कारण तो परस्पर एक या अभिन्न हैं; परन्तु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित